लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

आज यह बात बार-बार उठायी जा रही है कि आम लोगों में पढ़ने की आदत घट रही है। सवाल उठता है क्या तुलसीदास आज कम पढ़े जा रहे हैं ? क्या ‘रामचरितमानस’ कम बिक रहा है ? तुलसीदास आज भी सबसे ज्यादा पढ़े,सुने और देखे जा रहे हैं। सवाल उठता है पढ़ने की आदत पहले कैसी थी ? क्या हम पहले ज्यादा पढ़ते थे ? पढ़ने के मामले में हम पहले कोई ज्यादा बेहतर अवस्था में नहीं थे। हमारे पूर्ववर्ती कम पढ़ते थे। औपचारिक शिक्षा का प्रसार पढ़ने की संभावनाएं पैदा करता है। पहले कुछ ही लोग थे जो पढ़ते थे। संचार क्रांति के परिप्रेक्ष्य में पढ़ने की आदत को देखने पर जटिलता का आभास होता है। पढ़ने की जटिलताओं की अनुभूति साक्षरतायुग में नहीं थी।

हम अमूमन शिकायत सुनते हैं कि बच्चे टीवी के सामने बैठे रहते हैं या इंटरनेट में उलझे रहते हैं और कम पढ़ते हैं। सच क्या है ? जब भी संचार माध्यमों का विस्तार होता है तो उससे वर्तमान और भविष्य के बारे में जागरूकता पैदा होती है, वर्तमान और भविष्य सुंदर नजर आता है। अतीत को नए सिरे से सजाने का काम करते हैं। मीडिया के विस्तार के कारण जिस तरह वर्तमान के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारियां पाते हैं वैसे ही अतीत के बारे में भी जानकारियां पाते हैं। मीडिया का प्रसार वर्तमान और भविष्य को ही समृद्ध नहीं करता बल्कि अतीत के प्रति हमारी समझ को भी समृद्ध करता है। जो लोग वर्तमान के प्रति उपेक्षाभाव रखते हैं उनमें अतीत के प्रति भी अचेतनता होती है। सवाल उठता है क्या लेखन के विकसित होने के पहले मनुष्य के जीवन को जानना संभव था ? जी नहीं, अतीत का वास्तव रुप हम नहीं जानते थे। अतीत के बारे में दावे के साथ जो भी कहा जा रहा है वह लेखन के उदय के बाद ही सामने आया है। यह सारा का सारा निर्मित है। साक्षरता-पूर्व युग तुलसीदास का युग था। इस युग की वे ही बातें कमोबेश विश्वसनीय हैं जिन्हें किसी न किसी तरह लिपिबद्ध कर लिया गया था। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस तरह घोड़े के बिना ऑटोमोबाइल की कल्पना संभव नहीं है। उसी तरह लेखन के बिना संस्कृति की कल्पना संभव नहीं है।

वाचिकयुग कान-मुँह की संस्कृति का युग है। वाचिक संस्कृति में मनुष्य क्रमश: अपने अतीत के साथ बौद्धिक संपर्क खोता चला जाता है। वाचिक संस्कृति इतिहास को वैसे नहीं जानती जैसे इतिहास को हम आज जानते हैं। किसी भी वास्तविक घटना के विवरण और ब्यौरे चश्मदीद लोग बताते हैं अथवा वे लोग बताते हैं जो चश्मदीद के करीबी हों। लेकिन जो घटना बहुत समय पहले घटी हो तो उसके बारे में ,जैसे तुलसीदास का जन्म और लेखन तो इसके बारे में किसी भी बात को दावे के साथ कहना संभव नहीं है। यही स्थिति अन्य मध्यकालीन लेखकों की है। उनके जीवन प्रसंगों के बारे में विवाद हैं। वाचिकयुग में छात्र पढ़ते थे। शिक्षक पढ़ाते थे। किसी भी किस्म की परीक्षा नहीं होती थी। कोई लिखित अभ्यास नहीं करना पड़ता था। शिक्षक के सभी व्याख्यान मौखिक होते थे। शिक्षा की जितनी भी व्यवस्था थी वह मौखिक थी। छात्र को अपनी शैक्षणिक क्षमता का मौखिक ही प्रदर्शन करना पड़ता था। संगठित मौखिक बहस होती थीं। इसे हम शास्त्रार्थ के रूप में जानते हैं। इसमें प्रभाव ही बड़ी शक्ति था। इसके कारण इस युग को ”वाचिक-प्रभावयुग’ के नाम से जानते हैं।

भारत में दो किस्म की परंपराएं थीं। यहां सीखने-पढ़ने की परंपरा थी साथ ही पाण्डुलिपि की भी परंपरा थी। पाठ का यहां पर बड़े ही कौशल के साथ इस्तेमाल किया जाता था। तुलसीदास ने जिस समय लिखना आरंभ किया था उस समय भारत में लेखन संस्कृति का व्यापक विकास हो चुका था। पाण्डुलिपि संस्कृति के कारण ही हम संस्कृति को जान पाए। संस्कृति का संरक्षण संभव हो पाया।मनुष्य के विचारों पर अक्षर के उदय का व्यापक असर हुआ किंतु सबसे ज्यादा गंभीर असर तब हुआ जब छापेखाने के अक्षर का निर्माण हुआ। यह काम 15वीं शताब्दी में ही आरंभ हो गया था। भारत में 16वीं शताब्दी में छापे की मशीन आ गयी थी। तुलसीदास की कविता पुराने किस्म की कविता से अनेक अर्थों में भिन्न है। कमोबेश यह फिनोमिना सभी भक्ति आंदोलन के कवियों में मिलता है। तुलसीदास की कविता में कविता से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसमें व्यक्त ‘तर्क’। यह ‘तर्क’ द्वंद्वात्मक है। इसको हम सहज रूप में विमर्श के अर्थ में भी परिभाषित कर सकते हैं। तुलसीदास अपनी कविता के माध्यम से विमर्श तैयार करते हैं। विमर्श की कला का विकास करते हैं। यह ऐसा विमर्श है जो ‘संप्रेषणीयता’ और ‘सामाजिकता’ के गुण को अपने अंदर समेटे हुए है। तुलसीदास की कविता में ‘तर्क’ सीधे ‘रेटोरिक’ के रूप में आता है। यही वजह है कि तुलसी के मानस पर व्याख्यान ज्यादा अच्छे लगते हैं।

रामकथा को काव्य के रूप में सुनने से ज्यादा रामचरित मानस पर व्याख्यान ज्यादा सुखद लगता है, ज्यादातर समय तुलसीदास की रामकथा का भाषण के जरिए अथवा कथा के रूप में आनंद तब ही मिलता है जब उस कविता को वार्ताकार ‘रेटोरिक’ में तब्दील कर देता है। निश्चित रूप से रामकथा तुलसीदास के जमाने में कविता के रूप में ही जनप्रिय रही होगी, आज भी समाज में रामचरितमानस के अखण्ड पाठ व्यापक जनप्रिय हैं। किंतु छापे की मशीन आने के बाद रामकथा का तार्किक तौर पर रेटोरिक अथवा प्रवचन के रूप में तेजी से प्रसार होता है। छापे की मशीन के आने के बाद तुलसीदास के ‘तर्क’ को ज्यादा से ज्यादा व्याख्यायित करने की परंपरा का विकास होता है। ‘तर्क’ के विकास का अर्थ है प्रवचन परंपरा का ज्यादा प्रसार । रामकथा के वाचिकयुगीन परिप्रेक्ष्य का ही यह प्रभाव है कि आज हमारे बीच में रामकथा के प्रवचन जितने जनप्रिय हैं, उतने किसी नेता के भाषण जनप्रिय नहीं हैं।छापे की मशीन आने के बाद तुलसीदास के पाठ का पाठक के साथ निजी संबंध गहरा हुआ है। छपा पाठ व्यक्ति को निजी तौर पर पढ़ने और पाठ की प्राइवेसी की ओर ठेलता है। तुलसीदास के साथ इस मामले में उलटा हुआ है। छापे की मशीन और बाद में इलैक्ट्रोनिक मीडिया आने के बाद तुलसीदास का पाठ प्राइवेट पाठ नहीं बन पाया है। तुलसीदास का पाठ निजी पाठ क्यों नहीं बन पाया ? अन्य पुराने धार्मिक पाठ छापे की मशीन के आने बाद प्राइवेट पाठ बनकर रह गए हैं। पुराने पाठों में ‘रामचरितमानस’ और ”श्री मद्भागवत कथा” ही ऐसे पाठ हैं जो निजी पाठ नहीं बन पाए हैं। ये दोनों पाठ रेटोरिक कला के आदर्श उदाहरण हैं। इन दोनों के प्रवचनों में जितने व्यापक संदर्भों का कथावाचक इस्तेमाल करते हैं उतना अन्यत्र नजर नहीं आता। प्रवचनों में व्यापक स्तर पर संदर्भों का आना इस बात का संकेत भी है कि अब हम वाचिक संदर्भ की बजाय मुद्रित संदर्भ में आ गए हैं। किताब के युग में आ गए हैं। प्रवचन,भाषण,व्याख्यान कला के विकास का गहरा संबंध रैनेसां के साथ है। रैनेसां के आने के बाद रेटोरिक का तेजी से विकास होता है। पुराने किस्म का रेटोरिक नयी ऊर्जा प्राप्त करता है। छापे के युग में पाठ का ज्यादा सुसंगत संचय होता है। तथ्यों को ज्यादा व्यवस्थित ढ़ंग से संचित कर सकते हैं। अब तथ्यों को याद करने की नहीं बल्कि खोजने अथवा देखने की जरूरत होती है। पाण्डुलिपि के युग में तथ्यों को स्मृति में रखते थे किंतु छापे की मशीन के आने के बाद तथ्यों के दृश्य पर जोर है। मध्यकाल में प्राचीनकाल की तुलना में ज्यादा साक्षर थे और मध्यकाल की तुलना में आधुनिककाल में ज्यादा साक्षर हैं। रैनेसां की तुलना में आज ज्यादा साक्षर हैं। यानी रैनेसां की तुलना में आज के साइबरदौर में रीडिंग की आदत में इजाफा हुआ है।आज किताबें ज्यादा बिकती हैं, किताबों का प्रकाशन ज्यादा हो रहा है। अखबार और पत्रिकाएं ज्यादा पढ़ी और खरीदी जा रही हैं। लिखित पेज ने स्मृति के विकल्प के तौर पर अपने को विकसित कर लिया है। लिखित पेज के आगे अब हम डिजिटल पेज में दाखिल हो चुके हैं। डिजिटल पेज लिखित पेज से भी ज्यादा सुंदर ,उदार,गतिशील और प्रभावोत्पादक है। जिस तरह मौखिक परंपरा को शब्द ने लिपिबध्द किया वैसा ही शब्द की परंपरा को छापे की मशीन और अब छापे की मशीन की परंपरा को डिजिटल किताब रूपान्तरित कर रही है फलत: आज हम प्राचीनकाल से भी ज्यादा मौखिक काम करने लगे हैं। डिजिटल में ज्यादा बातें करने लगे हैं। डिजिटल ने वाचिक परंपरा को नए सिरे से जीवित कर दिया है। पहले वाचिक आख्यान को संरक्षित नहीं कर सकते थे किंतु आज ऐसा नहीं है। आज वाचिक आख्यान संरक्षित किया जा सकजा है। इसका आप वार्ताकार की अनुपस्थिति में भी आनंद ले सकते हैं। यह ऑडियो-वीडियो संस्कृति के विकसित होने के बाद ही हो पाया है। उसकी असंख्य प्रतियां तैयार कर सकते हैं। तुलसीदास के जमाने में सब कुछ बोलता था,यहां तक कि भगवान भी बोलता था। किंतु छापे की मशीन के आने के बाद से ‘चुप्पी’ या साइलेंस का युग शुरू होता है। अब कोई नहीं बोलता। चुप्पी के युग में मनुष्य सबसे बड़े संप्रेषक के रूप में सामने आता है। अब प्रत्येक चीज उस रूप में ही दिखाई देती है जिस रूप में मनुष्य उसे पैदा करता है। वाचिक परंपरा ने महान रचनाएं दीं हैं ,इनमें वेद हैं, महाकाव्य हैं,गीता है,रामचरितमानस है वहीं आधुनिकयुग में वाचिक परंपरा के जरिए नयी महान चीजें आयी हैं। भगवान के बारे में जितनी बेहतरीन रचनाएं मनुष्य ने वाचिकयुग में दीं वैसी रचनाएं आज दुर्लभ हैं। वाचिक संस्कृति बहुत ही समृद्ध संस्कृति है। हमारी समस्त कथाएं वाचिक परंपरा की ही देन हैं। प्राचीन दर्शन का समस्त श्रेष्ठतम रूप वाचिक की देन है। इसको ही कालान्तर में हमने उपदेश,प्रवचन,भाष्य, संवाद, विमर्श आदि में रूपान्तरित करके वर्गीकृत किया गया। हम जितना आगे जाना चाहते हैं उतनी ही तेज गति से अतीत भी अपनी ओर खींचता है। फलतःअतीत को खोले बिना भविष्य में जाना संभव ही नहीं है। आप ज्यों ही नए मीडिया को जन्म देते हैं पुराना मीडिया और भी चुस्त-दुरूस्त और सुंदर रूप में सामने आ जाता है। पुराना हमारा पीछा ही नहीं छोड़ता। यही वजह है वाचिक भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है। हम अपने भविष्य का जितना विस्तार करते जाते हैं अतीत का भी उतना ही विस्तार होता है। भविष्य में जाते समय आपका अतीत से संबंध नहीं कटता। वाचिक परंपरा के जो निर्माता थे,जो मौखिक परंपरा में जीते थे उन लोगों ने ही अक्षर परंपरा को जन्म दिया। जो ज्यादा बोलते थे उन्होंने ही लिखने की परंपरा को जन्म दिया। सड़कों पर काम करने वाले बातें करना बंद नहीं करते। यह सच है कि लेखन ने संप्रेषण को नयी दिशा दी। किंतु इससे बोलना कम नहीं हुआ। आज संदेश पहले की तुलना में ज्यादा आते हैं, आज पहले के किसी भी युग की तुलना में ज्यादा बातें करते हैं। आप जितना पढ़ते हैं उससे ज्यादा बातें करते हैं। वाचिकयुग का साहित्य आधुनिक किताबयुग आने के बाद और भी ज्यादा समृद्ध होता है,अर्थविस्तार पाता है। इलैक्ट्रोनिक मीडिया के जमाने में अब सब कुछ संचित करके रख सकते हैं। ज्ञान का सार्वभौम की बजाय स्थानीय उत्पादन कर सकते हैं। अपने कम्प्यूटर में छापें और मुद्रित करें। छापे की मशीन ने ज्ञान की स्थानीयता पैदा की थी। इसे नयी ऊँचाई पर कम्प्यूटर ने पहुँचाया। आज हम बिजली की तेज गति से आगे जा रहे हैं। आज हमें लेखन और मुद्रण से भी परे जाने की जरूरत है। आज जरूरी हो गया है कि प्रत्येक व्यक्ति लिखना सीख ले। जिससे हम तेजी से इलैक्ट्रोनिक मीडिया के परे जा सकें। आज प्रत्येक को प्रिंट करना आना चाहिए, टाइप करना आना चाहिए। इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने मुद्रण और लेखन दोनों को ही बदल दिया है। साथ ही मीडियम को भी बदल दिया है।

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