लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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politicianसमापन क़िस्त
[इस कहानी के प्रथम अंश में हमने देखा कि किस तरह विनय राजनीति में आया और किस तरह छः महीने के अंदर स्वतन्त्र उम्मीदवार से फिर एक पार्टी और फिर दूसरी पार्टी में शामिल हुआ.अब आगे देखते हैं जिंदगी क्या रंग बदलती है.]
विनय की कहानी को आगे बढ़ाने के पहले मैं आपलोगों को याद दिला दूँ कि जब मैंने यह कहानी प्रारम्भ की थी,तो मैंने कहा था कि यह आठ वर्षों की कहानी है,पर जब इसका पहला चरण समाप्त हुआ ,तो इस कहानी के नायक के राजनैतिक जिंदगी के केवल पांच महीने बीते थे.इन पांच महीनों में उसने कितने रंग बदले यह भी आपलोगों ने अवलोकन किया.आप कहेंगे यह भी कोई बात हुई. अब वह एक राष्ट्रीय दल का सदस्य है.उसके तरफ से निगम पार्षद है.इसके बाद इस युवक के आगे बढ़ने के लिए पार्टी में अनेक अवसर है. अब उसकी बंधी बंधाई जिंदगी है, अब तो उसका पीछा छोड़िए और अपने काम धंधे की ओर ध्यान दीजिये.अगर ऐसा होता तो शायद मैं भी प्रसन्न होता और कहानी भी समाप्त हो गयी होती,पर अभी तो इस कहानी में अन्य कई मोड़ आने हैं.
अब एक तरह से विनय का राजनैतिक जीवन एक ढर्रे पर आ गया था.ऐसे भी अभी तक तो उसके पार्षद बने हुए महज छःमहीने ही बीते थे.वह मोहल्ले का चहेता भी बन गया था.इतने कम समय में हीं उसकी एक पहचान बन गयी थी,हालाँकि दबी जबान से उसके इस दल बदलूपन की भी चर्चा चल ही रही थी.साल बीतने के पहले ही विधान सभा का भी चुनाव सर पर था.वहां के वर्तमान विधायक भी उसी के पार्टी के थे.विनय ने उनके चुनाव प्रचार में अथक परिश्रम की.लग रहा था कि वे भी इसके कार्यों से प्रसन्न थे,पर बाद की घटनाओं से कुछ और ही तथ्य सामने आया.
फिर आया लोकसभा का चुनाव.उस क्षेत्र से उसी के पार्टी के उम्मीदवार के पुनर्निर्वाचन का अवसर आया.इसकी जीत से विनय के अंदर आशा की एक नयी किरण प्रस्फुटित हुई,क्योंकि सांसद उसको हमेशा यथोचित सम्मान देता रहा.इसी बीच विनय ने राज्य के मुख्य मंत्री से भी ताल मेल बैठा लिया.एक बात पर मैंने गौर किया कि अब वह लोगों से अपनी ताल मेल बैठाने की कला में धीरे धीरे पारंगत हो रहा था,पर अभी कुछ अड़चने ऐसी थी, जिनको वह धीरे धीरे हटाने का प्रयत्न कर रहा था.
लोकसभा का चुनाव संपन्न होने के साथ विनय को इस पार्टी में सम्मिलित हुए करीब डेढ़ वर्ष बीत चुके थे.अपने क्षेत्र में काम भी वह ठीक ठाक से कर रहा था,बावजूद इसके कि निगम में उसकी पार्टी का शासन नहीं था.
एक बात की ओर मेरा ध्यान रह रह कर जा रहा था.लगता था कि विनय अंदर ही अंदर कुछ बेचैनी महसूस कर रहा है.खासकर ऐसा लग रहा था कि विनय को, शर्मा जी का उसपर एकाधिकार खलने लगा था.मैं तो इसे एक लम्बे अरसे से अवलोकन कर रहा था,पर चुपचाप था,क्योंकि मेरा इस बारे में कुछ कहना अनधिकार चेष्टा लग रहा था.पर जब उसने बात निकाली तो मुझे बताना पड़ा कि मैं स्वयं यह नहीं पसंद कर रहा हूँ.
ऐसे शर्मा जी के साथ मैं इतने वर्षों से जुड़ा हुआ था कि मैं उनके स्वभाव को अच्छी तरह पहचानता था.अपनी आदत के अनुसार मैंने साफ़ साफ़ कहा,”आपमें कुछ कमजोरियां हैं पहले उसको दूर कीजिये.आप पहले लोगों के सामने खुल कर बोलना शुरू कीजिये.शिष्टाचार में तो आप बहुत कुशल हैं.लोगों को अच्छा नहीं लगता कि बोलने किसी भी अवसर पर आप थोड़ा बोलकर शर्मा जी की ओर ईशारा कर देते हैं. या अपने बदले भी उन्हीं को बोलने को कहते हैं.बोलने की कला का विकास अपने आप हो जायेगा.पहले तो सामयिक समस्याओं का बारीकी से अध्ययन कीजिये.बोलते समय अपने को विषय पर केंद्रित कीजिये और जो भी बोलिए साफ़ साफ़ बोलिए.आप इस तरह इन सब कठिनाइयों को पार कर लेंगे.”
अब विनय पूरी तरह खुलाऔर बताया कि शर्मा जी तो यहां तक चाहते हैं कि कोई भी अधिकारी उससे मिलने के पहले शर्मा जी से मिले.मेरे विचार से यह तो हस्तक्षेप की पराकाष्ठा थी.मैंने सीधे सीधे कहा,” अपने स्वतन्त्र व्यक्तित्व का विकास कीजिये और इन सब मामलों को अपने हाथ में लीजिये”.
अब मुझे लगने लगा था कि वह अपने को एक नेता के रूप में विकसित कर रहा है,पर अभी तो बहुत कुछ होना शेष था.
शर्मा जी से उसकी दूरी बढ़ने लगी, पर पराकाष्ठा तो तब हो गयी जब उसने सीधे सीधे शर्मा जी के अधिकार क्षेत्र में दखल देने की ठानी.उसने तय किया कि सोसाइटियों के इस ग्रुप वाले प्रबंध समिति पर कब्ज़ा किया जाये.उसके सहयोगियों ने भी हाँ में हाँ मिलाई.इस तरह एक तरह से शर्मा जी और उनके सहयोगियों के एकछत्र राज्य को समाप्त करने की योजना बन गयी.जब इसकी घोषणा हुई तो इसका मतलब साफ़ था. उसने शर्मा जी से पूरी तरह पीछा छुड़ाने की ठान ली थी.इधर कुछ वर्षों से शर्मा जी ने भी एक तरह से तानाशाही रवैया अपना लिया था, अतः मैंने भी इस योजना में उसका साथ दिया.हालाँकि उसने खतरनाक रास्ता चुना था,पर इससे उसके अपने निगम वाले अधिकार क्षेत्र में तो कोई आंच आना नहीं था.
चुनाव हुआ.पूरा मोहल्ला दो भागों में बँट गया,पर यह चुनाव शर्मा जी और उनके सहयोगियों ने जीत लिया.लगभग तीस हजार आबादी वाले उस मोहल्ले में इससे किसी कि लोकप्रियता तो नहीं जांची जा सकती थी,क्योंकि इस चुनाव में प्रत्येक सोसायटी के केवल चुने हुए प्रतिनिधियों ने भाग लिया था,पर विनय जैसा नया खिलाड़ी तो हतप्रभ रह गया.वह तो इसके के लिए तैयार ही नहीं था.उसने तो पार्षद के पद से भी इस्तीफा देने का मन बना लिया.बड़ी मुश्किल से उसको मनाया गया और बताया गया कि यह मोहल्ले का उसके प्रति अविश्वास प्रस्ताव नहीं है ,क्योंकि आम जनता ने इसमे हिस्सा नहीं लिया है.इसके अतिरिक्त यह मुहल्ला तो उसके कार्य क्षेत्र का केवल एक तिहाई हिस्सा है.ऐसे भी जिस तरह वह कार्य कर रहा था,उससे जनता उसके साथ थी.पता नहीं वह पूरी तरह सतुष्ट हुआ या नहीं ,पर इस्तीफा देने का इरादा छोड़ दिया.
इसके बाद तो वह घटना घटी,जिसके लिए मैं कतई तैयार नहीं था.एकबार विनय के कुछ सहयोगियों ने साधारण रूप से कुछ कहा अवश्य था कि हमलोग मोहल्ले के लिए दूसरी समिति क्यों न बना लें. मैंने ऐसा करने से मना किया था. पर लगता है भीतर ही भीतर वे लोग तैयारी करते रहे और शायद उनको स्थानीय सांसद से भी सहयोग मिल गया.समिति की रूप रेखा तैयार करने के बाद मुझे बताया गया और सदस्य बनने का अनुरोध किया गया.सदस्य्ता दो तरह की थी,आजीवन और वार्षिक. उनलोगों को पूरी उम्मीद थी कि मैं आजीवन सदस्य बन जाऊंगा,पर मैनेअनमने मन से एक वर्ष के लिए सदस्य बनना स्वीकार किया और समिति में किसी तरह का पद लेने से इंकार कर दिया.उस समिति के साथ मेरा इतना ही सहयोग रहा. दूसरे ग्रुप के लिए यह दूसरी बार आश्चर्य का कारण बना. पहली बार तो उन्हें तब आश्चर्य हुआ था,जब मैं चुनाव नहीं लड़ा था और इसबार जब मैंने नई समिति में कोई पद नहीं लिया.
विनय अपने वार्ड में अपना काम बखूबी करता रहा.कुछ शिकायतें अवश्य आयीं,पर अधिकतर लोग उसके कार्य से संतुष्ठ नजर आते थे.उसका सबसे बड़ा गुण जो लोगों को उसके करीब ला रहा था,वह थी उसकी विनम्रता.
यह सब तो हो रहा था.शर्मा जी केसाथ छूटने के बावजूद उसकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आ रही थी.समय बीतते देर नहीं लगती.देखते देखते अगले चुनाव का समय नजदीक आने लगा.मुझे तो विश्वास था कि पार्टी उसे उम्मीदवार बनाएगी हैं,पर वह आश्वस्त नहीं था.लगता था कि स्थानीय विधायक से उसका मनमुटाव बहुत आगे बढ़ गया था.स्थानीय विधायक की गिनती वरिष्ठ विधायकों में होती थी.उसकी मुख्य मंत्री से निकटता विनय की चिंता और बढ़ा रही थी.मैंने उसको इस पर ज्यादा न सोचने की सलाह दी और अपना कार्य करते रहने को कहा.चुनाव के सात आठ महीने रह गए थे.उसी समय मुझे कुछ कार्यवश कुछ महीनों के लिए नगर से बाहर जाने का कार्यक्रम बनाना पड़ा.विनय को यह अच्छा नहीं लगा,पर मेरी अपनी मजबूरी थी.मैं यह भी जानता था कि मैं चुनाव से पहले आ जाऊँगा.
चुनाव के डेढ़ महीने पहले मैं आ गया.तब तक शायद उसे इत्मीनान हो चूका था कि उसे पार्टी का उम्मीदवार नहीं बनाया जायेगा.यह भी एक अजीब विडम्बना थी.विनय युवा था,कर्मठ था.क्षेत्र में उसकी अच्छी प्रतिष्ठा ही,फिर भी टिकट न देना,एक तरह से ज्यादती नजर आ रही थी.शायद स्थानीय विधायक ने यह तर्क दिया होगा कि शर्मा जी का वरद हस्त नहीं होने के कारण वह चुनाव नहीं जीत सकेगा.अब उसे अपने भविष्य की दिशा तय करनी थी.मैंने तो उसे किसी भी हालात में पार्टी न छोड़ने की सलाह दी,पर अधिकतर लोगों की सलाह इसके विपरीत थी.अंत में वही हुआ,जो मैं नहीं चाहता था.विनय को पार्टी का टिकट नहीं मिला और उसने स्वतन्त्र उम्मीदवार के रूप में पर्चा दाखिल कर दिया.इस तरह उसने दूसरी बार पार्टी छोड़ दी और आ गया अपने प्रारंभिक मुकाम पर. जीत के लिए पांच वर्ष पहले वाले प्लान पर ही अमल करने को सोचा गया.इस बार यह लाभ अवश्य था कि विनय अपने काम के बल पर वोट मांग सकता था,पर हानि यह थी कि वह दो दो बार पार्टी छोड़ चूका था.खैर चुनाव हुआ और परिणाम फिर विनय के पक्ष में आया.मतों की संख्या कम होने पर भी उसके जीत का अंतर पिछली बार से ज्यादा था.यह उम्मीदवारों कि संख्या ज्यादा होने के कारण था.जिस राष्ट्रीय पार्टी ने विनय को उम्मीदवार नहीं बनाया था ,उसका उम्मीदवार पांचवें स्थान पर रहा और उसकी जमानत भी जब्त हो गयी .
तो हमारा नायक फिर से पार्षद बन गया,पर इसी बीच पांच वर्ष बीत गए थे.. उत्तर चढ़ाव तो अवश्य आये,पर कहानी तो फिर उसी मोड़ पर आ गयी ,जहाँ से शुरू हुई थी.विनय के राजनैतिक जीवन का उथल पुथल बरकरार रहा.ऐसे तो न भारत में और न उसके नगर में राजनैतिक दलों की कमी थी, वह फिर से किसी भी राजनैतिक दल में शामिल हो सकता था पर नहीं ,वक्त को तो कुछ और गुल खिलाने थे.
निगम के इस चुनाव के एक वर्ष पहले ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन ने जोर पकड़ लिया था.मैं भी उस आंदोलन का हिस्सा बन गया था,पर हमारे नायक को उससे कुछ लेना देना था नहीं.वह तो अपनी गोटी बैठाने में व्यस्त था. ऐसे भी वह शासक वर्ग के साथ था,अतः आंदोलन का हिस्सा बन भी नहीं सकता था..
पर नहीं. अभी तो बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना शेष था. निगम के चुनाव के शायद चार महीने हीं बीते होंगे कि आंदोलन चलाने वाले समूह को उसकी सफलता में संदेह होने लगा.जिनके विरुद्ध आंदोलन हो रहा था,उन्होंने चुनौतियाँ देना भी आरम्भ कर दिया कि क़ानून में परिवर्तन कराना है,तो चुनाव जीत कर आओ और नए क़ानून बनाओ.चुनौती स्वीकार करने की बात हो या फिर आंदोलन की सफलता में गतिरोध से उत्पन्न निराशा,आंदोलन के बड़े हिस्से ने आपस में मिलकर एक पार्टी बनाने की ठान ली.मैं स्वयं पार्टी बनाये जाने के पक्ष में था, पर यह सब इतना आसान भी नहीं था पार्टी बनाने की औपचारिकता तो बात की बाद थी उसके बारे में गंभीरता पूर्वक विचार करने के समय ही आंदोलन कर्ता दो हिस्सों में बँट गए.एक बड़ा हिस्सा पार्टी बनाने के पक्ष में उभरा तो आंदोलन के नेता और बहुत से प्रभावशाली व्यक्ति जो आंदोलन का हिस्सा थे,इसके विरुद्ध में खड़े हो गए.फिर भी औपचारिक घोषणा के बाद पार्टी बनी पार्टी बनते हीं मैं एक आम सदस्य के रूप में पार्टी में शामिल हो गया और विनय से भी पार्टी की सदस्यता का परचा भरवा दिया.हालांकि अभी भी वह विचार करना चाहता था,पर मैंने कहा,”वह बाद में कर लेंगे”.उसका सोचना सही था.उसके समर्थकों की क्या प्रतिक्रिया होगी,यह भी जानना उसके लिए आवश्यक था.इसके अतिरिक्त यह तो अँधेरे में तीर मारने जैसा था.मैंने उसे समझाया,” अगर सचमुच में आपको आगे बढ़ना है तो आपको यह जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा.आप अभी युवा हैं और यह युवकों की पार्टी होने जा रही है.एक बार पार्टी के कर्णधारों की नजर में आप आ गए,तो आपको ऊपर उठने में देर नहीं लगेगी”.
इसी बीच मेरी प्रेरणा से वह एक दो धरने में भी शामिल हो चूका था.यह तो मुझे बाद में पता चला कि वह इन धरनों में सेल्फ़ी लेता रहा था,जिसे समय आने पर वह प्रमाण के रूप में पेश कर सके.
हमारा नायक भाग्यशाली भी कम नहीं है.इसी बीच उसके भाग्य से एक ऐसा मोड़ आया जिसने उसे आंदोलन का हिस्सा प्रमाणित कर दिया,पर केवल कर्णधारों की निगाह में.
पार्टी बनने के दो चार दिन हीं बीते होंगे. एक मंत्री के विरुद्ध राजधानी में धरने दिए जा रहे थे.विनय भी उस धरने में एकबार शामिल हुआ.उसी बीच उस मंत्री महोदय ने विवादित और दादागिरी वाला वयान दे दिया.चुनौती दी कि लोग उसके निर्वाचन क्षेत्र में आकर तो देखें.पहुँच तो जाएंगे,पर लौट नहीं पाएंगे. वे शायद भूल गए कि यह पार्टी दूसरों से भिन्न है.नेता के साथ साथ सदस्यों के बहुमत ने भी यह चुनौती स्वीकार कर ली और तय हो गया कि अमुक दिन सब वहां पहुँच जाएंगे.मुझे अपनी कहानी के नायक के लिए यह एक स्वर्ण अवसर दिखा.मुझे तो जाना ही था,पर मैंने सोचा कि अगर विनय वहां गया तो जब भी वह औपचारिक रूप सेपार्टी का सदस्य बनेगा तो पार्टी को प्रभावित करने के लिए उसके पास यह एक सुनहरा प्रमाण होगा.
बात उसकी समझ में आ गयी और हम पांच लोग उसकी कार से करीब ढाई सौ किलोमीटर का सफर तय करके वहां पहुँच ही गए और रैली का हिस्सा बन गए.आंदोलन में साथ देने के कारण मुझे बहुत लोग पहचानते थे,पर विनय को पहचानने वाला वहां शायद ही कोई था.जो जो सामने आता गया,उनसे मैं विनय का परिचय कराता गया.ऐसे भी पार्टी आफिस में मैं कुछ लोगों से उसका परिचय पहले भी करा चुका था., पर उन्होंने उसको कोई खास महत्त्व नहीं दिया था,अतः वह थोड़ा विक्षुब्भ भी था,फिर भी मेरे कहने के मुताबिक बढ़ते जा रहा था.
वहां पहली बार मैंने बार एक बात पर गौर किया.इस तरफ मेरा ध्यान कभी नहीं गया था.मैं आंदोलन का हिस्सा रहा था और आंदोलन की अनगिनत तस्वीरें ली थी,पर अपनी तस्वीर लेने की मैंने कभी कोशिश नहीं की थी. मैं देख रहा था कि विनय अपने फोन से सेल्फ़ी लेने का प्रयत्न कर रहा है,पर कुछ गड़बड़ी के कारण वैसा हो नहीं पा रहा था.मैंने उसकी सहायता करनी चाही,पर उसके कैमरे से फोटो नहीं लिए जा सके.तब मैंने उसकी तस्वीरें अपने फोन के कैमरे सेखींच ली.उसे संतोष नहीं हुआ.उसे लगा कि वे तस्वीरें उसके पास कैसे पहुंचेगी.मैंने उसे विश्वास दिलाया कि मेल से दूसरे दिन सुबह वे तस्वीरें उसको मिल जाएंगी और हुआ भी ऐसा ही
यह एक ऐसा ठोस प्रमाण उसके पास हो गया,जिसका उसने भविष्य में बहुत अच्छा इस्तेमाल किया.
अब वह पार्टी के कार्यक्रमों में भी भाग लेने लगा,पर उसकी पहचान बन नहीं पा रही थी. कभी कभी वह हतोत्साहित हो जाता था,पर मैं उसका साहस बढ़ाता रहा.अंत में उसका प्रयत्न रंग लाया.पार्टी के नेतृत्व ने उसको पहचाना.फिर क्या था?पार्टी को भी चुने हुए सदस्यों की आवश्यकता थी.उसको विधिवत बड़े तामझाम से पार्टी में शामिल किया गया.मैंने उसको कहा था कि पार्टी में शामिल होने के साथ ही उसे मोहल्ला सभा करनी पड़ेगी.वही हुआ.इसी बीच मेरा दिया हुआ,पार्टी का बाइबल समझजाने वाला पुस्तक भी पढ़ चूका था.चुनाव का भी जल्द घोषणा होने का अहसास सबको था ही.पार्टी का नामकरण और रजिस्ट्रेशन तो हो ही चूका था.
समय बदलते देर नहीं लगती. कुछ दिनों पहले जो विनय पार्टी में प्रवेश के लिए छटपटा रहा था, अब पार्टी के नेताओं में से था.कुछ लोगों को उसका यों ऊपर उठना खल भी रहा था,बिना आंदोलन का हिस्सा बने हुए,वह केवल एक बार की रैली में भाग लेने की बदौलत वह पार्टी नेतृत्व का विश्वास जीतने में सफल हो गया था.कुछ ही दिनों में उसे पार्टी के नेताओं में गिना जाने लगा.अब तो चुनाव प्रक्रिया में उम्मीदवार चुनने वाली पंचसदसीय समिति का एक सदस्य भी बन गया था. इसी बीच पार्टी के विजन दस्तावेज की भी रूप रेखा बनने लगी और उम्मीदवार चुनने का मुख्य जिम्मा कार्यकर्ताओं पर आ गया, जो अपने ढंग का अनोखा प्रयोग था,पर अंतिम निर्णय तो उसी पांच सदस्यीय समिति को ही लेना था.उसमें भी उसने अपनी चाल चलने का प्रयत्न किया था,पर लोगों ने ध्यान नहीं दिया.दर असल उसने अपना नाम भी उम्मीदवारों की सूची में शामिल कराने में कामयाबी हासिल कर ली थी.
मैंने आरम्भ में ही उसे एक सलाह दी थी.उसे कहा था कि वह इस चुनाव में उम्मीदवार न बने.मैंने उसको आगामी लोक सभा के लिए तैयारी करने को कहा था. मेरा यह सलाह अकारण नहीं था. दो ख़ास कारण थे. एक तो वह आंदोलन का हिस्सा नहीं था,अतः वालंटियर्स न तो उसको पहचानते थे और न उसको महत्त्व देते थे.उन लोगों को वह थोपा हुआ नेता लगता था.दूसरे वह जिस क्षेत्र से निगम का पार्षद था,वह क्षेत्र विधान सभा के आरक्षित क्षेत्र में आता था.मुझे लग रहा था कि अगर वह एक संसदीय क्षेत्र के विधान सभा उम्मीदवारों के प्रचार में लगेगा तो उसका पहचान क्षेत्र बढ़ जाएगा और तब तक पार्टी स्थापित भी हो जाएगी.ऐसे भी मैंने उसको समझाया था कि एक छोटे राज्य के विधायक बनने से ज्यादा अच्छा है कि वह संसद में जाए. एक लाभ यह भी होगा कि लोग इसे उसका त्याग समझेंगे.
पर ऐसा हुआ नहीं.उसने अपने लिए नजदीक का ही एक क्षेत्र चुन लिया और तब मुझे बताया.
मैं क्या करता?साथ देना मेरी मजबूरी थी.उसने तो मुझे बताने के पहले अपने लिए निर्वाचन दफ्तर इत्यादि का भी चुनाव कर लिया था,पर जब मैं उसके साथ वहां गया तो मुझे अहसास हो गया कि मेरा सोचना कितना सही था.उस दिन पार्टी के प्रधान का उसके क्षेत्र में आने का प्रोग्राम था.लोग इतने विक्षुब्ध थे कि काले झंडे सेउनका स्वागत करने जा रहे थे,पर ऐसा हुआ नहीं.किसी कारण वस उनका प्रोग्राम टल गया और मुझे मौका मिल गया विस्तृत मुयायाना का.
मैं अपने स्वभावानुसार अलग से उसके क्षेत्र में पहुंचा था,पर अब मैं उसको साथ लेकर चला या यों कहिये कि उसके साथ उसका इलाका देखने चला.मैं देखना चाहता था कि आखिर यह विद्रोह किस हद तक है.एक जगह करीब २० युवा वालंटियर्स खड़े थे.उसमे अधिकतर मुझे पहचानते थे.उन्होंने देखते ही मुझे घेर लिया.मैंने अपने नायक को कुछ दूर रहने का इशारा किया.उनलोगों का पहला प्रश्न था,”चाचा आप यहां कैसे?”
मैंने कहा, “मैं यहाँ क्यों नहीं आ सकता? आपलोग कैसे जानते है कि मैं यहां नहीं रहता?”
उनमे से एक ,जिसको मैं अच्छी तरह पहचानता था,बोला,”चाचा आप हमलोगों को हर जगह मिलते है.अगर आप यहाँ रहते हैं,तो हमलोगों को अभी तक यहाँ क्यों नहीं दिखे?क्या यह संभव था कि अगर आप यहाँ रहते तो हमलोगों को नहीं दीखते?” फिर उसने मेरा नाम पूछा.उस समूह में एक ऐसे सज्जन भी थे,जो प्रौढ़ थे.वे मेरा नाम भी जानते थे और आंदोलन के बीच उनसे परिचय भी हो चूका था.वह परिचय भी संयोग बस ही हुआ था.बाद में पता चला कि वे भी बहुत विक्षुब्ध थे,क्योंकि वे भी अपने को इस क्षेत्र से उम्मीदवार बनाना चाहते थे.मैंने विनय की ओर इशारा .किया.उनलोगों ने ऐसा दर्शाया,जैसे वह उनलोगों के लिए एकदम नया चेहरा हो..ऐसे कुछ हद तक वे सही थे,क्योंकि वह आंदोलन का हिस्सा तो था नहीं. विनय जब उम्मीदवार बन गया था,तो वे लोग उसको पहचानते तो थे ही,पर यह उनका विरोध था ,जो सामने आ रहा था.मैंने इशारे से विनय को वहां से हटने के लिए कहा और उनको समझाना शुरू किया.फिर उस इलाके से उसके उम्मीदवार बनाने की अहमियत भी बताई.करीब करीब सब लोग मेरी बात समझ गए और पूरी तरह से उससे सहयोग करने को तैयार हो गए,पर तीन लोग अंत तक प्रभावित नहीं हुए.. बाद में मैंने विनय को बुलाया और एक एक कर सबसे मिलवाया.उसके चुनाव क्षेत्र से स्थानीय कार्यकर्ताओं की वह मुख्य युवा टीम बनी,जिसने उसका अंत तक जोर शोर से प्रचार कार्य किया.ऐसे विनय अपने इलाके से भी एक टीम ले गया,जो वहां कार्य की देखभाल करते रहे,पर उनका वह प्रभाव कहाँ,जो स्थानीय टीम का था.उत्तर चढाव के बीच चुनाव संपन्न हुआ.विनय का मुकाबला तगड़ा तो था,पर चुनावी लहर ने उसके माथे पर भी जीत का सेहरा बाँध ही दिया.
असली नाटक तो अब आरम्भ हुआ.इस बार चुनाव जीतते ही वह अपने को सबसे बड़ा नेता समझने लगा.पता नहीं,उसने कैसे सोच लिया कि मंत्रिपद तो अब उसकी जेब में है.ऐसे तो चुनाव के पहले वाली रात्रि बेला में उसने ऐसा कार्य किया था,जिससे उसे पार्टी से निकाला जा सकता था,पर उसके दुष्प्रचार के बावजूद वहां से भी उसके पार्टी का उम्मीदवार ही जीता था और वह विनय से ज्यादा मतों के अंतर से विजयी हुआ था.असल में मैं उसी उम्मीदवार के प्रचार का हिस्सा था.विनय के चुनाव क्षेत्र में तो मैं कभी कभी केवल अपने युवा टीम से चुनाव का रूख और प्रचार की दिशा जानने जाया करता था.अगर एक रात् पहले मुझे उसके षड्यंत्र का आभाष भी हो गया होता,तो शायद मेरा नायक चुनाव हार जाता,क्योंकि वह पूरी टीम जो उसका प्रचार कर रही थी,रात्रि में ही उसके विरुद्ध प्रचार के लिए उत्तर जाती.खैर ऐसा हुआ नहीं.अगर ऐसा होता तो शायद उसका असली रंग लोगों के सामने पहले ही आ जाता.
खैर उसके लिए मंत्रिपद पद पाना इतना आसान नहीं था,जितना वह समझ रहा था.अब तो वह अपनेअसली रंग पर उत्तर आया और मंत्री पद पाने के लिए हर तरह का तिकड़म भिड़ाने लगा.उसकी ये हरकतें पार्टी के आंदोलन कारी और तपे हुए नेताओं को नागवार गुजरने लगी.पार्टी प्रमुख स्वयं इस तरह की तिकड़म से प्रभावित होने वाले नहीं थे.वह पार्टी छोड़ने की धमकी देने लगा,पर अपने कुछ शुभ चिंतकों के समझने बुझाने पर उसमे उस समय वह इरादा छोड़ दिया.पर लगता है,कुछ लोगों ने उसके विरुद्ध ठोस प्रमाण जुटाने शुरू कर दिए.लोकसभा का चुनाव भी सर पर था.इसने वहां उम्मीदवार बनना चाहा ,पर पार्टी यह सिद्धांत इसके आड़े आया कि किसी भी विधायक को लोकसभा का उम्मीदवार नहीं बनाया जायेगा.हालांकि पार्टी बाद में इस सिद्धांत पर पूरी तरह कायम नहीं रह सकी.मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पांच छः साल पहले जिसको राजनीति का क,ख,ग भी नहीं मालूम था,वह आदमी इतने काम अरसे में इतना महत्वाकांक्षी हो जाएगा.विनय की कहानी अगर इस मोड़ पर नहीं आती,तो शायद इतनी जल्दी उसको इतनी प्रसिद्धि भी नहीं मिलती.कहावत है कि बदनाम हुए तो क्या हुआ,नाम तो हुआ.टी.वी के महत्वपूर्ण चैनलों पर उसके साक्षात्कार दिखाए गए.रातों रात प्रसिद्धि पाने का यह तरीका बहुत कारगर रहा.
इतना होने के बावजूद विनय ने पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया,क्योंकि तब उसकी विधान सभा में सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती,जो वह गवारा नहीं कर सकता था.खैर उसको विधिवत पार्टी से निकाला गया.उसके लिए उसका पार्टी के उम्मीदवार के विरुद्ध प्रचार वाला मुद्दा भी प्रमाण के रूप में पेश हुआ.पर उसके ठीक पहले विनय ने अपने घर प्रेस कांफ्रेंस बुलाई,जिसका लाइव टेलीकास्ट हुआ,जो अपने आपमें उस कालोनी के लिए रेकॉर्ड था.मैंने मजाक भी किया कि उस इलाके को तो गर्वान्वित होना चाहिए कि उसने एक अंतराष्ट्रीय स्तर का नेता देश को दिया.तो इस तरह विनय के तीसरी पार्टी छोड़ने की गाथा पूर्ण हुई.
लोकसभा का चुनाव गुजर गया.विनय को किसी ने उम्मीदवार नहीं बनाया.चूंकि उसने पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया था,बल्कि उसको निकाला गया था,अतः उसकी विधान सभा की सदस्यता अक्षुण्ण रही,पर कब तक?विधान सभा ऐसे भी निलम्वित थी और कभी भी भंग हो सकती थी. दिन महीनों में बदलते गए,पर विधान सभा भंग नहीं हुई.लोकसभा का चुनाव संपन्न हो ही चूका था. केंद्र में नई सरकार बन चुकी थी.इधर विधान सभा भंग हुई और उधर विनय चौथी पार्टी में शामिल हो गया.अब जब चुनाव की घोषणा हुई,तो विनय चौथी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में आया,इतिफाक की बात कही जाये या उसके नयी पार्टी की चाल समझी जाये कि इस पार्टी ने विनय को उसी विधान सभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया,जहाँ उसके इसके पहले वाली पार्टी का दावेदार .वही व्यक्ति था,जिसने विनय को पार्टी में स्थान बनाने में सबसे ज्यादा सहयोग किया था.
इसके बाद की कहानी बहुत छोटी है..विनय को प्रथम बार हार का मुख देखना पड़ा और वह भी बहुत बुरी तरह.
लोग अब कहने लगे हैं कि विनय के राजनैतिक जीवन का अंत हो गया,पर मैं नहीं मानता.मेरे विचार से भारत में एक नेता जब तक जीवित रहता है,तब तक उसके राजनैतिक जीवन का अंत नहीं होता.

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