लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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डॉ. दीपक आचार्य

धैर्य से करें काम-काज

सांसारिक काम-धाम की आपाधापी में आज हर कोई कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा पा लेने को उतावला बना हुआ है। सभी को लगता है कि जैसे कामों का बोझ खूब ज्यादा है और समय कम।

कइयों को लगता है कि जो मौका मिला है उसे भुनाते हुए जितना ज्यादा से ज्यादा समय का अपने हक में उपयोग कर लें या अधिक से अधिक बटोर लें और निश्चिंत हो जाएं। तो काफी लोग ऐसे होते हैं जो खूब सारा पा चुकने और जमा कर लेने के बावजूद जीवन का सारा आनंद, संतोष और शांति छोड़ कर दिन-रात भाग रहे हैं।

भागदौड़ करने वाले अधिकांश लोगों के जीवन व्यवहार और मनोविज्ञान का अध्ययन किया जाए तो इन्हें समझ पाना कोई कठिन नहीं हैं। आम तौर पर मनुष्य वही हरकत करता है जो उसके विचार और भावों से सातत्य रखती है।

चित्त शांत और स्थिर रहने पर जो भाव मुद्रा और व्यवहार रहता है वह उद्विग्नता और चांचल्य की स्थिति में दूसरा रूप ग्रहण कर लेता है। हमारा हर व्यवहार हमारी सोच और मन-मस्तिष्क की स्थिति को अच्छी तरह अभिव्यक्त कर देता है। बस इसे थोड़ा समझने भर की जरूर है। मन की तरंगंे कभी ज्यादा वेगवान होती हैं कभी कम। इन्हीं अनुनादों के अनुसार हमारा शरीर व्यवहार करने लग जाता है।

वैसे मनुष्य के बारे में यह कहा जाता है कि वह कभी भी चुपचाप नहीं बैठा रह सकता। कोई न कोई हरकत वह हमेशा करने का आदी होता है। थोड़ा सा गौर करें तो इन हरकतों से ही उसके व्यक्तित्व और जीवन व्यवहार का स्पष्ट अंदाज लगने लगता है।

आदमी कभी बेवजह हिलता-डुलता रहता है, कभी अंगुली करने लगता है, कभी अंगूठा दिखाता है, हाथ या पाँव हिलाता रहता है, कभी कान और नाक या मूँछों अथवा सर के बाल खींच-खींचने का आनंद लेता है। कोई कान खुजाता रहता है तो कोई कहीं न कहीं खुजलाने की आदत को अपना चुका होता है। कोई कँधे उचकाता है, नाक, कपाल या सर खुजाता है तो कोई कहीं हाथ डालकर कुछ सूंघता रहता है।

कई लोग बार-बार शर्ट का कॉलर सँवारते रहते हैं, कोई घड़ी देखते रहते हैं, कई बार-बार कँघी से सर को रगड़ते हैं, कभी मँूछों या दाढ़ी पर हाथ फिराता है तो कभी बार-बार दर्पण में झाँकता रहता है। कोई बार-बार चश्मा पहनता-उतारता या हिलाता रहता है।

कोई बातचीत करते हुए अचानक मौन धारण कर लेता है तो चुपचाप बातें सुन रहा कोई अपने आप बिना काम का बोलने लग जाता है या बिना बताए आस-पास घूमने-फिरने लग जाता है। कोई तम्बाकू मसलने की मस्ती लूटता है तो कोई पूरा मुँह फाड़ कर जात-जात के गुटखो का अपने गले में अभिषक करते हैं।

कई लोग कुछ काम न हो तब भी मुफ्त के फोन या मोबाइल से बतियाना शुरू कर देते हैं और हवा में हाथ लहराते हुए ऊँची आवाजों में रमने लग जाते हैं। एक किस्म के लोग जो भी सली, आलपिन या नुकीली चीज मिल जाए, कभी कान में डालते हैं कभी इसे दाँतों के बीच कुरेदेंगे। कई लोग सड़क पर बीच रास्ते चलते हुए, कोई दुपहिया चलाते हुए कान से मोबाइल दबाये बढ़ते रहते हैं, कई राह चलते ऐसे बातें करेंगे जैसे चिल्ला रहें हो या लड़ाई-झगड़ा कर रहे हों।

काफी लोग बिना वजह से बार-बार या लगातार हॉर्न बजाने के आदी हो जाते हैं। कई ऐसे हैं कि जहाँ बैठे रहेंगे वहाँ चुपचाप नहीं बैठ सकते। कभी अंगुली में चाबी के छल्लों के चक्कर फिरायेंगे तो कभी टेबल पर पड़े पेपरवेट या पेन/पेन्सिल को घुमाने का आनंद लेने में ऐसे मग्न हो जाते हैं कि कुछ ध्यान ही नहीं रहता। कइयों के पास कोई काम नहीं होता मगर जब किसी काम के लिए कहो तो यह कहते हुए साफ छूट पड़ेंगे कि मरने तक की फुरसत नहीं है।

इसी तरह की सैकड़ों प्रकार की हरकतें करने वाले लोग हमारे आस-पास खूब मिल जाते हैं। ये सारे लक्षण ऐसे हैंे जिन पर हम सामान्यतः गौर नहीं करते मगर असल में यह मानसिक उद्विग्नता और मनोरोग के आरंभिक संकेत हुआ करते हैं। ये आदतें व्यक्तित्व को कमजोर करती हैं और इसलिए जितना जल्दी को इनसे छुटकारा पाने का जतन करना जरूरी है।

इन आदतों पर गंभीरता से चिन्तन करें और जीवन में उद्विग्नता और चंचलता को धीरे-धीरे कम करते हुए इनकी बजाय व्यक्तित्व में धीर-गंभीरता और आनंद का समावेश करें।

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