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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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-वेद प्रकाश अरोड़ा

बजट सरकार की आमदनी और खर्चों का बहीखाता ही नहीं होता, वह सरकार की आर्थिक नीतियों, सुधारों और राहों के कांटों-कठिनाइयों को हटाकर सुखद समाधान प्रस्तुत करने की दूर दृष्टि और भावी नीतियां तथा कार्यक्रम भी अपने दामन में लिए रहता है। कह सकते हैं कि वह विगत कल की उपलब्धियों, कमियों, वर्तमान की चुनौतियों और आगत कल के सुनहरी सपनों-संकल्पनाओं को आकार देने के प्रयासों का दर्पण भी होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि 2009-2010 का वित्तीय वर्ष भारत की तेज उभरती अर्थव्यवस्था के लिए विकट चुनौतियों का वर्ष रहा। ये चुनौतियां इसलिए अधिक गंभीर थी क्योंकि सारा विश्व भयंकर वित्तीय संकट के भंवर में फंसा हुआ था। लगभग सभी महाद्वीप अमरीका से पसरी घोरमंदी और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से उत्पन्न महंगाई की मार झेल रहे थे। ई।

विश्वव्यापी मंदी के नकारात्मक परिणामों से उभरने के लिए सरकार ने तीन बड़े राहत पैकेज दिए, जिनमें उत्पाद, करों और निर्यात शुल्कों में छूट पर छूट दी गई। उधर रिजर्व बैंक ने भी तंगहाली को कम करने और खपत, मांग तथा खर्चे बढ़ाने के उद्देश्य से बाजार में नकदी डालने के लिए रेपो और रिवर्स रेपो रेट यानी छोटी अवधि के कर्जों पर ब्याज दरें कम कर दीं और कैश रिजर्व रेशो यानी नकदी आरक्षी अनुपात में भी कटौती कर दी। इससे बाजार में वित्तीय गहमागहमी, नकदी का चलन और कारोबार बढ़ गया, लेकिन मंदी में भी महंगाई की मार रुकने का नाम नहीं ले रही थी। बढ़ती महंगाई के प्रकोप पर लगाम लगाने के लिए रिजर्व बैंक ने पहला काम यह किया कि उसने कैश रिजर्व रेशो 0.75 प्रतिशत बढ़ाकर 5 प्रतिशत से 5.75 प्रतिशत कर दी। इस वृद्धि से बैंकों की 360,000 करोड़ रुपए की नकदी, रिजर्व बैंक के हाथ में चली गई। बाजार में इस राशि का चलन रूकने से महंगाई पर कुछ लगाम लग सकती है। उधर बैंक अपनी नकद राशि की कमी दूर करने के लिए ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं। कुछ बैंकों ने ये बढ़ाई भी हैं। इससे भी महंगाई पर कुछ और अंकुश लग सकता है। सरकार द्वारा फूंक-फूंक कर कदम रखने का ही परिणाम है कि अभी रेपो दर और रिवर्स रेपो दर क्रमश: 4.75 प्रतिशत और 3.25 प्रतिशत पर ही कायम रखी गई है। यानी ब्याज दरों को जहां का तहां रखकर विकास की गति को बनाए रखने का प्रयास जारी है और दूसरी तरफ कैश रिजर्व रेशो में कमी कर महंगाई पर अंकुश लगाने का प्रयत्न भी जारी है। दूसरे शब्दों में महंगाई पर अंकुश लगाकर सरकार आम लोगों की पीड़ा को कम करना चाहती है और साथ ही विकास को बढ़ाकर आय और रोजगार के अवसर बढ़ाना और खुशहाली लाना चाहती है। इसके लिए जरूरत है कि विकास का आधार व्यापक बनाया जाए और उसे अधिक समावेशी बनाया जाए। साथ ही यह भी जरूरी है कि आपूर्ति और मांग के बीच दूरियां और असंतुलन कम हो।

समावेशी विकास

वर्तमान सरकार के लिए समावेशी विकास सर्वसाधारण से जुड़ा आस्था और विश्वास का मंत्र है। पिछले पांच वर्षों में इसी सरकार ने कानूनी गारंटी के साथ व्यक्ति को सूचना का अधिकार और काम का अधिकार प्रदान किया है। इसके बाद 2009-10 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम बना। अगले कदम के रूप में अब खाद्य-सुरक्षा का बिल तैयार है। इसके अंतर्गत गरीबी की रेखा के नीचे जिन्दगी बसर करने वाले परिवारों को 25 किलो चावल या गेहूं तीन रुपए किलो की दर से दिया जाएगा। यह न मिलने पर उन्हें मुआवजे के रूप में नकद राशि मिलेगी। इस राशि से वे खुले बाजार में अनाज खरीद सकेंगे। अगर कोई राज्य सरकार इसकी व्यवस्था नहीं कर सकी तो वह अनाज के मूल्य का भुगतान करेगी। ऐसे सभी वायदों-वचनों को पूरा करने के लिए सामाजिक-क्षेत्र पर व्यय बढ़ते-बढ़ते 137674 रुप्ए तक पहुंच गया है। यह रकम वर्ष 2010-2011 के कुल बजट व्यय का 3.7 प्रतिशत है। योजना आवंटन का अन्य 25 प्रतिशत ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास के लिए रखा गया है। इससे समावेशी विकास की प्रक्रिया और मजबूत होगी। समावेशी विकास का मतलब है देश के उत्थान की राह तमें सबको साथ लेकर चला-बढ़ा जाए। जो लोग अभी तक समाज कल्याण के इस महायज्ञ में शामिल नहीं हुए हैं, उन्हें भी साथ लेकर और कदम-से-कदम मिलाकर आगे बढ़ने का अभियान जारी रखा जाए। यानी सर्वोदय और सर्वसमाज की प्रगति के लाभ से कोई वंचित न रह जाए। इसी प्रयास के अंतर्गत बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का अधिकार 2009 के अधिनियम में प्रदान किया गया है। इस अधिनियम में 6 से 14 वर्ष तक के आयु-समूह के सभी बच्चों को बिना किसी भेदभाव और समता के सिध्दांतों पर आधारित गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की रूपरेखा तैयार की गई है। हाल के वर्षों में सर्वशिक्षा अभियान ने प्राथमिक शिक्षा के लिए बच्चों के पंजीयन और बुनियादी ढांचे के सुधार में महत्वपूर्ण योगदान किया है। लगभग 98 प्रतिशत बस्तियां अब प्राथमिक स्कूलों के दायरे में आ गई हैं। स्कूली शिक्षा के लिए योजना आवंटन 26800 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 31,636 करोड़ रुप्ए कर दिया गया है। इसके अलावा तेरहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार राज्यों को प्राथमिक शिक्षा के लिए 3675 करोड़ रुपये मिलेंगे। स्वास्थ्य क्षेत्र की बात करें तो बजट में इस बात पर जोर दिया गया है कि स्वास्थ्य सुविधाएं जन-जन तक पहुंचाई जाए और कहीं कोई कमी देखने में आए तो उसे दूर कर दिया जाए। इसके लिए जिलावार स्वास्थ्य रूपरेखा तैयार करने के लिए स्वास्थ्य सर्वेक्षण किया जाएगा। निस्संदेह इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों से प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम खासकर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को बहुत फायदा होगा। स्वास्थ्य कार्यक्रमों के सफल कार्यान्वयन के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए योजना आवंटन 19534 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 22300 करोड़ रुप्ए कर दिया गया है।

भारत निर्माण

चाहे गांव हो या शहर दोनों क्षेत्रों में, आम आदमी के लिए कल्याण कार्यों की झड़ी लगाकर उनकी दशा सुधारने के लिए युगांतकारी कदम उठाए गए हैं। महात्मा गांधी कहा करते थे-जिस तरह ब्रह्मांड मनुष्य में वास करती है, उसी तरह भारत गांवों में वास करता है। ग्रामीण बुनियादी ढांचे का विकास सराकर की एक उच्च प्राथमिकता क्षेत्र है। नए वित्त वर्ष में गांवों में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 66100 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। जब भी ग्रामीण आधारभूत ढांचे की चर्चा चलती है तो भारत-निर्माण का बृहद कार्यक्रम, सिर चढ़कर बोलने लगता है। यह कार्यक्रम सरकार की कार्य पध्दति और प्रबंधन के प्रति दृष्टिकोण को साफ-साफ जग-जाहिर करता है। यह दृष्टिकोण है-ग्रामीण क्षेत्रों के प्रति सहृदयता, सदाशयता और संवेदनशीलता का।

• त्वरित सिंचाई

• त्वरित जल सप्लाई

• ग्रामीण सड़कों से बस्तियों को जोड़ना

• देहाती इलाकों में मकान बनाना

• गांवों में बिजली की व्यवस्था करना और

• टेलीफोन की सुविधा प्रदान करना।

बजट के शिल्पी वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के अनुसार योजना खर्च में 48 प्रतिशत आवंटन भारत निर्माण के विभिन्न कार्यक्रमों के लिए है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ने भारत निर्माण कार्यों में सोने पर सुहागे का काम किया है। इस योजना से भी शहरों की तरफ पलायन रोकने में बहुत मदद मिली है। योजना को शुरू हुए चार वर्ष पूरे हो चुके हैं। अब यह देश के सभी जिलों में लागू हो चुकी है। इसने साढ़े चार करोड़ से अधिक परिवारों की जिन्दगी में नया खुशनुमा रंग भर दिया है। अनेक घरों में मायूसी का स्थान मुस्कानों ने ले लिया है। नए वर्ष में इस योजना के लिए व्यय राशि बढ़ाकर 40100 करोड़ रुपए कर दी गई है।

इस सिलसिले में कमजोर वर्ग के लोगों के लिए ग्रामीण मकान निर्माण योजना का जिक्र किए बिना नहीं रहा जा सकता है। नए वित्त वर्ष में इंदिरा आवास नाम की लोकप्रिय योजना के लिए आवंटन बढ़ाकर 10,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है।

देश के पिछड़े इलाकों में आधारभूत ढांचे की कमियां-कमजोरियां दूर करने के लिए पिछड़ा-क्षेत्र-अनुदान कोष कारगर साधन प्रमाणित हुआ है। इसलिए अब इस कोष की राशि 26 प्रतिशत बढ़ाकर 5800 करोड़ से 7300 करोड़ रुपए कर दी गई है।

किसान देश की जनसंख्या का लगभग 70 प्रतिशत हैं और सकल घरेलू उत्पाद के तीन घटक हैं-विनिर्माण, सेवा और कृषि। इसलिए स्वाभाविक है कि समावेशी अथवा समग्र विकास को बढ़ावा देने, ग्रामीण आमदनी और किसानों की क्रयशक्ति में वृद्धि करने और खाद्य-सुरक्षा को बनाए रखने में कृषि और किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इस सबको देखते हुए किसानों के लिए कर्ज माफी और कर्ज राहत योजना के तहत कर्जों की वापसी की अवधि 31 दिसंबर, 2009 से 30 जून, 2010 तक, छह महीने के लिए बढ़ा दी गई है। कुछ राज्यों में सूखे और कुछ अन्य भागों में आई भीषण बाढ़ से पीड़ित किसानों को कर्जों की वापसी में यह राहत देना किसानों के प्रति सरकार के उदार दृष्टिकोण का परिचायक है। इसी उदारता का एक अन्य प्रमाण यह है कि पिछले बजट में अल्पावधि-फसल ऋणों का निर्धारित समय पर भुगतान करने वाले किसानों के लिए प्रोत्साहन के रूप में एक प्रतिशत की अतिरिक्त सहायता ब्याज के भुगतान में दी गई थी। नए वित्त वर्ष में फसल ऋणों का समय पर भुगतान करने वाले किसानों के लिए यह आर्थिक सहायता एक प्रतिशत से बढ़ाकर दो प्रतिशत कर दी गई है। मतलब यह कि अब ये किसान पांच प्रतिशत की वार्षिक दर पर ब्याज का भुगतान करेंगे।

छोटी-छोटी आय वाले लोगों में बचत की आदत डालने और बचत की राशि से अपना आर्थिक स्तर सुधारने के लिए 2000 से अधिक आबादी वाली 60 हजार बस्तियों में अगले दो वर्षों में समुचित बैकिंग सुविधाएं प्रदान की जाएगी। इससे वे साहूकारों और महाजनों के चंगुल से छुटकारा भी पा सकेंगे। बिना बैंक वाले इलाकों में बैंक खोलने में तेजी लाने के लिए नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक) में बनाए गए वित्तीय समावेश कोष और वित्तीय समावेश टेक्नॉलॉजी कोष दोनों के लिए एक-एक सौ करोड़ रुपए की राशि बढ़ा दी गई है।

शहरी कल्याण कार्यक्रम

समाज कल्याण की दिशा में आगे कदम बढ़ाते हुए गांवों की तरह शहरों में भी गरीबों की हालत सुधारने, बेरोजगारों को रोजगार दिलाने, छोटे-छोटे धंधों में तकनीकी कौशल बढ़ाने और सामुदायिक भागीदारी को गति देने के लिए स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना को सुदृढ़ बनाया गया है। शहरी विकास के लिए आवंटन में पिछले वर्ष की तुलना में 75 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि की गई है। इसके अलावा शहरी गरीबी उन्मूलन और आवास के लिए आवंटन 850 करोड़ से बढ़ाकर 1000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। शहरों को जल्द-से-जल्द झुग्गी-झोंपड़ियों से मुक्त कराने के उद्देश्य से पिछले वर्ष संक्षेप में कह सकते हैं कि नए वित्त वर्ष का बजट जन-जन के कल्याण की भावना से ओत-प्रोत है। यह आर्थिकता के इस कठिन दौर में भी गरीब के चेहरे और उसके आंसुओं को केंद्र में रखकर बनाया गया है। पैट्रोल और डीजल पर प्रति लीटर एक रुपया केंद्रीय उत्पाद शुल्क लगाने के सिवा कोई नया कर नहीं लगाया गया है। पहले दी गई रियायतों और छूटों में से कुछ को वापस लिया गया है। कह सकते हैं कि यह बजट मुख्यतया किसान, मजदूर और आम आदमी को समर्पित है। इसमें चाहत है-आम आदमी को जमीन से उठाकर कुछ सम्मान दिलाने की, उसकी जिन्दगी को जीने लायक बनाने की। (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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