लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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-निर्मल रानी

भारत में पहली बार आयोजित हुए राष्ट्रमंडल खेल पूरी सफलता के साथ समाप्त हो गए। नि:संदेह कार्यक्रम के शानदार उद्धाटन तथा समापन समारोहों ने पूरी दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचा। क्या राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ी तो क्या इन खेलों के साक्षी बनने आऐ विदेशी सैलानी, सभी ने इस अभूतपूर्व शानदार आयोजन की जमकर सराहना की। आयोजन की सफलता से उत्साहित आयोजन समिति से जुड़े कई लोगों के मुंह से तो यह भी सुनने में आया कि भारत अब ओलंपिक खेलों का आयोजन कराने की भी क्षमता रखता है। बहरहाल, याद कीजिए राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने के पहले 6 महीनों का वह वातावरण जबकि मीडिया ने आयोजन समिति की इस हद तक आलोचना करनी शुरू कर दी थी कि ऐसा संदेह होने लगा था कि इतना विशाल आयोजन वास्तव में दिल्ली में हो भी पाएगा या नहीं। और यदि किसी तरह हुआ भी तो सफल हो पाएगा या नहीं। यह संदेह भी तमाम भारत वासियों को होने लगा था कि ऐसा न हो कि इतने बड़े आयोजन के बाद हमें मान स मान, प्रतिष्ठा आदि मिलने के बजाए कहीं अपमान, अक्षमता व फिसड्डीपन का तमंगा न मिल जाए। परंतु प्राकृतिक व मानवीय तमाम नकारातमक परिस्थितियों के बावजूद भारत ने इस आयोजन को सफलतापूर्वक कराकर दुनिया को अपनी क्षमता का आंखिरकार लोहा मनवा ही दिया। सोने पे सुहागा तो यह रहा कि हमारे देश के खिलाड़ियों ने इन राष्ट्रमंडल खेलों में अब तक के सबसे अधिक पदक जीतकर दुनिया को यह भी दिखा दिया कि हमारा देश केवल आयोजन में ही अनूठा नहीं बल्कि हमारे देश के खिलाड़ी भी दुनिया को अपना लोहा मनवाने की पूरी क्षमता रखते हैं।

बहरहाल जहां यह अभूतपुर्व एवं विशाल आयोजन पूरी तरह सफल रहा वहीं इसी आयोजन समिति के साथ व्यापारिक रूप से जुड़े तमाम लोगों ने लूट खसोटमचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक अनुमान के अनुसार राष्ट्रमंडल खेलों में लगभ 8000,करोड़ रूपये का घपला किए जाने का अनुमान है। ऐसी भी संभावना है कि यह घपला इससे भी बड़ा हो सकता है। गौरतलब है कि जब राष्ट्रमंडल खेलों का पारंपारिक बजट तैयार हुआ था तो उस समय इस पर 2 हाार करोड़ रूपये से भी कम लागत का अनुमान लगाया गया था। परंतु खेल के समापन तक इस पर 70 हजार करोड़ तक की लागत का ताज़ा अनुमान लगाया जा रहा है। आंखिर इस आयोजन के बजट में लगभग 35 गुणा की बढोतरी के पीछे का रहस्य क्या हो सकता है। यदि महंगाई को भी इस का कारण माना जाए तो यह बात गले से इसलिए नहीं उतरती कि देश में बावजूद इसके कि लगभग सभी वस्तुएं पहले से कहीं अधिक महंगी हो चुकी हैं उसके बावजूद किसी भी वस्तु का दाम कम से कम 35 गुणा तो हरगिज नहीं बढ़ा है।

खेलों के आयोजन में व्यापक भ्रष्टाचार होने के शोर-शराबे के बीच खेल उद्धाटन से पूर्व ही यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने यह सांफ कर दिया था कि खेलों के समापन के बाद इसमें हुए भ्रष्टाचार की पूरी जांच कराई जाएगी। उसी समय यह आभास हो गया था कि कार्यक्रम के समापन के बाद यथाशीघ्र इसकी जांच होने की संभावना है। परंतु इस बात का अंदाज तो किसी को नहीं था कि समापन समारोह के अगले ही दिन प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह इसकी जांच के आदेश दे देंगे। परंतु ऐसा ही हुआ। खेलों के समापन के अगले ही दिन देश के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग)को 90 दिन में राष्ट्रमंडल खेलों पर हुए पूरे खर्च का ऑडिट करने का आदेश दे दिया गया। और अब आशा है कि संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान ही कैग संभवत: अपनी रिपोर्ट भी संसद के सुपुर्द कर देगा।

इस बीच आयकर विभाग ने राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े व्यवसायियों के घरों, दं तरों व संबंधित संस्थानों में छापेमारी की कार्रवाई शुरु कर दी है। माना जा रहा है कि खेलों से जुड़े लगभग 20 व्यापारिक संस्थान संदेह के घेरे में हैं। पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता तथा स्वर्गीय प्रमोद महाजन के कभी परम मित्र व सहयोगी समझे जाने वाले ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के तथाकथित पहरेदार सुधांशु मित्तल के दिल्ली, चंडीगढ़ व लुधियाना में उनके व उनके रिश्तेदारों के आवासों व व्यापारिक परिसरों पर लगभग 30 जगह एक साथआयकर विभाग द्वारा छापेमारी की गई। यहां गौरतलब यह भी है कि राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार का सबसे अधिक राग इन्हीं ‘भाजपाई सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों’ द्वारा ही अलापा जा रहा था। परंतु इत्तेंफांक यह भी है कि संदेह की सुई सर्वप्रथम भाजपाई नेता पर ही जा टिकी। और इस छापेमारी से तिलमिलाए भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने जब कुछ नहीं सूझा तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ही संदेह के घेरे में लेने की कोशिश कर डाली। जरा गौर कीजिए कि जो व्यक्ति पहली बार देश का प्रधानमंत्री बनने के दिन तक मात्र एक मारूती 800 कार का स्वामी रहा हो तथा ड्राईवर रखने के बजाए स्वयं अपनी गाड़ी चलाता रहा हो ऐसे ईमानदार व्यक्ति पर संदेह करना हिमाक़त नहीं तो और क्या है?

ऐसा नहीं है कि राष्ट्रमंडल खेलों में हुए इस अभूतपूर्व लूटकांड में किसी कांग्रेसी नेता का हाथ नहीं होगा या कांग्रेस पार्टी से जुड़े व्यवसायियों ने दोनों हाथों से लूट नहीं मचाई होगी। परंतु इसकी शुरुआत में जिस प्रकार सुधांशु मित्तल जैसे ‘राष्ट्रवादियों’ से जुड़े स्थानों पर व उनके रिश्तेदारों के घरों व कार्यालयों पर छापे पड़ रहे हैं उससे एक बार फिर यह साफ जाहिर हो गया है कि इनका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या तो महा दिखावा है या फिर लूट-खसोट को ही यह लोग सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहते हैं। शायद बंगारू लक्ष्मण, दिलीप सिंह जूदेव तथा संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने वाले कई सांसदों की ही तरह। बहरहाल शुरु से ही विवादों में रहे राष्ट्रमंडल खेलों की जांच पूरी निष्पक्षता व पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए। चाहे इस लूट में कोई प्रधानमंत्री का सगा संबंधी शामिल हो या सोनिया गांधी व राहुल गांधी का कोई खास आदमी या फिर कांग्रेस पार्टी के किसी भी नेता का कोई नुमाईंदा या भारतीय जनता पार्टी का कोई सांस्कृतिक राष्ट्रवादी। जिसने देश की आम जनता के पैसों को लूटकर अपने घर भरे हैं उन्हें यथाशीघ्र न केवल बेनकाब होना चाहिए बल्कि उन्हें यथाशीघ्र संभव जेल की सलाखों के पीछे भी होना चाहिए।

हालांकि अभी से इस बात को लेकर भी संदेह व्यक्त किया जाने लगा है कि यह जांच किसी ठोस नतीजे पर पहुंचेगी भी या नहीं। और इस जांच के बाद कुछ लोग बेनकाब होंगे भी या नहीं। ऐसा संदेह पिछले कई दशकों से भ्रष्टाचार संबंधी तमाम जांच समितियों की जांच के बाद मिले असफल परिणामों के संदेह के आधार पर व्यक्त किया जा रहा है। परंतु जो लोग सोनिया गांधी व मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि से वांकिंफहैं तथा उसपर विश्वास करते हैं उन्हें जरूर इस बात की उम्‍मीद है कि जो भी हो इस जांच के परिणाम यथाशीघ्र सामने आएंगे तथा भ्रष्ट लोगों के चेहरों को देश व दुनिया ज़रूर देख व पहचान सकेगी। हालांकि खेल समापन के अगले ही दिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व सोनिया गांधी ने आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी से फासला बनाकर यह संदेश देश को दे दिया था कि खेल संबंधी भ्रष्टाचार की जांच में पूरी पारदर्शिता व निष्पक्षता रखी जाएगी तथा किसी भी व्यक्ति के बड़े से बड़े संबंधों का कोई लिहाज नहीं किया जाएगा। बावजूद इसके कि सुरेश कलमाड़ी खेल शुरु होने से पहले ही सांफतौर पर यह कह चुके हैं कि यदि मैं इन भ्रष्टाचारों में शामिल हुआ तो बेशक मुझे फांसी पर क्यों न चढा दिया जाए।

जहां तक भारत और भ्रष्टाचार का संबंध है तो आपको गत् सितंबर माह में अवकाश प्राप्त कर चुके भारतीय सतर्क ता आयुक्त प्रत्यूष सिन्हा के वे शब्द शायद भली भांति याद होंगे जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से यह कहा था कि यहां तीस प्रतिशत भारतीय तो पूरी तरह भ्रष्ट हैं जबकि इतने ही भारतीय भ्रष्ट होने की कगार पर हैं। पूरी दुनिया में फैले भ्रष्टाचार पर नार रखने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल के अनुसार भारत को दस में से केवल 3.4 अंक ही प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार भारत दुनिया के भ्रष्ट देशों की सूची में 84वें स्थान पर है। जबकि इस सूची में 1.1 अंक लेकर सोमालिया सबसे भ्रष्ट देश गिना जा रहा है। वहीं 9.4 अंक के साथ न्यूजीलैंड दुनिया के सबसे कम भ्रष्ट देशों में प्रथम है। भ्रष्टाचार पर नार रखने वाले विशेषक इसके पीछे का मु य कारण यह मानते हैं कि वर्तमान दौर में मनुष्य की इज्‍जत व सम्‍मान का मुख्‍य आधार केवल पैसा ही समझा जाने लगा है। आम आदमी केवल यह देखता है कि अमुक व्यक्ति कितना अधिक पैसे वाला है तथा उसके पास कितने संसाधन हैं। परंतु वह यह नहीं देखता कि उसने वह पैसा कहां से और किस प्रकार अर्जित किया। जबकि कुछ दशक पूर्व आम आदमी की इस सोच में कांफी अंतर था। कोई भी व्यक्ति पहले पैसे से अधिक अपनी इज्‍ज्‍त और मान सम्‍मान को तरजीह देता था। यही वजह है कि पहले हमें व हमारे देश को राजनेताओं के रूप में कभी लाल बहादुर शास्त्री, गुलारी लाल नंदा, रंफी अहमद किदवई, सरदार पटेल, डॉ राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण जैसे तमाम ऐसे ईमानदार लोग मिले जो आज हमारे लिए केवल दिखावे मात्र के लिए ही सही परंतु प्रेरणास्रोत जरूर समझे जाते हैं। परंतु दुर्भाग्यवश आज के दौर में हमें कभी मधु कौड़ा जैसे लोग मु यमंत्री बने दिखाई देते हैं तो कभी किसी रायपाल का विमान क्रैश होने पर आसमान से नोटों की बारिश होते नार आती है। कभी बंगारु लक्ष्मण तो कभी जूदेव तो कभी रेड्डी बंधु। कभी चारा घोटाला तो कभी चीनी घोटाला आदि न जाने क्या-क्या। ऐसे में एक बार फिर किसी ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादी’ नेता के रूप में सुधांशु मित्तल जैसे भाजपाई नेता का नाम राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले के सिलसिले में संदेह के दायरे में आना कोई आश्चर्यजनक बात तो नहीं परंतु अफसोसनाक बात तो जरूर है।

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13 Comments on "राष्ट्रमंडल खेल घोटाला: भाजपाई नेता पर हुआ पहला संदेह"

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शैलेन्‍द्र कुमार
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शैलेन्द्र कुमार

अरे निर्मला जी ने अपना पूरा परिचय छुपा रक्खा था
जे पी शर्मा जी को धन्यवाद्

J P Sharma
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कांग्रेस सेवा दल की पत्रकार शाखा के एक उदीयमान सदस्य द्वारा अपना कर्त्तव्य निभाने की मिसाल निर्मल रानी जी ने सब के सामने रख दी.एक सर्वविदित महाभ्रष्ट पार्टी के पत्रकार को कांग्रेस गठबंधन सर्कार के महाघोटालों में से कोई याद नहीं आया.बेचारी को यह भी पता नहीं की सीबीआई किस के इशारों पर नाचती है .क्वात्त्रोची को काले धन का पैसा बैंक से निकलवाने में सीबीआई पर जो कलंक लगा उसे कौन नहीं जानता .आपका भविष्य उज्जवल हो पर ऐसा तो लिखने की कृपा करें जिस पर कम् से कम अज्ञान पाठक ही विश्वास कर लें
विजय प्रकाश सिंह
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निर्मल रानी जी, अब जब सुधान्सू मित्तल को पकड़ ही लिया है तो जांच खत्म कर देनी चाहिए | क्यों बेकार में समय और पैसा बर्बाद किया जाए | आखिर बोफोर्स की जांच और कार्यवाही बंद करने के लिए यही तर्क दिया गया था | पिछली यूपीए सरकार ने अपने पहले साल में ही लन्दन के बैंक से बोफोर्स का पैसा निकालने दिया और फिर जांच बंद कर दी कि समय और पैसा बेकार में खर्च हो रहा है | दूसरी पारी में CWG घोटाले पर भी कुछ वैसी ही उम्मीद है और आप जैसे समर्थक तो हैं ही |… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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वाह! अवधेश जी, मंसूर जी,शैलेन्द्र कुमार जी, अभिषेक पुरोहित जी, शिशिर जी की तीखी और सही टिप्पणियों से पता चलता है की देश के लोग जागरूक हैं, सचेत हैं ; समय आने पर देश को लूटने वालों को वे दंड ज़रूर देंगे. इन जागरूक मित्रों को साधुवाद और सन्देश कि “जागते रहना”

दिवस दिनेश गौड़
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तिवारी जी भाजपा का तो पता नहीं किन्तु कांग्रेस तो चोर है ही साथ में वामपंथी आतंकवादी है| आपने आखिर स्वीकार कर ही लिया कि जो सत्ता में होगा वो तो खाएगा ही| तिवारी जी वैसे वामपंथ का बैंक बैलेंस भी मैंने सुना है काफी बढ़ गया है| शैलेन्द्र भाई, अभिषेक भाई और शिशीर भाई ने महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ दी हैं| और अभिषेक भाई ने तो इनकी ऐसी की तैसी कर डाली| शिशीर भाई सही कहा आपने इन्होने तो घोटालों में भी राजनीति खोज डाली| और शैलेन्द्र भाई आपने तो तिवारी जी कि बोलती ही बंद कर डाली| मुझे ख़ुशी हो… Read more »
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