लेखक परिचय

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरव

हिंदी काव्यमंचों के लोकप्रिय कवि। सोलह पुस्तकें प्रकाशित। सात टीवी धारावाहिकों का पटकथा लेखन। तीस वर्षों से कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध। संप्रति स्‍वतंत्र लेखन।

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पंडित सुरेश नीरव

मुझे शक है कि मैं दिन-ब-दिन शक का शौकीन होता जा रहा हूं। पहले शायद ऐसा नहीं था मगर फिर सोचता हूं तो शक होता है कि कहीं ऐसा तो नहीं था कि शक का शौक मुझे बचपन से ही हो और मैंने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया हो। अब तो हालत यह है कि मुझे शक पर भी शक होने लगा है कि कहीं ये शक हकीकत तो नहीं है। शक का ही दूसरा नाम शंका है। इस शंका का भी कुछ अलग ही खेल है। शंका लघु शंका होती है तो मुझे शक होता है कि कहीं ये शंका दीर्घ शंका तो नहीं है। और मैं उसे लघु शंका ही समझ रहा होऊं। जब कोई आदमी लघु शंका को भी

दीर्घ शंका मान बैठे तो शंका में भी इस बात की आशंका रहती है कि इस शंका का समाधान कहां और कैसे होगा। सुलभवाले वैसे तो काफी काम कर रहे हैं मगर फिर भी लघु या दीर्घ शंका के समाधान में आदमी को आत्मनिर्भर ही रहना चाहिए। देश-दशा और दिशा के साथ ही शंकाएं ज़ोर मारती हैं। और हर शंका के समाधान के लिए सुलभ हर जगह सुलभ हो जाएगा ऐसा दुर्लभ विश्वास भी कितनों को सुलभ होता है। मुझे फिर ऐसे दुर्लभ विश्वास पर भी शक होने लगता है।

कभी-कभी तो मुझे यह भी शक होने लगता है कि कहीं मैं आदमी की जगह घड़ी तो नहीं हो गया हूं। जिसके शक की सुई कभी इधर-तो-कभी उधर घूमती रहती है। ये कैसी सुइयां हैं जो समय के लिए नहीं बल्कि सिर्फ शक के लिए ही घूमती हैं।

सोचता हूं कि क्या घड़ी भी मेरी तरह शक की शौकीन होने लगी हैं। जब इनकी संदेह की सुई नहीं घूमती होगीं तो शायद इन घड़ियों को भी शक होने लगता होगा कि कहीं वो बंद तो नहीं हो गईं। शक की दवा तो लुकमान हकीम के पास भी नहीं थी। क्या लुकमान हकीम को भी अपनी योग्यता पर शक था। मुझे लगता है कि हकीम भी मेरी तरह कहीं शक का शौकीन तो नहीं था। झोला छाप डाक्टरों को तो कभी अपनी योग्यता पर शक नहीं होता। हो सकता है कि लुकमान शक को बीमारी ही नहीं मानता हो। इसलिए उसकी दवाई जानबूझ कर ही नहीं रखता हो। इस मामले में

घड़ियां हकीम से ज्यादा संवेदनशील होती हैं। इधर शक की सुई घूमना बंद हुई नहीं कि उन्हें ये शक हो जाता है कि वो बंद हो गई हैं। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही है। जैसे ही मैं शक करना बंद कर देता हूं मुझे शक होने लगता है कि

मैं मर गया हूं। मैं चिल्लाकर लोगों से पूछता हूं कि देखना भैया कहीं मैं मर तो नहीं गया। तब लोग-बाग चिल्लाकर कहते हैं कि आप जिंदा ही कब थे जो आपको मरने का वहम हो रहा है। तब मुझे शक होता है कि कहीं ये झूठे लोग सच तो नहीं बोल रहे। शक की ये बीमारी भी बड़ी अजीब है। मुझसे तो वही लोग अच्छे हैं जिन्हें कभी ये शक ही नहीं होता कि वे मरे हुए हैं और बड़े मज़े से जिंदगी जीते चले जाते हैं। मुझे शक है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि इनकी मौत की खबर से ही यह मालुम पड़ता हो कि ये लोग कभी जिंदा भी थे। शक के इस शौक ने मुझे कब शक्की और झक्की बना दिया मुझे पता ही नहीं चला। फिर

कभी-कभी ये भी शक होता है कि मैं शक का शौकीन हूं कहीं ये भी मेरा महज शक तो नहीं है। पता नहीं मैं किस शक-संवत मैं पैदा हुआ हूं जो शक का इस कदर शौकीन हो गया हूं।

 

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