लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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ऐक्चुअली मैं उनका खासमखास तबसे हुआ जबसे मैंने चुनाव में उनके नाम भारी जाली मतदान सफलतापूर्वक करवाया था और वे भारी मतों से जीते थे।

आज की डेट में उनको अकबर तो नहीं कह सकता पर मैं उनके लिए बीरबल की तरह हूं। जब भी वे परेशान होते हैं लाइफ लाइन में मुझे ही यूज करते हैं।

कल वे मेरे घर आए। लड़खड़ाते हुए चल रहे थे, जैसे हाउस में ठीक ठाक पिट गए हों। चेहरे पर इतनी उदासी जैसे महीनों से कुछ खाया ही न हो। कहीं किसी कार्यक्रम में न गए हों। शायद हाउस में किसी मुद्दे को लेकर विपक्ष से उलझ गए होंगे, दिमाग के पतले शरीर के मोटे जो ठहरे। पार्टी ने इनको टिकट दिमाग देखकर नहीं शरीर देख कर ही तो दिया है। आजकल हाउस में किसी मुद्दे को लेकर बहस कम होती है लात घूंसे अधिक चलते हैं। फिर भी आज की डेट में सबसे कमाई वाला धंधा या तो राजनीति है या फिर धर्म, अध्यात्म। मजे करो जनसेवा के नाम पर जितने कर सकते हो। पिछले महीने ही वे हमारी पंचायत के प्रधान बने, कल जो फटी चप्पलों में वोट मांगने आए थे आज वही लग्जरी कार में शौच जाते हैं। फूंक वाले बाबा जी, मजे करो भगवान के नाम पर जितने कर सकते हो। भक्तों को कहो, वासना से दूर रहो। खुद आठों पहर चौबीसों घंटे वासना के सागर में डुबकियां लगाते रहो। मानो हरि की पौड़ी पर डुबकियां लगा रहे हों।

‘क्या बात गुरू! ये क्या हाल बना रखा है? कुछ खाते क्यों नहीं?’

‘यार क्या खाऊं! यहां तो हाथों के तोते उड़ रहे हैं।’ उन्होंने कहा तो मैं उनके खाली हाथों को देखने लगा कि यार! इनके हाथों में तोते तो है नहीं। बंदे ने माल पकड़ने के बदले तोते पकड़ने का धंधा कबसे शुरू कर दिया! जब कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने अपना सिर खुजलाते उनसे कहा, ‘देखो गुरू! मैं जनता तो हूं नहीं कि आपके खाली हाथों में तोते देख सकूं। मैं ठहरा जाली मतों का जुगाड़ करने में सिध्दहस्त! सीधी बात पर अपुन की कमांड है सो सीधी बात कहो।’

‘यार! रीयली दुविधा में हूं।’ और वे सच्ची को दुविधा में लगे। हद है यार! पूरे देश को दुविधा में डालकर खुद मजे लेने वाला खुद दुविधा में? ये कोई बंदे का नया पैंतरा तो नहीं? चलो देखते हैं माजरा क्या है? कम तो हम भी नहीं, ‘कहो गुरू, दुविधा क्या है? साली दुविधा के हाथ पांव तोड़कर आपके हाथ में न दे दूं तो मेरा नाम भी… अभी इन हड्डियों का दम गया नहीं है। ‘मैंने खद्दर के कुरते के सारे बटन खोल मारे तो उन्होंने मेरे कुरते के बटन बंद कर मेरे जोश को कुछ शांत करते कहा, ‘यार! ये दुविधा दिमाग की है! है तेरे पास?’

‘गुरू दिमाग होता तो… आज पता चला साला दिमाग पास न हो तो हाथी भी गधा ही होता है, ‘पर गुरू कहो तो सही। शायद दिमाग पर जोर डाल कर कुछ हल निकल ही आए।’ मैंने यों ही कह दिया। हालांकि मेरे दिमाग के बारे में मेरे से अधिक उनको पता था।

‘ये महिला आरक्षण बिल देर सबेर लागू तो होगा ही !’ कह वे रोने से हो गए।

‘तो क्या हो गया?? राज तो फिर भी मर्द ही करेंगे ना!’

‘नहीं यार वो बात नहीं! पर मर्दों की सीटें तो कम हो जाएंगी?’

‘हां ये बात तो है!’ पहली बार मेरे दिमाग पर बोझ सा पड़ा कुछ’, तो???’

‘तो क्या यार! शादी भी नहीं करवाई। ऐसे ही निकल रहा था। तब सोचा था विवाह करवा कौन पंगा ले। अब शादी होने से रही। मेरी सीट कल को महिला के लिए आरक्षित हो गई तो???’

‘मेरी बीवी है ना गुरू!’ लगा जैसे मैं दिल्ली में सांसदों के आलीशान मकान के आगे के लॉन में टहल रहा होऊं। भाई लोग आंखों ही आंखों में बात कर रहे हैं, ‘वो तो तेरी है ना?’

‘तो क्या हुआ गुरू! मैं तो आपका हूं ना!’

‘सो तो ठीक है भैया! सब जगह औरों की बीवी चल सकती है पर चुनाव के लिए तो अपनी ही बीवी चलती अच्छी लगती है। अच्छा , एक बात बता?’

‘कहो गुरू!’ गुरू पर गुस्सा आया था उस वक्त। पर चुप रहा। साले का नमक जो खाया है। और अपुन लोग सबकुछ भूल जाते हैं पर किसी का खाया नमक नहीं।

‘किसी अच्छे डाक्टर को जानता है?’

‘गुरू अपुन को साले जुकाम से अधिक कभी कुछ हुआ ही नहीं। सो दो गोली किसी भी झोला छाप से ली और दारू के साथ गटक ली। इधर दारू के साथ गोली अंदर तो उधर जुकाम विपक्ष से हाउस की तरह बाहर। पर करना क्या है?’ मैंने पूछा तो वे अपने मुंह को मेरे कान के पास ले फुसफुसाए ,’ यार! सेक्स चेंज करवाना था।’ फिर इधर उधर देखने लगे।

‘सेक्स चेंज करवाना है? क्यों मर्द होकर जीने में मजा नहीं रहा अब??’

‘नहीं रहने वाला है न! समझा करो ना यार! तुम हमेषा पैरों के पास की सोचते हो। तुम्हारे साथ यही सबसे बड़ी दिक्कत है। मैं फ्यूचर की सोच रहा हूं। इससे पहले कि मेरी सीट महिला के लिए आरक्षित हो मैं… जनता की सेवा करने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं। कोई अच्छा सा डॉक्टर जितनी जल्दी हो सके ढूंढना। ये सोचकर कि मैं अपना सेक्स चेंज नहीं, तुम अपना सेक्स चेंज करवा रहे हो। कहीं ऐसा न हो कि गलत हाथों में पड़कर न इधर का रहूं न उधर का। ये मेरे कद का नहीं तुम्हारे कद का सवाल है।’

अब साहब मैं क्या करूं?? आपकी नजर में कोई भरोसेमंद डॉक्टर हो तो अवश्‍य बताइएगा। देश की इज्जत का सवाल है।

-डॉ. अशोक गौतम

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