लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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 सिद्धार्थ शंकर गौतम

राष्ट्रपति चुनाव की सरगर्मियों के बीच देश भर में हुए विधानसभा व एक लोकसभा के उपचुनाव में कांग्रेस की जो दुर्गति हुई है उससे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता कि २०१४ के आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन क्या होने वाला है? हालांकि २०१४ के लोकसभा चुनाव में अभी काफी वक़्त शेष है किन्तु राजनीतिक परिदृश्य पर लगातार मजबूत होते क्षेत्रीय क्षत्रप निश्चित रूप से कांग्रेस की राह को अधिक मुश्किल करने वाले हैं| देशभर की २६ विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस को महज ३ सीटों से संतोष करना पड़ा है| कांग्रेस की सबसे शर्मनाक हार तो उसके आखिरी दक्षिणी दुर्ग आँध्रप्रदेश में हुई है जहां बागी जगन की वाईएसआर कांग्रेस के प्रत्याशियों ने १५ विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की है| यहाँ सबसे बड़ी बात यह रही कि १० विधानसभा सीटों पर तो कांग्रेस की जमानत तक जब्त हो गई| जगन के विरुद्ध न तो कांग्रेस के युवराज काम आए न ही सुपरस्टार चिरंजीवी| जगन अकेले ही सभी पर भारी पड़ गए| राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के लिए यह स्थिति लज्जाजनक ही कही जाएगी| वैसे देखा जाए तो आंध्र में अपनी दयनीय हालात के पीछे कांग्रेस की जिद तथा उसका अहंकारपूर्ण रवैया ही रहा है| आखिर पार्टी के जिस क्षत्रप ने पूरे प्रदेश में पार्टी की सियासी राह सुगम की उसी के पुत्र की अति सक्रियता के मद्देनज़र शीर्ष नेतृत्व ने ऐसे-ऐसे बेतुके निर्णय लिए जिसकी भरपाई करने में अब शायद पार्टी को दशकों का समय लगे| वाईएसआर रेड्डी ने कांग्रेस को जो ज़मीन राज्य में तैयार कर कर दी थी, उस पर पहला हक़ उनके पुत्र जगनमोहन रेड्डी का था| अब यदि कांग्रेस इसे परिवारवाद का नाम दे तो यह तो जगन के साथ नाइंसाफी जैसा होगा| ज़रा कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अपने गिरेबान में झाँक कर देखे, क्या राहुल गाँधी को स्थापित करने के लिए उसने कई ज़मीनी कांग्रेसियों को दरकिनार नहीं किया? क्या इतिहास इस तथ्य को झुठला सकता है कि राजीव गाँधी की प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी हेतु प्रणब मुखर्जी, पी.वी. नरसिम्हाराव जैसे वरिष्ठों को दरकिनार नहीं किया गया? अब जबकि २०१४ के लिए राहुल गाँधी को तैयार किया जा रहा है तो राष्ट्रपति पद हेतु मुखर्जी का नाम क्या उन्हें प्रधानमंत्री की रेस से बाहर करने जैसा नहीं लगता? यक़ीनन प्रणब ही राहुल के लिए खतरा हो सकते थे लिहाज़ा सोनिया ने अपनी जिद तथा अपने पुत्र को प्रधानमंत्री पद पर देखने की खातिर उन्हें राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी का प्रत्याशी घोषित कर रायसीना हिल्स का रास्ता दिखा दिया|

 

दरअसल कांग्रेस ने कभी अपनी गलतियों से सबक नहीं लिया और इसे पीछे एक ही कारण था पार्टी का एक परिवार के हाथ में होना| पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र का दंभ भरते नेताओं से यह सवाल किया जाना चाहिए कि क्यों प्रणब को राजीव गाँधी ने अपने मंत्रिमंडल में शामिल ने करते हुए उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया? क्यों निजलिंगप्पा जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी इंदिरा गाँधी की हठधर्मिता का शिकार हुए? क्यों अर्जुन सिंह, एन.डी. तिवारी, कमलनाथ जैसे गाँधी परिवार के खासम-ख़ास कार्यकर्ताओं को पार्टी छोडनी पड़ी? क्यों ममता बैनर्जी, शरद पवार, पी.ए. संगम जैसे कांग्रेसी आज कांग्रेस की नकेल कसने का साहस जुटा रहे हैं? उत्तर साफ़ है, गाँधी-नेहरु परिवार से इतर कांग्रेस की कल्पना नहीं की जा सकती| या यों कहें, पार्टी गाँधी-नेहरु परिवार के नाम को छोड़ना ही नहीं चाहती| और जब तक पार्टी इन नामों से नहीं उबरती जगन जैसे बागी पैदा होते रहेंगे और कांग्रेस को यूँ ही लज्जाजनक स्थिति से दो-चार होना पड़ेगा| गुटबाजी और गाँधी-नेहरु परिवार के नाम का अपनी चमक खोना कांग्रेस को धीरे-धीरे ही सही मगर संगठनात्मक रूप से खोखला ज़रूर कर रहा है| विधानसभा की १८ सीटें हार जाना किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए एक ऐसी चेतावनी है जिसे दरकिनार करना उसे भविष्य के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है| जगन को अपने पिता के नाम और काम दोनों का लाभ तो मिला ही, सी.बी.आई द्वारा उनकी गिरफ्तारी भी कांग्रेस के प्रति लोगों में आक्रोश भर गई| पता नहीं, कांग्रेस के नीति-नियंताओं को यह बात क्यों समझ नहीं आई कि अपने जिस लोकप्रिय नेता को खोने की वजह से राज्य की जनता आत्महत्या करने पर उतारू हो जाए, उसी के पुत्र के साथ कांग्रेस का सौतेला व्यवहार कैसे बर्दाश्त कर पाएगी?

 

आँध्रप्रदेश से इतर मांट (उत्तरप्रदेश), बाकुंडा तथा दासपुर (पश्चिम बंगाल), महेश्वर (मध्यप्रदेश), हटिया (झारखंड), केज (महाराष्ट्र), नलचर (त्रिपुरा), पुडुकोट्टी (तमिलनाडू) जैसी विधानसभा सीटों पर भी कांग्रेस कहीं से कहीं तक मुकाबले में नज़र नहीं आई| हाँ, केरल की नेयात्तिन्कारा विधानसभा सीट जीत कर यदि उसे अपनी क्षमताओं पर गर्व महसूस हो रहा हो तो उसकी वो जाने? वैसे संप्रग सरकार की द्वितीय दागी पारी ने देशभर में कांग्रेस की स्थिति को कमजोर किया है| कांग्रेस नेता अपनी ओर से पार्टी को मजबूत करने हेतु कितने भी जतन कर लें, कहीं न कहीं केंद्र सरकार की छवि उनकी मेहनत पर पानी फेर देती है| मात्र सत्ता शीर्ष पर काबिज होने की ललक ने भी कांग्रेस की नकारात्मक छवि को उजागर किया है जिसकी वजह से उसे हाल ही के महीनों में संपन्न विधानसभा, लोकसभा सहित तमाम उपचुनावों में मुंह की खानी पड़ी है| कभी गठबंधन को बचाए रखने की सक्रियता तो कभी देश को अपनी मर्ज़ी से हांकने की जिद ने कांग्रेस को सचमुच आम आदमी से दूर कर दिया है| उस पर भी तुर्रा यह कि हम तो ऐसे ही अपने हिसाब से चलेंगे| वो तो भला हो विपक्ष का कि वह एकजुट नहीं है, भाजपा अपनों के सितम से चोट ख रही है तो वाम दलों की रीढ़ झुक गई है वरना ऐसे हालातों में तो कांग्रेस का नामलेवा कोई नहीं होता| शीर्ष स्तर पर निर्णय लेने की अक्षमताओं ने कांग्रेस को सीमित दायरे में समेट दिया है जिसकी वजह से क्षेत्रीय क्षत्रप जब चाहे उसे आँख दिखा कर मनमाने ढंग से सरकार को बेतुके निर्णय लेने हेतु बाध्य कर रहे हैं| कांग्रेस के लिए यह समय निश्चित रूप से आत्ममंथन का है कि आखिर वह मात्र सत्ता चाहती है या आम आदमी के साथ से निरंतर बढ़ना चाहती है| वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य देखकर तो कहा जा सकता है कि यदि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अपने रुख में बदलाव नहीं किया तो जगन जैसे न जाने कितने बागी उसकी रफ़्तार को कुंद कर देंगे|

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