लेखक परिचय

तनवीर जाफरी

तनवीर जाफरी

पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में बहुत ही सक्रिय लेखन,

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-तनवीर ज़ाफरी

दशहरा पर्व केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। राजा दशरथ पुत्र मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम के जीवन की प्रमुख घटनाओं का मंचन इस पर्व के दौरान रामलीला के रूप में किया जाता है। विशेष कर इस दौरान अपने भाई भरत को अयोध्या की राजगद्दी सौंप कर भगवान राम के अयोध्या से 14 वर्ष केलिए वनवास पर जाने तथा इन 14 वर्षों के दौरान उनके जीवन में घटी प्रमुख घटनाओं विशेषकर सीता हरण, रावण की लंका पर आक्रमण तथा अंत में राक्षस प्रवृति का प्रतीक बने रावण के वध तक का दृश्य रामलीला के मंचन के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। दशहरा महोत्सव के अंतिम दिन अर्थात, विजयदशमी के दिन विशालकाय रावण तथा उसके राक्षस भाई कुंभकरण तथा पुत्र मेघनाद के विशाल पुतलों को अग्नि की भेंट कर ऐसी कल्पना की जाती है कि समाज द्वारा इन राक्षस रूपी प्रतीकों का दहन कर तमाम सामाजिक बुराईयों को नष्ट किए जाने का संदेश दिया गया है।

लंकापति रावण के विषय में यह कहा जाता है कि वह बावजूद इसके कि एक उच्च कुलीन ब्राह्मण परिवार में जनमा अत्यंत बुद्धिमान, तपस्वी, महाज्ञानी, बलशाली तथा सिद्ध व्यक्ति था। परंतु इन सब विशेषताओं के बावजूद वह अत्यंत अहंकारी, जिद्दी तथा राक्षसी प्रवृति का भी स्वामी था। छल कपट,मक्कारी बड़बोलापन तथा अनैतिक व्यवहार उसकी रग रग में भरे थे। उसके इसी व्यवहार ने उसे सीता जी का अपहरण करने की नौबत तक पहुंचा दिया। और यही घटना उसके जीवन का काल साबित हुई। आखिरकार अपने इन्हीं अनैतिक कार्यों के परिणाम स्वरूप उसे भगवान श्री राम के हाथों वध होना पड़ा। आज उसी लंका पति रावण को पूरी दुनिया में फैली तमाम प्रकार की कुरीतियों, बुराईयों व अनैतिकताओं का प्रतीक मानकर विजयदशमी के दिन उसे अग्नि के हवाले किया जाता है। त्यौहार के रूप में प्रत्येक वर्ष दोहराए जाने वाले इस रावण दहनके पश्चात ऐसा माना जाता है किरावण दहन कर प्रतीक रूप में अहंकार, ईर्ष्‍या, सहित तमाम सामाजिक बुराईयों को अग्नि की भेंट कर दिया गया है।

इसी आशय के साथ न केवल पूरे भारत वर्ष में बल्कि दुनिया के और भी तमाम उन देशों में जहां हिंदू समाज से जुड़े लोग पर्याप्त सं या में रहते हैं वहां भी रावण के पुतले को जलाकर बुराईयों को समाप्त किए जाने का संदेश दिया जाता है। दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू बहुसंख्‍क देश होने के नाते जाहिर है कि भारत वर्ष का विजय दशमी अथवा दशहरा महोत्सव सबसे अधिक हर्षोल्लास से तथा सबसे बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। भारतवर्ष में जिन प्रमुख स्थानों में यह पर्व बड़े पैमाने पर मनाया जाता है तथा उन्हें राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रय स्तर पर प्रसिद्धि प्राप्त है वे हैं दक्षिण भारत में मैसूर तथा हिमाचल प्रदेश में कुल्लू तथा उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद का दशहरा तथा दिल्ली के राम लीला मैदान में आयोजित होने वाला दशहरा महोत्सव। दिल्ली के दशहरा महोत्सव की प्रसिद्धि का प्रमुख कारण यही है कि एक तो यह देश की राजधानी का प्राचीन आयोजन है तथा दूसरे यह कि इस कार्यक्रम में आमतौर पर देश केप्रधानमंत्री अथवा देश के सर्वोच्च नेतागण भाग लेते रहते हैं। और सामाजिक बुराईयों के प्रतीक स्वरूप रावण वध का अग्नि बाण इन्हीं मु यातिथियों के द्वारा छोड़ा जाता है।

परंतु भारत के हरियाणा राय के अंबाला जिले के अंतर्गत पड़ने वाले बराड़ा नामक कस्बे में आयोजित होने वाली रामलीला तथा इसके अंतिम दिन अर्थात् विजयदशमी के दिन फूंका जाने वाला रावण का पुतला गत् 5 वर्षों से पूरी दुनिया में प्रसिद्धि के शिखर को छूता जा रहा है। बराड़ा कस्बे का यह रावण गत् तीन वर्षों से विश्व के सबसे ऊंचे रावण के रूप में तो अपनी पहचान बना ही चुका है। इसके साथ-साथ इस रावण से जुड़ी तमाम विशेषताएं भी ऐसी हैं जो बराड़ा के रावण को विश्व प्रसिद्ध रावण के रूप में स्थापित करती हैं। रामलीला क्लब बराड़ा के संस्थापक, अध्यक्ष तथा विश्व के सर्वोच्च रावण के पुतले के कला एवं तकनीकी निर्देशक राणा तेजिंद्र सिंह चौहान ने दो दशकों पूर्व रावण के मात्र 20 फुट ऊंचे पुतले का निर्माण कराकर इस महत्वपूर्ण आयोजन की बुनियाद डाली थी। तेजिंद्र सिंह चौहान बताते हैं कि जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे देश व दुनिया में सामाजिक बुराईयां भी अपना मुंह और अधिक फैलाती गई। और जैसे जैसे समाज में कुरीतियां, विद्वेष, वैमनस्य तथा अहंकार आदि समय के साथ साथ बढ़ता गया वैसे वैसे रामलीला क्लब बराड़ा द्वारा रावण के पुतले की ऊंचाई को भी निरंतर बढ़ाया जाता रहा। यहां तक¤ कि रावण का यह विशालकाय पुतला 2007 में 151 फुट, 2008 में 171 फुट ऊंचा, 2009 में 175 फुट तथा 2010 में 180 फुट की ऊंचाई तक पहुंच गया। इस प्रकार यह विशालकाय रावण जोकि गत् 4वर्षों से विश्व के सबसे ऊंचे रावण होने का गौरव प्राप्त कर चुका है,गत् तीन वर्षों से लगातार ऊंचाई के अपने ही कीर्तिमान को ध्वस्त करता आ रहा है।

इस अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के मुख्‍य सूत्रधार राणा तेजिंद्र चौहान ने इस वर्ष के रावण के पुतले की 180 फुट की ऊंचाई में जिन तमाम सामाजिक बुराईयों को प्रतीक स्वरूप समाहित किया है उनमें सांप्रदायिकता, जातिवाद, अहंकार, वैमनस्य, कन्याभ्रूण हत्या, अशिक्षा, बढ़ती जनसंख्‍या, बेराजगारी, मूल्यवृद्धि, राजनीति का अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, मिलावटखोरी व जमाखोरी तथा असमानता जैसी तमाम बुराईयां शामिल हैं। लगभग 5 लाख रुपये की लागत से इस वर्ष तैयार होने वाले इस विशालकाय रावण में 40क्विंटल से भी अधिक बांस लगाए गए। इस विशालकाय रावण को सिल्की एवं रंगीन पोशक से सजाया गया। सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल पेश करने वाले इस विश्व के सर्वोच्च रावण की एक और प्रमुख विशेषता यह रही कि इसे आगरा से आए मुस्लिम कारीगरों के एक परिवार ने आठ महीनों की लगातार मेहनत के बाद तेजिंद्र चौहान के निर्देशन में तैयार किया। रावण के पुतले की तैयारी के दौरान ही रमजान व ईद जैसे मुस्लिम समुदाय के प्रमुख त्यौहार भी गुजरे। इन त्यौहारों के दौरान मुस्लिम कारीगरों की सभी जरूरतों को श्री रामलीला क्लब, बराड़ा प्रमुख द्वारा पूरा किया गया। इस प्रकार रावण का विश्व का यह सबसे ऊंचा पुतला जिसे मुस्लिम कारीगरों ने तैयार किया, दुनिया में भारत की सांप्रदायिक एकता व सांप्रदायिक सौहार्द्र की पहचान भी बना।

गत 5 वर्षों से मैं भी इस विश्वस्तरीय रावण दहन के आयोजन को बहुत ही करीब से देख रहा हूं। यह आयोजन अपनी उपरोक्त विशेषताओं के चलते केवल कस्बाई या जिलास्तरीय भीड़ को ही आकर्षित नहीं करता बल्कि हरियाणा व देश के दूर-दराज इलाक़ों से भी तमाम लोग इसे देखने आते हैं। सैकड़ों की सं या में रेहड़ी वाले खाने-पीने की तमाम वस्तुएं लेकर तथा बच्चों के खिलौने आदि बेचने वाले तमाम दुकानदार बराड़ा में विजय दशमी से एक दिन पूर्व ही एकत्रित होना शुरु हो जाते हें। गोया यह आयोजन एक विशाल मेले के रूप में तमाम लोगों को एक दिन का रोजगार मुहैया कराने का भी साधन बन जाता है। इस विशालकाय रावण को खड़ा करना भी अपने आप में किसी परियोजना से कम नहीं है। इस पुतले को खड़ा करने के लिए कुछ ऐसी विशेष क्रेन बुलाई जाती हैं जिनमें इतने लंबे पुतले को खड़ा करने तथा इसे सुरक्षित स्थापित करने की पूरी क्षमता हो। इस आयोजन में प्रत्येक वर्ष अतिथि,मु य अतिथि व विशिष्ट अतिथि के रूप में अनेक बुद्धिजीवी, राजनेता तथा उद्योग जगत से जुड़े लोग शामिल होते हैं। इस वर्ष इस आयोजन के मु य अतिथि महर्षि मार्कंडेय विश्वविद्यालय मुलाना के चेयरमैन तरसेम गर्ग रहे।

इस वर्ष के आयोजन पर रोशनी डालते हुए आयोजन प्रमुख चौहान ने कहा कि अभी कुछ दिनों पूर्व अर्थात् 30 सितंबर को ही इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय की लखनऊ पीठ ने 6 दशक से लंबित पड़े रामजन्‍मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर अपना निर्णय सुनाया है। उच्‍च न्‍यायालय के निर्णय से साफ़ ज़ाहिर होता है कि हमारे देश का न्‍यायालय भी सहअस्तित्‍व, सांप्रदायिक सद्भाव तथा सांप्रदायिक एकता व समरसता का पक्षधर है। उच्‍च न्‍यायालय के इस निर्णय के तत्‍काल बाद आयोजित होने वाले दशहरा महोत्‍सव के माध्‍यम से बराड़ा में फूंका जाने वाला रावण भी न्‍यायालय के फ़ैसले का आदर व सम्‍मान करते हुए अपने विशालकाय व विश्‍व के सबसे ऊंचे रावण के दहन के माध्‍यम से केवल भारत के लोगों को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के शांतिप्रिय लोगों को यह संदेश देना चाहता है कि किसी समुदाय विशेष को ही नहीं बल्कि समाज के हर वर्ग को मिलजुलकर समाज में फैली तमाम उन बुराइयों के विरूद्ध एकजुट होकर आवाज़ उठाना चाहिए तथा संघर्ष करना चाहिए जो कि समाज में अपनी जड़ें गहरी कर चुकी हैं तथा हमारे समाज को दूषित कर रही हैं। और सांप्रदायिकता तथा धार्मिक उन्‍माद वर्तमान समय में समाज का सबसे बड़ा कलंक है। बराड़ा में बनाया गया यह विशालकाय रावण का पुतला जो कि अपने आप में प्रतीक स्‍वरूप तमाम बुराइयों को समेटे हुए है, का भी पूरी दुनिया को यही संदेश है कि हम सब मिलकर बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष करें व समाज से दुर्भावनाओं का ख़ात्‍मा कर प्रेम व सद्भावना का संदेश जन-जन तक पहुंचाएं।

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2 Comments on "सांप्रदायिक एवं सामाजिक सौहार्द्र का प्रतीक बना विश्व का सबसे ऊंचा रावण"

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awdhesh tiwari
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पंडित जी रिश्तेदारी याद आ रही है क्या ? फिर तो आज के जितने अवगुणी हैं सभी में कोई न कोई गुण तो है ही,क्यों न उनके गुणों पर ही ध्यान दिया जाये

prembabu sharma
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पुतला ऊँचा करने की कीर्तिमान ढ आपेक्षा एषा काम करो की लोग आपको याद करे. ये काम रका नेताओ को शोभा देता है. दोसरी बात रावन को बुराई का पर्तिक कहा जाता है लेकिन हमें रावन के अवगुण की अपेक्षा उसके गुने पर गौर करना चाहिए . प्रेम बाबु शर्मा

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