लेखक परिचय

बालमुकुन्द पाण्डेय

बालमुकुन्द पाण्डेय

लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के सह संगठन सचिव हैं।

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-बालमुकुन्द पाण्डेय

चित्रकूट में भरत मिलाप का दृश्‍य जब सामने आता है तो देखने को मिलता है कि भरत के साथ आयी हुई सेना को देखकर लक्ष्मण का मन विकृत हो जाता है और वे भरत के सेना पर आक्रमण करने के लिए आक्रोशित होकर श्रीराम जी से अनुमति मांगते हैं। स्वभाव से शान्त व परिपक्व बुद्धि के श्रीराम लक्ष्मण को कुछ क्षण ठहरकर भरत के शुभ चरित्र का वर्णन करते हैं बाद मे भरत मिलाप होने पर लक्ष्मण ग्लानि से भर जाते हैं और श्रीराम से कहते है कि भैया आखिर ये बातें मुझे समझ में क्यों नहीं आतीं। लक्ष्मण का मार्गदर्शन करते हुए श्रीराम कहते हैं कि भावनाओं से विहीन मनुष्य, मनुष्य नहीं रह जाता, भावनायें मानवीय संवेदनाओं की प्रतीक हैं। किन्तु भावनाओं का सामंजस्य बुद्धि से नहीं होने के कारण उसका प्रतिफल सदैव प्रतिकूल होता है। जिसे समाजशास्त्र की भाषा में सद्गुण विकृति कहा गया है। रामायण के प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि इस प्रकार की सद्गुण विकृतियाँ भारतीय समाज में प्रारम्भिक काल से अब तक रही है। ये ‘भावुक’ शब्द ही अपभ्रंश होकर ‘बऊक’ शब्द बनता है अपने सामने से आने वाले शत्रु की मनसा समझे बिना उसके साथ किया गया व्यवहार सदैव घातक होता है। हमने विदेशियों के द्वारा भारत में किए गये क्रियाकलापों को समझे बिना उनके साथ जो व्यवहार किये और कर रहे हैं इसका प्रतिसाद हम हजारों वर्षों से भुगत भी रहे हैं। इसी प्रकार के एक दुरभि षणयन्त्र का परिणाम है ‘राष्ट्रमण्डल’।

इग्लैण्ड से अंग्रेज भारत क्यों आये उनका हेतु समझे बिना अपने सद्गुणों के कारण हमने उन्हे अंगीकार किया जिसका परिणाम हुआ भारत का सब प्रकार का शोषण, भारतीय संस्कृति का ह्रास, आर्थिक विपन्नता, समाज का विखण्डन व भारत का विभाजन।

अब विचार हमे यह करना है कि वह कौन सी परिस्थितियाँ थीं कि सब प्रकार से अपने को श्रेष्ठ बताने वाले अंग्रेज अपना घर छोड़कर गरम, अनपढ़, आलसी और मूर्ख लोगों के देष भारत में उन्हे आना पड़ा।

वास्तव में भारत व इंग्लिस्तान का सम्पर्क दो अलग-अलग सभ्यताओं व अलग-अलग आदर्शों का एक-दूसरे से टकराना था इसलिए और बातों से पहले हम उस समय के इंग्लिस्तान का संक्षिप्त चित्र देना चाहते हैं। सत्रहवीं शताब्दी के इंग्लिस्तान की हालात को बयान करते हुए प्रसिद्ध इतिहासकार डे्रपर लिखता है कि किसानों की झोपड़ियाँ नरसलों व छड़ियों की बनी होती थीं जिनके ऊपर गारा पोत दिया जाता था घर में घास जलाकर आग तैयार की जाती थी व धुएँ के निकलने के लिए कोई जगह नहीं होती थी। जिस तरह का समान उस समय एक अंग्रेज के घर में होता था वह जिस तरह से जीवन यापन करता था उससे मालूम होता था कि गाँव के पास नदी के किनारे जो उद्विलाव मेहनत से मांद बनाकर रहता था उस उद्विलाव की हालात में और उस किसान के हालात में ज्यादा फर्क न था। सड़कों पर डॉकू फिरते थे, नदियों पर समुद्री लुटेरे और लोगों के कपड़ों व बिस्तरों मे जुएँ, आम तौर पर लोगों की खुराक होती थी मटर, उड़द, जड़े व दरख्तों की छालें। ऐसा कोई धन्धा न था और न कोई तिजारत जिससे बारिश न होने के कारण से किसान दुष्काल से बच सके, मौसम की सख्ती से बचने का मनुष्यों के पास कोई उपाय न था। आबादी बहुत कम थी जो आबादी थी वह अन्न के आभाव से और घटती रहती थी। शहर के लोगों के हालात भी गाँव के लोगों से कुछ अच्छी न थी। शहर वालों का बिछौना भूस का एक थैला होता था तकिये की जगह एक लकड़ी का टुकड़ा होता था। जो शहर वाले खुशहाल थे वे चमड़े के कपड़े पहनते व जो गरीब थे वे अपने हाथ व पैरों पर पुआल की पुलियां लपेट कर अपने को सर्दी से बचाते थे जिन शहरों में शीसे व तेलपत्र की कोई खिडकी न होती थी वहाँ किसी तरह के कारीगर के लिए कहाँ गुंजाइस थी। वहीं कोई कारखाना न था जिसमे कोई कारीगर आराम से बैठ सके गरीबों के लिए कोई वैद्य न था सफाई का कहीं कोई इन्तजाम था ही नहीं।

आगे चलकर उस समय के यूरोप के सदाचार को बयान करते हुए डे्रपर लिखता है कि जिस तेजी के साथ गरमी की बिमारी उन दिनों तमाम रुपों में फैली थी उससे इस बात का साफ पता चलता है कि लोगो में दुराचार कितने भयंकर रुपों मे फैला था। यदि हम उस समय के अंग्रजी लेखकों का विश्वास करें तो विवाहित या अविवाहित, ईसाई पादरी या मामूली गृहस्थ, पोप लियो दशवें से लेकर के गली के भिखमंगे तक कोई वर्ग ऐसा न था जो इस रोग से बचा हो। इंग्लिस्तान की आबादी 50 लाख से भी कम थी। किसान अपने जमीन का मालिक नहीं होता था, जमीन जमींदार की होती थी व किसान केवल उसका मजदूर व चौकीदार होता था। सारी अंग्रेज कौम इतनी अनपढ़ थी कि पार्लियामेन्ट के हॉऊस ऑफ लार्डस् के बहुत से मेम्बर न पढ़ सकते थे न लिख सकते थे। ईसाई पादरियों में भयंकर दुराचार फैला हुआ था। खुले तौर पर कहा जाता था कि इंग्लिस्तान में 1 लाख ऐसी औरते हैं जिन्हे पादरियों ने खराब कर रखा है। कोई पादरी बड़ा से बड़ा जुर्म करे तो थोड़ा सा जुर्माना देकर छूट जाता था, मनुष्य हत्या के लिए पादरियों को केवल 6 सिलिंग जुर्माना था।

वहाँ स्वातंत्र्य के सम्बन्ध में डे्रपर लिखता है कि ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने आज्ञा दे रखी थी कि बकेनन, मिल्टन व वेक्स्टर की राजनैतिक पुस्तकें स्कूलों के ऑंगन में रखकर खुले तौर पर जला दी जांए। राजनीतिक व धार्मिक अपराधों के बदले जिस तरह की सख्त सजा दी जाती थी उस पर विश्वास होना कठिन है। लंदन के टेम्स नदी के पुराने टूटे हुए पुल पर इस तरह के अपराधियों के डरावने सिर काटकर लटका दिए जाते थे। उस समय की उदारता का अंदाजा एक कानून से लगाया जा सकता है जो 8 मई सन् 1985 को स्काटलैण्ड के पार्लियामेन्ट ने पास किया था। कानून यह था कि जो मनुष्य सिवाय वातसाह के सम्प्रदाय के दूसरे किसी ईसाई सम्प्रदाय के गिरजे में जाकर उपदेश देगा या सुनेगा उसे मौत की सजा दी जायेगी। स्काटलैण्ड के केवेनेन्टर (एक ईसाई सम्प्रदाय) लोगों के घुटनों को शिकंजा के अन्दर कुचलकर तोड़ दिया जाता था। स्त्रियों को लकडी से बाँध कर समुद्र के रेत पर छोड दिया जाता था। जबरजस्ती गुलाम बनाकर अमेरिका भेज दिया जाता था अपराध केवल इतना था कि वे सरकार के बताये हुए गिरजाघर में जाने से इन्कार कर दिये थे। इस नारकीय व्यापार में स्वयं इंग्लिस्तान की मलिका हिस्सा लेती थी। स्वभाविक था कि ऐसी हालात में शान्ति व तिजारत के लिए समाज में हलचल मचनी शुरु हो गयी थी। इसके लिए भारत का आकर्षण अंग्रजों के लिए उन्हे भारत खींचकर लाया।

बातें तो बहुत सारी हैं किन्तु भारत को सभ्यता और विकास सिखाने का दावा करने वाले अंग्रजों के भारत आने का उद्देष्य हम नहीं समझ सके। हमने अंग्रेजों के समझे बिना उनको गले लगाया और वे हमारे पीठ में छुरा मारते रहे झूठी कसमें और जालसाजियों के बल पर हमारा पतन करने में सक्षम हुए। विलियम हॉविट लिखता है जिस तरह से ईस्ट इंडिया कंपनी ने हिन्दुस्थान पर कब्जा किया उससे अधिक विभत्स व ईसाई सिद्धान्तों के विरुद्ध किसी दूसरे तरीके की कल्पना नहीं की जा सकती। जब कभी हम दूसरी कौमो के सामने हम अंग्रेजी कौम की सच्चाई व इमानदारी का जिक्र करते हैं तो वो बड़ी ही हिकारत के साथ भारत की ओर इशारा करके हमारा मजाक उड़ा सकते हैं। प्रसिद्ध अंग्रेज तत्ववेत्ता हर्वर्ड स्पेनर 1851 में करीब 100 साल के ईस्ट इंडिया कम्पनी के भारतीय शासन का सिंहावलोकन करते हुए लिखता है कि पिछली सदी में भारत में रहने वाले अंग्रेज जिन्हे बर्क ने भारत में शिकार की गरज से जाने वाले फसली परिन्दे बताया है। अपने मुकाबले पेरु व मैक्सिको निवासी यूरोपियनों (जिन्होंने वहाँ के लाखों आदिवासियों को खुले अंग भंग करके उनका शिकार खेलकर निर्मूल कर दिया था।) उससे कुछ कम जालिम साबित हुए।

भारत में अंग्रेजो के आने के मनसा का चित्रण करते हुए महान इतिहासकार सर सुन्दरलाल अपनी पुस्तक भारत में अंग्रेजी राज्य के द्वितीय खण्ड के अन्त में लिखते हैं कि मलिकाए ब्रितानिया के उपनिवेश स्थापित होने के बाद भारत में स्थाई रुप से अंग्रेजियत थोपने का कानूनी रुप करने का प्रयास किया गया। सन् 1813 के चार्टर्ड एक्ट में एक धारा यह भी थी कि जो अंग्रेज ईसाई पादरी भारतवासियों के धार्मिक उद्धार के लिए यानि उन्हे ईसाई बनाने के लिए भारत जाना चाहे उन्हें कानून के जरिये हर तरह की सुविधा दी जाय। इसके बाद ही ईसाई धर्म का प्रचार एक सरकारी महकमा (एक्लेजिएस्टिकल डिपार्टमेन्ट) भारत में खोल दिया गया और उसका खर्च भी जबरजस्ती भारतीयों के सिर ही मढ़ दिया गया। मार्च सन् 1858 में अंग्रेजी पत्रिका दी कलकत्ता दी व्यू में एक अंग्रेज का लिखा हुआ निम्न वाक्य मिलता है ”हमें चारों तरफ समय की आवाजें सुनाई दे रहीं हैं जिससे जोरों के साथ यह सलाह दी जाती है कि हमे क्या करना चाहिए कोई कहता है भारत को अवश्य ईसाई बना लेना चाहिए, कोई कहता है कि भारत में अंग्रेजों को बसाना चाहिए, कोई कहता है कि हिन्दुस्थानी जबानों को खत्म कर देना चाहिए तथा अंग्रेजी को प्रचलित कर देनी चाहिए। इसके परिणाम स्वरुप अंग्रेजों ने दो उपाय सोचे पहला ईसाई मत का प्रचार व दूसरी अंग्रेजी शिक्षा। मलिका विक्टोरिया नें यह वादा किया था कि मजहब के मामले में अंग्रेज सरकार किसी भी तरह का पक्षपात नहीं करेगी किन्तु 1858 में ही इंग्लिस्तान के प्रधानमंत्री लार्ड पामस्टन नें ईसाई पादरियों के एक डेपुटेशन के उत्तर में कहा कि मालूम होता है कि अन्तिम लक्ष्य के बारे में हम सबका एक ही मत है समस्त भारत में पूर्व से पश्चिम तक उत्तर से दक्षिण तक ईसाई मत के फैलाने में जहाँ तक हो सके मदद देना न केवल हमारा फर्ज है वरन् इसी में हमारा हित है। भारत की स्थिति में भारत को ईसाई बनाने का न प्रयत्न चल सका व न उसे खुले तौर पर शासन की निति का अंग बनाया जा सका किन्तु अंग्रेजी शिक्षा नें ऐसे लोगों की श्रेणी खड़ी कर दी जिनमें से अधिकतर लोगों मे राष्ट्रीयता व राष्ट्र्रीय की भावना का आभाव है। भारत के विकास के नाम पर रेल, रुई की खेती, अफीम व नील की खेती, अंग्रेजों को नौकरियाँ, भारतीयों को असली शासन से दूर रखना, भारतीय सेना का संगठन। भारत में इंग्लिस्तान का खिराज के द्वारा भारत के आर्थिक और मानसिक शोषण का दौर शुरु हुआ। लार्ड मैकाले ने स्वयं कहा था कि सब तरह के अन्यायों में सबसे बुरा अन्याय एक कौम का दूसरी कौम पर शासन करना है। अमेरिका के प्रसिद्ध राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने एक स्थान पर लिखा है कि कोई भी कौम इतनी भली नहीं हो सकती है कि दूसरी कौम को सुशासन दे सके।

महान उपन्यासकार गुरुदत्त ने दो खण्डों में प्रकाशित अपनी पुस्तक दो लहरों की टक्कर नामक पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि हिन्दू महासागर की तलहटी में एक ऐसी धारा प्रवाहित है जो भारतीय वांगमय को समय-समय पर व्यवस्थित करती रहती है। इसी के आधार पर भारतीय समाज के चिन्तक सन्त, क्रान्तिकारियों के द्वारा ब्रितानियों के मंसूबे ध्वस्त होते रहे। स्वामी विवेकानन्द, दयानन्द सरस्वती, रामसिंह कूका तथा राजस्थान व पंजाब के देशभक्तो के द्वारा अनवरत मात खाने के बाद ब्रितानियों के एक अधिकारी ने भेद नीति के द्वारा सन् 1885 में भारतीय राष्ट्र्रीय कांग्रेस की स्थापना ए0ओ0 ह्यूम ने वायसराय लार्ड डरफिन के परामर्श से की ताकि भारत में व्याप्त असंतोष को विद्रोह के रुप में परिणित होने से बचाया जा सके। लाला राजपत राय ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का मुख्य कारण यह था कि ह्यूम अंग्रेजी सम्राज्य को छिन्न-भिन्न होने से बचाना चाहते थे। कांग्रेस की स्थापना की कूटनीति में अंग्रेज अधिकारी सफल रहे क्योंकि उनके साथ दादा भाई नौरोजी, सूर्यनाथ बनर्जी, व्योमेश बनर्जी, फिरोजशाह मेहता और रानाडे जैसे भारतीय नेता अंग्रेजों के कुकृत्यों के वैचारिक सहयोेगी निकले किन्तु समय के साथ अंग्रेजों के कुत्सित षणयन्त्रों से पर्दा हटने लगा, कांग्रेस दो भागों मे बंट गयी। बंगाल विभाजन, जलियावाला बाग हत्याकाण्ड, लालाराजपत राय की हत्या से अंग्रेजों के विरुद्ध बहुसंख्यक भारतीयों में असंतोष सत्यदर्शन के आधार पर ज्ञात हुआ। कांग्रेस के प्रथम धड़े को उदारवादी गुट कहा गया। उदारवादी गुट का मानना था कि अंग्रेजों के हित मे ही हमारा हित निहित है। उदारवादी कांग्रेसी शासन के विरोधी नहीं थे उनका विचार था कि अंग्रेजों के देश से जाने के बाद देश मेें अराजकता फैल जायेगी। गोपाल कृष्ण गोखले ने विचार व्यक्त करते हुए कहा था कि अंग्रेजी नौकरशाही कितनी ही खराब क्यों न हो परन्तु आज केवल अंग्रेज ही केवल व्यवस्था बनाये रखने में सक्षम हैं। सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने अंग्रेजी शासन में अपनी पूर्ण श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा था कि ”इग्लैण्ड से हमे प्रेरणा व पथपर्दशन की अपेक्षा है इग्लैण्ड हमारा राजनैतिक नेता है”। इसी प्रकार के विचार व्यक्त करते हुए रहीमतुल्ला सयानी ने काग्रेंस के 12वें अधिवेशन में कहा था कि ”अंग्रेजों के इस राष्ट्र से अधिक ईमानदार तथा प्रबल राष्ट्र्र का इस दुनिया में अस्तित्व नहीं है”।

भारत में एनी बेसेन्ट के द्वारा थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना कांग्रेस के दूसरे धडे क़े द्वारा बंग-भंग आन्दोलन में विजय प्राप्त करने के पश्चात् एक नये विचार का सूत्रपात हुआ। लोकमान्य तिलक के द्वारा यह कहना कि ”स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है”, वीर सावरकर की पुस्तक 1857 तथा वन्देमातरम् के प्रयोग से भारत में एक नयी क्रान्ति का सूत्रपात हुआ जो ए0 ओ0 ह्यूम द्वारा स्थापित कांग्रेस के मंसूबों को ध्वस्त कर दिया।

यूरोपिय विद्वान वैटलैट रसैल ने लिखा है कि ”यूरोप के राजवंशो ने फ्रांस की क्रान्ति को नष्ट करना चाहा और नैपोलियन पैदा कर दिया नैपोलियन ने प्रसा को नष्ट करना चाहा व फिक्टे को जन्म दे दिया फिक्टे से विस्मार्क तक की यात्रा एक सहज विकासक्रम का रुप है। विस्मार्क ने फ्रांस को कुचलना चाहा जिसका परिणाम प्रथम विश्वयुद्ध हो गया। प्रथम विश्वयुद्ध विश्व में व्याप्त उपनिवेशवाद के प्रतिस्पर्धा का परिणाम था। यूरोपिय देश अपने उपनिवेश को बढ़ाने और उसका शोषण करना और ईसाईयत का प्रचार करना अपना अधिकार और कर्तव्य समझने लगे थे। इस युद्ध का सबसे प्रत्यक्ष राजनीतिक परिणाम यह हुआ कि तीन साम्राज्य जर्मनी, आष्ट्रिया, हंगरी व रुस समाप्त हो गये सारे विश्व में राजतंत्रो के विरुद्ध हवा चल गयी। मित्र राष्ट्रों मे गणतंत्र की प्रधानता थी युद्ध में प्रजातंत्र का नारा दिया गया व प्रजातंत्र विजयी हुआ उसे नैतिक बल मिला लेकिन पश्चिमी प्रजातंत्रों का खोखलापन तब प्रकट होने लगा जब उन्होने अपने उपनिवेश आजाद नहीं किये और उनका शोषक स्वरुप कायम रखा। ब्रितानिया उपनिवेषवाद पर इसका दूरगामी प्रभाव पड़ा ब्रिटेन ने अपने उपनिवेशों में प्रजातंत्र लागू करने से साफ इन्कार कर दिया, उदाहरण के लिए युद्ध में सब प्रकार के सहयोग के वावजूद रौलेट एक्ट पास हुआ जलियावाला बाग का भीषण हत्याकांड हुआ। 1919 की गवर्नमेन्ट ऑफ इंडिया नें अपेक्षित परिवर्तन नहीं किये इस तरह पष्चिमी देषों का प्रजातांत्रिक मुखौटा उतर गया और सारे एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका में राष्ट्रवादी शक्तियो का आन्दोलन तेजी से विकसित होने लगा। दुनिया को उन देशों को भी राजनैतिक महत्व मिलने लगा जिनकी चर्चा तक नहीं होती थी। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति अब यूरोप के देषों के वैदेशिक सम्बन्धों तक सीमित नहीं रह गयीं।

युद्ध काल के बाद अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग का महत्व स्पष्ट हुआ। किसी देश का अर्थतन्त्र और राजनीति राष्ट्रीय सीमाओं मे नहीं बाँधा जा सकता था क्योंकि बाजार का स्वरुप इतना व्यापक हो गया कि हर देश का आयात-निर्यात अन्य देशों के व्यापार पर निर्भर रहने लगा। परिणाम यह हुआ कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग व नीति निर्धारण होने लगा।

1887 में ब्रिटिश महारानी का जुबिली समारोह आयोजित किया गया था यह परम्परागत रुप से 1902 व 1907 में भी सम्मेलन हुए किन्तु तत्कालीन उपरोक्त कारणों से ब्रितानिया सम्राज्य को अपने औपनिवशिक देशों के व्यापार, शिक्षा संस्कृति और राजनीति को कायम रखने कि लिए ऐसे उपनिवेशिक देशों का एक संघ बनाने की आवश्यकता महसूस हुयी। 18 नवम्बर 1926 को ब्रिटिस्ट साम्राज्यवादी नेताओं के कान्फ्रेन्स में जो लन्दन में आयोजित था बालफोर नामक विद्वान ने एक घोषणा पत्र (मसौदा) पेश किया जिसे 1930 में कुछ संशोधन के पश्चात् 11 दिसम्बर सन् 1931 को ब्रिटिश पार्लियामेन्ट ने मान्यता दी जिसे ब्रिटिस्ट कामनवेल्थ के नाम से जाना जाता गया। और राष्ट्रमण्डल को वैधानिक स्वरुप प्रदान करने की बात कही गयी। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, द0 अफ्रीका आदि अनेक देश ब्रिटिस्ट शासन से धीरे-धीरे मुक्त होने लगे। द्वितीय महाविश्व युद्ध के पूर्व ब्रिटेन की हालात बिगड़ती गयी इस परिवेश में एशिया और अफ्रीका महाद्वीप के अनेक ब्रिटिश उपनिवेश स्वतंत्र हो गये। विश्व के बदलते परिवेश में ब्रिटेन अपन वर्चस्व को कायम रखना चाहता था। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उसने स्वतंत्र राष्ट्रों का एक सांगठनिक स्वरुप स्थापित करना चाहता था। ईस्ट इंडिया कम्पनी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आदि तमाम प्रयोगों के बाद सब प्रकार के निराशा के वातावरण मे अपने हित व अहंकार की तुष्टि होती रहे इस उद्देष्य से राष्ट्रकुल अस्तित्व में आया। और इसके माध्यम से अभी तक थोथा ही सही अपना वर्चस्व बनाये हुए है। आज राष्ट्रमण्डल में 53 देश हैं जिसमे एक को छोड़कर शेष ब्रिटेन के उपनिवेशिक देश हैं। 1931 के अधिनियम में डोमिनियनों के सम्बन्ध में यह टिप्पणी की गयी है कि ये राष्ट्र ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वसाशी जनसमुदाय है जो अपने आन्तरिक व वैदेशिक मामलों मे किसी के अधीन नहीं है परन्तु ब्रिटिश क्राउन के प्रति समान निष्ठा रखते हैं। इस अधिनियम का यह वाक्य कि ब्रिटिश क्राउन के प्रति समान निष्ठा रखते हैं इस अधिनियम में वर्णित समान दर्जे की अवधारणा को स्वयं ही मिथ्या व सारहीन सिद्ध करता है तथा राष्ट्रकुल में अन्य राज्यों को दोयम दर्जे का स्थान प्रदान करता है।

28 अप्रैल 1949 को भारत को राष्ट्रकुल का स्थायी सदस्य बनाया गया इसी दिन को आधुनिक कामनवेल्थ का जन्म माना जाता है। इसे लन्दन घोषणापत्र के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हुई। इस घोषणापत्र के माध्यम से यह निर्णय हुआ कि उन देशों को भी इसमें लिया जाय जो कामनवेल्थ के सदस्य नहीं हैं व इसका नाम ब्रिटिश कामनवेल्थ को बदलकर राष्ट्रकुल कर दिया गया।

द्वितीय महाविश्वयुद्ध के पश्चात् 1947 ई0 में ब्रितानिया साम्राज्य तितर-बितर सा हो गया था ब्रितानिया उपनिवेश के 70 प्रतिशत देश अपने को स्वतंत्र कर लिए थे। उपनिवेशों से खिराज के रुप में जाने वाला धन लगभग बन्द प्राय: हो गया था। ऐसी स्थिति में 14 जून सन् 1945 को लार्ड वेवल ने भारत के लिए एक योजना की घोषणा की जिसे भारतीय इतिहास में वेवल योजना के नाम से जाना जाता है इसे शिमला सम्मेलन भी कहते हैं। यह सम्मेलन 14 जुलाई सन् 1945 को असफल समाप्त हो गयी। इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता एवं इसके आस-पास का समय अंग्रेजो के द्वारा भारत को विखण्डित करने का सफल प्रयास चल रहा था जो राष्ट्रकुल के नियमों के सर्वथा विरुद्ध था। स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में अंग्रेजी दासता से मुक्त होने की एक लहर सी चल पड़ी थी हिन्दी भाषा, भारतीय संस्कृति एवं भारतीय प्रतीक चिन्हों से देश को सजाया जा रहा था यह विचार प्रमुखता से सामने आयी कि अंग्रेजो के प्रतीक चिन्ह और मुर्तियाँ जो स्थान-स्थान पर लगी हैं उससे हमे परतंत्रता का बोध होता है इसे हटा दी जांए। अनेक जगहों पर इसका प्रयास भी हुआ, अंग्रेजी भाषा के स्थान पर हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया तथा क्षेत्रिय भाषाओं को सम्मान मिलना प्रारम्भ हो गया किन्तु भारत सरकार मे उन विचारधारा का प्रभुत्व था जो अपने व अपने देश के उत्थान का माध्यम ब्रितानिया सरकार के नियमों और कार्यपद्धतियों को मानते थे भारत के राष्ट्रीय विचारधारा तथा भारतीय संस्कृति उनकी दृष्टि में ब्रितानिया संस्कृति से छोटी दिखाई देती थी। भारत के लिए गुलामी के प्रतीक के रुप में राष्ट्रकुल की सदस्यता से तुरन्त मुक्ति पा लेनी चाहिए थी जैसे अमेरिका ने किया। अमेरिका स्वतंत्र होने के पश्चात् अपने राष्ट्रवाद के उद्भव के लिए गुलामी के प्रतीक चिन्हो में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया था। देश में लगी हुई सारी मुर्तियाँ स्वतंत्रता के बाद ही निकालकर समुद्र में डुबो दी गयी थी रेल की लाइने जो ब्रितानिया साम्राज्य मे 1 मी0 10 सेमी की होती थीं अमेरिका ने 1 मी0 5 सेमी किया। ब्रितानिया साम्राज्य में Right hand driving है अमेरिका ने Left hand driving किया। ब्रितानिया साम्राज्य में दूरी की प्रणाली किमी0 मे है किन्तु अमेरिकन मे मील मे है इतना ही नहीं ब्रिटेन के अंग्रेजी के स्पेलिंग बदल करके अमेरिकन इंग्लिश भाषा का प्रावधान किया किन्तु भारत स्वतंत्र होने के पश्चात् भी ब्रितानिया उपनिवेशवाद के जहर से आज भी उबर नहीं पाया है और राष्ट्रकुल के सभी देश आज भी ब्रितानिया साम्राज्यवाद के प्रतीक संविधान, कानून, चलने के ढ़ंग व बोलने के तरीके का अनुसरण कर रहे हैं।

कामनवेल्थ ने विभिन्न घोषणा पत्रों के माध्यम से अपने कार्यपद्धति को बडे ही सावधानीपूर्वक राष्ट्रमण्डल के देषों पर थोपने का प्रयास किया इसमे पहला प्रजातंत्र के लिए कार्य दूसरा शिक्षा क्षेत्र में कार्य तीसरा मानवाधिकार की रक्षा चौथा शासन प्रणाली मे सुधार पाँचवा गरीब देशों की सतत् सहायता छठां राष्ट्रमण्डल के खेल और सांस्कृतिक मेल-मिलाप। अमेरिका का प्रभुत्व होने के पश्चात् यूएन की स्थापना हुई राष्ट्रमण्डल के सारे क्रियाकलापों के समानान्तर यूएन ने अपने कार्यव्यवहार प्रारम्भ कर दिये केवल राष्ट्रमण्डल के खेल तक ही राष्ट्रमण्डल की पहचान बची रह गयी है। अब यूएन व राष्ट्रमण्डल दोनो वैश्विक अधिनायकवाद और ईसाई मिशिनरी के रुप में भारत में सक्रिय हैं। शिक्षा व स्वास्थ्य के नाम पर भारतीय संस्कृति का विकृतिकरण किया जा रहा है। जैसे यौन शिक्षा एड्स का दुष्प्रचार बालश्रम, स्तनपान दिवस आदि माध्यम से बेरोजगारी, अराजकता, व्यभिचार को बढ़ाया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ अपने को विकसित देश मानकर विकासशील देशों का शोषण किया जा रहा है। राष्ट्रकुल की भाषा अंग्रेजी है तथा इसकी अध्यक्ष एलिजाबेथ द्वितीय है। यहाँ तक कि आज भी राष्ट्रमण्डल के सदस्य राजदूत एक दूसरे देश में राजदूत न कहके उच्चायुक्त (हाई कमीश्नर) कहे जाते हैं। सब प्रकार से विचार करने पर राष्ट्रमण्डल की प्रासंगिकता भारत में दासता के रुप मे है सबसे दुखद व शर्मनाक बात यह है कि भारत 1947 में स्वतंत्र होने के बाद भी इस विभेदकारी व दासता के प्रतीक संगठन का सदस्य बना एवं वर्तमान में भी इसका सदस्य बना हुआ है। किसी भी प्रभुता सम्पन्न एवं स्वाभिमानी राष्ट्र को इस सदस्यता को त्यागकर राष्ट्रमण्डल को समाप्त करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए जिससे कि भारत का गौरव व आत्मसम्मान अक्षुण्‍ण रखा जा सके।

(लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के सह संगठन सचिव हैं।)

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sunil patel
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पाण्डेय जी को धन्यवाद. हर अगला कदम पिछले कदम से सीख कर चलता है. हमारे देश का दुर्भाग्य है की हमने कभी भी इतिहास से कोई सीख नहीं ली. अंग्रेजो ने हमें नाम के लिये आजादी दी है, किन्तु मानसिक द्रष्टिकोण से हमें सेकड़ो सालो के लिए गुलाम बना लिया है. आज भी हम अंग्रजो का गुणगान करते नहीं थमते है. अंग्रेज चरवाहों का खेल यानि क्रिकेट को हमने भगवान् के खेल का दर्जा दे दिया है. अंग्रजो की चाय ने हमारा सरीर ख़राब कर दिया है, दूद दही से देश को मोहताज कर दिया है. अंग्रेजी को माँ और… Read more »
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