लेखक परिचय

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरव

हिंदी काव्यमंचों के लोकप्रिय कवि। सोलह पुस्तकें प्रकाशित। सात टीवी धारावाहिकों का पटकथा लेखन। तीस वर्षों से कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध। संप्रति स्‍वतंत्र लेखन।

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पंडित सुरेश नीरव

हम बदनाम भी हुए तो कुछ गम नहीं…चलो इस बहाने नाम तो हुआ। नामचीन होने के तमाम बहाने आजमाने के बाद दुनियाभर के आम आदमी ने सर्वसम्मति से नामचीन होने के लिए बदनाम होने के फार्मूले को ही सबसे सुविधापूर्ण और सम्मानजनक नुस्खा पाया है। इसमें सबसे बड़ा लाभ तो उसे ये होता है कि-वह इंसाफ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के-जैसी फालतू , लड़कपन की धमकीभरी चुनौतियों से तत्काल निजात पा लेता है। और ऐसे जुमलों की खिल्ली उड़ाते हुए पूछता है कि जब तमाम सुविधाजनक राजपथ और जनपथ हमारे चलने के लिए सरकार ने बनवाए हैं तो फिर हमें क्या जरूरत है इंसाफ के डगर पर चलने की। और वह भी उस इंसाफ की डगर पर जोकि जब से बनी है तभी से डगर-मगर है। अरे हमें चलना है या सड़क पर ब्रेक डांस करना है। हम दाएं जाएं तो इंसाफ की डगर बाएं जाए। क्या रखा है ऐसी कवायद में। पुराने जमाने में छुआछूत,सतीप्रथा,बालविवाह-जैसी तमाम कुरीतियां तो समाज में थी हीं मगर इससे भी आदनी की तृप्ति नहीं होती थी इसलिए ईमानदारी, सचरित्रता और इंसाफ पर चलने-जैसी कई डिजाइन की आत्महत्यात्मक प्रथाएं उसने और चला रखी थीं। ये वो दौर था जब स्त्री के सती होने पर और आदमी के हरिश्चंद टाइप दुर्दांत उत्पीड़न करने के बाद ही यश का का टेटू उसके माथे पर गोदा जाता था। शौहरत पाने का यह तरीका इतना दर्दनाक होता था कि इससे बचने के लिए लोगों को चांदसी दवाखाने में जाकर घोड़े की बालवाला पिछाड़ी मुहल्ले का आपरेशन कराना ज्यादा फायदे का सौदा लगता था। एक-आध बिस्मिल,आजाद या भगतसिंह की बात दीगर है। जो यश के लिए जिंदगी पर दांव खेल जाते थे। मगर ऐसे जांबाज सिरफिरे तो उंगलियों पर ही गिने जाते हैं कंप्यूटर या कैलकुलेटर से नहीं। मगर नाम कमाने की तमन्ना तो सभी रखते हैं। चाहे स्वतंत्रता सेनानी हों या उन्हें पकड़वानेवाले पुलिस के मुखबिर। तो तमाम सालों के शोध के बाद नाम कमाने का जो शार्टकट-फार्मूला सामने आया है जिसके तहत आदमी होता है नामी वो है भाया- बदनामी। नाम से बदनाम में वजन भी कुछ ज्यादा है। और शो तो ज्यादा है ही। ौर साहब जबसे नाम कमाने के लिए बदनाम होने का फार्मूला हिट हुआ है तब से बदनाम होना गौरव की बात हो गई है। बदनामी अब नये समाज का नया स्टेटस सिंबल है। लोग बदनाम होने के लिए लालायित रहने लगे हैं। बड़े आदमियों ने तो बदनाम होने के लिए एक बजट तय कर रखा है। उत्साही नव धनाढ़्यों ने तो सलाहकार तक नियुक्त कर डाले हैं जो अपने आकाओं को बदनाम होने के रोज़ नए-नए फार्मूले सुझाते हैं। पहले सुझाते हैं फिर रिझाते हैं। अब हालत यह है कि बदनाम होने की कला में जो जितना अव्वल है वो उतना ही बड़ा स्टार है।सेलिब्रिटी है। बदनाम

होने की इस गला काट प्रतियोगिता में कहीं पीछे रहकर नाक न कट जाए इस भय से लोग बदनाम

होकर अपनी नाक ऊंची करने लगे हैं। दुनिया की सुपरपावर कहे जानेवाला अमेरिका के एक राष्ट्रपति तो बदनाम होने की प्रतियोगिता में पराजित होने के भय से इतने डरे हुए थे कि कि उन्होंने होने की प्रतियोगिता में जीत पक्की करने के लिए मोनिकालेवेंस्की नामक एक अति सम्मानित समाजसेविका की गुप्तरंग सेवाएं तक ले डालीं। उससे प्रिदिन,नियमपूर्वक हाईएस्ट क्वालिटी की रिक्वेस्ट की कि मैडम मेरा भविष्य आपके ही हाथों में है। उस भोली लड़की को प्रेसीडेंट का भविष्य लड्डू लगा सो उसने अपने नेशन के खातिर उसे अपने मुंह में रख लिया। उसे चर्च के फादर ने बताया था कि इंडिया में कोई हनुमान हुआ था उसने तो सूरज को ही मूंह में रख लिया था। लोग बताते हैं कि मोनिका मैडम रोमन हनुमानिस्ट थीं। उसने अपने नेशन के लिए बड़े गर्व के साथ अपनी लोक-लाज खोई और अमेरिका जैसे सुपरपापर देश के सम्मीनित प्रेसीडेंट को बिनलादेन और सद्दाम हुसैन-जैसे टिटपुंजियों के आगे पराजित होने से बचा लिया। बदनामी के ग्लैमरस संसार में श्री क्लिंटन ने एक नया कीर्तिमान गढ़कर अमेरिका की शान को बरकरार रखा। राजनीति में गहरी पकड़ रखनेवाले इसे भी क्लिंटन-मोनिका-वाटरगेट कांड ही कहते हैं। अमेरिकन तो होतो हीं हैं- जनम-जनम के वाटरगेटी। क्लिंटन की आपार निगेटिव लोकप्रियता से हर्षद मेहता नामक हमारे देश के एक उभरते हुए प्रतिभावान सितारे को इतना हर्ष हुआ कि खुशी के मारे उसके प्राण पखेरू उड़कर क्लिंटन को बधाई देने अमेरिका उड़ गए। और फिर वापस इंडिया तो क्या अपनी बाडी में भी नहीं लौटे। लोग कपते हैं कि उसके एनआऱआई प्राण अभी भी पीएमओ में चक्कर लगाते रहते हैं। यह जानने के लिए कि उनका सूटकेस कौन चबा गया। बदनाम होने के लिए बेचारे ने क्या-क्या जतन नहीं गहे और क्या-क्या सितम नहीं सहे। पर सब भाग्य की बाते हैं। अमेरिका की साजिश से इंडिया बदनामी का सुपर स्टार बनते-बनते रह गया। लेकिन मुद्दई लाख बुरा चाहे क्या होता है। वही होता है जो मंज़ूरे खुदा होता है। खुदा के करम से और साधु के धरम से कौन जीता है। राष्ट्री शोक और निराशा के घटाटोप अंधकार में डूबे देश को उबारने के लिए लाइफबेल्ट बांधे,हेल्पलाइन की तरह मेडइन झारखंड बाबा शिबूसौरैन अवतरित हुए। जब-जब देश में अधर्म की हानि होती है तो उसके उत्थान के

लिए प्रभु कृपा से तब-तब भारतभूमि में बाबा प्रकट होते हैं। बाबा ने भ्रष्टाचार के आलोक से दीप्त-प्रदीप्त अपना विराट रूप दिखाकर संसद में रौनक ला दी। मीडिया और राजनीति के मुरझाए चेहरे हर्ष से खिल उठे। बदनामी के दंगल में एक बूढ़े ने लंगोट घुमाकर सभी सूरमाओं को चित कर दिया। हत्या और अपहरण बाबा के श्रृंगार हैं। बाबा विरोधियों की भस्मी ही अपनी देह पर लगाते हैं। उपवास तोड़ते हैं तो फलाहार मात्र सौ-दौसौ करोड़ ही खाते हैं। आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करते। बाबा बड़े तपस्वी और अपरिग्रही है। झारखंड के एक लोकल बाबा ने देश की नाक ऊंची कर दी। कृतज्ञ राष्ट्र ने उनकी अमूल्य सेवा का ऋण उन्हें दुबारा सत्ता की कुर्सी पर बैठाकर चुकाया। बाबा के प्रति अपनी श्रद्धा का सरकारी खर्चे पर ज्ञापन-विज्ञापन किया। बाबा-जैसे महर्षियों का प्रचार ही सरकार का प्रचार है। ऐसे सात्विक कार्यों से ही लोकतंत्र मजबूत होता है। इस ही नैन लोकतंत्र के डोले और ऐव्स देखर ही आम जनता के मुंह से वेरी-वेरी हाट-जैसे सात्विक मंत्रों का उच्चार और उद्धार होता है। बदनामी के जिम में बर्जिश करके ही नेता स्मार्ट और सेक्सी होता है। इसकी बलिष्ठ और शक्तवर्धक काया देखकर ही रूपसिंयां बौराई हुईं,हाय हैंडसम कहती हुईं 80 वर्ष के किशोर को छेड़ने राजभवन तक जा पहुंचती हैं। बदनामी का पर्फ्यूम होता ही इतना मादक है जो अच्छे-अच्छों को दीवाना बना देता है। तय मानिए कि अगर आज की डेट में कहीं कृष्ण बगवान होते तो वे अपने नियलेरय और डियरेस्ट फ्रेंड अर्जुन सको गीता का ज्ञान कुछ इस तर्ज पर ही देते कि –सुन-सुन-सुन हे अर्जुनषइस बदनामी में बड़े-बड़े गुन, लाख लुखों की एक दवा है क्यूं ना अजमाए,काहे घबड़ाए…। और कृष्णजी से गुप्त ज्ञान प्राप्त कर अर्जुन का इनर्जी लेबल इतना बढ़ जाता कि वो अपना गांडीव उठाता और युद्ध क्षेत्र में जाकर युधिष्टिक को यह कहकर भगाता कि- अबे ओ जुआरी… तेरी मति गई थी मारी, तेरे कारण ही हमने द्रौपदी हारी। और इस एक ही डायलाग से वो शकुनी,दुशासन और दुर्योधन को बदनामी के महारत में पछाड़कर अर्जुन से अर्जुनसिंह हो जाते। मगर अर्जुन ऐसा नहीं कर पाए,इसलिए अर्जुनसिंह नहीं हो पाए। बदनामी अर्जित करने की प्रचंड-प्बल प्रतिभा तो जन्मजात होती है। इसके लिए किसी कृष्ण के कोचिंग की जरूरत थोड़े ही होती है। संजय दत्त,सलमान खान जन्मजात प्रतिभा हैं। बदनाम

होने की इन्होंने किसी से कोई ट्रेनिंग ली हो एसका कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता है। जो भी किया शान से किया और अपने मौलिक ज्ञान से किया। अभी हाल ही में एक राजा हैं जो बदनामी की सियासत के ताजदार बादशाह बनकर निकले हैं और रातोंतात सेलिब्रिटी हो गए। चैनल और अखबार इनकी मनोहारी छवि की एक झलक के लिए तात-दिन उछल-कूद करके नहीं थके। राजा सचमुच का राजा निकला। कोई सुरेश कलमाड़ी नहीं। जो बदनाम होने के लिए कामनवेल्थ गेम का हाथ में आे सुनहरे मौके का भी उपयोग नहीं कर सके। स्येडियम में खड़े-खड़े हाथ हिलाना एक बात है और मैच में शील्टड जीतना दूसरी बात है। खेल वो है जो ितनी बारीकी से खेला जाए के खेल भी हो जाए और खेल का पता भी न चले। बदनानी के कामनवेल्थ गेम का शिल्प भी बहुत बारीक होता है। इसकी बारीकी को जितनी बारीकी से सुश्री राखी सावंत ने समझा है,उतना किसी और ने नहीं। रुसबाइयों का कार्पोरेट दफ्तर चलता है मैडम के दिमाग में। मैं मैडम की दुर्दांत प्रतिभा के आगे सरकारी हैंडपंप की तरह नतमस्तक हूं। कचकचायमान वाणी कि इतनी धनी, लगता है मानो वह व्यक्ति नहीं पूरा रेडियो एफएम हों। जो शुरू हुआ तो बैटरी के निष्प्राण होने पर ही रुकता है। बदनामी की प्रौद्यौगिकी की मेडम क्यूरी हैं-राखी सावंत। शोहरत के आकाश में बदनामी के सुनहरे पंखों से उड़ती एक सोनचिरैया। जो एक चुंम्मे से अच्छे खासे मर्द को मिक्का बना दे। अब मीडिया की भी लार टपकी है बदनामी के मैच में उतरने की। नाइन सबके पैर धोती है मगर नाइन के पैर कौन धोए। मीडिया किसी को भी रुसबाइयों का सुपरस्टार बनाने की कुव्वत रखता है, मगर मीडियावालों को कौन आब्लाइज करे। दुखी है बेचारे। दुबलायगए हैं बेचारे। आत्मनिर्भरता और ात्मविश्वास ही सफलता की कुंजी है। इस फलसफे को मानकर अब मीडियावाले भी एक-दूसरे को बदनामी के सांचे में ढालकर सेलेब्रिटी-सेलिब्रदी बनाने का खेल खेलने में लग गए हैं। अब उनके भी परम प्राइवेट प्रसंग निजीकरण के दैर में सार्वजनिक होने लगे हैं। मीडिया के मोहल्ले में एक नई बयार नी बहार लेकर आई है। प्ल्लिक भी पुराने और बासी चेहरों को देखकर सुपरोत्तम बोरियत को प्राप्त हो चुकी है। अब तमाशा दिकानेवाले खुद तमाशा बनने को स्वेच्छा से तैयार हैं। आखिर उनके भी तो दिल है। बदनामी के इनर्जीलेबल से वे भी लवरेज हैं। मीडिया कन्याएं भी रुसबाइयों के रेशमी रेंप पर कैटवाक करने को कसमसा रही हैं। वो भी तो गा-गाकर लोगों को बतानी चाहती हैं कि-मुन्नी बदनाम हुई जालिम मैं तेरे लिए। अपुन के भेजे में भी जब से ये फंडा आया है कि सिलिब्रिटी बनने के लिए बदनामी ही शार्टकट है अपुन दिन-रात इसी उधेड़बुन में हैं कि बदनाम होने के लिए कौन-से पदार्थ का सेवन किया जाए. ताकि रातों-रात या दिनों-दिन अपुन भी सेलेबिरिटी हो जाएं। आखिर एक अदद नाजुक दिल अपने भी सीने में तालाब के मेढक की तरह फुदकता रहता है। अपुन की भी अंतिम इच्छा है कि टीवीपर आऊं,इठलाऊं और गाऊं..मैं शायर बदनाम। सुना है कि हर आदमी की सफलता में कोई (या कई) स्त्री का हाथ होता है। अपनु भी इंतजार में हैं कि किसी से अपनी भी केमिस्ट्री जमे और वो इमोशनल होकर अपुन की इज्जत पर हाथ डालदे। और अपुन क्लिंटन नहीं तो कम-से-कम नारायणदत्त तिवारी ही बन के खल्लास हो जाए।

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1 Comment on "हास्य-व्यंग्य/ मुन्‍ना बदनाम हुआ धन्नो ये तेरे लिए"

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Anil Sehgal
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हास्य-व्यंग्य/ मुन्‍ना बदनाम हुआ धन्नो ये तेरे लिए – by – पंडित सुरेश नीरव

सिलिब्रिटी बनने के लिए आप के लिए बदनामी का शार्टकट – बस ndtv वाली बरखा दत्त पर एक व्यंग लिख डालो – ऐ राजा का रिकॉर्ड पार कर जाओगे – नक़ल के लिए पढो प्रवक्ता में NRI महिला का लिखा ताज़ा लेख.

– अनिल सहगल –

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