लेखक परिचय

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरव

हिंदी काव्यमंचों के लोकप्रिय कवि। सोलह पुस्तकें प्रकाशित। सात टीवी धारावाहिकों का पटकथा लेखन। तीस वर्षों से कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध। संप्रति स्‍वतंत्र लेखन।

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जिन्हें टोपी पहनने का शौक होता है वो टोपी नहीं पहना करते। टोपी पहनानेवाले ऐसे सूरमा अच्छे-अच्छों को टोपी पहना दिया करते हैं। देखिए न अपने गांधीजी ने कभी भूल से भी टोपी नहीं पहनी मगर एक-दो को नहीं पूरे देश को उन्होंने टोपी पहना दी। और उस पर भी जलवा ये कि टोपी कहलाई भी तो पूरे जोर-शोर से गांधी टोपी। जिन्हें टोपी नहीं पहननी वो मौका चाहे उपवास का हो या सामूहिक भोज का टोपी नहीं पहनते तो नहीं पहनते। हरगिज़ नहीं पहनते। और ऐसों को टोपी पहनानेवाले को क्या कहेंगे आप। समझ नहीं आता कि टोपी पहनाने का सदभाव से क्या संबंध है।

मामला थोड़ा पेचीदा है। पर इतना पेचीदा भी नहीं। ठीक वैसे ही जैसे कि मद्यनिषेध के लिए शराबियों का होना जरूरी है वैसे ही किसी की टोपी उछालने के लिए उसका टोपी पहनना बेहद जरूरी होता है। मद्यनिषेध आंदोलन चलता ही शराबियों के बूते पर है। बिना शराबियों के काहे का मद्यनिषेध । मद्यनिषेध के के लिए जरूरी है शराब का विधिवत सेवन। ऐसे ही टोपी उछालने के लिए टोपी का पहनना बेहद लाजमी है।

और जो टोपी उछालने का होमवर्क किये बैठे हों उनकी तो मेहनत ही खल्लास यदि कोई टोपी पहनने से ही मना कर दे। पहनानेवाली की यदि वो टोपी पहन लेता तो गुंजाइश बनती टोपी उछालने की। टोपी पहनते ही कहा जाता कि वो रंगा हुआ सियार है। पाखंडी है। टोपी के जरिए तुष्टीकरण करना चाहता है। पहले से टोपी पहना होता तो सीबीआई से टोपी की फोरेंसिक जांच की मांग की जाती कि ज़रा पता तो करो कि टोपी संध की है या सावरकर की। टोपी जहां भी होती है पब्लिक को मज़ा देती है। टोपी राजनीति का शाश्वत-सनातन लतीफा है। सरकस में जोकर टोपी पहनता है। उतारकर जनता को सलाम बजाता है। जनता कितनी खुश होती है। जनता की इत्ती-सी खुशी के लिए भी अगर कोई नेता टोपी नहीं पहन सकता तो वह क्या खाक नेता है। जादू के खेल में जादूगर टोपी से कबूतर निकालता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि ये कबूतर टोपी के जादू से प्रकट होते है.। ठीक वैसे ही जैसे राजनीति में टोपी के जादू से लोकतंत्र प्रकट होता है। जादूगर का कोई जादू थोड़े ही कोई होता है। टोपी नेता का श्रंगार है। नेता का अलंकार है। सियासत के ब्यूटी पार्लर में टोपी के बिना नेता की सज-धज दोनों ही अधूरी होती है। टोपी नेता की सज्जनता का प्रतीक है।

इसलिए शरीफ और सज्जन नेता राजभवन में रंगरेलियां मनाते समय भी टोपी जरूर पहने रहते हैं। जो टोपी पहनने से इंकार कर दे उस नेता से तो आदरणीय ओसामाजी ज्यादा अच्छे थे जिन्होंने अमेरिका की ट्रेडटॉवर गिरवा दी मगर अपने सिर से टोपी नहीं गिरने दी। जिन शरीफ लोगों को टोपी पहनने का कभी मौका नहीं मिलता रस्म पगड़ी पर पगड़ी बांधकर टोपी पहनने की इच्छा वो भी पूरी कर लेते हैं। आखिर संस्कार भी तो कोई चीज़ होती है। और फिर उस के लिए जो सोते-जागते भारतीय संस्कृति की बात करे,जाप करे उसका टोपी पहनने से इंकार सरासर जघन्य अपराध है। टोपी में अमरत्व छिपा होता है। ये बात भी उसे नहीं मालुम। अरे टीपू सुल्तान और तात्या टोपे इतिहास में अपनी टोपी के ही कारण ही मशहूर हुए.थे। कुछ नासमझ इसका श्रेय उनकी बहादुरी को भी देते हैं। मगर इन की टोपियों की आलोचना ये भी नहीं कर पाते हैं। हमें अफसोस है कि एक नेता अपनी नासमझी के कारण इतिहास में दर्ज होने से बाल-बाल चूक गया। शुभचिंतकों ने तो उसे टोपीबहादुर बनाने की पुरज़ोर कोशिश की थी।

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1 Comment on "हास्य-व्यंग्य : टोपी बहादुर – पंडित सुरेश नीरव"

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vimlesh
Guest

नीरव जी बहुत बहुत धन्यवाद

क्या टोपी पनई है नीरव जी आपने .

नीरव जी यदि आप टोपी पहनाने की कला पर थोडा प्रकाश और डालते तो शायद हम जैसे टपोरियो का भी नाम रोशन हो जाता हम लोगो का भी शेयर ऊचा हो जाता आपकी कृपा से.

हम टपोरियो को भी रोजगार मिलजाता बैठे बिठाये लोग द्दूर दूर से आते टोपी पहनाने की कला सिखने आते कसम से हम टपोरी धन्य हो जाते .

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