लेखक परिचय

सत्‍येन्‍द्र सिंह 'भोलू'

सत्‍येन्‍द्र सिंह 'भोलू'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं। संपर्क : आनंद नगर कटर, गांधी नगर, बस्‍ती (उत्तर प्रदेश)

Posted On by &filed under राजनीति.


सत्येन्द्र सिंह भोलू

’28 दिसम्बर, 1885′ को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना अवकाश प्राप्त आई0सी0एस0 अधिकारी स्कॉटलैंड निवासी ऐलन ओक्टोवियन ह्यूम (ए0ओ0ह्यूम) ने थियोसोफिकल सोसाइटी के मात्र 72 राजनीतिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से इसकी नींव रखी थी। अखिल भारतीय स्तर पर राष्ट्रवार की पहली सुनियोजित अभिव्यक्ति थी। आखीर इन 72 लोगो ने कांग्रेस की स्थापना क्यों की और इसके लिए यही समय क्यों चुना?

यह प्रश्न के साथ एक मिथक अरसे से जुड़ा है, और वह मिथक अपने आप में काफी मजबूती रखता है। ‘सेफ्टी वाल्ट (सुरक्षा वाल्व) का यह मिथक पिछली कई पीढ़ीयों से विद्यार्थियों एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं के जेहन में घुट्टी में पिलाया जा रहा है। लेकिन जब हम इतिहास के गहराईयों को झाकते है, तो हमे पता चलेगा कि इस मिथक में उतना दम नहीं है, जितना कि आमतौर पर इसके बारे में माना जाता है। 125 साल पूरे होने के अवसर पर आज यह सही मौका है कि इस मिथक के रहस्य पर से परदा उठाया जायें, हालाँकि इसके लिए इतिहास में काफी गहरे जाकर खोजबीन करनी पड़ेगी।

‘मिथक यह है कि ए0ओ0ह्यूम और उनके 72 साथियों ने अंग्रेज सरकार के इशारे पर ही ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना की थी। उस समय के मौजूदा वाइसराय ‘लॉर्ड डफरिन’ के निर्देश, मार्गदर्शन और सलाह पर ही ‘हयूम’ ने इस संगठन को जन्म दिया था, ताकि 1857 की क्रान्ति के विफलता के बाद भारतीय जनता में पनपते- बढ़ते असंतोष को हिंसा के ज्वालामुखी के रूप में बहलाने और फूटने से रोका जा सके, और असतोष की वाष्प’ को सौम्य, सुरक्षीत, शान्तिपूर्ण और संवैधानिक विकास या ‘सैफ्टीवाल्व’ उपलब्ध कराया जा सकें। ‘यंग इंडिया’ में 1961 प्रकाशित अपने लेख में गरमपथी नेता लाला लाजपत राय ने ‘सुरक्षा वाल्व’ की इस परिकल्पना का इस्तेमाल कांग्रेस की नरमपंथी पक्ष पर प्रहार करने के लिये किया था। इस पर लंम्बी चर्चा करते हुए लाला जी ने अपने लेख में लिखा था? कि ”कांग्रेस लॉर्ड डफरि के दिमांग की उपज है।” इसके बाद अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने लिखा था कि, ”कांग्रेस की स्थापना का उद्देश्य राजनीतिक आजादी हासिल करने से कही ज्यादा यह था कि उस समय ब्रिटिश साम्राज्य पर आसन्न खतरो से उसे बचाया जा सकें।

यही नही उदारवादी सी0 एफ0 एड्रूज और गिरजा मुखर्जी ने भी 1938 मे प्रकाशित ‘भारत में कांग्रेस का उदय और विकास’ में ‘सुरक्षता बाल्ब’ की बात पूरी तरह स्वीकार की थी।

1939 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संचालक एम0 एस0 गोलवलकर ने भी कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता के कारण उसे गैर- राष्ट्रवादी ठहराने के लिए ‘सुरक्षा वाल्व’ की इस परिकल्पना का इस्तेमाल किया था। उन्होंने अपने परचे ‘वी’ (हम) में कहा था कि हिन्दू राष्ट्रीय चेतना को उन लोगो ने तबाह कर दिया जो ‘राष्ट्रवादी होने का दावा करते है। गोलवलकर के अनुसार, ह्यूम कॉटर्न और वेडरबर्न द्वारा 1885 में तय की गई नीतियां ही जिम्मेदार थीं- इन लोगो ने उस समय ‘उबल रहे राष्ट्रव’ के खिलाफ ‘सुरक्षा वाल्व के तौर पर कांग्रेस की स्थापना की थी।

सुरक्षा वाल्व की इस परिकल्पना को ऐतिहासिक साक्ष्य बना देने में सात खण्डो वाली उस ‘गोपनीय रिपोर्ट’ की निर्णायक भूमिका रही, जिसके बारे में ह्यूम का कहना था कि 1878 को गर्मियों में शिमला में उन्होंने पढ़ा था। पढ़ने के बाद उन्हे पक्का यकिन हो गया था भारत में ‘असंतोष उबल रहा है।’ और तत्कालीन अग्रेज सरकार के खिलाफ एक बड़ी साजिश रची जा रही है। निचले तबके लोग ब्रिटिश शासन को हिसा के द्वारा उखाड़ फेकने वाले है। इसके पहले 1857 का जब विद्रोह हुआ था उसमें भारतीय राजाओं नवावो, तालुकेदारो, जमीदारो का नेतृत्व था। लेकिन यह विद्रोह जो पनप रहा था। उसमें समाज का अंतिम व्यक्ति हिन्सक आन्दोलन कि तैयारी में जुट गया था।

यह जानना अतिआवश्यक है कि इस सात खण्डो का रहस्य क्या है। इस ने ए0ओ0 ह्यूम की जीवनी लिखी थी जो, 1913 प्रकाशित हुई। सबसे पहले इसी जीवनी में सात खण्डो की इस गोपनीय रिपोर्ट की चर्चा की गयी थी।

1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना न अप्रत्याशित घटना थी न ही कोई ऐतिहासिक दुर्घटना। 1860 और 1870 के दशको से ही भारतीयों में राजनीतिक चेतना पनपते लगी थी। कांग्रेस की स्थापना इस बढ़ती चेतना की पराकाष्ठा थी। 1870 के अंत में 1880 के दशक के शुरू में भारतीय जनमानस राजनीतिक रूप से काफी जागरूक हो चुका था। 1885 में इस राजनीतिक चेतना ने करवट बदली। भारतीय राजनीतिक और राजनीति में सक्रिय वुध्दिजीवी, संक्रीर्ण हितो के लिए आवाज उठाने के बजाय राष्ट्रीय हितों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संर्घष करने को छटपटाने लगे थे। उनके इस प्रयास में सफलता मिली, एक एक ‘राष्ट्रीय दल’ का गठन हुआ- एक ऐसा दल, जो राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक था, भारतीय राजनीति के लिए एक प्लेट फार्म, एक संगठन, एक मुख्यालय।

जब लोगो में आजादी का ये जज्बा, क्षमता, योग्यता और देशभक्ति थी, तो यह प्रश्न विचारणीय है कि वे ह्यूम को कांग्रेस का मुख्य संगठनकर्ता क्यों बनाये? इसका सही जबाब तत्कालीन परिस्थितियों में ही छुपा था। भारतीय महाद्वीप के विस्तृत आकार की तुलना में, 1880 के दशक की शुरूआत में राजनीतिक सोच रखने वाले लोग बहुत कम थे और ब्रिटिश शासकों के खुले विरोध की परंपरा की जड़े भी कतई नहीं जग पायी थी।

न्याय मूर्ति रानाडे, दादा भाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, जी0 सुब्रहमण्डीय अय्यर और साल भर बाद आये सुरेन्द्रनाथ बनर्जी जैसें उत्साही और प्रतिबध्द नेताओं ने इसलिए हयूम से सहयोग लिया कि वे बिलकुल शुरू- शुरू में ही सरकार से दुश्मनी नहीं मोल लेना चाहते थे। उनका सोचना था कि अगर कांग्रेस जैसे सरकार विरोधी संगठन का मुख्य संगठनकर्ता, ऐसा आदमी हो जो अवकाश प्राप्त ब्रिटिश अधिकारी हो तो इस संगठन के प्रति सरकार को शक- सुबहा कम होगा और इस कारण कांग्रेस पर सरकारी हमले की गुंजाइश कम होगी।

दूसरे शब्दों में अगर ह्यूम और दूसरे अंग्रेज उदारवादियों ने कांग्रेस का इस्तेमाल ‘सुरक्षा वाल्व’ के तौर पर करना भी चाहा हो, तो कांग्रेस के नेताओं ने उनका साथ इस आशा से पकड़ा था कि ये लोग कांग्रेस के लिए ‘तड़ित चालाक’ जैसे काम करेंगे और आन्दोलन पर गिरने वाली सरकार दमन की बिजली से उसे बचा लेगे। और जैसा कि बाद के हालात गवाह है, इस मामलों में कांग्रेस के नेताओं का अंदाजा और उम्मीदें सही निकली।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz