लेखक परिचय

अरूण पाण्डेय

अरूण पाण्डेय

मूलत: इलाहाबाद के रहने वाले श्री अरुण पाण्डेय अपनी पत्रकारिता की शुरुआत ‘दैनिक आज’ अखबार से की उसके बाद ‘यूनाइटेड भारत’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘देशबंधु’, ‘दैनिक जागरण’, ‘हरियाणा हरिटेज’ व ‘सच कहूँ’ जैसे तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय अखबारों में बतौर संवाददाता व समाचार संपादक काम किया। वर्तमान में प्रवक्ता.कॉम में सम्पादन का कार्य देख रहे हैं।

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अरूण पाण्डेय
नईदिल्ली। केन्द्रीय कांग्रेस कमेटी में इन दिनों अपना चेहरा टीवी पर दिखाने की होड लगी हुई है, नेताओं को डर लगने लगा है कि मोदी के पांच साल के शासन के दौरान उनका नाम ही कहीं न राजनैतिक बाजार से गायब हो जाय। जिन नेताओं ने सबसे ज्यादा टीवी चैनलों पर अपनी उपस्थित दिखायी उनमें दिग्विजय सिंह, अजय माकन व रणदीप सिंह सुरजेवाला का नाम शुमार है।
कांग्रेस में आज के समय में जो नेता सभी जगह दिखाये जा रहे है, उनमें रणदीप सिंह सुरजेवाला का नाम सबसे उपर है। वह मीडिया प्रभारी है और राहुल गांधी के खास है । वह विधायक रहे और हरियाणा सरकार में मंत्री भी रहे । उन्हें यहां लाने का उदेश्य क्या था यह बात अभी भी विचारकों के गले नही उतर रहा हैं। अजय माकन की कहानी भी कुछ इसी तरह की है, वह दिल्ली के जानकार हो सकते है देश के नही, इसलिये उन्हें क्यांे बढाया जा रहा है यह बात भी राजनैतिक विचारको के गले नही उतर रहा है। प्रवक्ता में चार बार सांसद रहे दीपेन्द्र हुड्डा को शामिल क्यांे नही किया गया यह बात भी उसी तरह समझ से परेय है जबकि हरियाणा के प्रभावशाली लोगों में उनका नाम है।
पिछले एक साल की कांग्रेस की गतिविधियों पर नजर डाली जाय तो उसके सदाबहार नेता दिग्विजय सिंह अपने कुछ खास पत्रकारों के बीच ही महफिल जमाकर सीमित हो गये,इसके अलावा उन्होने अपनी प्रेेमिका से शादी की, जिसे लेकर अफवाहों का बाजार भी गर्म रहा। मोतीलाल बोरा जी अब मीडिया के लिये मुखातिब नही होते , इसके कई कारण है पहला वह छत्तीसगढ के प्रभारी है और गंभीर मामलों्र पर भी कांग्रेस वहां माहौल नही बना पाती , अजीत जोगी और मोेतीलाल बोरा की कमेस्टी का ही यह फल है कि हर बार कांग्रेस की पकड से छत्तीसगढ निकल जाता है और सारा सरकारी अमला इसी कांग्रेस के इर्दगिर्द धूमता है और सरकार नही बनती आखिर क्यों ? इसी तरह कई नेता और भी है, जिनके चेहरे इस समय राजनीति से गायब होने की कगार पर है। जिनमें गिरजा ब्यास , मोहसिना किदवई,रीता बहुगुणा जोशी, सलीम शेरवानी, राजबब्बर, congressअजहरूद्दीन, पी चिंदम्बरम्, ए के एटनी ,शशि थरूर आदि के नाम है।
सरकार के समय में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के सबसे करीबी कहे जाने वाले ए के एटनी अब किसी कार्यक्रम या वक्तव्य को लेकर सुर्खियों में नही है। पी चिदम्बरम को कोई पार्टी में और न पार्टी से बाहर पूछ रहा है। मनमोहन सिंह भी कुछ नही बोल रहे है हलाकि यह उनकी पुरानी आदत है उनकी ताकत ही न बोलना है और समय समय पर उन्होने इसबात को सिद्ध भी किया है। सरकार के दौरान गरज कर बोलने वाले व सोनिया जी की आवाज कहे जाने वाले जनार्दन द्विवेदी भी अपना बोरिया बिस्तर बांधकर गायब है। उनका नाम अब सोनिया जी के मैसेज के रूप् में आये एसएमएस को देखकर दिखता है। कुछ ऐसे लोग भी थे जो प्रियंका की वकालत करते थे वह भी खामोश है और अब उन्हें लगने लगा है कि कांग्रेस नेतृत्व में महिला का पदार्पण नही होगा।
मुख्यमंत्रियों की बात की जाय तो शीला दीक्षित खामोश है , भूपेन्द्र सिंह हुड्डा हरियाणा मे ंललकारने का प्रयास कर रहे है लेकिन अशोक तंवर व किरण चैधरी का साथ उन्हें नही मिल रहा है जिसके चलते वह कोर्ट पुनः जाने लगे है। पंजाब में पूर्व मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह व प्रताप बाजवा के बीच चल रहा अन्र्तद्वद पार्टी को हाशिये पर ला रहा है । जिसके कारण केन्द्र से रामेश्वर राजौरा का समायोजन पंजाब में किया गया। अशोक गहलोत ने आज की परिपाटी से अपने आप को किनारे रखा हुआ है। अन्य नेताओं में रीता बहुगुणा जोशी , अनिल शास्त्री समेत कई बडे नेता खामोश है ओर समय इंतजार कर रहे हैं। कही कोई कार्यक्रम नही हो रहा है और न ही पार्टी कैसे ताकतवर हो इस पर कोई काम हो रहा है।सभी खामोश है और कुछ एैसा चाहते है कि कोई लहर आये और वह उसमें सवार होकर फिर से उसी घारा से जुड जाये। जिसमें पहले सवार थे लेकिन क्या यह अब संभव है।
सबसे खास बात यह है कि सोनिया गांधी व राहुल गांधी ने जिस तरह से भूमि अधिग्रहण मसले पर पहली बार विपक्ष की भूमिका को पहचाना और जीत को उत्सव के रूप में मनाया , उससे कांग्रेस में एक नये उत्साह का संचार होना चाहिये था लेकिन नही हुआ और पार्टी दिन प्रति दिन गिरती जा रही है। बिहार मंे हुए गठबंधन ने पार्टी के नीतियों को और नीचे गिरा दिया है, राजनैतिक समीक्षाकार इसे पार्टी के उस दौर से तुलना करते है जिस दौर में सीताराम केसरी ने अध्यक्ष रहते हुए उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी से समझौता किया था और कई जिलों में उनके झंडे भी नही लगपाये। यही हाल बिहार में है कांगेस के झंडे बिहार के कई जिलों में नही दिखेगें।
अब एक बात आखिर क्यों , बार बार टीवी पर आने को बकरार है ये नेता । तो एक ही बात जेहन में उठकर आती है कि जिन नेताओं को अब रूपहले पर्दे का लाने का प्रयास किया जा रहा है ओर कांग्रेस का चेहरा बनाने की कोशिश की जा रही है, वह वो लोग है जिन पर दाग नही है और साफ सुथरी छवि है एैसा कांग्रेस मानती है। इसमें से ए के एटनी, जयराम रमेश, मल्लिकार्जुन, पी चिदम्बरम, शकील अहमद ,अहमद पटेल , आनंद शर्मा , आर पी एन सिंह , वी नरायण स्वामी , सी पी जोशी , के राजू , राजीव गौडा , जितेन्द्र सिंह सभी लगभग बेदाग है और कांग्रेस को आसानी से आगे बढा सकते है। इसके अलावा इन्हें टीवी पर दिखाने का एक कारण यह भी है कि कांग्रेस की पहचान बदले और नये लोग आगे आयेगें तो नये लोग जुडेगें,

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1 Comment on "टीवी पर कांग्रेसी चेहरा दिखाने को बेताब"

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बी एन गोयल
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बंधुवर – आप का लेख काफी अच्छा लगा. सभी नेताओं का मानसिक विश्लेषण और श्रेणी विभाजन स्तुत्य है. लेकिन फिर भी आप ने जाने अनजाने में कुछ नाम छोड़ दिए हैं. ये नाम बहुत ही महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये सब पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं. अन्य नेताओं के लिए ये रोल मॉडल अर्थात आदर्श के रूप में माने जाते हैं. ये नाम हैं सर्वश्री मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद, अभिषेक सिंघवी. अभी कुछ दिन पहले ही ये लोग विदेश यात्रा पर गए थे जहाँ इन ने ‘देश और अपनी पार्टी’ की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाये.

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