लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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ओ३म्

मनुष्य का धर्म क्या है व अधर्म किसे कहते हैं? आज का शिक्षित मनुष्य स्वयं को सभ्य कहता है परन्तु उसे यह पता ही नहीं की धर्म क्या है और अधर्म क्या है? हमें लगता है कि आजकल अनेक मतों में जिन बातों को धर्म माना जाता है उनमें से कुछ बातें धर्म न होकर अधर्म भी हैं। कारण यह है कि सभी धार्मिक लोग अपनी मत की पुस्तकों व पुराने विद्वानों की बातों को आंखें बन्द कर विश्वास करते हैं और इसे आस्था का नाम देते हैं। विचार करने पर प्रतीत होता है कि मनुष्य का धर्म उसकी असत्य में आस्था नहीं हो सकती अपितु अपनी बुद्धि से सत्य व असत्य का विचार कर जो बात सत्य व उचित निश्चित हो, उसे ही धर्म मानें तथा उसके विपरीत सभी बातें निश्चय ही अधर्म हैं और उनका त्याग करना मनुष्य का कर्तव्य व यथार्थ धर्म है।

धर्म शब्द का अर्थ सद्गुणों को धारण करना होता है। मनुष्य को वस्त्र धारण करने होते हैं। स्वस्थ रहने के लिए पोषक भोजन करना होता है और इसके साथ व्यायाम, प्राणायाम व योगाभ्यास करना होता है। यह सब कार्य धर्म कहे जा सकते हैं क्योंकि इनके बिना जीवन निरूपद्रव नहीं होता। कपड़े भी ऐसे होने चाहिये जिसमें शालीनता दिखाई दें, देखने वाले के मन पर उसका अव्यभिचारी प्रभाव हो तो वह धर्म में आता है और जहां उसका उद्देश्य व प्रभाव विपरीत हो रहा है तो उसमें सुधार व परिवर्तन की आवश्यकता होती है। मनुष्य जीवन में सबसे महत्वपूर्ण दो बातें हैं, सत्य व असत्य। सत्य का धारण धर्म होता है और असत्य का धारण या उसका जीवन में व्यवहार अधर्म कहा जाता है। सत्य क्या है? यह किसी पदार्थ के वास्तविक या यथार्थ स्वरूप को कहते हैं। जल को जल कहना और मानना धर्म है। जल के गुणों यथा शीतलता को जानकर उसका वैसा ही प्रयोग व व्यवहार करना धर्म है। यदि जल गर्म है तो यह जानना कि जल में गर्मी का कारण अग्नि तत्व की विद्यमानता है। यह जल का स्वाभाविक गुण नही है। इसी प्रकार में मनुष्य जीवन में सत्य को धारण करना ही धर्म है। अब धर्म के 10 लक्षणों को भी जान लेते हैं। धैर्य, क्षमा, अनुचित इच्छाओं व एषणाओं का दमन, चोरी या छिपाकर कोई अनुचित कार्य न करना, जीवन में स्वच्छता व सादगी, इन्द्रियों को वश में रखना, शुद्ध ज्ञानयुक्त बुद्धि का होना, विद्या व ज्ञानवान होना, सत्य का पालन तथा क्रोध न करना, यह धर्म के दस लक्षण हैं। जिस व्यक्ति में यह 10 लक्षण पूर्णरूपेण विद्यमान हों वह धार्मिक होता है और इसके विपरीत लक्षणों वाला अधार्मिक कहा जा सकता है वा होता है।

 

गोरक्षा मनुष्य धर्म कैसे है? यह इस प्रकार है कि गाय एक ऐसा प्राणी है जिससे मनुष्यों को वा सृष्टि का बहुत उपकार होता है। अतः स्वयं या मनुष्यों के हित व उपकार के लिए गायों की रक्षा करना मनुष्य का धर्म निश्चित होता है। हम सब यह जानते हैं कि संसार व सभी प्राणियों को ईश्वर ने बनाया है। ईश्वर ने इसलिए बनाया कि उसमें संसार को बनाने की सामथ्र्य है। उसने यह जीवों के सुख के लिए मनुष्य आदि योनियों व संसार को बनाया है। जीवों को सुख किस प्रकार से होता है कि सत्य वा सत्तावान, चेतन, एकदेशी, अजन्मा, अनादि, नित्य, अविनाशी, अमर, कर्मों का कत्र्ता व कर्म के फलों का भोक्ता, जन्म-मृत्यु-जन्म के चक्र में फंसें हुए जीवात्मा को उसके पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार मनुष्य आदि योनि प्रदान की जाये जहां रहकर वह अपने पूर्व जन्मों के कर्मों का फल सुख व दुःख के रूप में भोगें और भावी जन्मों के लिए अन्य शुभ कर्मों को करें। जीव शब्द की परिभाषा ही यह है कि स्वतन्त्रता से कर्मों को करने वाला। जीव के इस गुण को सार्थकता ईश्वर द्वारा उसे प्राप्त जन्म द्वारा ही सम्भव होता है। अतः ईश्वर सभी जीवों को उनके कर्मानुसार भिन्न-भिन्न प्राणी योनियों में जन्म देता है और उनका नियन्त्रण करता है। इस कर्म-फल सिद्धान्त के आधार पर उसने जीवों को गाय व मनुष्य आदि बनाया है। गाय अपने कर्मों का फल भोग रही है और मनुष्य अपने कर्मों को भोगने व नये कर्मों को करने के लिए पैदा हुआ है। गाय का उद्देश्य घांस व तृण आदि भक्षण कर अपने पालक को अपनी सन्तान के रूप में गाय व बैल आदि देना और इसके साथ अमृत समान गोदुग्ध देकर मनुष्य के जीवन को बल, आरोग्य, सुख, समृद्धि, दीर्घायु से युक्त कर कर्मशील आदि बनाना है। गाय से दुग्ध, गोमूत्र व गोमय प्राप्त होने से मनुष्य उसका ऋणी व कृतज्ञ बनता है जिसका उपाय उसे गाय की सेवा, उसको अच्छा चारा व घास आदि खिलाना, उसको सुरक्षा प्रदान करना, उसके प्रति माता के समान आदर भाव रखना है।

इस संसार को रोग रहित बनाने में यज्ञ वा अग्निहोत्र का महत्व निर्विवाद है। वेदों में इस संसार को बनाने वाले ईश्वर की आज्ञा है कि मनुष्यों को प्रतिदिन यज्ञ करना चाहिये। यज्ञ करने से मनुष्य अनजाने में किये हुए पापों के बन्धनों से मुक्त होता है। यज्ञ से अनेकानेक अन्य लाभ भी होते हैं। यह यज्ञ बिना गोघृत के सम्भव नहीं है। अतः मानव जीवन को वेदानुसार वा ईश्वर आज्ञानुसार व्यतीत करने के लिए यज्ञ करना आवश्यक है और वह यज्ञ गोरक्षा, गोसेवा, गोपूजा वा गोपालन कर गोदुग्ध व गोघृत प्राप्त कर ही सम्पन्न किया जा सकता है। यज्ञार्थ व ईश्वराज्ञा पालनार्थ गोरक्षा करना मनुष्य के प्रमुख कर्तव्यों में से एक कर्तव्य है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो ईश्वर की आज्ञा भंग होने से वह ईश्वर से दण्ड का अधिकारी बनता है। हम समझते हैं कि बहुत से धार्मिक लोग कई बार शिकायत करते हैं कि हमने जीवन में कभी किसी का बुरा नहीं किया और न अन्य कोई बुरा काम ही किया है, फिर यह भीषण दुःख हम पर किस कारण से आया? उस समय हम यह भूल जाते हैं कि हमने कभी ईश्वर के बारे में यह विचार ही नहीं किया कि वह क्या चाहता है? यदि देखें तो एक कारण यह भी ज्ञात होता है कि हमने कभी ईश्वर की हमसे अपेक्षाओं को जानने का प्रयास ही नहीं किया जिसमें ईश्वर की हमसे अनेकानेक अपेक्षायें हो सकती है। इसे जानने के लिए हमें वेद और प्राचीन ऋषियों मुनियों के युक्ति व तर्क संगत ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिये। परन्तु आजकल देखा यह जा रहा है कि यदि कोई स्त्री व पुरूष इस प्रकार की बात करे तो उसकी बात पर विचार किए बिना ही उसे रूढि़वादी या दकियानुसी विचारों वाला व्यक्ति घोषित कर दिया जाता है। इससे कुछ मामलों में हम लौकिक व अलौकिक लाभों से वंचित हो जाते हैं और जीवन में पुण्य अर्जित नहीं कर पाते।

 

गाय से हमें केवल दुग्ध का ही लाभ नहीं होता अपितु उससे मिलने वाली बछडि़या भी एक-दो साल में गाय बन कर हम और हमारी सन्ततियों का पोषण व नानाविध उनकी रक्षा करती हैं। गाय के बछड़े खेती व भार ढ़ोने के काम आते हैं। यह कार्य पर्यावरण की दृष्टि से तो उपयोगी है ही साथ में पेट्रोल पर जो द्रव्य व्यय किया जाता है वह भी नहीं होता। हां, आजकल के आधुनिक काल में यह व्यवस्था अप्रांसगिक हो गई है परन्तु आने वाले समय में जब पेट्रोल समाप्त हो जायेगा तो मनुष्य को शायद पुनः इसकी आवश्यकता पड़ सकती है। अतीत में बैलों ने हमारे पूर्वजों की नाना प्रकार से सेवा की है अतः उनके प्रतिनिधि आजकल के बैलों पर अत्याचार करना क्रूर कर्म होने के साथ अधर्म है और इससे मनुष्य ईश्वर व अत्याचार किये गये जीवों का शत्रु व घातक सिद्ध होता है जिससे ईश्वर की व्यवस्था से उसे दण्ड मिलना निश्चित होता है। यहां यह भी जान लेना आवश्यक है कि इस जन्म में मृत्यु के बाद कर्मानुसार हममें से कुछ को अगले जन्म में गाय या बैल की योनी मिले। यदि पशु हत्या समाज में प्रचलित रहेगी तो हमें भी आजकल की भांति अगले जन्म में दूसरे मनुष्यों के द्वारा अपनी हत्या के दुःख से गुजरना पड़ सकता है। यदि हम चाहते हैं कि हमें भावी पशु योनियों में यह दुख न मिले तो हमें आज ही गो व गोवंश सहित सभी पशुंओं की हत्याओं के विरोध में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिये।

 

हम यह भी अनुभव करते हैं कि यदि शत-प्रतिशत गोरक्षा हो तो देश को आत्म निर्भर व सुखी बनाया जा सकता है। यह इस प्रकार होगा की गोरक्षा, गोपालन, गोसंर्धन के कार्यक्रम चलाकर गायों की नस्ल व संख्या में वृद्धि की जाये। इससे देश में गोदुग्ध व गोघृत की आवश्यकता के अनुरूप व उससे भी अधिक मात्रा की उपलब्धि होगी। भरपूर गोदुग्ध आदि पदार्थों से हमारे देश की प्रजा निरोग व बलवान होगी। गोदुग्धादि पदार्थों के यथेष्ट पान से बुद्धि में ज्ञान व बल की भी वृद्धि होगी। सभी लोग ज्ञानी, वैज्ञानिक, इंजीनियर, वैद्य व डाक्टर बनेंगे। देश शंक्तिशाली व आत्म निर्भर होगा। सभी लोगों का अनायास रोजगार मिलेगा। ऐसा माना जाता है कि जहां पशुओं की संख्या अधिक होती है तो वहां मनुष्यों की संख्या कम और मनुष्यों की अधिक होती है तो पशुओं की संख्या कम हो जाती है। जनसंख्या नियन्त्रण का एक तरीका यह हो सकता है गाय, बकरी, भेड़ आदि की संख्या में वृद्धि की जाये। ईश्वर ने गायों के लिए खाने व भोजन के साधन मनुष्यों से भिन्न बनाये हैं और वह अपने आप ही प्रकृति में उत्पन्न होते हैं। अतः पशुओं की संख्या में वृद्धि होने से मनुष्यों के हितों को किसी प्रकार की हानि नहीं अपितु लाभ ही लाभ है। गाय का गोमूत्र भी कैंसर जैसे रोगों के उपचार में उपयोग किया जाता है। इस पर उच्चस्तरीय अनुसंधान की आवश्यकता है और ऐसा सम्भव है कि भविष्य में गोमूत्र आदि पदार्थों से कैंसर का पूर्ण निदान सम्भव हो जाये। गाय का गोबर भी आर्थिक दृष्टि से ईधन और खेतों में खाद के काम आता है। आज के युग में गाय के गोबर से बनी खाद सर्वोत्तम खाद सिद्ध हुई है। वैज्ञानिक परीक्षणों में यह भी पाया गया है कि गाय का गोबर रेडियोधर्मिता प्रतिरोधी है। मरने पर गाय व बैल का चर्म मनुष्यों के पैरों की जूते व चप्पल के रूप में रक्षा करता है। इन्हीं गुणों के कारण प्राचीन आर्य और ऋषि-मुनियों ने गाय को माता के समान स्थान देकर गौरवान्वित किया था। मनुष्य गोहत्या न करे, सम्भवतः इसी कारण हमारे पूर्वजों ने गोहत्या को महापाप की संज्ञा दी थी जो कि यथार्थ ही है। इस प्रकार गाय हमारे जीवन से गहनता से जुड़ी हुई है और हमारे जीवन का बहुमूल्य हिस्सा है। इसके बिना मनुष्य जीवन एकांगी व अधूरा है। हम अनुभव करते हैं कि आधुनिक दृष्टि से भी गोरक्षा, गोपालन, गोसंवर्धन, गोदुग्ध-घृत का सेवन संसार के सभी मनुष्यों के लिए परम कल्याणकारी है और गोहत्या महापाप है। गोहत्या करने वाले सभ्य या मनुष्य की संज्ञा के अधिकारी नहीं है अपितु वह परमात्मा और मानवता के अपराधी है। इस पर मानवीय दृष्टि से विचार कर पूर्ण गोहत्या बन्दी का कानून बनना चाहिये और गोहत्या करने वालों को कठोरतम् दण्ड का प्राविधान किया जाना चाहिये जिससे संसार के सभी मनुष्य स्वस्थ, सुखी, बलवान, निरोग, दीर्घायु, ईश्वर भक्त व यज्ञप्रेमी बन कर अभ्युदय व निःश्रेयस की प्राप्ती कर सकें। हम दिवंगत आर्य विद्वान पं. प्रकाशीवीर शास्त्री के शब्दों में यह कर कर विराम देते हैं कि गोरक्षा राष्ट्ररक्षा तथा गोहत्या राष्ट्र हत्या है। आज मनुष्य को मनुष्य बनाने की आवश्यकता है जिससे वह असुरत्व छोड़कर देवत्व को धारण करे।

 

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