लेखक परिचय

सत्‍येन्‍द्र सिंह 'भोलू'

सत्‍येन्‍द्र सिंह 'भोलू'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं। संपर्क : आनंद नगर कटर, गांधी नगर, बस्‍ती (उत्तर प्रदेश)

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सत्येन्द्र सिंह भोलू

हिन्दुस्तान पहले से ही भीषण महंगाई से त्रस्त था ऊपर से केन्द्र की यू0पी0ए0 सरकार ने गैस 50 रूपये, डीजल 3 रूपयें, मिट्टी (केरोसिन) का तेल 2 रूपयें तथा पिछले महीने पेट्रोल का दाम 5 रूपयें बढ़ाकर आम आदमी को सकते में डाल दिया है। जिसका असर भारत वर्ष में रहने वाले सर्वाधिक किसानों और मध्यमवर्गीय परिवारो को उठाना पड़ेंगा। क्योंकि देश की आजादी के बाद आज हिन्दुस्तान उस स्थिति में आ चुका है, जहॉ एक बड़े परिवर्तन की जरूरत है। किसी भी देश की विदेश नीति वही सफल मानी जाती है जो राष्ट्र हित में हों। आज 60 प्रतिशत से अधिक आबादी की आजीविका कृषि पर आधारित है। राष्ट्रीय नीतियों में कृषि की उपेक्षा के चरम बिन्दु ने ही भुखमरी, खाद्यान्न असुरक्षा और किसानो को आत्महत्याओं जैसी विडंबनाओं को जंन्म दिया है, और सही कारण है कि हमारी विदेश नीति संदेह के घेरे में आ जाती है।

स्वतन्त्रता के बाद जब सम्पूर्ण देशों में दो गुटो का विभाजन हुआ तो भारत निर्गुट सम्मेंलन के देशो का एक मान्य नेता था। लेकिन आज वह गुट समाप्त हो चुका है। सोवियत गणराज्य बिखर चुका है, संसार की राजनीति पर अमेरिका का वर्चस्व बढ़ गया है। दुनिया के तीन एंेसे संगठन है जिन पर अमेरिका का पूर्ण वर्चस्व है। (1) विश्व बैंक (2) विश्व ब्यापार संगठन (3) अंन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और इन तीनो संगठनो के माध्यम से वह (अमेरिका) विकसित देशो पर तो कम विकासशील देशों पर बहुत कुप्रभाव डाल रहा है। क्यांेकि एशियाई क्षेत्रो की बड़ी बाजार के रूप में अमेरिका की निगाह अब भारत पर है। आज दुनिया की राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान पर रहते हुए भी भारत अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अकेला सा हो चुका है। सारे पूॅजीवादी राष्ट्र भारत से अपनी शर्तो पर समझौता कर लाभान्वित होंना चाह रहंे है। और भारत वर्ष की दो बड़ी राजनैतिक पाटर्ी्र कांग्रेस व भाजपा इन पूॅजीवादी राष्ट्रो के हाथो में खेल रही है और यही कारण है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दबाव मे लगातार खासकर तेल कम्पनियां घाटे में चल रही है का भ्रामक प्रचार सरकार द्वारा कराकर पेट्रोलियम पदार्थो में वृद्धि किया जा रहा है। लेकिन हकीकत तो यह है कि ये तेल कम्पनियां भारी मुनाफा कमा रही है।

अन्तर्राष्ट्रीय बाजार का हवाला देने वाली केन्द्र सरकार पेट्रो पदार्थ मे लगातार वृद्धि करती चली जा रही है। सरकार से अगर यह प्रश्न किया जाय कि ये बढ़ोत्तरी किसके हित में की है, 78 प्रतिशत गरीब जनता या बी.पी.सी.एल. व आई.ओ.सी. जैसी मुनाफा वाली तेल कम्पनियां के लिए। सरकार को तेल कम्पनियों के घाटे की चिन्ता तो है लेकिन उस आदमी की जरा सा भी चिन्ता नहीं है जिसे इन पेट्रो पदार्थो की मूल्य वृद्धि के जरिए उसके ऊपर महंगाई का एक और रद्दा रख दिया गया है।

बहुत सम्भव है कि कांग्रेस जिस दलित वोट बैंक को अपना बनाने के लिए प्रयास कर रहीं है, ऐसे में कांग्रेसी संगठन के रणनीतिकारों का यह मत हो कि पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमत बढ़ाने से गरीब व्यक्ति पर कोई विशेष प्रभाव नही पड़ेगा, किन्तु आज के वैश्विक समय में यह कदापि संभव नही है कि पेट्रेल, गैस, डीजल, केरोसिन के दामो में वृद्धि हो और आम आदमी अछूता रह जायें। वास्तव में अमेरिका के दबाव और वोट के राजनीतिक समीकरण बिठाते-बिठाते कांग्रेस स्वंय उहापेाह का शिकार हो गयी है।

मसलन उत्तर प्रदेश में ही देखे मौजूदा प्रदेश सरकार किसानो के प्रति उतनी गंभीर नही है जिस तरह की चिन्ता मुलायम सिंह को रहती थी। इसका मूल कारण यह भी है कि मायावती बेहतर जानती है कि उसका मतदाता गन्ना की खेती नही करता है वरन वह किसी प्रकार खेत में मजदूरी करता है। और इसी प्रकार सोच के चलते देश व प्रदेश को अनेक प्रकार के संकटो का सामना करना पड़ रहा है। इन संकटो के निदान के लिए हमे स्वंय अपने ऊपर आत्म निर्भर होना होगा। क्योकि जिस प्रकार केन्द्र सरकार अमेरिकी दबाव मे विदेश नीति तय कर रही है और पंचशील एवं गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्तो को दर किनार किया जा रहा है, यही कारण है कि विदेशी कम्पनियां अंधाधुंध प्रवेश कर रही है। आज विश्व ब्यापार संगठन द्वारा एक बिलियन डालर सब्सिडी ये देश अपने लोगों (भारत) को देते है। सन् 1995 से 2005 के बीच अमेरिका ने बतौर सब्सिडी बीस बिलियन डालर खर्च किये थे। ऐसे मे हिन्दुस्तान के किसानों को अन्तर्राष्ट्रीय बाजारो में इनके स्पर्धा में खड़ा कर दिया गया है। अगर हमें उतनी सुविधाए नही है तो हम उनका मुकाबला कैसे करेंगें, और यही कारण है डब्लू.टी.ओ. मे हम कंुछ कर नही पा रहे है। हमें इतना तो करना चाहिये था, मात्रात्मक प्रतिबन्ध का अधिकार हम अपने पास ले लेते ताकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियांे का कृषि उत्पादन भारत में नही बिकता। कटु यथार्थ तो है कि जिस प्रकार से यू.पी.ए. सरकार लुभावनी आम बजट प्रस्तुत किया था, उसे पूरा करना आसान नही है। इसका सबसे सरल तरीका केन्द्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादो के दाम बढ़ाने में समझा।

विगत दस वर्षो में जिस प्रकार पहले राजग और अब यू.पी.ए. सरकार में लगातार गैस, डीजल, पेट्रोल, केरोसिन की कीमते बढ़ाई गई है, समूचे देश में इसकी तीखी प्रतिक्रियां हुई है। अगर समय रहते इसमें संशोधन नही हुआ तो देश और स्वंय कांग्रेस को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। अब देश के लोगो को खुद विचार करना पड़ेगा कि ये दोनो गठबंधन चाहे यू.पी.ए. हो राजग दोना अमेरिकी ईशारों पर नाचते है। इस तानाशाह (अमेरिका) को मुहॅतोड़ जबाब दे और देश में महंगाई पर लगाम लगाने के साथ-साथ अमन चैन का माहौल बने।

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