लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

Posted On by &filed under राजनीति.


-अरविंद जयतिलक-
congress

चुनाव में करारी शिकस्त खाने के बाद हार पर मंथन के लिए आहुत कार्यसमिति की बैठक में जिस तरह सदस्यों ने प्रस्ताव पारित कर हार की सामूहिक जिम्मेदारी का प्रहसन किया उससे यही प्रतीत होता है कि उनका मकसद हार पर मंथन करना नहीं, बल्कि हार का ठीकरा सोनिया-राहुल के सिर न फुटे इसका उपाय ढूंढ़ना था। कार्यसमिति ने सोनिया व राहुल के इस्तीफे की पेशकश को ठुकरा दिया है। कार्यसमिति का यह फैसला दस जनपथ के प्रति समर्पण व निष्ठा को दर्शाता है न कि क्षत-विक्षत पड़ी पार्टी को उबारने की चिंता को। राजनीति में जिम्मेदारी और जवाबदेही साथ चलती है। लेकिन कांग्रेस शायद मान चुकी है कि दस जनपथ सभी जवाबदेही से उपर है और उससे किसी तरह का सवाल नहीं किया जा सकता। लेकिन देश हैरान है कि जब कांग्रेस जीत का ताज सोनिया-राहुल के सिर बांध सकती है तो हार का ठीकरा फिर दूसरे के सिर क्यों ? लेकिन ऐसे सवाल कांग्रेस को नापसंद हैं। यही वजह है कि उसके सिपाहसालार चुनावी नतीजे के पहले दिन से ही सोनिया-राहुल के बचाव में ढाल उठा हार के कारणों की हास्यादपद व्याख्या कर रहे हैं। कोई हार के लिए डॉ. मनमोहन सिंह की मौन को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो कोई सहयोगी दलों के घपले-घोटाले को। कोई भी स्वीकार करने को तैयार नहीं कि इस हार के लिए सोनिया व राहुल गांधी भी जिम्मेदार हैं जिनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया। यह सही है कि चुनाव में कांग्रेस ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं कर रखा था। लेकिन चुनाव के दरम्यान खुद राहुल गांधी कहते सुने गए कि अगर पार्टी सत्ता में आती है तो वह बागडोर संभाल सकते हैं। क्या यह रेखांकित नहीं करता है कि वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे और पार्टी सत्ता में आती तो वह प्रधानमंत्री बनते? ऐसे में यह उचित था कि सोनिया और राहुल अपने पद से इस्तीफा देते जिससे उनकी छवि मजबूत होती और चापलूस और जनाधारविहिन किस्म के लेफ्टिनेंटों से भी छुटकारा मिलता। लेकिन रिमोट कंट्रोल से कांग्रेस को हांकने का मोह छुट नहीं पाया। यह सोनिया-राहुल की अदूरदर्षिता को ही रेखांकित करता है। जबकि उन्हें चिंतित होना चाहिए कि उसके नेतृत्व में कांग्रेस 1977 से भी बुरे दौर में पहुंच गयी है। देष के कई राज्यों में उसका खाता नहीं खुला है। दक्षिण से उसका सफाया हो गया है।

महंगाई, भ्रष्टाचार, घपले-घोटाले, बेरोजगारी और आर्थिक मोर्चे पर उसकी नाकामियों ने उसे मरणासन्न स्थिति में ला दिया है। उसे देशभर से उतनी भी सीटें नहीं मिली, जितना भारतीय जनता पार्टी को अकेले उत्तर प्रदेश से मिला है। अलोकप्रियता के अंतिम पायदान पर खड़ी कांग्रेस में मजबूत विपक्ष बनने की भी शक्ति क्षमता नहीं बची है। कहना मुश्किल है कि यूपीए के घटक दल राहुल गांधी को लोकसभा में अपना नेता स्वीकारेंगे। कांग्रेस कार्यसमिति ने पराजय के कारणों को जानने के लिए कई समितियों के गठन का निर्णय ली है। लेकिन वह समिति के सुझावों पर अमल करेगी इसमें संदेह है। बहुत पहले एके एंटनी समिति ने कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के ढेरों उपाए सुझाए थे। लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ। राहुल गांधी के नेतृत्व में जब 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में करारी षिकस्त मिली तब भी हार के कारणों को जानने के लिए समितियों का गठन हुआ। लेकिन समितियों के सुझाव कूड़ेदान में डाल दिए गए। सच तो यह है कि कार्यसमिति द्वारा समितियों के गठन का यह फैसला भी हार के कारणों को दफनाने का ही प्रयास है। दरअसल, कांग्रेस नहीं चाहती है की हार का सही पोस्टमोर्टम हो। उसे पता है कि हार की जितनी अधिक समीक्षा होगी सोनिया और राहुल गांधी के नेतृत्व पर उतने ही अधिक सवाल खड़े होंगे। इसलिए कि इन दोनों के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा गया और पार्टी को अपने इतिहास की सबसे करारी हार मिली है। कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा हार के लिए ध्रुवीकरण की राजनीति और मीडिया की आक्रामकता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कुछ ऐसी ही दलील मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद और नीतीश कुमार ने भी दी है। लेकिन यह उचित नहीं। यह एक तरह से जनादेश का अपमान है। कांग्रेस अध्यक्ष को अहसास हो जाना चाहिए कि सवा सौ पुरानी कांग्रेस पार्टी को देश ने पूरी तरह खारिज कर दिया है। इनमें उन युवाओं की तादाद सर्वाधिक है जिनके नायक आज नरेंद्र मोदी हैं। कांग्रेस को समझना होगा कि राजनीति का परंपरागत ढांचा टूटा है और जाति-पाति की दीवारें ढही हैं। अब उसे यथास्थितिवाद के खोल से बाहर निकल स्वीकार लेना चाहिए कि अब उसमें देश को भरोसे के डोर से बांधने की क्षमता नहीं रह गयी है। यह भी उचित होगा कि वह राहुल गांधी से चमत्कार की आशा छोड़ दे। एक-दो बार नहीं कई बार उनके नेतृत्व क्षमता का परीक्षण हो चुका है। उनके राजनीति में डटे एक दशक से अधिक हो गए।

2004 में उन्होंने संसदीय जीवन की शुरुआत की और उनके कंधे पर संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी डाली गयी। लेकिन वह इसमें विफल रहे। 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव को जीतने के लिए उन्हें 2006 में पार्टी का महासचिव बनाया गया। लेकिन वह जीत नहीं दिला सके। कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई। 2009 के आमचुनाव में जरुर बड़ी सफलता हाथ लगी और उसका श्रेय राहुल गांधी को मिला। लेकिन 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार ने राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता पर पुनः प्रष्नचिंह लगा दिया। कांग्रेस को सिर्फ चार सीटें मिली। उचित होगा कि कांग्रेस अब खुद को बदलने के लिए सज हो। आने वाले दिनों में उसे और कड़ी चुनौती मिलने वाली है जब कई राज्यों के विधानसभा चुनाव होंगे। अब कांग्रेस को जमीन पर उतरकर काम करना होगा। उन कार्यकर्ताओं को आगे लाना होगा जो कर्मठ और पार्टी के लिए समर्पित हैं। साथ ही उन्हें किनारे लगाना होगा जो गणेश परिक्रमा के सहारे संगठन पर काबिज हैं। सोनिया और राहुल को अपनी मनमानी से भी परहेज रखना होगा। यह तथ्य सामने आ चुका है कि डॉ. मनमोहन सिंह की आड़ में सोनिया गांधी ने ही सत्ता का संचालन किया और नतीजा यह हुआ कि आज भारत कांग्रेस मुक्त दिखने लगा है। अगर यूपीए के दूसरे कार्यकाल में डॉ. मनमोहन सिंह लाचार दिखे और उनके नाक नीचे लाखों करोड़ों रुपए के घपले-घोटाले हुए तो इसके लिए सोनिया गांधी भी बराबर की जिम्मेदार हैं। देखा गया कि उपलब्धियां सोनिया और राहुल गांधी के खाते में जाती रही और नाकामियां मनमोहन सिंह के। मनरेगा और सूचना का अधिकार यूपीए सरकार की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। लेकिन इसका पूरा श्रेय सोनिया और राहुल गांधी ले उड़े। बुंदेलखंड समेत देश के अन्य पिछड़े क्षेत्रों के लिए आर्थिक पैकेजों को भी राहुल की उपलब्धियों से जोड़कर प्रचारित किया गया। नतीजा सामने है। अब कांग्रेस पार्टी भले ही हार के लिए पूर्णतः जिम्मेदार सोनिया-राहुल की साख बचाने के लिए कुछ सिपाहसालारों के गर्दन उड़ा दे लेकिन इससे सोनिया और राहुल की कार्यशैली और उनके नेतृत्व क्षमता पर उठने वाले सवाल थमने वाले नहीं हैं। कांग्रेस को यह भी समझना होगा कि राजनीति में इस्तीफा कब नैतिकता होता है और कब नाटक, यह देने वाला नहीं, देखने वाला तय करता है।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz