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शैलेन्द्र सिन्हा 

परंपरागत रूप से नदियों, पहाड़ों, झरनों एवं जोरिया से पानी पीकर वर्षों से मनुष्य अपना जीवन यापन करता आ रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर केन्द्र सरकार द्वारा पूरे भारत के गांवों में जलछाजन योजना के तहत सामुदायिक सहभागिता से जल को पीने लायक व कृषि उपयोग हेतु हरियाली नामक योजना चलायी गई है। हरियाली योजना दुमका जिले के कई प्रखंडों में चल रहे है। जलछाजन योजना स्वयंसेवी संस्था के द्वारा चलाये जा रहे है। सामुदायिक स्तर पर सहभागिता के तहत स्वयं सहायता समूह का गठन किया गया है। किसान एवं ग्रामीण सिंचाई की व्यवस्था के लिए स्वयं निर्णय लेते है। हरियाली के तहत जो दिशा निर्देश दिये गये है उसके तहत गांव के लोग हीं गांव में शुद्ध पेयजल के लिए कुओं का जीर्णोद्धार एवं तालाबों की साफ सफाई के साथ-साथ हैंडपंपों के बहते हुए पानी को खेतों में पहुंचाने की दिशा में प्रयास करना है। स्वयं सहायता समूह में महिलाओं को केन्द्र मानकर प्रदान नामक संस्था ने काठीकुण्ड एवं शिकारीपाड़ा में समूह बनाया है सामुदायिक विकास समूह स्तर पर हो इसके लिए लाभूक समूह, तकनीकि समूह एवं जलछाजन समिति का निर्माण किया गया है। समूह में महिला हीं अध्यक्ष, सचिव एवं कोषाध्यक्ष होती है षिकारीपाड़ा प्रखंड के लतबेधा गांव की सितली बेसरा स्वयं सहायता समूह एवं दुलाधन महिला मंडल की अध्यक्ष है। लदबेधा गांव में समूह ने एक बड़े डैम के पानी को खेतों तक लाने के लिए एक चैनल का निर्माण किया। इस चैनल से 32 किसान परिवार आज सिंचाई कर रहे है। जलछाजन से सिंचाई की सुविधा बढ़ी है। उनके प्रयास से हीं गांव में खुशहाली आयी है। इसका परिणाम हुआ कि मेसो विभाग में समूह को हाटीकल्चर का काम सौंपा। शिकारीपाड़ा के हीं बरघट्टा गांव में इस योजना के तहत दो तालाब का पूनरूद्धार हुआ जिससे 16 परिवार के 17 बीघा जमीन में सिंचाई की सुविधा मिली। इस गांव के किसान आज रवि फसल लगाकर खुशहाल है। सोनाढ़ाप पंचायत के केलाई बाड़ी गांव की पानमुनी हेम्ब्रम ने गांव की आर्थिक स्थिति सुधारने में बड़ी मदद की पानमूनी ने नरेगा जागरूकता अभियान के तहत गांव को जागरूक किया और पानी के व्यवहार से अवगत कराया। पानमूनी आज गांव में पानी की व्यवहार समिति की सचिव है। उसके प्रयास से ही समूह को पम्पींग सेट मिला जिसका रख-रखाव वही करती है। जलछाजन समिति गांव में होने वाले काम का निर्णय स्वयं लेती है, खर्च करती है, हिसाब -किताब रखती है और मास्टर रौल व कैष बुक का काम भी करती है। जलछाजन समिति लाहन्ती की अध्यक्ष ज्योति हेम्ब्रम बताती है जलछाजन का काम जिले में इसलिए सफल नहीं हो पा रहा है क्योंकि समूह को समय पर राशि मुहैया नहीं करायी जाती है। समूह को पैसे के अभाव में काम करने में असुविधा होती है जिसस उत्साह घटता है। सरकार यदि समय पर राशि मुहैया कराए तो जलछाजन के काम में गति आयेगी।

उपविकास आयुक्त, उपेन्द्र नारायण उरांव ने जलछाजन के धीमी काम के संबंध में बताया कि यह योजना भारत सरकार की है। केन्द्र सरकार के द्वारा राशि नहीं मिलने के कारण काम रूका हुआ है। उन्होनें बताया कि यह योजना के तहत पीने के पानी एवं सिंचाई की व्यवस्था सामुदायिक सहभागिता से होनी है। ज्ञात हो कि यह योजना वर्ष 2004 से प्रारंभ हुआ है। जिसे 5 वर्षों में पूरा होना है लेकिन 5 वर्ष बीत जाने के बावजूद यह काम आधा-अधूरा ही पड़ा है। प्रत्येक जलछाजन योजना में 30 लाख के बजट का प्रावधान है लेकिन संस्था को कार्य कराने के लिये लगभग 6 लाख की राशि ही दी गई है। प्रदान संस्था द्वारा शिकारीपाड़ा प्रखण्ड में जलछाजन के तहत लदबेधा, अमड़ापाड़ा, सोनाढाप, बृडासोल, कोनारपाहन व तिलातांड़ गांव में धरती एवं जल जिविका के माध्यम से कार्य हो रहा है।

जलछाजन योजना समुदाय आधारित कार्यक्रम है। समुदाय, समूह के माध्यम से काम करती है। प्रत्येक समूह में 10-20 सदस्य होते हैं। समुह के सदस्य अपने ग्रूप से एक सदस्य एपेक्स बॉडी के लिये चुनते हैं। एपेक्स बॉडी में कई समूह के लोग होते हैं और जलछाजन समिति इन्हीं से बनती है। प्रदान संस्था के प्रोजेक्ट एक्ज्क्यूटिव तुहीन कुमार दास बताते हैं कि जलछाजन का उद्देश्‍य अब तक पूरा नहीं हुआ है। इसकी मुख्य वजह समय पर राशि का नहीं मिलना है। उन्होनें एक उदाहरण देते हुए बताया कि वर्ष 1997 में काठीकुण्ड प्रखण्ड के बमरझण्टी गांव में जलछाजन का काम इतना अच्छा हुआ था कि तत्कालीन राज्यपाल श्री प्रभात कुमार उसे देखने आये थे। आज भी गांव समिति कार्यरत है। समिति के पास आज पम्पिंग सेट, धान झाड़ने वाली मशीन एवं स्प्रे मशीन भी है। गांव में आज भी इसका उपयोग किसान कर रहे हैं। बमरझण्टी गांव में जलछाजन समिति ने सिंचाई के उपाय ढूंढ लिये हैं। आज वहां 18 किसान परिवार के 18 एकड़ जमीन पर सिंचाई हो रही है। श्री दास ने बताया कि वर्तमान जलछाजन का काम समय पर पैसा नहीं मिलने के कारण रूका हुआ है। केन्द्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी जलछाजन योजना में सामुदायिक सहभागिता बढ़ी है। लोग इससे जुड़ रहे हैं लेकिन सरकार पैसे के निकासी कर समूह को नहीं दे रही है, फलतः यह योजना इस जिले में सफल नहीं हो पा रहा है। जलछाजन योजना में स्वयंसेवी संस्था की भूमिका गांव में जागरूकता करना और उन्हें सहायता पहुंचाने भर है। (चरखा फीचर्स)

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