लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मोदी विरोध अब उनके पक्ष में जाता दिख रहा है। कांग्रेस को भी नीतीश में सहयोगी का भाव दिखने लगा है। यहां तक कि कई वरिष्ठ कांग्रेसियों का मत है कि नीतीश को एनडीए से अलग कर २०१४ के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की राह आसान की जा सकती है। हालांकि अधिसंख्य कांग्रेसी इस राय से इत्तेफाक नहीं रखते किन्तु भाजपा की तरफ से नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार बनाने की संभावना का नीतीश कुमार खुलकर विरोध कर रहे हैं, लिहाजा नीतीश इस वक़्त कांग्रेस के लिए खासे मुफीद साबित हो सकते हैं। चूंकि नीतीश की बिहार में राजनीतिक हैसियत बढ़ी है और लालू-पासवान जैसे दिग्गजों के राजनीतिक अवसान के बाद बिहार में कांग्रेस अपनी खोई ज़मीन पाने हेतु लालायित है, अतः नीतीश की आंधी में वह भी पंजे को जनता के साथ जोड़ना चाहती है और यह कवायद तभी पूरी हो सकती है जब नीतीश को अपने पाले में करने के लिए उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा किया जाए। यही वजह है कि गुरूवार को  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) की बैठक में सरकार ने बिहार को पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष (बीआरजीएफ) के तहत मौजूदा १२वीं योजना के शेष बचे चार वर्षो में १२,००० करोड़ रुपये दिए जाने की घोषणा की है। गौरतलब है कि पिछली योजना के दौरान राज्य को ६,४६८ करोड़ रुपये मिले थे। हालांकि नीतीश ने बिहार के लिए २० हज़ार करोड़ की मांग की थी किन्तु केंद्र ने उनकी मांग को आर्थिक कमजोरी का नाम देकर उन्हें थोड़े से ही संतुष्ट करने की कोशिश की है। दरअसल नीतीश की बिहार को विशेष दर्ज दिए जाने की मांग और दिल्ली में विशाल रैली से अपनी ताकत दिखाने के बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि सरकार उनकी मांग को देर-सवेर मान ही लेगी। यही वजह है कि पहले केंद्र सरकार की तरफ से जारी आर्थिक सर्वेक्षण और बाद में आम बजट २०१३ में वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों की मौजूदा परिभाषा को बदलने की बात कही। बदले में नीतीश ने भी बजट के प्रस्तावों का स्वागत किया। बाद में केंद्र की तरफ से बताया गया कि अगले दो-तीन महीने में विशेष राज्य घोषित करने की मौजूदा नीति बदल दी जाएगी। इससे बिहार को केंद्र से ज्यादा अनुदान मिलने लगेगा। कुल मिलाकर बिहार को विशेष पैकेज के बहाने कांग्रेस ने भावी राजनीतिक समीकरणों को हवा दे दी है जो राजनीति की दशा-दिशा बदल सकते हैं।

 

जहां तक बिहार को विशेष राज्य दर्जा देने की मांग है तो सीधे तौर पर उसे नहीं माना गया है। चूंकि बिहार विशेष राज्य के दर्जे की आहर्ताओं को पूरा ही नहीं करता लिहाजा सरकार ने उसे  पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष (बीआरजीएफ) के तहत उक्त राशि दी है। यह राशि किसी भी राज्य की आर्थिक व भौगोलिक स्थिति को देखकर दी जाती है। हालांकि यह केंद्र के विवेक पर निर्भर करता है कि वह इस राशि का इस्तेमाल किसे और कैसे करने की छूट देता है पर यह परिपाटी भी उचित नहीं कि केंद्र सरकार मात्र राजनीतिक स्वार्थों के चलते किसी भी राज्य को भारी भरकम राशि दे ताकि उस राज्य का मुख्यमंत्री विपक्षी पार्टी की चाल को मंद कर सके। केंद्र ने बिहार को राशि देकर जो मुसीबत मोल ली है उससे पार पाना अब आसान न होगा। सरकार का हर सहयोगी या भावी सहयोगी अब सरकार से आर्थिक मदद का अभिलाषी होगा। हो सकता है केंद्र सरकार बिहार को दी गयी राशि को सही ठहराने के लिए आंकड़ों का मायाजाल दिखाए पर इससे एक बात को साबित होती है कि नीतीश ने आज तक बिहार की तरक्की का जो झूठा महिमा-मंडन किया था वह खोखला था। यदि बिहार सच में विकास और प्रगति की राह पर अग्रसर होता तो पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष (बीआरजीएफ) के तहत राशि पाने का हकदार ही नहीं होता। केंद्र द्वारा दी गयी आर्थिक मदद से नीतीश भले ही बिहार की भोली-भाली जनता को बेवक़ूफ़ बना लें किन्तु वे देश को मूर्ख नहीं बना सकते। स्पष्ट दृष्टिगत हो रहा है कि केंद्र और नीतीश के बीच की गलबहियां बढ़ते हुए अब उस स्तर तक पहुँच गयी हैं जहां वे कोई भी अथवा किसी भी तरह का आपसी समझौता कर सकते है। यह राजनीति में पतन की पराकाष्ठा ही होगी। अब चूंकि १२,००० करोड़ की राशि बिहार को मिलने वाली है लिहाजा इस राशि का कैसा और क्या उपयोग होता है उस पर निगाह रखनी होगी। हालांकि राजनीति के वर्तमान चाल-चलन को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इस राशि की बंदर-बांट भी तय है।

 

सिद्धार्थ शंकर गौतम 

 

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