लेखक परिचय

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरव

हिंदी काव्यमंचों के लोकप्रिय कवि। सोलह पुस्तकें प्रकाशित। सात टीवी धारावाहिकों का पटकथा लेखन। तीस वर्षों से कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध। संप्रति स्‍वतंत्र लेखन।

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पंडित सुरेश नीरव

अगर अन्नाजी का जादू चल गया तो देख लेना भारत में एक दिन ऐसा भी आएगा कि भ्रष्टाचार की बातें सिर्फ कहानी-किस्सों में पढ़ने को ही रह जाएंगी।

बच्चे परी कथाओं की तरह पढ़ा करेंगे कि बहुत समय पहले भारत में भ्रष्टाचार नाम का एक दैत्य हुआ करता था। जिसने बड़ा उत्पात मचाया हुआ था। मौका मिलते ही वह तैंतीस करोड़ देवी-देवताओंवाली इस पवित्र-पावन भूमि पर निवास करते ऋषि-मुनियों की संतानों को भ्रष्टाचार के वशीकरण मंत्र से दबोच लेता और उनसे रिश्वत,घोटाले-जैसे मनचाहे गलत-सलत काम करवा लेता।

भोले-भाले नागरिक-तो-नागरिक सरकार तक इस भीषण दैत्य के वशीकरण में आकर खुद बदनाम होती और देश को भी बदनाम करा देती। अभिनेता, नेता, अफसर और व्यापारी ही नहीं सिद्ध साधु-संत तक इसकी चपेट में आ जाते। देश का सारा निरीह समाज भ्रष्टाचार से त्रस्त और दुखी था। जो भ्रष्टाचार करता वो भी और जो भ्रष्टाचार का शिकार होता वो भी। तमाम निर्दोष नर-नारी भ्रष्टाचार के दैत्य से पीड़ित होकर तिहाड़ जेल से लेकर लोकल पुलिस लॉकरों में मूर्छित होकर कैद हो जाते। पता ही नहीं चलता कि कब किसके सिर पर भ्रष्टाचार का दैत्य चढ़ जाता और उससे ऊटपटांग तथा अंटशंट काम करवा लेता।जब कभी सीबीआई नाना प्रकार के प्रश्न पूछती तो निर्दोष को भान होता कि भ्रष्टाचार ने उसे सम्मोहित कर उससे क्या-क्या करवा डाला। कई भोलेभाले नागरिक तो जेल के सदमें में आकर अपनी याददाश्त तक खो बैठते।

समस्त नर-नारी त्राहिमाम-त्राहिमाम कर उठे। तब धर्म की रक्षा हेतु भगवान ने स्वयं अन्ना का रुप धर कर भारत की पुण्य धरा पर अवतार लिया। नर-नारी खुशी से नाच उठे। सरकार जिसने बहुत लंबे समय से इस भ्रष्टाचार के दैत्य की चाकरी की थी उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि एक बुढ़ऊ सच्ची-मुच्ची में भ्रष्टाचार–जैसे दैत्य का वध कर सकता है। उसके अज्ञानी चाकरों ने अपने बचकाने कुतर्कों से अन्ना भगवान को काफी परेशान किया।उनके दिमाग पर भ्रष्टाचार का दैत्य सवार था। वे अन्ना भगवान को दैत्य के राज में कहीं बैठने की जगह तक नहीं देना चाहते थे। उन्होंने अन्ना भगवान को जेल में डाल दिया। भगवानों की तो लीला स्थली ही जेल होती है। जैसे कंस की जेल तोड़कर कृष्णजी बाहर आ गए वैसे ही अन्ना भगवान भी बाहर आ गए। और रामलीला मैदान में बैठकर अपनी लीला दिखाने लगे। अन्ना भगवान चमत्कारी थे।

उनके पास जनलोकपाल विधेयक नामक एक ब्रह्मास्त्र था। भगवान जितने दिन का उपवास करते भ्रष्टाचार दैत्य का उतना किलो ही वजन कम हो जाता। अन्ना की लीला देखने मोबाइल चोर, जेबतकरे, रंगीन मिज़ाज किन्नर और सड़क छाप मजनुओं से लेकर अरबपति साधु-संत और काला बाजारीरियों के अलावा शरीफ लोग भी सभी समस्त भेदभावों को भुलाकर समान श्रद्धाभाव से वहां जाने लगे। रिश्वत लेते पकड़े गए जमना बाबू तो छह दिन से रामलीला मैदान में ही सपरिवार डटे हैं।

कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार को देश से विदा करके ही घर लौटेंगे। टोपी-झंडे वालों की तो अन्ना सीजन में चांदी-ही-चांदी है। हर दिन पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी है। वे कहते हैं कि इत्ते टोपी-झंडे तो कभी बिके ही नहीं।

वो भगवान को पटा रहे हैं कि अन्ना भगवान की लीला और लंबी चले। जेब तकरों में भी धार्मिक भावनाएं उछाल मारने लगी हैं। वे हाथ में मिनी तिरंगा लिए सब को सम्मति दे भगवान का भजन गाते हुए कर्मण्याधिकारस्ते के पुनीत भाव से ओतप्रोत होकर रामलीला मैदान में जेबतराशी का अपना कर्म करने में लगे हुए हैं। प्राइवेट प्रेमिकाएं प्रेमी की कमर में हाथ डालकर मुंह पर तिरंगे का टैटू लगाए-हाय अन्ना का आलाप लेती हुईं रामलीला मैदान से लेकर इंडियागेट तक की दूभर यात्रा में तीन-तीन बार आईसक्रीम खाकर प्रेमी के धन और अपने तन-मन के बूते पर भ्रष्टाचार से युद्ध करने में जुट गईं हैं। आम आदमी से लेकर विपक्ष और विपक्ष से लेकर सरकार तक भ्रष्टाचार के खिलाफ सभी अन्ना के साथ हैं। अब आएगा मज़ा। अब भ्रष्टाचार की खैर नहीं। यकीनन भ्रष्टाचार हिंद महासागर में डूबकर आत्म हत्या कर लेगा। और तब आनेवाली नस्लें सिर्फ किताबों में ही पढ़ेंगी कि कभी भारत में भी भ्रष्टाचार हुआ करता था।

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