लेखक परिचय

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं। डॉ. मिश्रा के हिन्दी में वैज्ञानिक लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं । उनकी अनेक हिन्दी कविताएँ विभिन्न कविता-संग्रहों में संकलित हैं। डॉ. मिश्रा की अँग्रेजी भाषा में वनस्पतिशास्त्र व पर्यावरणविज्ञान से संबंधित 15 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी एक और पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।

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हम प्रतिवर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाते हैं। सरकारी स्तर पर काम करने वालों को भारत की राजभाषा नीति के बारे में फिर भी काफी जानकारी काम करते करते हो जाती है। परन्तु गैर सरकारी विशुद्ध रुप से आम भारतीय जनता को प्रायः ही राजभाषा नीति के बारे में कोई विस्तृत जानकारी होती है। लेकिन भारत के नागरिक होने के नाते यह आम भारतीय के लिए उतना ही जरुरी भी है कि वे अपनी राजभाषा के लिए बनाई गई राजभाषा नीति को जानें और समझें। हमारा देश एक बहुभाषा-भाषी देश है। तेईस प्रमुख भारतीय भाषाएँ यहाँ बोली जाती हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 1652 बोलियां बोली जाती हैं। प्रत्येक प्रदेश की अपनी भाषा है और उस भाषा की अपनी स्वस्थ, सुदीर्घ एवं साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा है, जिसमें भारतीय धर्म-दर्शन, विद्या-बुद्धि, चिंतन और कलाओं की चर्मोत्कृष्ट संपदा समायोजित है। दूसरे शब्दों में भारतीय मनीषा और विचारणा इन्हीं भाषाओं के साधकों एवं सृजकों की समेकित अभिव्यक्ति है, जिसे हम दूसरे शब्दों में ‘भारतीयता’ या ‘भारतीय-अस्मिता’ भी कहते हैं।
स्वतंत्रता के बाद हमारे देश के सामने जब यह प्रश्न चुनौती बनकर खड़ा हुआ कि बहुभाषाओं वाले इस देश की राजभाषा किसे बनाया जाए और उसको उसके स्वरुप में कैसे अक्षुण्ण रखा जाए? जब देश की राजभाषा बनाने पर विचारविमर्श चल रहा था तब दो भाषाएं विकल्परुप में रखी गईं थीं एक हिन्दी और दूसरी तमिल। ज्यादा वोट हिन्दी के लिए पड़े और सर्वसम्मति से हिन्दी राजभाषा घोषित कर दी गई। राजभाषा का सामान्य अर्थ है राजकाज चलाने की भाषा अर्थात् भाषा का वह स्वरुप जिसके द्वारा राजकीय कार्य चलाने में सुविधा हो। वास्तव में यह शब्द अँग्रेजी के स्टेट लैंग्वेज का अनुवाद रुप है, जिसका प्रयोग सर्वप्रथम राजाओं के द्वारा किया जाता था। स्वतंत्रता से पूर्व हिन्दी के लिए राजभाषा शब्द का प्रयोग प्रायः नहीं मिलता है। स्वाधीन भारत के अन्तर्गत भारत के गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी ने राष्ट्रभाषा के समानांतर राजभाषा शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया था। हिन्दी को राजभाषा घोषित करने वाला प्रस्ताव दक्षिण भारतीय विद्वान श्री गोपालस्वामी अय्यंगर द्वारा रखा गया था, जो 14 सितम्बर 1949 को संविधान में राजभाषा के रुप में स्वीकारा गया। इसलिए हम 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाते हैं।
अब देश की राजभाषा तो स्वीकार कर ली गई, लेकिन इसे अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए संवैधानिक नीतियों का बनाया जाना भी अनिवार्य था। अतः 26 जनवरी 1950 से संविधान के लागू होने के साथ-साथ हिन्दी का भारत संघ की राजभाषा बनने के बाद भारत सरकार को यह कर्तव्य सौंपा गया कि वह हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार एवं विकास करे ताकि हिन्दी भाषा सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके। हाँलाकि भारत संघ की राजभाषा हिंदी के प्रावधानों को अमल करने की नीति जोर-जबरदस्‍ती की कभी नहीं रही है, जैसा कि कई बार लोग दुष्प्रचार करते हैं कि हम पर हिन्दी थोपी जा रही है, ऐसा बिल्कुल भी नहीं रहा है, अपितु प्रारम्भ से ही राजभाषा नीति प्रेरणा और प्रोत्‍साहन की रही है। भारत सरकार आरम्भ से ही राजभाषा हिंदी संबंधी संबैधानिक उपबन्‍धों एवं उन पर बने नियमों के अनुपालन हेतु चरणबद्ध कार्यक्रमों के माध्यम से राजभाषा हिंदी को सरकारी संगठनों और उपक्रमों आदि पर लागू करने की ओर प्रवृत रही है। जहां तक राज्यों की राजभाषा नीति की बात है, तो वे राज्य जिन्‍होंने केंद्र की तरह अपने-अपने राज्यों में राजभाषा भी हिंदी को स्‍वीकार किया है, इन राज्‍यों में भी राजभाषा नीति भारत सरकार की नीति के अनुकूल प्रेरणा और प्रोत्‍साहन की ही रही है।
भारत की राजभाषा नीति के संवैधानिक स्वरुप को यदि विश्लेषित किया जाए तो हम पाते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि भारत की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है। संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप है। हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा का प्रयोग भी सरकारी कामकाज में किया जा सकता है। अनुच्छेद 343 (2) के अंतर्गत यह भी व्यवस्था की गई है कि संविधान के लागू होने के समय से 15 वर्ष की अवधि तक, अर्थात सन 1965 तक संघ के सभी सरकारी कार्यों के लिए पहले की भांति अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग होता रहेगा। यह व्यवस्था इसलिए की गई थी कि इस बीच हिन्दी न जानने वाले हिन्दी सीख जायेंगे और हिन्दी भाषा को प्रशासनिक कार्यों के लिए सभी प्रकार से सक्षम बनाया जा सकेगा। अनुच्छेद 334 (3) में संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह 1965 के बाद भी सरकारी कामकाज में अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रखने के बारे में व्यवस्था कर सकती है। अनुच्छेद 344 में यह कहा गया कि संविधान प्रारंभ होने के 5 वर्षों के बाद और फिर उसके 10 वर्ष बाद राष्ट्रपति एक आयोग बनाएँगे, जो अन्य बातों के साथ साथ संघ के सरकारी कामकाज में हिन्दी भाषा के उत्तरोत्तर प्रयोग के बारे में और संघ के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसी के लिए अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग पर रोक लगाए जाने के बारे में राष्ट्रपति को सिफारिश करेगा। आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए इस अनुच्छेद के खंड 4 के अनुसार 30 संसद सदस्यों की एक समिति के गठन की भी व्यवस्था की गई। संविधान के अनुच्छेद 120 में कहा गया है कि संसद का कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है। परन्तु राज्यसभा के सभापति महोदय या लोकसभा के अध्यक्ष महोदय विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। किन प्रयोजनों के लिए केवल हिंदी का प्रयोग किया जाना है, किन के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग आवश्यक है और किन कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाना है, यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा नियम 1976 और उनके अंतर्गत समय समय पर राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए निदेशों द्वारा निर्धारित किया गया है।
भारत की राजभाषा ओर उसकी नीतियों के अनुपालन करवाने में राजभाषा विभाग की बहुत बड़ी भूमिका है। राजभाषा के बारे में संवैधानिक और विधिक प्रावधानों के अनुपालन तथा संघ के कार्यालयीन प्रयोजनों के लिए हिन्दी के प्रयोग को बढावा देने के लिए जून 1975 में, भारत सरकार के गृह मंत्रालय के एक स्वतन्त्र विभाग के रूप में राजभाषा विभाग की स्थापना की गयी थी। तभी से यह विभाग संघ के कार्यालयीन प्रयोजनों हेतु हिन्दी के प्रगामी प्रयोग के लिए प्रयासरत है। विभाग बन जाने के बाद राजभाषा नियम 1976 में बने और आदेशों का संकलन 1976 में निकाला गया, दूसरा 1980 में और तीसरा संस्करण 1986 में प्रकाशित हुआ। भारत सरकार नियम 1961 के अनुरूप राजभाषा विभाग को प्रमुख कार्यों के दायित्व सौंपा गए थे, उनमें राजभाषा से सम्बधित संवैधानिक प्रावधानों तथा राजभाषा अधिनियम, 1964 (1963 का 19) का कार्यान्वयन, किसी राज्य के उच्च-न्यायालय में अंग्रेजी के अतिरिक्त, भाषा के सीमित प्रयोग की अधिकृति हेतु राष्ट्रपति का पूर्व अनुमोदन, संघ की कार्यालयीन भाषा के रूप में केन्द्र सरकार के कर्मचारियों के लिए हिन्दी शिक्षण योजना, पत्र-पत्रिकाओं तथा अन्य तत्संम्बन्धित साहित्य तथा नियमों प्रशासनिक शब्दावली, पाठ्यचर्या, पाठ्यपुस्तकें, प्रशिक्षण सामग्री का प्रकाशन शामिल हैं। इनके अलावा राजभाषा विभाग केन्द्रीय सचिवालय कार्यालयीन भाषा सेवा के संवर्ग का गठन और प्रबन्धन, केन्द्रीय हिन्दी समिति, इसकी उपसमितियों सहित, से संबन्धित मामलों को देखना और विभिन्न मंत्रालयों/ विभागों द्वारा स्थापित विभिन्न हिन्दी सलाहकार समितियों से सम्बन्धित कार्य का समन्वय और केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो से सम्बन्धित कार्य भी करता है।
राजभाषा नीति को सुचारु रुप से देश में कार्यांवित करने के लिए प्रारम्भ से ही इतने अधिक कार्य किए गए हैं, जिनके बारे में आम जनता जानती ही नहीं है। राजभाषा हिन्दी का जो स्वरुप वर्तमान में सामने आया है, उसको स्थापित करने में प्रशासनिक स्तर पर चरणबद्ध ढंग से बहुत काम हुए हैं। 1950 में हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किए जाने के बाद से हिन्दी के माध्यम से प्रशासनिक कार्यों के संचालन के लिए सर्वप्रथम जो महत्वपूर्ण कार्य किए गए, उनमें प्रशासनिक, वैज्ञानिक, तकनीकी एवं विधि -शब्दावली का निर्माण, प्रशासनिक एवं विधि-साहित्य का हिन्दी में अनुवाद, अहिन्दी भाषी सरकारी कर्मचारियों का हिन्दी प्रशिक्षण और हिन्दी टाइपराइटरों एवं अन्य साधनों की व्यवस्था आदि शामिल थे। शब्दावली निर्माण के लिए शिक्षा मंत्रालय ने 1950 में वैज्ञानिक तथा तकनीकी बोर्ड की स्थापना की। इसके मार्गदर्शन में शिक्षा मंत्रालय के हिन्दी विभाग ने तकनीकी शब्दावली के निर्माण का कार्य चालू किया। हिन्दी विभाग का विस्तार होते होते सन् 1960 में केंद्रीय हिन्दी निदेशालय की स्थापना हुई। इसके कुछ समय बाद 1961 में राष्ट्रपति के आदेशानुसार वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग की भी स्थापना की गई। निदेशालय तथा आयोग ने अब तक विज्ञान, मानविकी, आयुर्विज्ञान, इंजीनियरी, कृषि तथा प्रशासन आदि के लगभग 4 लाख अंग्रेज़ी के तकनीकी शब्दों के हिन्दी पर्याय प्रकाशित कर दिए हैं। इसी प्रकार राजभाषा (विधायी आयोग) तथा राजभाषा खंड ने विधि शब्दावली का निर्माण कार्य लगभग पूरा कर लिया है। केंद्रीय सरकार के विभिन्न मंत्रालयों/विभागों के मैनुअलों, संहिताओं, फार्मों आदि का अनुवाद कार्य पहले शिक्षा मंत्रालय के केंद्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा किया जाता था। बाद में मार्च, 1971 में यह कार्य गृह मंत्रालय के अधीन स्थापित केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो को सौंपा गया। ब्यूरो ने निदेशालय द्वारा अनूदित साहित्य के अतिरिक्त अब तक अनेक मैनुअलों/फार्मों/रिपोर्टों आदि का अनुवाद करके विभिन्न मंत्रालयों को उपलब्ध करा दिया है। इस समय ब्यूरो मंत्रालयों/विभागों के अतिरिक्त अन्य सरकारी कार्यालयों/उपक्रमों आदि के मैनुअलों का भी अनुवाद कर रहा है। इसी प्रकार विधि मंत्रालय के राजभाषा खंड ने भी अब तक अधिकांश केंद्रीय अधिनियमों एवं नियमों आदि का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कर दिया है और यह कार्य निरंतर चल रहा है।
यह सर्वविदित है कि भारत में हिन्दी सभी राज्यों में भलीभाँति बोली समझी नहीं जाती है। अतः राजभाषा नीति को सभी पर थोपा नहीं जा सकता। इसके लिए भाषायी दृष्टिकोण से राजभाषा नीति के अन्तर्गत भारत का ‘क”, ”ख” और ”ग” क्षेत्रों के रुप में क्षेत्रीय विभाजन किया गया है। ‘क” क्षेत्र के अंतर्गत- बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान, उत्‍तर प्रदेश, छत्‍तीसगढ़, उत्‍तराखंड, झारखंड राज्‍य तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, दिल्‍ली संघ राज्‍य क्षेत्र आते हैं। ”ख” क्षेत्र के अंतर्गत – गुजरात, महाराष्‍ट्र, पंजाब राज्‍य और चंडीगढ़ संघ राज्य आते हैं। राजभाषा नियम में संशोधन के पश्‍चात् दमण और दीव एवं दादर तथा नगर हवेली को इस क्षेत्र में शामिल किया गया है। ”ग” क्षेत्र के अतंर्गत – ”क” और ”ख” क्षेत्र में शामिल राज्‍यों एवं संघ राज्‍यों को छोड़कर अन्‍य सभी राज्‍य एवं संघ क्षेत्र आते हैं। राजभाषा नियम 1976 यथा संशोधित 1987 के अंतर्गत शामिल ”क” क्षेत्र में – बिहार, हरियाणा ”ख” क्षेत्र में – गुजरात, महाराष्‍ट्र तथा ”ग” क्षेत्र में- पश्चिम बंगाल, केरल आते हैं।
राजभाषा नीति में इस बात का ध्यान रखा गया कि जिन लोगों को हिन्दी नहीं आती है, उनके लिए प्रशिक्षण की सरकारी स्तर पर व्यवस्था की जानी चाहिए। अतः केंद्र सरकार के कर्मचारियों को हिंदी शिक्षण योजना के अंतर्गत प्रशिक्षण देने के लिए केंद्रीय हिंदी निदेशालय में पत्राचार पाठ्यक्रम विभाग की स्थापना सन् 1968 में की गई थी। केंद्र सरकार के कर्मचारी, सार्वजनिक उपक्रमों तथा स्‍वायत्‍त संस्थाओं आदि में कार्यरत कर्मचारियों को पत्राचार हिंदी सिखाने के लिए कार्यालयी हिंदी से संबंधित तीन पाठ्यक्रम ‘प्रबोध, प्रवीण तथा प्राज्ञ’ क्रमश: सन् 1969, 1970 तथा 1972 में आरंभ किए गए। पहला प्रबोध – यह प्रारंभिक पाठ्यक्रम है और इसका स्तर प्राइमरी स्कूल की हिंदी के स्तर के बराबर होता है। दूसरा प्रवीण – इसका स्तर मिडिल स्कूल की हिंदी के स्तर के बराबर होता है। तीसरा प्राज्ञ – इसका स्तर हाई स्कूल की हिंदी स्तर के बराबर होता है। इसके अलावा दो-दो वर्षों की अवधि के ‘प्रवेश’ और ‘परिचय’पाठ्यक्रमों के स्थान पर अब एक-एक वर्ष के क्रमश: ‘सर्टिफिकेट’ और ‘डिप्लोमा’ पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं। वर्ष 2003-04 से सर्टिफिकेट, डिप्लोमा पाठ्यक्रम के अतिरिक्‍त दो और नए पाठ्यक्रम : एडवांस हिंदी डिप्लोमा और बेसिक हिंदी पाठ्यक्रम आरंभ किए गए। एडवांस हिंदी डिप्लोमापाठ्यक्रम को हिंदी भाषा एवं साहित्य की समुचित जानकारी उपलब्ध कराता है। बेसिक हिंदीपाठ्यक्रम अनिवासी भारतीयों को तथा भारत में रहने वाले विदेशियों को अल्पावधि में हिंदी सिखाने के से प्रारंभ किया गया है। निदेशालय के पाठ्यक्रमों में छात्रों की संख्या कई गुणा बढ़ गई है। पत्राचार पाठ्यक्रम योजना के तहत संचालित पाठ्यक्रमों में प्रतिवर्ष लगभग 10,000 छात्रों को दाखिला दिया जाता है। इन पाठ्यक्रमों से अब तक लाभान्वित छात्रों की संख्या 4-18 लाख से भी अधिक है।
राजभाषा नीति के तहत राजभाषा के समुचित प्रयोग के लिए विभिन्न समितियाँ भी गठित की गईं। संसदीय राजभाषा समिति का गठन राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 4 के अनुसार 1976 में किया गया। इस समिति में कुल 30, जो राज्यसभा से 10 और लोकसभा से 20 सदस्य होते हैं। भारत के गृहमंत्री इस समिति के अध्यक्ष होते हैं और राजभाषा विभाग, भारत सरकार के सचिव इस समिति के सदस्य-सचिव होते हैं। यह समिति अपना प्रतिवेदन (रिपोर्ट) भारत के राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करती है। हिन्दी के प्रचार और प्रसार के लिए भारत सरकार ने इसके बाद एक और केंद्रीय हिन्दी समिति का गठन राजभाषा अधिनियम, 1963 के 1967 के संशोधन के साथ किया था। यह समिति भारत सरकार के सभी मंत्रालय, विभाग एवं उपक्रमों में हिंदी के हो रहे कार्यों और कार्यक्रमों का समन्वय करती है। भारत के प्रधानमंत्री इस समिती के अध्यक्ष होते हैं, भाषाई क्षेत्र क, ख, ग क्षेत्रों में से सभी के 6 मुख्यमंत्री,संसदीय राजभाषा समिति की उपसमिति के संयोजक इस समिति के प्रतिनिधी होते हैं और राजभाषा विभाग, भारत सरकार के सचिव इस समिति के सदस्य-सचिव होते हैं। यह उच्च-स्तरीय समिति होती है। इसके दिशा-निर्देशन में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में भी ‘हिंदी सलाहकार समितियों’ का गठन किया जाता है जिसकी अध्यक्षता संबंधित विभाग के मंत्री करते हैं। हिन्दी सलाहकार समिति का गठन राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 4 के अनुसार 1976 में किया गया। इस समिति में कुल 30, जो राज्यसभा से 10 और लोकसभा से 20 सदस्य होते हैं। भारत के गृहमंत्री इस समिति के अध्यक्ष होते हैं। राजभाषा विभाग, भारत सरकार के सचिव इस समिति के सदस्य-सचिव होते हैं। यह समिति अपना प्रतिवेदन (रिपोर्ट) भारत के राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करती है। केंद्रीय राजभाषा क्रियान्वयन समिति के अध्यक्ष राजभाषा विभाग के सचिव होते हैं। सभी मंत्रालयों के संयुक्त सचिव इस समिति के पदेन सदस्य होते हैं। यह समिति सरकारी कामकाज में हिन्दी के प्रयोग की समीक्षा करती है। कर्मचारियों को हिन्दी का प्रशिक्षण देने, राजभाषा विभाग द्वारा समय समय पर जारी निर्देशों का पालन करवाने तथा इन निर्देशों के कार्यान्वयन में आने वाली कमियों तथा कठिनाइयों को दूर करने के लिए अपने सुझाव देती है। भारत सरकार के सभी कार्यालयों,उपक्रमों,बैंकों आदि में राजभाषा कार्यान्वयन को सुचारू, सुनियोजित और सुंदर ढंग से संचालित करने के लिए राजभाषा कार्यान्वयन समिति का गठन किया गया है। इस समिति का गठन प्रत्येक कार्यालय, शाखा आदि में अनिवार्य है। राजभाषा नियम 12 में कहा गया है कि प्रत्येक सरकारी कार्यालय में राजभाषा कार्यान्वयन का दायित्व प्रशासनिक प्रधान का है इसलिए प्रत्येक कार्यालय में इस समिति का पदेन अध्यक्ष कार्यालय विशेष के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं तथा समिति का पदेन सदस्य-सचिव कार्यालय विशेष का राजभाषा अधिकारी होता है। इन दो पदों के अतिरिक्त समिति के सदस्य होते हैं जो सामान्यतया कार्यालय के विभिन्न विभागों के प्रमुख होते हैं। इस समिति की कोई निर्धारित संख्या नहीं होती है, कार्यालय के आकार के अनुसार संख्या होती है। कार्यालय के सभी विभाग प्रमुखों को इस समिति का सदस्य बनाना अनिवार्य है। नगर राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय द्वारा देश भर में फैले कार्यालयों/उपक्रमों/बैंकों आदि में राजभाषा के प्रयोग को बढ़ावा देने और राजभाषा नीति के कार्यान्‍वयन के मार्ग में आई कठिनाइयों का दूर करने के उद्देश्‍य से गठित किया गया एक संयुक्‍त मंच है। देश के उन सभी नगरों में जहां केन्‍द्रीय सरकार के 10 या इससे अधिक कार्यालय हो, वही नगर राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति गठन कर सकते हैं। जिन कार्यालयों को यह समिति चलाने का अधिकार मंत्रालय, राजभाषा विभाग की ओर से दिया गया है, उस कार्यालय के प्रमुख इसके अध्‍यक्ष होते हैं। समिति के अध्‍यक्ष अपने कार्यालय अथवा किसी अन्‍य सदस्‍य कार्यालय से एक हिंदी विशेषज्ञ को उसकी सहमति से समिति का सदस्‍य सचिव मनोनीत करते हैं। इस समिति की बैठक वर्ष में दो बार होती है।
राजभाषा कार्यान्वयन को सुचारू रूप से चलाने के लिए भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष वार्षिक कार्यक्रम जारी किया जाता है जिसमें राजभाषा कार्यान्वयन के विभिन्न लक्ष्यों को दर्शाया गया होता है। इस समिति की बैठक प्रत्येक तिमाही में कम से कम एक बार अवश्य आयोजित किया जाना अनिवार्य है। सामान्यतया अप्रैल-जून, जुलाई-सितम्बर, अक्तूबर-दिसंबर तथा जनवरी-मार्च की कुल चार तिमाहियों में राजभाषा कार्यान्वयन समिति की कुल चार बैठकें आयोजित की जाती हैं। राजभाषा कार्यान्वयन समिति बैठक के कार्यवृत्त का अपना महत्व होता है। इससे जहाँ एक ओर बैठक की संपूर्ण कार्यवाही की जानकारी मिलती है, वहीं बैठक में अनुपालनार्थ लिए गए निर्णयों का यह एक अधिकृत तथा प्रामाणिक दस्तावेज होता है। समिति की आगामी बैठक में कार्यवृत्त की पुष्टि में उपयोग में आता है। यह बैठक की मदवार, क्रमवार कार्यवाही अनुसार सदस्य-सचिव द्वारा लिखा जाता है जिसमें महत्वपूर्ण चर्चाएं, निर्णय, चर्चा में भाग लेनेवाले/ पहल करनेवाले सदस्यों आदि का नाम,पदनाम होता है अर्थात संपूर्ण बैठक का यह शाब्दिक आईना होता है। इसे विभिन्न कार्यालयों आदि में प्रेषित किया जाता है। कार्यवृत्त लिखना एक कौशल है। कुशल राजभाषा अधिकारी बैठक की संपूर्ण कार्रवाई को क्रमबद्ध, लयबद्ध और सारबद्ध रूप में लिखता है जो पठन में रूचिकर और आकर्षक लगता है। राजभाषा कार्यान्वयन समिति और राजभाषा अधिकारी का अटूट पारस्परिक रिश्ता है। यदि यह समिति सशक्त है तो राजभाषा अधिकारी सशक्त है। यदि राजभाषा अधिकारी परिणामदायक है तो यह समिति परिणाम देनेवाली है। यदि राजभाषा अधिकारी अपने कार्य में प्रभावशाली है तो यह समिति भी प्रभावशाली है। किसी भी कार्यालय के राजभाषा कार्यान्वयन की स्थिति की झलक या तो राजभाषा कार्यान्वयन समिति के कार्यवृत्त से देखी जा सकती है अथवा राजभाषा अधिकारी से मिलकर इसका अनुभव किया जा सकता है।
राजभाषा नीति की प्रोत्साहन योजनाओं के अन्तर्गत किसी भी सरकारी संस्थान में हिन्दी में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए दो स्तर की योजनाएं हैं। एक संस्थान के स्तर पर और दूसरी भारत सरकार द्वारा निर्धारित। संस्थान अपने स्तर पर हिन्दी में श्रेठ कार्य करने के लिए, आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं जैसे हिन्दी टिप्पण लेखन, हिन्दी टाइपिंग, आदि के लिए पुरस्कार प्रदान करता है। भारत सरकार द्वारा निर्धारित हिन्दी पुरस्कार योजनाओं में वर्ष 1986-87 से इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्‍कार योजना प्रचालनरत है। प्रत्‍येक वर्ष मंत्रालयों / विभागें, बैंकों और वित्तीय संस्‍थानों, सार्वजनिक क्षेत्र प्रतिष्‍ठानों तथा शहर राजभाषा कार्यान्‍वयन समितियों को संघ की राजभाषा नीति के कार्यान्‍वयन में असाधारण उपलब्धियों के लिए पदक दिए जाते हैं। केन्‍द्रीय सरकार, बैंकों, वित्तीय संस्‍थानों, विश्‍वविद्यालयों, प्रशिक्षण संस्‍थानों और केन्‍द्रीय सरकार के स्‍वायत्त निकायों को हिन्‍दी में मूल पुस्‍तकें लिखने वाले कार्यरत / सेवा निवृत्त कर्मचारियों को नकद पुरस्‍कार दिए जाते हैं। ज्ञान विज्ञान पर मूल पुस्‍तक लेखन के लिए एक राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार योजना को आधुनिक विज्ञान/ प्रौद्योगिकी तथा समकालीन विषयों की सभी शाखाओं में हिन्‍दी भाषा में पुस्‍तकें लिखने को प्रोत्‍साहन देने के लिए भी एक राष्‍ट्रीय राष्ट्रभाषा पुरस्‍कार योजना है जो भारत के सभी नागरिकों के लिए है। इनके अलावा क्षेत्रीय स्‍तर पर क्षेत्रीय राजभाषा पुरस्‍कार प्रति वर्ष संघ की राजभाषा नीति के कार्यान्‍वयन और हिन्‍दी के प्रगामी उपयोग को आगे बढ़ाने में असाधारण उपलब्धियों के लिए क्षेत्रीय / अधीनस्‍थ कार्यालयों, सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों, शहर राजभाषा कार्यान्‍वयन समितियों, बैंकों और केन्‍द्रीय सरकार के वित्तीय संस्‍थानों को भी पुरस्‍कार दिए जाते हैं।

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