लेखक परिचय

हिमकर श्‍याम

हिमकर श्‍याम

वाणिज्य एवं पत्रकारिता में स्नातक। प्रभात खबर और दैनिक जागरण में उपसंपादक के रूप में काम। विभिन्न विधाओं में लेख वगैरह प्रकाशित। कुछ वर्षों से कैंसर से जंग। फिलहाल इलाज के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से रचना कर्म। मैथिली का पहला ई पेपर समाद से संबद्ध भी।

Posted On by &filed under विविधा.


हिमकर श्याम

दशकों से गरीबी, देश की सबसे बड़ी चुनौती है। यह चुनौती लगातार गंभीर और व्यापक होती गयी पर, सत्ता पक्ष-विपक्ष किसी ने इसके कारगर उपाय के लिए अपनी पूरी ताकत नहीं झोंकी। गरीबी और गरीबी रेखा का इस्तेमाल हमेशा से ही राजनैतिक फायदे के लिए किया गया। गरीब होने का अर्थ है अभाव भोगना। यह अभाव भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य या रोजगार आदि बुनियादी जरूरतों से जुड़ा हो सकता है। गरीब लोग कितने अभावग्रस्त हैं और उनकी दशा में कितना परिवर्तन आ रहा है, इन दो बातों पर विचार जरूरी है। यहाँ गरीबी रेखा हकीकत को बताने का कम, उसे छिपाने का काम अधिक करती है। गरीबों को आंकड़ों में उलझा कर गरीबी को अनदेखा कर देना उचित नहीं है।

देश में गरीबी और गरीबी को मापने का पैमाना क्या हो इसे लेकर शुरू से विवाद रहा है। गरीबी रेखा आय के उस स्तर को कहते है जिससे कम आमदनी होने पे इंसान अपनी भौतिक जरूरतों को पूरा करने मे असमर्थ होता है। योजना आयोग द्वारा तय की गयी गरीबी की नयी परिभाषा ने इस समस्या को और उलझा दिया हैं। देश के समावेशी विकास की योजना बनानेवाला आयोग जमीनी हकीकतों से अनजान है। आयोग की दलीलों से लगता है कि यह विवेकहीनों, नाकारों और जमीन से कटे हुए लोगों की जमात है। गरीबी के बारे में योजना आयोग का सुप्रीम कोर्ट में दिया गया हलफनामा न सिर्फ गरीबों के खिलाफ साजिश है बल्कि गरीबी की समस्या को ही नकारने का प्रयास है। आश्चर्यजनक बात यह है कि इस हलफनामे पर खुद प्रधानंत्री मनमोहन सिंह के हस्ताक्षर हैं।

भ्रष्टाचार और महंगाई पर पहले से चैतरफा घिरी सरकार के लिए योजना आयोग का हलफनामा नयी मुसीबत लेकर आया है। ऐसे समय जब खाने पीने की वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं, लोग रोजी-रोटी के जुगाड़ में परेशान हैं, गरीबी के इस नये पैमाने से योजना आयोग की मंशा पर सवाल उठने लगे हैं। गरीबी के इस मापदंड से गरीबी तो नहीं अलबत्ता गरीब जरूर मिट जाएंगे। अनेक अर्थशास्त्री केंद्र सरकार और आयोग के मापदंड को सही नहीं मानते। सरकार की फजीहत के बाद योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने इस मामले में पुनर्विचार के संकेत दिए हैं। हलफनामे में कहा गया है कि शहरी इलाकों में हर महीने 965 रुपए और ग्रामीण इलाकों में 781 रुपए से ज्यादा खर्च करने वालों को गरीब नहीं माना जाएगा। आयोग का कहना है कि शहर में 32 रुपये से ज्यादा खर्च करने वाले और गांव में 26 रुपये से ज्यादा खर्च करने वाले लोग राज्य और केन्द्र की कल्याणकारी योजनाओं से मिलने वाले लाभ के हकदार नहीं हैं। योजना आयोग के हलफनामे में ऐसे लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर बताने की कोशिश ही नहीं की गयी, बल्कि यह भी बताया गया है कि कैसे इतने रूपये में दूध, दाल, सब्जी, खाद्य तेल, दवा आदि का खर्च निकाल सकते हैं। योजना आयोग के इस फार्मूले से बड़ी संख्या में बीपीएल परिवार सूची से बाहर हो जाएंगे। ऐसे में जो खाद्य सुरक्षा विधेयक चर्चा में है उससे आम आदमी का कितना भला होगा इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

हमारे नीति नियंता गरीबी रेखा का निर्धारण कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं या फिर उस रेखा के आधार पर गरीबों की संख्या का अनुमान लगा कर संतुष्ट हो जाते है। गरीबी रेखा के निर्धारण के नाम पर महज औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं। गरीबी आर्थिक विषमता का ही एक रूप है। देश में गरीब और अमीर के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीरों का पैसा लगातार बढ़ता जा रहा है। भारत के गांव आज भी बदहाल हैं। एक-तिहाई जनता कुपोषण का शिकार है। प्रति व्यक्ति आय का फायदा गरीबों तक नहीं पहुंच रहा है।

भारत ने जब से वैश्वीकरण और उदारवाद को अंगीकार किया है तब से जो प्रगति हुई है उसका खूब बखान होता रहा है। उसकी पुष्टि फ़ोर्ब्स की सूची में अमीरों की तेजी से बढ़ती हुई सख्या और पांच से दस करोड़ प्रतिमाह वेतन पाने वाले लोगों की संख्या से भी होती है। विकास का यह आंकड़ा अंतर्विरोधों से भरा हुआ है। आंकड़ों मे भले ही विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों, लेकिन जमीनी सच्चाई यही है कि भारतीय नागरिकों के जीवन स्तर मे कोई खास सुधार नही हुआ है। विकास की कहानी से बहुत लोग अछूते रह गए हैं। मजबूत आर्थिक वृद्धि के बावजूद शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में खराब सामाजिक बुनियादी ढांचा के कारण भारत मानव विकास सूचकांक के मामले में 119वें पायदान पर है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के इस ‘मानव विकास रिपोर्ट 2010’ में 169 देशों और क्षेत्रों को शामिल किया गया है। मानव विकास रिपोर्ट बताती है कि जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिहाज से भारत के अधिकतर लोग कहां खड़े हैं।

विकास की परिकल्पना सिर्फ अमीरों के हितों को ध्यान में रख कर नहीं की जा सकती है। विकास का एक मापदंड यह है कि लोगों को गरीबी के दायरे से निकाला जाए। उन्हें सम्मानजनक जिंदगी जीने का अवसर दिया जाए। लोकतंत्र में जनता को रोजगार, आवास, भोजन, उचित जीवन की अन्य आवश्यकताएं प्राप्त करने के लिए मूलभूत अधिकार प्राप्त है। जहां ये सारी चीजे उपलब्ध नहीं होती वहां स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती है। एडम स्मिथ के अनुसार आवश्यकताओं का अभिप्रायः जीवित रहने के लिए जरूरी चीजों से ही नहीं-इनमें समाज की परंपरा के अनुसार जिन चीजों का न्यूनतम वर्ग के लोगो के पास भी नहीं होना बुरा समझा जाता है, वे चीजें शामिल हैं।

भारत में भूख और कुपोषण के शिकार लोगों की आबादी दुनिया में सबसे अधिक है। कुपोषण गरीबी की समस्या का ही एक आयाम है। गरीबी रेखा के निर्धारण में कुपोषण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। गरीबी रेखा का निर्धारण पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य की कसौटी पर होना चाहिए। हाशिये पर छोड़ दिये गये लोगों की जिंदगियां सिर्फ पेट भरने के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गयी हैं। पेट भरने के लिए आज भी लोगों को सड़कों पर कूड़ा चूनना पड़ता है। मध्यप्रदेश, राजस्थान,, उड़ीसा, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में कुपोषण तथा बाल मृत्यु दर बेहद खराब है। महंगाई के कारण आबादी का बड़ा हिस्सा गुजारे के लिए संघर्ष कर रहा है।

8.9 प्रतिशत आर्थिक विकास दर से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यस्था में गरीबी रेखा के नीचे रहनेवालों की संख्या को लेकर भ्रम है। तेंदुलकर कमेटी की रिपोर्ट में देश की कुल आबादी का 37 फीसदी हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे रहने की बात कही गयी है। वहीं एनसी सक्सेना समिति ने कुल जनसंख्या का 50 फीसदी गरीबी रेखा के नीचे रहने का अनुमान जताया है जबकि अर्जुन सेन गुप्ता समिति ने अब भी देश की 77 फीसदी आबादी के बीपीएल की श्रेणी में होने की बात कही है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के एक रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश के गांवों में प्रति व्यक्ति मासिक आय 487 रूपये है जबकि शहरी क्षेत्र में 982 रूपये। बिहार के गांवों में प्रतिव्यक्ति मासिक आय 465 रूपये और शहरों में 684 रूपये और झारखंड के गांवों में प्रतिव्यक्ति मासिक आय 489 रूपये तथा शहरों में 1082 रूपये है।

देश, समाज और जनता के सपनों, आकांक्षाओं और जरूरतों को योजना आयोग ही आकार देता है। योजना आयोग एक संवैधानिक संस्था है और इसके अध्यक्ष स्वयं प्रधानमंत्री होते हैं। आयोग मे एक नामजद उपाध्यक्ष होता है, जिसका रैंक एक कैबिनेट मंत्री के बराबर होता है। कुछ महत्वपूर्ण विभागों के कैबिनेट मंत्री आयोग के अस्थायी सदस्य होते हैं, जबकि स्थायी सदस्यों में अर्थशास्त्र, उद्योग, विज्ञान एवं सामान्य प्रशासन जैसे विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल होते हैं। देश के समग्र विकास के लिए पंचवर्षीय योजना बनाने का काम योजना आयोग का ही है। योजना आयोग का गठन इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया था कि राष्ट्र के सभी प्रकार के संसाधनों का आकलन कर उनको निर्धारित समय के अनुसार निवेश किया जाए ताकि निश्चित दर से राष्ट्र का विकास हो सके और लोगों की मूलभूत जरूरतों की पूर्ति की जा सके। विडंबना है कि आयोग अपने मूल उद्दश्यों को भूल कर सत्ता और साधन का पिछल्लगू बनकर रह गया है। गरीबी एक गंभीर समस्या है और गरीबी रेखा, अभाव में जी रहे लोगों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने का पैमाना। गलत आंकड़ों की बुनियाद पर न तो इस समस्या का हल निकाला जा सकता है और न ही देश के समग्र विकास की कोई योजना बनायी जा सकती है।

 

Leave a Reply

1 Comment on "आंकड़ों में उलझी गरीबों की जिंदगी"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
KBP SRIVASTAVA
Guest

जिनके पैर न फटे बिबाई
वो क्या जाने पीड़ पराई

wpDiscuz