लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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-बीनू भटनागर-   kejriwal

2014 लोकसभा चुनाव में परंपरागत कांग्रेस पार्टी और भाजपा के बीच टकराव को आम आदमी पार्टी ने त्रिकोणीय मुक़ाबला बना दिया है। एक साल पहले जन्मी इस पार्टी के लिये दिल्ली विधानसभा में 28 सीटें जीतने के बाद यह दूसरी उपलब्धि है। अन्य राजनैतिक दल पहले भी उनकी उपस्तिथि स्वीकार करने को तैयार नहीं थे, अब भी वो ही लोग कह रहे हैं कि दिल्ली में 28 सीटें जीतने वाली ये पार्टी लोकसभा में कोई चमत्कार नहीं दिखा पायेगी।

कांग्रेस को हाल के विधानसभा चुनाव में चार प्रदेशों की जनता नकार चुकी है। कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, कोलगेट, रेलगेट, 2जी, 3जी घोटाले सहित बहुत बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार इस पार्टी की पहचान बन चुका है। रॉबर्ट वाड्रा को बचाने के लिये पूरी पार्टी ने पूरा ज़ोर लगा दिया, राहुल गांधी और सोनिया गांधी को आसमान की ऊंचाइयां देकर अपनी स्वामिभक्ति साबित की, पर जनता का भरोसा खो दिया। मनमोन सिंह को प्रधानमंत्री की जगह रोबोट बनाकर, रिमोट सोनिया जी को थमा दिया। महंगाई बढ़ती गई- पेट्रोल, गैस, बिजली और पानी की क़ीमतें बढ़ी। दाल-सब्ज़ी, रोटी खाना आम आदमी के लिये दूभर हो गया। विकास की दर घटी, नौकरियों के अवसर कम हुए, भारत की डगमग विदेश नीति के चलते पाकिस्तान से छिटपुट आक्रमण और घुसपैठ होती रही, सेना के जवानों के सर काट दिये गये और धड़ वापस भेजे गये, तो जनता का ख़ून उबला। चीन की घुसपैठ भी होती रही पर कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया। छोटे-बड़े देश जब चाहें, तब भारत को आंखें दिखाने लगे।

ऐसे में भारत की ग़रीब जनता को लुभाने के लिये खाद़्य सुरक्षा बिल लाया गया। 3-4 रोटी हर व्यक्ति को मिलेगी, कोई भूखा नहीं सोयेगा, बहुत सी सब्सिडी देकर ये घोषणा हुई, जनता जान गई कि ये चुनावी रोटी है जो कब तक मिलेगी पता नहीं। फिर अन्य खाद्य पदार्थों और ईंधन की भी ज़रूरत होती है। ग़रीब जनता की सूखी रोटी से प्याज़ भी चली गई…

एक समय कहा गया था ‘इंदिरा इज़ इण्डिया, इण्डिया इज़ इंदिरा’ और अब इसी तरह राहुल के नाम की माला जपते हुए कांग्रेस लोकसभा के चुनाव में उतर रही है। राहुल पर 500 करोड़ ख़र्च करने का मन भी बना लिया है, इससे क्या हासिल होगा ये वो ही जानें! राहुल में योज्ञता होती तो बात अलग थी वो तो इस परिवार में पैदा होने का बोझ उठा रहे हैं। कांग्रेस ने उन्हें इतनी ऊंचाई, बिना किसी पद की ज़िम्मेदारी के दी हुई है कि ख़ुफिया सूचना प्रधानमंत्री या गृह मंत्री से पहले उनके पास आती हैं। वो मंत्रिमंडल के लिये फैसलों को फाड़कर कूड़े में फेंक सकते हैं।

संभावना यह भी बताई जा रही है कि प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में लाकर उनके और उनकी दादी के चेहरे की समानता का लाभ उठाया जाये पर उनके पति की छवि के चलते ये पासा उलटा भी पड़ सकता है। जनता इतनी बेवकूफ़ भी नहीं है कि सिर्फ चेहरा देख कर वोट करे। ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस चुनाव में क्या कर पाती है, शायद पूरे देश से सफ़ाया हो जाय या 30-40 सीटें।

नरेंद्र मोदी को एकाएक प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से उनका क़द काफी ऊंचा हुआ है। गुजरात में तीन बार जीत कर वो ये साबित कर चुके हैं कि वो कुशल शासक हैं। काफ़ी हद तक विकास भी हुआ है, पर गुजरात भारत नहीं है। दक्षिण में कर्नाटक के अलावा भाजपा की उपस्थिति नगण्य है। पूर्व और उत्तर पूर्व में भी उनका कोई अस्तित्व नहीं है। बाकी जगह जितने उनके समर्थक हैं उतने ही विरोधी भी हैं। क्लीन चिट मिलने के बाद भी 2002 के दंगों से उन्हें जोड़ा जाता है, ऊपर से ये स्नूपगेट उनकी छवि बिगाड़ रहा है।

भाजपा और कांग्रेस के टकराव का मुद्दा हमेशा से सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता का रहा है। कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हमेशा से अलपसंख्यकों का तुष्टीकरण करती आई है और भाजपा के हिन्दुत्व की दुहाई देने को सांप्रदायिक कहा जाता रहा है। दोनों ने धर्मनिरपेक्षता शब्द के अर्थ ही बदल कर रख दिये हैं। भाजपा एक बड़ा खेमा धर्मनिरपेक्ष है, पर उनके साथ कुछ कट्टरपंथी ताक़ते हैं, जो कांग्रेस की हिन्दू विरोधी नीतियों के कारण उभरी हैं। भाजपा के पीछे राष्ट्रीय स्यं सेवक संघ है, सब जानते हैं, इसके अलावा अन्य कई छोटे-छोटे दल जैसे राम सेना, हिन्दू रक्षा दल और बजरंग दल आदि भी साथ में हैं। ये कट्टरवादी दल अपने यहां तोड़फोड़ करने वाले असामाजिक तत्वों को भी पनाह देते हैं। ऐसे गुण्डे पालना आज संभवतः हर राजनैतिक पार्टी की मजबूरी बन गया है। मोदी को यदि जनता स्वीकार करती है तो उन्हें उनकी और पार्टी की ग़लतियों के साथ ही स्वीकार करना होगा। नरेंद्र मोदी की छवि भले ही ईमानदारी वाली हो पर उनकी पार्टी में नितिन गडकरी और येदियुरप्पा जैसे लोग भी है। भाजपा की सरकारों में बलात्कार और क़त्ल जैसे जुर्मों के आरोपियों की भी हिस्सेदारी है। सरकार की स्थिरता चाहने के लिये इन्हें भी झेलना पड़ेगा।

पिछली बार जब एनडीए सरकार के पास सत्ता आई थी तब वो आपसी कलह के कारण विघटित हो गई। अभी भी यदि पूर्ण बहुमत नहीं मिला तो भाजपा को समर्थन देने के लिये आगे आने वाले दल नहीं दिख रहे हैं। हां, यदि मोदी के नेतृत्व को किसी तरह जनता का पूर्ण बहुमत मिल गया तो भारत को स्थिर सरकार मिल सकती है। आगे सरकार की कुशलता पर निर्भर करेगा। बहुत सारी क्षेत्रीय पार्टियां भी राजनीति के मैदान में हैं। ये पार्टियां अब तक कई प्रदेशों की विधानसभा चुनाव जीतकर सरकारें बना चुकी हैं। लोकसभा में भी कुछ सांसद भेजकर सौदेबाज़ी करती आई हैं। तमिलनाडु में एक बार जयललिता सत्ता संभालती हैं और अगली बार करुणानिधि। ज़ाहिर है दोनों ही जनता की कसौटी पर खरे नहीं उतरे हैं। उत्तर प्रदेश में कभी मायावती दलित उद्धार के नाम पर आती हैं, तो कभी मुलायम सिंह आ जाते हैं, दोनों ने कितनी कमाई की है, किसी से छिपा नहीं है। पर दोनों को क्लीन चिट मिल चुकी है। इसी तरह की स्थिति बिहार में है। नीतीश कुमार हों या लालू यादव, बिहार गर्त में ही जाता जा रहा है। ओड़िशा, झारखंड और आंध्र प्रदेश में भी कुछ इसी तरह चल रहा है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भी कुशल शासन नहीं दे सकी है, यद्यपि उनकी अपनी छवि साफ़ सुथरी है। कुल मिलाकर केन्द्र में इनकी स्थिति ‘जहां देखा तवा परात वहीं बिताई सारी रात’ जैसी ही है।

अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से उभरी, अन्ना से अलग होकर अपनी पहचान बनाने वाली आम आदमी पार्टी से देश की जनता ने बहुत उम्मीदें लगाई हैं। जैसे अंधेरे में भटकते राही को किसी ने सही रास्ता दिखा दिया हो, ये उम्मीदें आप पर बहुत दबाव भी बनाती हैं। उनसे 5 रु का भी हिसाब मांगा जाता है, जबकि दूसरी पार्टियां 500 करोड़ रुपये भी लुटा दें तो सवाल उठते हैं और दब जाते हैं। इस पार्टी का जन्म ही भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर हुआ था, इसलिये चुनाव प्रचार में यह मुद्दा तो अहम रहेगा ही, इसके अलावा बिजली पानी, सड़क शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के मुद्दों को लेकर ये चुनाव में उतरेंगे। विदेश नीति, आर्थिक नीति, परमाणु शक्ति की नीति के बारे में पार्टी विचार विमर्श के बाद कोई वक्तव्य देगी।

यह एक साल पुरानी पार्टी है और जब लोकसभा चुनाव में उतरने का निर्णय लिया जा चुका है तो पार्टी से हर दिन नये लोग जुड़ रहे हैं। नये लोगों को जोड़ते समय पार्टी को बहुत सावधान रहना चाहिये कि कहीं कोई अपराधी या भ्रष्ट आचरण वाला व्यक्ति पार्टी में न आ जाये। दूसरी पार्टी छोड़कर आये हुए लोगों की भी परख करना ज़रूरी है। यदि कोई ग़लत किस्म का व्यक्ति पार्टी से जुड़ जाये तो असलियत पता लगने पर उसे निष्कासित करने से भी नहीं हिचकिचाना चाहिये।

‘आप’ में कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है, परन्तु कुशल नेतृत्व की कमी ज़रूर है। अरविंद केजरीवाल, योगेन्द्र यादव और मनीष सिसोदिया के अलावा कोई और सुलझा हुआ नेता उनके पास नहीं है। प्रशांत भूषण पर उनकी गैर-ज़िम्मेदार बयानबाज़ी के चलते और कुमार विश्वास पर उनके बड़बोलेपन के कारण नेतृत्व सौपना विवादास्पद सिद्ध हो सकता है। ‘आप’ को बेवजह के विवादों से भी बचना चाहिये। हां, इन दोनो की नीयत पर शक नहीं किया जा सकता, दोनों ही पार्टी के मज़बूत स्तम्भ हैं। धीरे-धीरे पार्टी में विभिन्न क्षेत्रों से नये-नये लोग आकर जुड़ रहे हैं, जो अलग अलग स्तर पर पार्टी को नेतृत्व देने की योज्ञता रखते हैं। पार्टी में नेतृत्व की कमी को पूरा करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

लोकसभा चुनाव का परिणाम जो भी हो, ’आप’ के जितने भी सांसद लोकसभा में पहुंचे वो अपने, आचरण, कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी से संसद की गरिमा को निभायेंगे। यदि जनता ने ‘आप’ को सरकार बनाने का मौक़ा दिया तो ‘आप’ उसमें सक्षम है और देश को एक ईमानदार और अच्छा शासन देनेवाली सरकार मिल सकती है।

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1 Comment on "कांग्रेस-भाजपा के मध्य ‘आप’ का निशाना"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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जो लोग आप के २० दिन के शाशन के बाद ही उस पर बदनीयती से ऊँगली उठा रहे हैं जनता उनकी एक नही सुनेगी; विशवास न हो तो दिल्ली में चुनाव से पहले का वक़त याद keejiye जब आप को मीडिया गम्भीरता से नही ले रहा था. लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ही नही अन्ये दलों को भी अपनी औक़ात पता चल जायेगी.

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