लेखक परिचय

मुकेश चन्‍द्र मिश्र

मुकेश चन्‍द्र मिश्र

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में जन्‍म। बचपन से ही राष्ट्रहित से जुड़े क्रियाकलापों में सक्रिय भागेदारी। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और देश के वर्तमान राजनीतिक तथा सामाजिक हालात पर लेखन। वर्तमान में पैनासोनिक ग्रुप में कार्यरत। सम्पर्क: mukesh.cmishra@rediffmail.com http://www.facebook.com/mukesh.cm

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उत्तर प्रदेश के चुनाव खत्म होने पर जब सपा की सरकार को पूर्ण बहुमत मिला था तो उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने कहा था कि लोग साल भर मे ही सपा सरकार के गुंडाराज से त्रस्त होकर उनके कार्यकाल को याद करेंगे।

उपर्युक्त बयान के परिपेक्ष मे यदि आज यूपी के हालात देखें तो सायद मायावती जी ने एकदम सटीक भविष्यवाणी की थी जो छह महीने मे ही हमारे सामने है।

जबसे यूपी मे सपा की सरकार बनी है यहाँ पर दंगों की बाढ़ आई हुई है पहले कोशिकला (मथुरा) फिर प्रतापगढ़, बरेली से होते हुये अब मसूरी (गाजियाबाद) तक इन दंगों की आग फैल चुकी है इसके अलावा लखनऊ और इलाहाबाद मे भी कुछ छुट पुट घटनाएँ हुई हैं, भगवान बुद्ध की मूर्ति तोड़ने की कोशिश की गयी, महिलावों के साथ अश्लील हरकते की गयी और वो भी तब जब कथित सांप्रदायिक शक्तियाँ यूपी की सत्ता से कोसों दूर हैं और एक ऐसी सरकार सत्ता मे है जो सेकुलर और सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ाने के मामले मे या कहें कि मुस्लिमो का सबसे बड़ा शुभचिंतक दिखने मे अपने आपको सारी राजनैतिक जमात से अलग दिखाने की भरपूर कोसिश करती है। और ज़्यादातर फैसले भी मुस्लिमो के ही हितार्थ ही लिए हैं चाहे 30000 रुपये सिर्फ मुस्लिम क्षात्रावों को देना हो या अरबी भाषा के विकास के लिए अनुदान आदि, फिर भी ये सरकार आखिर इन्हे शांत क्यों नहीं रख पा रही है?

इसके अलावा भी हर रोज कहीं ना कहीं से बलात्कार और हत्या की खबरे आना आम बात हो गयी है, छह महीन मे ही यूपी मे अराजकता अपने चरम पर पहुँच गयी है और यहाँ की अखिलेश सरकार बेरोजगारी भत्ते बाँट कर ही सोच रही है कि सबकुछ ठीक हो जाएगा, अब इन्हे कौन समझाये की अगर ऐसे ही हालात रहे तो इस बेरोजगारी भत्ते का उपयोग भी लोग असलहे और चाकू – छुरा खरीदने मे ही करेंगे।

कोई भी स्टेट प्रगति तभी कर सकता है जब वहाँ शांति हो पर हमे लगता है यूपी की शांति तो मायावती जी अपने शासन के साथ ही वापस ले गयीं। हम मायावती के कार्यकाल के दौरान हुये भ्रष्टाचार और कथित अगड़ी जातियों के साथ हुये दुर्व्यवहार की अनदेखी का समर्थन नहीं कर सकते पर उनके शासनकाल मे कम से कम शांति तो थी, और सायद उन्होंने थोड़ा बहुत भी जातिवादी राजनेता की अपनी छवि बदलने की कोशिश की होती और सबको साथ लेकर चलतीं तो उन्हे सत्ता से कोई हटा भी ना पाता क्योंकि उनमे एक कुशल प्रसाशक के सारे गुण हैं और वो जब सत्ता मे रहती हैं तो उनसे गुंडो और असामाजिक तत्वों मे एक भय व्याप्त रहता है साथ ही अफसर शाही पर भी लगाम लगती है। जैसा की पुरानी कहावत है – शासन को गरम, लड़की को शरम और बनिया को नरम होना चाहिए। इस प्रकार उनकी छवि एक सख्त मुख्यमंत्री की ही रही है।

अब दूसरी ओर यूपी के आज के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के अब तक के फैसले लेने की क्षमता और कार्य करने के तरीके पर गौर करें तो हम पाएंगे की ये हमारे अंडरअचीवर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह ही नम्र या मृदुभाषी हो सकते हैं पर शासन चलाने मे बेहद ही लाचार हैं, अभी तक इन्होने उतने फैसले लागू नहीं किए होंगे जितने वापस ले लिए चाहे 20लाख रुपये विधायकों की गाड़ी का हो या आजम खान के मेरठ प्रभार का मामला अथवा बेरोजगारी भत्ते की उम्र सीमा मे लगातार बदलाव आदि। जब इनका नाम मुख्यमंत्री पद के लिए सामने लाया गया था तो यूपी के लोगों को एक उम्मीद की किरण दिखी थी क्योंकि इन्होने डीपी यादव जैसे आपराधिक प्रवृति के लोगों से चुनाव के समय से ही दूरी बनाई थी, पर इनकी सरकार बनने के बाद से ही जिस तरह अपराधी फिर से सिर उठा रहे हैं और यूपी को अराजकता की तरफ धकेल रहे हैं हमे कहना पड़ेगा मायावती जी तुम बहुत याद आ रही हो।

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