लेखक परिचय

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरव

हिंदी काव्यमंचों के लोकप्रिय कवि। सोलह पुस्तकें प्रकाशित। सात टीवी धारावाहिकों का पटकथा लेखन। तीस वर्षों से कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध। संप्रति स्‍वतंत्र लेखन।

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पंडित सुरेश नीरव

सच बोलने के लिए दिमाग की जरूरत नहीं पड़ती है। जब से मैंने यह महावाक्य पढ़ा और सुना है तभी से जितने भी दिमागी-विद्वान लोग हैं, उन्हें मैं झूठा मानने लगा हूं। और दुनिया के जितने भी झूठे हैं,उन्हें विद्वान। इस समीकरण के मुताबिक जो जिस दर्जे का झूठा वो उसी दर्जे का विद्वान। इस फार्मूलानुमा फंडे ने जिंदगी की व्यावहारिकता के जटिल गणित को बहुत सरल कर दिया है। बिलकुल मोबाइल के टॉक टाइम की तरह। अब आप सार्वजनिकरूप से किसी को भी झूठा कह सकते हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि जिसे आप झूठा कहना चाहते हैं,उसे उसके सामने ही क्या सारी पब्लिक के सामने आप झूठा कह सकते हैं। और मज़ा यह कि पब्लिक और वह प्राणी जिसे आप झूठा कहें दोनों अति प्रसन्न। पब्लिक इस बात पर खुश कि इतना दुस्साहस तो किसीने हंसते-हंसते कर के दिखा दिया। सीधी-सी बात है- आप जिसे झूठा कहना चाहते हैं बस आपको पूरी विनम्रता के साथ उसे इतना ही तो कहना है कि अमुकजी-जैसा विद्वान मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा। और विद्वान तो चलो बहुत ढ़ूंढ़ने पर इत्तफाक से एक-आध कहीं मिल भी जाए मगर हमारे आदरणीय तो महाविद्वान हैं। जैसे ब्राह्मणों में महाब्राह्मण होते हैं। कुछ-कुछ उसी गोत्र के कानकाटू महाविद्वान। विद्वान हैं तो दिमाग भी ये अब्बल दर्जे का ही रखते हैं। और जब दिमाग है तो क्यों न उसे झूठ बोलने-जैसे रचनात्मक कार्य में खर्च किया जाए। सच बोलने में तो वैसे भी दिमाग की जरूरत कहां होती है। इसीलिए तो गधे कभी झूठ नहीं बोलते। गधे जो ठहरे। बिना दिमाग के निरीह प्राणी। आदमी शान से झूठ बोलता है क्योंकि उसके पास आला दर्जे का दिमाग है। हां, ये बात दीगर है कि जब कभी आदमी का दिमाग खराब हो जाता है तो वो भी सच बोलने-जैसी हरकत कर बैठता है। मगर जैसे ही उसे अपनी गलती का एहसास होता है,वो पछताता है। बार-बार अपनी गलती,अपनी मूर्खता को कोसता है। धिक्कारता है अपने को कि आदमी होकर क्या जरूरत थी उसे सच बोलने की। वह ईश्वर के आगे अपने दोनों कान पकड़कर माफी मांगता है कि अनजाने में मुझसे पाप हो गया है,मुझे माफ कर देना प्रभु। आप तो परम दयालु हो। आइंदा ऐसी गलती नहीं होगी। आपकी कसम खा नहीं सकता क्योंकि वो तो मैं झूठ बोलते समय ही खाता हूं। मगर इस वक्त मजबूरी में मुझे सच बोलना पड़ रहा है। एक चमचे की मस्केबाजी से प्रसन्न अफसर की तरह भगवान भी भक्त की हाईक्वालिटी की प्रार्थना से पसीज जाते हैं। और फिर भक्त सतर्कतापूर्वक झूठे मुंह भी कभी सच नहीं बोलता है। उसे भगवान से पंगा लेना है क्या। अगर भगवान को उससे सच ही बुलवाना होता तो उसे दिमाग ही क्यों देते। अब वो हमेशा दिमाग लगाकर ही दिमाग का उपयोग करेगा। भले ही उस वक्त दिमाग सातवें आसमान पर ही क्यों न हो। भक्त को तो राजनीति भी करनी है। भक्त सोचता है कि राजनीति में दागी और दिमागी होना पहली शर्त है। और फिर वह ठहरा खानदानी सियासतबाज। सियासत का पिद्दी राजा। ये उसके दिमाग का ही कमाल है कि कभी राजा के महल में चपरासी रहे पिता की औलाद आज राजा के नाम से कुख्यात है। और वो भी तब जब कि देश में राजतंत्र कभी का खत्म हो चुका है। राजा की आएगी बारात रंगीली होगी रात का महानायक। रात की रानी चोरों का राजावाला पिद्दी राजा। चोरों के बीच सियाने की छवि रखनेवाला खुरापाती पिद्दी राजा। जिसका खुराफात में दिमाग चलता है और दिमाग में खुराफात चलती है। जैसे नाले में पड़ा कोई चिकना घड़ा। जिसके भीतर भी कीचड़ और बाहर भी कीचड़। बस बीच में सियासत के झूठ की झीनी-सी दीवार। कंप्यूटर की जुबान में बोलें तो खुराफात पिद्दी राजा की मेल आई-डी है और झूठ पासवर्ड है। सच्चाई का पासवर्ड रखकर इन्हें जिंदगी में फेल होना है क्या। पिद्दी राजा बड़े कुशाग्र झूठे हैं। मेधावी लफ्फाज हैं। बड़े परम असत्यवादी हैं। सत्यवादी हरिश्चंद्र की काट में भगवान ने इन्हें मार्केट में उतारा है। बेचारे हरिश्चंद्र को तो सत्य के चक्कर में चांडाल की नौकरी तक करनी पड़ी थी। पिद्दी राजा ने उस चांडाल की टूटी-फूटी झौपड़ी पचाकर अपनी प्रबल-प्रचंड प्रतिभा का परिचय दे डाला। अब मुकद्दर का मारा चांडाल इनका बंधुआ मजदूर है। ये है झूठ की ताकत। सच बोलने और सच के रास्ते पर चलने में दिमाग का क्या काम। तय है पिद्दी राजा हरिश्चंद्र से ज्यादा ब्रिलिएंट और इंटेलीजेंट हैं। दमयंतीवाले राजा नल से भी ज्यादा इंटेलीजेंट। जो नल होकर भी प्यासे थे। अपने पिद्दीराजा का तो जी चाहता है कि प्यास लगे और वो रोज शराब और शवाब से अपनी प्यास बुझाएं। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि सतयुग में तो कोई विद्वान होता ही नहीं होगा। क्योंकि सच बोलने में दिमाग का क्या काम। उस दौर में किसी की खोपड़ी में दिमाग होना वैसे ही यूजलैस होता होगा जैसे बिनलादेन के हाथ में हजामत का सामान। पिद्दीराजा से मिलकर तो हमें बापू के बारे में भी नए सिरे से सोचना पड़ेगा जो सदा सत्य बोलो के नुस्खे के जरिए सारे देश के लोगों को दिमागहीन बनाने पर तुले हुए थे। पिद्दीराजा का मानना है कि उनकी ये हरकत ही गोडसे को नागवार गुजरी थी। उसने जो भी किया देशहित में किया। पिद्दीराजा देश को गांधीजी की तरह बरबाद नहीं करना चाहते हैं। इसलिए सत्यमेव जयते-जैसे जुमलों को दिल पर नहीं लेते हैं। वैसे भी हंसी-मजाक की बातों को सीरियसली नहीं लेना चाहिए। बड़े दिमागी हैं पिद्दीराजा। एक कुशल ड्रायवर की तरह- आगे खतरनाक मोड़ है जैसी सूचनाओं को पढ़कर संभले हुए ड्रायवर की तरह वे हमेशा सत्य से संभावित होनेवाली मुठभेड़ से बाल-बाल बच जाते हैं। बड़े पहुंचे हुए झूठानंद हैं हमारे पिद्दीराजा। उनके विरोधी कहते हैं कि पिद्दीराजा झूठ बोलते हैं। यह एक बड़े आदमी का सरासर अपमान है। हकीकत तो यह है कि वे सिर्फ झूठ और सिर्फ झूठ बोलते हैं। सत्ताइस कैरेट का खालिस टंच झूठ। झूठ उनकी शान है। आन है,बान है। पिद्दीराजा चलते-फिरते झूठिस्तान हैं। ऐसा झूठधर्मी अखिलभारतीय व्यक्तित्व देश को ही क्या दुनिया को भी सौभाग्य से ही मिलता है। हमें गर्व है कि पिद्दीराजा-जैसी दुर्दांत आत्मा ने भारत में जन्म लेकर भारत को ऑब्लाइज किया। और झूठ बोलने की ललित कला को आगे बढ़ाया। वैसे तो झूठ हर शरीफ आदमी बोलता है इसमें खास क्या है। खास तो तब है जब कोई अपने एक अदद झूठ से ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को बेवकूफ बना सकें। झूठ तो फुटपाथ पर चादर बिछाकर ताकत की दवा बेचनेवाला मेवाफरोश भी बोलता है। मगर सत्तर-पचहत्तर साल के चंद बूढ़ों को जवानी का जोश दिलानेवाली पुड़ियां थमाने में ही उसका झूठ-जैसा कीमती माल खर्च हो जाता है। झूठ की एक टुच्ची-सी कुल्फी होती है,उसके पास। जिसे वह चूसता रहता है। हमारे पिद्दीराजा तो झूठ के हिमालय हैं। मेवाफरोश अपनी ज़िंदगी में कुल जितने लोगों को अपने झूठ से बेवकूफ बना पाता होगा उससे कहीं ज्यादा लोगों को बेवकूफ तो हमारे पिद्दीराजा एक झपट्टे में ही बना देते हैं। उससे ज्यादा दिमाग है,इनके पास। वो झूठ का कुटीर उद्योग चलाता हैऔर पिद्दीराजा झूठ का भारी उद्योग चलाते हैं। बड़ा फ़र्क होता है दोनों में। मीडियवाले इस फर्क को जानते हैं। जौहरी ही हीरे की कद्र जानता है। मीडियामंडी के जौहरी झूठ के इस नायाब हीरे की कीमत जानते हैं। इसीलिए वे पिद्दीराजा का सम्मान करते हैं। पिद्दीराजा वारदात से लेकर लाफ्टर शो तक फिट और हिट हैं। मीडिया के चैनलों की टीआरपी की चलती-फिरती हंडी हैं,हमारे पिद्दीराजा। सौभाग्य है मीडिया का कि बिना टेलैंट हंट किए उन्हें घर बैठे एक बेजोड़ प्रतिभा मिल गई। इसे कहते हैं कि हर्र लगे न फिटकिरी और रंग चोखा आ जाए. मगर पिद्दीराजा की तो हर बात में झूठ की हर्र और फरेब की फिटकिरी मिली होती है। बड़ा आयुर्वेदिक झूठ होता है पिद्दीराजा का। इसीलिए तो हर महफिल में उनका रंग चोखा जमता है और सामनेवालों के चेहरे के रंग उड़ जाते हैं। वैसे भी सच बोलनेवाले तो आजकल बेचारे मीडिया दफ्तर के सिक्यूरिटी गार्डों से पिटकर ही संतोष कर लेते हैं। सिक्योरिटी गार्ड की दुत्कार और फटकार ही इनका गिफ्ट हेंपर होता है। पिद्दीराजा की सब कदर करते हैं। पिद्दीराजा की बदौलत सत्य का सोना भी झूठ का लोहा मानता है। पिद्दीराजा ने कोटि-कोटि गोरेपन की क्रीमों को रगड़-रगड़कर अपने झूठ को गोरा किया है। फकाफक सफेद झूठ। पिद्दीराजा का झूठ सफेदी की चमकार से चमचमाता हुआ सुपर सफेद झूठ होता है। इनके लकझक सफेद झूठ के आगे मैले-कुचैले झूठ की तो आंखें ही चौंधिया जाती हैं। जितने सफेद कपड़े उतना सफेद झूठ। सफेद झूठ की पुलकित यामिनी,दमिनी और कामिनी सभी मोहित होकर- हाय पिद्दीराजा के हॉट डॉयलाग बोलकर ठंडेपन के अहसास में छपाके मारने लगती हैं। पिद्दीराजा को देखकर ्ब तो मुझे अखंड विश्वास हो गया कि सत्य बोलने के लिए दिमाग की कतई जरूरत नहीं होती है। इधर कुछ ब्रेनलैस सत्यवादियों ने दुष्प्रचार कर डाला कि झूठ के पैर नहीं होते। अरे, अंधा हाथी की विशालता को कहां जानता है। पिद्दीराजा की सुपर सोनिक चाल को देखें तो धारणा अपने आप बदल जाएगी। एक झूठ के पैरों में सत्य के इतने शरीर दंडवत कर रहे होते हैं कि उसके कमल-पैर दिखाई नहीं दे पाते और दिमागहीन लोग फैसला कर डालते हैं कि झूठ के पैर नहीं होते। अरे अब इन बुद्धिहीन सत्यवादियों को कौन समझाए कि झूठ का कमल तो खिलता ही सत्य के दलदल में है। कमल के पांव तो दलदल में ही होते हैं, दिखेंगे कैसे। बिलकुल पिद्दीराजा की तरह होता है कमल। जिसका निजी सौंदर्य भी सार्वजनिक होता है। बिल्कुल पिद्दीराजा के बयान की तरह। हाहाकारी झूठ का स्मोकबम हैं हमारे पिद्दीराजा। ऐसा दिमागी और दागी भला और कौन है जमाने में। जिसे हम झूठ की विद्वता की मोबाइल अकादमी कह सकें।

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