लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

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-श्रीराम तिवारी

१६ वें एशियाई खेल-२०१०, चीन के ग्वांगझू नगर में निर्विघ्न सम्पन्न हुए. जिन भारतीय खिलाड़ियों ने तमाम बाधाओं, परेशानियों के भारत के लिए पदक हासिल किये -वे देश के सर्वश्रेष्ठ सम्मान के हकदार हैं. नई दुनिया के खेल पृष्ठ पर ३६ देशों की पदक तालिका प्रकाशित की गई है, उसमें भारत ६ वें नंबर पर है ये अंतिम स्थिति है और सम्मानजनक है २६ नवम्बर तक मुश्किल से ८-१० स्वर्ण पदक भारत के खाते में था, जबकि चीन, जापान दक्षिण कोरिया के खाते में सैकड़ों स्वर्ण पदक कब के आ चुके थे और उनके खिलाड़ी आखिरी रोज तक पदकों कि झड़ी लगा रहे थे. किन्तु भारत के जांबाज खिलाड़ियों ने अपने देशवासियों को निराश नहीं किया और अंतिम दिन आधा दर्जन स्वर्ण झटककर देश को पदक तालिका में ६ वें स्थान पर ला दिया. इन महान सपूतों को लाल सलाम.

पिछली बार भारत ८ वें स्थान पर रहा था, इस बार दो पायदान ऊँचे चढ़ा है, उम्मीद है कि आगामी एशियाड में भारत और ऊँचे चढ़ेगा. मेरे इस आशावाद पर घड़ों पानी डालने को आतुर लोगों से निवेदन है कि नर्वस न हों अपनी तुलना चीन जापान या कोरिया से न करे. चीन से तो कतई नहीं क्योंकि पदक तालिका में उसका नंबर पहला है यह अचरज की बात नहीं वो तो हर कम्म्युनिस्ट देश की फितरत है कि हर चीज में आगे होना- चाहे जो मजबूरी हो इसीलिये उसके -४१६ पदकों के सामने हमारे ६४ पदक बेहद मायने रखते हैं क्योंकि हम एक महा भ्रष्ट व्यवस्था में, घपलों की व्यवस्था में, आरक्षण की व्यवस्था में, सिफारिश की व्यवस्था में नाकारा-मक्कार नेतृत्‍व की शैतानियत से आक्रांत व्यवस्था में बमुश्किल जीवन घसीट रहे हैं ऐसे में नंगे भूखे देश के कुछ सपूतों ने अपनी निजी हैसियत से ये ६४ पदक, बड़ी कुर्बानी से हासिल किये हैं …हम उन्हें नमन करते हैं और इन ६४ पदकों को ६४० के बराबर समझते हैं. जिस दिन भारत में साम्यवाद का शासन होगा. जिस दिन भारत में अम्बानियों, मोदियों, बिरलाओं और टाटाओं के इशारों पर चलने वाली सरकार न होकर, देश के सर्वहारा और मेहनतकशों के आदेश पर भारत की शासन व्यवस्था चलेगी उस दिन भारत भी एशियाड और ओलम्पिक में नंबर १ होगा.

चीन की बराबरी करने से पूर्व हमें- कजाकिस्तान, ईरान जापान और कोरिया जैसे छोटे देशों को मात देनी होगी. तालिका में तो ये हमसे ऊपर है ही किन्तु इनके खाते में इतने पदक हैं कि भारत उनके सामने नगण्य दिखता है. देश की जनता को और खेल जगत को जागना होगा. जानना होगा कि ईरान, ताइपे, कजाकिस्तान और उज्बेग्स्तान जैसे नव स्वाधीन देशों में ऐसा क्या है जो कि भारत जैसे विश्व की गतिशील दूसरे नंबर का अर्थ व्यवस्था वाले सवा सौ करोड़ कि आबादी वाले देश के पास नहीं है.

१९५१ के प्रथम एशियाई खेलों में हम दो नंबर पर थे विगत ६० साल में हम कहाँ पहुंचे यह आकलन भी जरुरी है.मौजूदा दौर में तो कबड्डी को छोड़ बाकी सभी पदक व्यक्तिगत प्रतिभाशाली प्रतिभागियों के एकल प्रयाश का परिणाम कहना गलत नहीं होगा. देश के सत्ता प्रतिष्ठान का योगदान क्या है? यह संसद में और विधान सभों ओं में प्रश्न उठाना चाहए.

१९५१ में जापान नंबर वन था, हम दूसरे नंबर पर थे, अब तक १६ एशियाई खेलों में भारत ने कुल १२८ स्वर्ण पदक हासिल किये हैं चीन तो इससे ज्यदा स्वर्ण एक बार कि स्पर्धा में ही जीत लेता है. हम अपनी आंतरिक और बाह्य परेशानियों के लिए निसंदेह पाकिस्तान को दोष दे सकते हैं किन्तु किसी खेल प्रतियोगिता में बेहतर प्रदर्शन से रोकने कि ताकत किसी में नहीं, और इसके लिए किसी भी बाहरी ताकत को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. इसके लिए हमें अपनी खेल नीति और शासन व्यवस्था का उत्तर दायित्व सुनिश्चित करना होगा.

राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के पास १०१ पदक थे. एक महीने में ऐसा क्या घट गया कि जो राष्ट्रमंडल में अर्श पर थे वे खिलाडी ग्वांगझू में फर्श पर जा गिरे. हाकी, निशानेबाजी, तैराकी और कुश्ती इत्यादि में संतोषजनक प्रदर्शन नहीं देखने को मिला। भारत १०१ से ६४ पर आ गिरा। हम आगे बढ़े हैं या पीछे चले गए, ये फैसला आगामी ओलम्पिक में होगा.

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14 Comments on "जिस दिन भारत में साम्‍यवादी शासन होगा, उस दिन वह एशियाड और ओलंपिक में नंबर एक होगा"

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आर. सिंह
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पटेलजी चाय पर आपका लेख देखा.आपने यथार्थ का वर्णन किया है.सच्च में आम हिनुस्तानी इसी तरह चाय पीता है.यहाँ आपने हिन्दुस्तानी तरीके से चाय बनाने की विधि का वर्णन नहीं किया है उससे आपका लेख थोडा अधूरा लगता है.हमारी चाय बनाने की विधि है की हम चाय की पत्ती,दूध,शक्कर सब ठंढे पानी में डाल देते हैं ,फिर उसको उबालते हैंऔर खुब उबालते हैं.इस तरह हम सचमुच चाय को जहर बनादेते है और दूध भी वर्बाद होता है और दोष देते हैं चाय को .चाय से सचमुच में लाभ है ,अगर उसको चाय की तरह पीयें.पहले तो उसमे न दूध की… Read more »
sunil patel
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आदरणीय सिंह साहब. धन्यवाद की अपने मेरा कमेन्ट पढ़ा. शायाद मेरी जानकारी उतनी ज्यादा नहीं है. वैसे भी मेरे कहने का मतलब यह नहीं था की पुरे चाइना में भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि खेल के चेत्र में भ्रष्टाचार नहीं है. अगर है भी तो मैनेजमेंट, एडमिनिसट्रेसन लेवल पर होगा पर खेल के मैदान में बिलकुल नहीं है, क्योंकी वोह जानते है की अगर रिजल्ट नहीं मिले तो सरकार चोराहे पर गोली मार देगी, कोई सुनवाई नहीं होगी, कोई मानवाधिकार संगठन नहीं होगा. खिलाड़ी तो हमरे भी पसीना बहते है, ज्यादा पसीना बहते है, किन्तु हर कुर्सी पर भ्रस्ताचार, हर फाइल… Read more »
sunil patel
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धन्यवाद आदरणीय तिवारी जी. आशा करते है की साम्यवाद ही आये, अगर उसमे रामराज्य के गुण हो तो. जहाँ तक सच्चे झूठे इतिहास की बात है तो नाप तो तराजू में ही हो सकता है. जब ज्योमितीय में गोलाई को खंड करके नापा जा सकता है तो इतिहास पर राष्ट्रव्यापी, विश्वयव्यापी अध्ययन क्यों नहीं हो सकता है. इससे सार्थक निष्कर्ष तो निकल कर आएगा. यह मानवीय व्यवहार है की हमे हमेशा अपना पक्ष ही सही लगता है. आपने बिल्ली वाला उदहारण बिलकुल सही दिया है. हमें सुशाशन की जरुरत है, सबको रोटी मिले, मकान मिले, इज्जत मिले. अगर यह साम्यवाद… Read more »
अभिषेक पुरोहित
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जनता को अक्ल होती तो बंगाल में ४० साल तक कम्युनिस्ट जीतते??वैसे एक दिन पता नहीं मुझे क्या हुवा मैं जनता को धुन्धने निकला चुनाव के दिनों की बात थी मुझे बामन मिला- दलित मिला- जाट मिला- राजपूत कायश्थ,मुसलमान-क्रिश्चन सिख मिले ,जनता नहीं मिली कोई कोंग्रसी मिला कोई भाजपाई मिला कोई खाती कम्युनिस्ट मिला पर जनता नहीं मिली mene socha chalo यार छोडो meri hi buddhi moTi hogI ,aapako मिले तो usaka पता मुझे भी बताना………..

श्रीराम तिवारी
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एक मित्र ने टिप्पणी करते वक्त “रामराज्य” की दुहाई दी है …..यह एक अंतहीन विमर्श का मेटाफर है ;
इसी सन्दर्भ में ग़लत इतिहास पढ़ाए जाने का रोनाभी रोया गया है. क्या सच है क्या झूठ यह तय करने का अधिकार ,
किसी व्यक्ति या समूह को नहीं जाता ..बिल्ली काली हो या सफेद यडी चूहे मारती हो तो ,अवश्य पाली जाए..रामराज्य हो या साम्यवाद
अगर जनता खुश तो बंदा खुश …अपनी कोई ज़िद नहीं की बिल्ली सफेद न्हीं लाल ही हो .

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