लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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dalitराकेश कुमार आर्य

गतांक से आगे…..

आज के चाणक्य इस पवित्र भावना से इस प्रकार मुंह फेरे हुए हैं कि यदि ऐसा कहा जाए कि वह राष्ट्रवाद की भावना को मारने में सहायक हो रहे हैं, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नही होगी। चाणक्य ने आतंक के पर्याय चोर, गुंडे, लुच्चे, बदमाश और लफंगों से राष्ट्र की राजसभा को नंद और उसके दरबारियों का नाश करके मुक्त किया था, जबकि आज इन्हीं लोगों को राजसभा अर्थात संसद में स्थान मिलता जा रहा है। राष्ट्र के भविष्य पर लगे इस भयावह प्रश्न को कौन सी आंखें हैं जो देख रही हैं? या देखने का साहस कर पा रही हैं?

हमें मुल्क बनाना था ये हम क्या बना बैठे।
जिनसे ताल्लुक नही था उन्हें शाह बना बैठे।।

आज हमारे भारत में यही हो रहा है, राष्ट्र लहूलुहान है, उसका मानचित्र बड़ी जिज्ञासा से पूछ रहा है-

तुम्हें नही था शऊर तो मेरा ख्वाब ही क्यों संजोया?
ये वो सफर है जिसमें शख्सियतों का इम्तिहां होता है।।

चुनाव और फिल्मी हस्तियां

भारत में चुनावों का मौसम आये और अभिनेता और अभिनेत्रियों के दिल की कली ना खिले, ऐसा हो ही नही सकता। भारत की राजनीति देह-व्यापार के भ्रष्टाचार के पेशे में डूब मरी। डूबते को तिनके का सहारा पर्याप्त होता है-जनसमस्याओं के प्रति पूर्णत: लापरवाह रहने का परिणाम बेचारे जानते हैं उन्हें भी भली प्रकार पता है कि तुम्हें सुनने के लिए जनता अब उतनी लालायित नही है, जितनी कि कभी हुआ करती थी अथवा जितनी होनी चाहिए।

अत: बेचारे वैचारिक लकवे के मारे हुए राजनीतिज्ञ अपनी सभाओं में भीड़ बढ़ाने के लिए पहले तो उधारी और किराये की भीड़ इकट्ठी किया करते थे। रैलियों में मजदूर तबके के लोगों को एक दिन की दिहाड़ी पर मुफ्त सफर कराकर भीड़ एकत्रित करते थे। अब जब इनसे भी जनता ने किनारा करना प्रारंभ कर दिया तो ये नेता लोग अब अभिनेताओं पर निर्भर हो गये हैं। इससे बड़ा दुर्भाग्य इस देश का और क्या हो सकता है? यह ठीक है कि कला समाज के लिए एक आवश्यक विषय है, किंतु साथ ही यह भी सच है कि कला की भी अपनी सीमाएं हैं। मर्यादा वहां भी है। नंगा नाच करने पर वह भी प्रतिबंध लगाती है। जो लोग फिर भी नंगा नाच करके लखपति से करोड़पति और करोड़पति से अरबपति बनते जा रहे हैं वह कला के साथ भी अभद्र व्यवहार कर रहे हैं।

अत: वे लोग राष्ट्र के दिशा दर्शक नही हो सकते। फिर भी देश के दिशा दर्शक यदि इन्हीं लोगों का आश्रय और संरक्षण लेने पर विवश हो ही गये हैं तो निश्चित रूप से ये लोग दया के पात्र हैं।

ऐसा क्यों हुआ?
राजनीतिक प्रतिभाओं और राष्ट्रवाद के भावों से भरे हुए हृदयों का सर्वथा अकाल सा अंतत: इस जीवंत राष्ट्र भारत में क्यों पड़ा? सचमुच कोई न कोई तो कारण होगा-जो इस प्रश्न का उत्तर बन सके। इसके लिए थोड़े ही समय के पिछले पृष्ठों को पलटकर देखने की आवश्यकता है। बीते समय से राष्ट्र के साथ जो विश्वासघात किया गया है, उसे देखने, समझने और खोजने की आवश्यकता है। हमारे देश का इतिहास आज भी विदेशियों के द्वारा लिखा गया ही हमें पढ़ाया जा रहा है। यह ऐसा इतिहास है जिसमें तथ्यों के साथ भारी घपला किया गया है। इस इतिहास ने हमें यही बताया है कि-

हम विदेशी आर्यों की संतानें हैं, यह भारतभूमि मूलरूप से हमारी नही है।
मुस्लिमों का इस देश पर आक्रमण कोई नई और अद्भुत बात नही थी इससे पूर्व भी इस देश पर विदेशियों के आक्रमण हुए हैं।
मुस्लिमों ने भी इस देश पर राज करके हम पर उपकार किया है।
फलस्वरूप राजा दाहिर, राजा जयपाल, राजा अनंगपाल, पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, शिवाजी, बंदा बैरागी, गुरू गोविंद सिंह आदि पुण्यात्माओं को इतिहास की दृष्टि से ओझल किये रखना ही श्रेयस्कर है।
रही सही कसर ‘नेहरू एण्ड कंपनी’ ने पूरी कर दी। इन लोगों ने भारत के इतिहास को उपरोक्त बिंदुओं के आईने में ही देखा। जिसके कारण इन्हें भारत एक राष्ट्र नही अपितु एक संघ परिवार दिखाई दिया अत: भारतीय संविधान में उसे भारत संघ अर्थात Indian Union कहा गया। ऐसा कहना उस समय के बिखरे समाज (भारत और पाकिस्तान के रूप में) के बिखराव पर स्वीकृति की मोहर लगा देना तो था ही साथ-साथ भविष्य की किसी बिखराव पूर्ण नीति के लिए द्वार खोल देना भी था, जिसे बाद की पंजाब, असम, नागालैंड और कश्मीर की घटनाओं ने यह सिद्घ भी कर दिया। दुर्भाग्यवश हमारे अंधे नेतृत्व की आंखें फिर भी नही खुली हैं और भारत आज भी यथावत ‘भारत संघ’ ही है।
भारतवर्ष से भारत संघ
वस्तुत: भारत को भारतवर्ष बनाने और संघ बनाये रखने से क्या-क्या हानि लाभ हैं? यह तथ्य ही इन लोगों के मन मस्तिष्क में स्पष्ट नही हो पाया है। यदि अपवादस्वरूप राष्ट्रवादी सांसदों के दिल में है भी तो दलगत हित और नीतियों के कारण अपने मुंह पर वह स्वयं लगाम लगाये बैठे हैं। यह कैसा लोकतंत्र है? जहां उचित और राष्ट्रहित की बात को भी स्पष्टता से स्वीकार न किया जा सके और न ही कहा जा सके।

वह अनुशासन भी अनुशान नही कहा जा सकता जो भावभिव्यक्ति तक पर रोक लगा दे। फिर भी एक बात तो स्पष्ट है लोकतंत्र और अनुशासन दोनों ही जब कठोर बनकर तानाशाह बन जाते हैं तो व्यवस्था परिवर्तन (क्रांति) की भूमिका तैयार करने का कारण भी बन जाते हैं।

नेहरू जी ने क्रांतिकारियों की उपेक्षा करके जो कृत्य किया वह सर्वविदित है। आज राष्ट्र का नवयुवक अपने समुज्ज्वल इतिहास के पन्ने से पूरी तरह अनभिज्ञ है। आज भी कितने भारतीय ऐसे हैं जो अपनी स्वतंत्रता के अर्थ और उसके लिए आसन्न संकटों को समझते हैं? संभवत: ऐसे लोग मुट्ठीभर ही हों। इसका कारण यही है कि-उन्हें इतिहास में यही पढ़ाया गया है कि ‘‘हमारी आजादी हमें अपना खून बहाने से नही अपितु सोने के थाल में परोसकर अंग्रेजों के द्वारा बड़े ही आराम से दे दी गयी थी।’’ ऐसे में यह लोग कैसे समझ सकते हैं कि ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का अर्थ क्या है? वे कौन लोग थे-जो ‘इंकलाब जिंदाबाद’ को एक मिशन मानकर स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े थे। इंकलाब के लिए खून की आवश्यकता पड़ती है। राष्ट्र के जीवन में इंकलाब के बड़े व्यापक अर्थ हैं। इन अर्थों को समझना और समझकर उनके प्रति सदैव जागृत और सजग रहना हर भारतीय का दायित्व है। न जाने कब इंकलाब कारगिल के रूप में परीक्षा के लिए हमारे सामने ‘तख्ती पर सवाल’ निकलवाने के लिए आ खड़ा हो। कभी वह कारगिल बन सकता है, कभी वह कश्मीर का सुलगता प्रश्न और अंतरव्यथा बन सकता है। तो कभी पंजाब में हमारे धैर्य की परीक्षा लेने के लिए आ सकता है। चुनौती जीवन का अनिवार्य अंग है। वस्तुत: जीवन ही एक चुनौती है-तो राष्ट्र के जीवन से चुनौती को कैसे निकाला जा सकता है? राष्ट्र भी इससे अछूता नही है। अब यदि चुनौती है तो उसके लिए बलिदान की आवश्यकता अनिवार्य है और बलिदानों को ‘बिना खडग बिना ढाल’ कैसे दिया जा सकता है? यदि बलिदानों से खडग और ढाल को निकाल दिया जाए तो महाराणा प्रताप और उनके राजपूत रणबांकुरों के बलिदानों को निंदित कार्य कहना पड़ेगा। क्या ऐसा कहना संभव है? कदापि नही।
क्रमश:

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