लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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friendकुछ बातें ऐसी होती हैं जो याद रह जाती हैं.कुछ ऐसी बातें भी होती हैं,जिन्हे याद रखना पड़ता है.यह घटनाक्रम उन बातों में से है,जो याद रह जाती हैं.

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विनय से मेरा मिलना इतिफाक या संयोग ही था,पर घटनाक्रम कुछ ऐसा रहा कि वह मेरे नजदीक आता गया और आता ही गया.बात बहुत पुरानी नहीं है,पर इतनी भी नई नहीं है.तब से आजतक पुल के नीचे से बहुत पानी बह चूका है.

मेरा अपना जीवन भी बहुत उतार चढाव भरा रहा है.अतः जिंदगी में किसी के साथ जुड़ना या फिर साथ का छूटना मेरे लिए बहुत मतलब नहीं रखता.

विनय के साथ मेरे जुड़ने को किस श्रेणी में रखा जाये यह मुझे भी नहीं पता,अतः मैं सीधे सपाट शब्दों में आठ वर्षों का वह इतिहास ही वर्णित कर देता हूँ,जो मेरी इस उतार चढ़ाव वाली जिंदगी का एकअहम  हिस्सा बन चूका है और शेष मैं विद्व जनों पर छोड़ता हूँ.मैं अपनी बात बढ़ा चढ़ा कर तो नहीं कहूँगा,पर जब कहानी  का काल आठ वर्षों में खींचा हुआ है,तो इसके लम्बा होने का खतरा तो है,पर मेरा प्रयत्न रहेगा कि यह उबाऊ न हो.

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उस दिन शर्मा जी थोड़ा ज्यादा ही उत्तेजित दिखाई दे रहे थे.ऐसे नाटकीयता उनके स्वभाव का अंग है,अतः उनकी नाटकीयता को हमलोग ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते थे,पर उस दिन अवश्य कुछ ख़ास हुआ था जिसके चलते उनकी नाटकीयता भी सामान्य सीमा से कुछ ज्यादा ऊंचाई पर थी.आपात्कालीन मीटिंग ऐसे ही सदस्यों की उत्सुकता बढ़ा रही थी,क्योंकि उन्होंने मीटिंग  की कार्य सूची बताने की भी औपचारिकता नहीं निभाई थी.खैर सौ से अधिक सदस्यों वाली इस समिति के सतर सदस्य इस सभा में उपस्थित थे.

यह समिति भी अपने ढंग की एक ही थी.उस पैंतालीस छ्यलिस सोसायटी वाली कालोनी में समिति का दावा था किवह पूरी कालोनी का प्रतिनिधित्व करती है  उस  समय तक बहुत हद तक यह दावा सही भी था.

हाँ तो सदस्यों में जिनको आना था, वे आ गए.इसी बीच अध्यक्ष भी आ गए.शर्मा जी  के रूप में समिति के सचिव तो पहले से ही उपस्थित थे.दो शब्द अध्यक्ष के बारे में.इनकी उम्र शर्मा जी से ज्यादा थी और शिक्षा में तो वे बहुतों से आगे थे.शर्मा जी की मुश्किलें जब बढ़ती थीं तो वे आगे बढ़ कर संभालने का प्रयत्न करते थे.

सदस्यों की उत्सुकता पराकाष्ठा पर थी.सब यह  जानने को आतुर थे की ऐसा भी क्या ख़ास आन पड़ा जिसके चलते बिना कार्य सूची के आपात्कालीन बैठक बुलाई गयी.

प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुई और शर्मा जी ने कहना आरम्भ किया,”आपलोग इस बात से वाकिफ हैं कि कोई भी राजनेता हमारे मोहल्ले को महत्त्व नहीं देता और न कोई कार्य करता है”

सही कहा था उन्होंने..

ऐसे भी उच्च मध्यवर्गीय और धनी लोगों का मोहल्ला था यह,अतः ध्यान देने की ज्यादा आवश्यकता भी नहीं थी,फिर भी,

वार्तालाप आगे बढ़ी.उन्होंने कहा,”नगर के सभी सोसायटियों के संगठन ने यह फैसला किया है कि हमलोग निगम के चुनाव में अपने अपने वार्ड से स्वतन्त्र उम्मीदवार खड़ा करें..”

मैंने अपना हाथ उठा दिया.शर्मा जी मेरी बात सुनने के लिए चुप हो गए.मैंने कहा,”अन्य जगहों के बारे में तो मैं ज्यादा नहीं कह सकता,पर यहाँ हमलोगों का उम्मीदवार बुरी तरह हार जाएगा.”

प्रारम्भ  में हीं यह विघ्न सब सन्न रह गए.इस तरह के  नकारात्मक टिप्पणी की  किसी को उम्मीद नहीं थी.शर्मा जी तो बुरी तरह बौखला गए और उसी बौखलाहट में आगे कुछ बोल ही नहीं पाये.पर अब कमान संभाली अध्यक्ष ने.’

“यह क्या?आप इस तरह की नकारात्मक बात क्यों करते हैं?”

शर्मा जी को सह मिला तो वे बोल ही पड़े,”इनकी यही आदत है.हमेशा नकारात्मक सोचते हैं.”

एक दो अन्य सदस्य भी उनकी हाँ में हाँ मिलाने लगे.

पर मैंने तो हतप्रभ होना सीखा ही नहीं था,अतः साफ़ साफ़ कहा,”आपलोगों में से १७% तो मतदान करते हैं,अन्य लोग मतदान के दिन मौज मस्ती के लिए निकल जाते हैं.उस हालात में आप का उम्मीद्वार कैसे जीतेगा?”

बात तो पते की थी,अतः अब करीब करीब   सम्पूर्ण मंडली मेरे साथ हो गयी.शर्मा जी को तो कोई उत्तर नहीं सूझा,पर अध्यक्ष महोदय ने फिर कमान संभाला.”अब आप ही बताइये कि उम्मीदवार को जीताने के लिए क्या करना होगा?क्या आप कोई प्लान सुझा सकते हैं?”

अजीब मुसीबत थी.आपने मीटिंग बिना कार्यसूची  बताये आनन फानन में बुलाई.बिना किसी भूमिका के आपलोग अपने मुद्दे पर आ गए.पता नहीं क्या सोचा था,उनलोगों ने?सोचा होगा कि सब हाँ में हाँ मिला देंगे.प्रस्ताव पारित हो जाएगा,पर नतीजा क्या होता?अब जो वास्तविकता सामने आई यो लोग लगे बगलें झांकने.. खैर अब जो उन्होंने गेंद मेरे पाले में डाल दी थी,तो मुझे कुछ तो करना ही था.

मैं इसके लिए समय भी मांग सकता था,पर टालने वाली आदत तो कभी रही नहीं,अतः तत्काल निर्णय  लेना  ही एक मात्र रास्ता  था.यहाँ मेरा पिछला अनुभव भी काम आया.

मैंने सीधे सीधे कहा,”हमलोग छयालिस सोसायटी का प्रतिनिधित्व करते हैं.प्रत्येक सोसायटी में पांच पांच  सदस्यों की एक एक टीम बना दी जाए और उनके जिम्मे उम्मीदवार के प्रचार से लेकर मतदाताओं को मतदान के दिन मतदान केंद्र तक भेजने की जिम्मेवारी सौंप दी जाए,तो शायद हमलोग अस्सी प्रतिशत तक मतदान करने में सफल हो जाएँ.

[कहानी थोड़ी उबाऊ होती जा रही है,पर मजबूरी है,क्योंकि यहाँ तो यथार्थ का वर्णन है और अभी तक तो हमारा नायक दृश्य पटल पर आया ही नहीं.]

थोड़ी बहस अवश्य हुई.जिम्मेदारी से भागने की प्रवृति भी दिखी,पर अंत में सहमति बन ही गयी.फिर तो सभी उपस्थित सदस्यों को अपने अपने सोसायटी से पांच पांच नाम देने को कहा गया.मैंने भी अपनी सोसायटी की जिम्मेदारी ली.शर्मा जी की जिम्मेदारी यह तय की गयी किवे उन सोसायटियों से प्रतिनिधि लें जिन सोसायटियों से कोई नहीं आया था.

इस तरह  यह औपचारिकता पूरी हुई.अब प्रश्न यह था कि उम्मीदवार कौन है और वह कहाँ है?अब मैंने फिर प्रश्न किया,”बारात तो सज गयी,पर दूल्हा कहाँ है?”

दूल्हा शब्द पर तो हंसी का फव्वारा फूट पड़ा. वातावरण भी थोड़ा सामान्य हुआ. पर प्रश्न लाजिमी था.सबने हाँ में हाँ मिलाई.फिर सर्वसम्मतिसे तय हुआ कि इस काम के लिए सबसे सुयोग्य व्यक्ति शर्मा जी हैं,अतः उन्हें ही इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए.शर्मा जी ने सहर्ष यह जिम्मेदारी अपने कंधे पर ले ली.

मुझे उम्मीद थी कि शर्मा जी उसी मोहल्ले से किसी को लाएंगे,पर शर्मा जी ने दूर की सोची थी.हमारा मोहल्ला तो चुनाव क्षेत्र का एक तिहाई था,अतः उन्होंने यहां से किसी को नहीं चुना.उन्होंने  अगली मीटिंग में हमलोगों के सामने एक लम्बे सांवले रंग के युवक को लाकर  खड़ा कर दिया.सदस्यों में बहुत  ऐसे थे,जो उसको पहचानते थे,पर मेरे लिए तो वह एक तरह से अनजान चेहरा मात्र ही था.

यही विनय था,मेरी इस कहानी का नायक.विनय उसी मोहल्ले से सटे हुए शहरी गाँव केएक  धनी मानी परिवार से आता था. देखने में स्मार्ट तो अवश्य लगता  था,पर मुंह खोलते ही अनुभव हीनता दिखने लगती थी.मेरे और अन्य लोगों के प्रश्नों का उत्तर भी उसने ठीक ठाक ही दिया,पर लगा कि इसे अभी बहुत कुछ सीखना पड़ेगा.चुनाव तो अब सर पर था,अतः  हमलोग भी इसे प्रतिष्ठा  का प्रश्न बना कर लग गए जी जान से.विनय नम्र था या नहीं ,यह बताना   मुश्किल था,पर कमाल की ऐक्टिंग थी उसकी.कोई भी अगर उम्र में उससे थोड़ा भी बड़ा हो तो वह तुरत उसके पैरों में झुक जाता था.बोलचाल भी ठीक ही थी.भाषण देने की तो नौबत ही नहीं आई  और वह थोड़े से अंतर से ही सही,पर चुनाव जीत गया.

विनय अब पार्षद बन गया था,पर था पूरी तरह शर्मा जी के चंगुल में.वह उठने को कहते,तो उठता और बैठने को कहते तो बैठता. बोलने को कहा जाता तो शर्मा जी को बोलने को कहता.कभी कभी एक आध वाक्य बोल भी देता था.शर्मा जी बहुत प्रसन्न थे.क्या शिष्य मिला था.यही वह समय था,जब वह मेरे नजदीक आने का प्रयत्न करने लगा.जब थोड़ा सम्बन्ध बढ़ा तो मैंने उसे कुछ बातें बताना आवश्यक समझा. पहली बात तो यह कि उसे बोलना,भाषण देना सीखना चाहिए.दूसरे उसे प्रत्येक बात में शर्मा जी का मोहताज नहीं होना चाहिए.उसे अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व विकसित  करना चाहिए.उस समय हालत ऐसे थे कि वह कोई भी निर्णय अपने से नहीं लेता था.वह शायद मन ही मन कुढ़ भी रहा था,पर अभिव्यक्त नहीं करता था.इसी तरह करीब दो महीने बीत गए.अचानक उस दिन उसका फोन आया,”मैं –पार्टी में शामिल होना चाहता हूँ.”

मुझे आश्चर्य हुआ.एक तो पार्टी में जाना और दूसरे —पार्टी में?मुझे हजम नहीं हुआ.मैंने पूछा,”यकायक यह पार्टी का धुन कैसे सवार हुआ?”

उसने बताया,”मैं नया नया राजनीति में आया हूँ.स्वतन्त्र पार्षद के रूप में कोई मुझे महत्त्व नहीं दे रहा है अतः अपने क्षेत्र की भलाई के लिए किसी पार्टी में शामिल होना आवश्यक है.”

मैंने कहा,” ठीक है,पर—पार्टी हीं क्यों?कोई अन्य पार्टी  क्यों नहीं?”.

विनय,” यह एक उभरती हुई पार्टी है.अतः यहां मेरा कुछ महत्त्व रहेगा.पहले से जड़ जमाये हुए राष्ट्रीय दलों में मुझे कौन घास डालेगा?”

बात तो उसने पते की थी.शर्मा जी काआशीर्वाद उसे पहले से प्राप्त था.उस परिस्थिति में मैं कौन होता था रोकने वाला?उसने फोन खासकर इसी लिए किया था किमैं अपनी  स्वीकृति दे दूँ और उसके औपचारिक रूप सेपार्टी में शामिल होने के समय उसके साथ रहूँ.मुझे यह बहुत अटपटा लगा.मैंने सीधे इंकार कर दिया.पार्टी की राजनीति  से ऐसे भी कोई खास लगाव नहीं था,फिर वह पार्टी?पर मेरी एक न चली. वह जिद्द पर आ गया कि अगर मैं साथ नहीं दूंगा ,तो वह नहीं शामिल होगा.अजीब असमंजस में उसने मुझे डाल दिया.मैं बचने का रास्ता ढूंढने लगा.इसी बीच शायद उसने शर्मा जी को फोन कर दिया.उन्होंने भी मुझे अपनी जिद्द छोड़ने की सलाह दी.इसके बाद मैंने अनमने मन सेअपनी स्वीकृति देदी,पर मैंने साफ़ साफ़ कहा कि औपचारिकता पूरी होते हीं मैं मीटिंग   छोड़ दूंगा.

खैर औपचारिकता पूरी हुई और स्वतन्त्र पार्षद विनय अब उस पार्टी का पार्षद बन गया.

मैंने तो सोचा था  कि चलो अब इसको स्थिरता तो मिली,पर कहाँ?

शायद मुश्किल से दो महीने बीते होंगे कि एक दिन उसका ख़ास फोनआया. उस फोन ने मुझे एक बार फिर चौंका दिया. ऐसे तो मिलना जुलना होता रहताथा ,पर इस बीच ऐसा कुछ हुआ नहीं था,जिससे मैं इस तरह के फोन कॉल के लिए तैयार होता.इसबार तो उसने मेरी स्वीकृति की भी आवश्यकता नहीं समझी.फोन पर वह कह रहा था,” कल  अमुक राष्ट्रीय पार्टी के दफ्तर  में चलना है.”

मुझे आश्चर्य हुआ ,”आखिर किसलिए?”

उसके उत्तर से और ज्यादा हैरानी हुई.

उसने कहा,”मैं इस राष्ट्रीय पार्टी में शामिल हो रहा हूँ.मैंनेआपसे पहले सलाह नहीं ली,क्योंकि मैं जनता था कि आप मेरे इस निर्णय से अवश्य खुश होंगे.” वह कुछ हद तक सही था,पर सिद्धान्तः मैं इस तरह के दल बदल के खिलाफ हूँ.

मैंने पूछा,”पहली पार्टी छोड़ने का कारण?”

उसने जो उत्तर दिया,उससे मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ.

चलो अब करीब पांच महीनों के अंदर हमारे इस कहानी के नायक पहले अचानक राजनीति में आये.माहौल कुछ ऐसा रहा कि जीत भी गए और स्वतन्त्र पार्षद बन गए,फिर एक पार्टी के पार्षद बने .उसे छोड़ा और अब दूसरी पार्टी.पता नहीं यह किनारा था कि यह नाव यूहीं किनारे की खोज में भटकती रहेगी.

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1 Comment on "जिंदगी के रंग"

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आर. सिंह
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यह उस लम्बी कहानी काप्रारम्भ है,जिसका पटाक्षेप आगे के समापन अंश में हुआ हुआ है.

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