लेखक परिचय

पंडित दयानंद शास्त्री

पंडित दयानंद शास्त्री

ज्योतिष-वास्तु सलाहकार, राष्ट्रीय महासचिव-भगवान परशुराम राष्ट्रीय पंडित परिषद्, मोब. 09669290067 मध्य प्रदेश

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वास्तु के अनुसार प्रमुख द्वार सदियों तक सुखद व मंगलमय अस्तित्व को बनाए रखने में सक्षम होते हैं। प्रवेश द्वार चाहे घर का हो, फैक्ट्री, कारखाने, गोदाम, आफिस, मंदिर, अस्पताल, प्रशासनिक भवन, बैंक, दुकान आदि का हो लाभ-हानि दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे जुड़े सिद्धांतों का सदियों से उपयोग कर मानव अरमानों के महल में मंगलमय जीव बिताता चला आ रहा हैं।मुख्य प्रवेश द्वार के जरिये शत्रुओं, हिंसक पशुओं व अनिष्टकारी शक्तियों से भी रक्षा होती है। इसे लगाते समय वास्तुपरक बातों जैसे, प्रवेश द्वार के लिए कितना स्थान छोड़ा जाए, किस दिशा में पट बंद हों एवं किस दिशा में खुलें तथा वे लकड़ी व लोहे किसी धातु के हों, उसमें किसी प्रकार की आवाज हो या नहीं। प्रवेश द्वार पर कैसे प्रतीक चिन्ह हों, मांगलिक कार्यों के समय किस प्रकार व किससे सजाना इत्यादि बातों पर ध्यान देना उत्तम, मंगलकारी व लाभदायक रहता है। घर के निर्माण में जिस तरह विभिन्न दिशाओं को महतवपूर्ण माना गया है, उसी तरह घर के प्रवेश द्वार की सही दिशा व स्थान भी बेहद आवश्यक है। प्राचीन ऋषियों ने भवन की बनावट, आकृति तथा मुख्य प्रवेश द्वार के माध्यम से प्रवेश होने वाली ऊर्जा के सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव का गहरा अध्ययन किया है। आदिकाल से प्रमुख द्वार का बड़ा महत्व रहा है, जिसे हम फाटक, गेट, दरवाजा, प्रवेशद्वार आदि के नाम से संबोधित करते हैं, जो अत्यंत मजबूत व सुंदर होता हैं।

निम्नांकित बातों का ध्यान रखकर हम अपने एवं अपने पारिवारिक जीवन को सुखद व मंगलकारी बना सकते हैं ..

आए जानें क्या हैं ये सिद्धांतः-

——सूर्यास्त व सूर्योदय होने से पहले मुख्य प्रवेश द्वार की साफ-सफाई हो जानी चाहिए। सायंकाल होते ही यहां पर उचित रोशनी का प्रबंध होना भी जरूरी हैं।

——दरवाजा खोलते व बंद करते समय किसी प्रकार की आवाज नहीं आना चाहिए। बरामदे और बालकनी के ठीक सामने भी प्रवेश द्वार का होना अशुभ होता हैं।

——प्रवेश द्वार पर गणेश व गज लक्ष्मी के चित्र लगाने से सौभाग्य व सुख में निरंतर वृद्धि होती है।

——-पूरब व उत्तर दिशा में अधिक स्थान छोड़ना चाहिए।

——–मांगलिक कार्यो व शुभ अवसरों पर प्रवेश द्वार को आम के पत्ते व हल्दी तथा चंदन जैसे शुभ व कल्याणकारी वनस्पतियों से सजाना शुभ होता है।

——-प्रवेश द्वार को सदैव स्वच्छ रखना चाहिए। किसी प्रकार का कूड़ा या बेकार सामान प्रवेश द्वार के सामने कभी न रखे। प्रातः व सायंकाल कुछ समय के लिए दरवाजा खुला रखना चाहिए।

इनका भी विशेष घ्यान रखें:-

जिस घर में निम्नांकित नियमों का सावधानीपूर्वक पालन किया जाता है वहां सदैव लक्ष्मी, धन, यश, स्वास्थ्य लाभ व आरोग्य रहता है …

——-किसी भी मकान का एक प्रवेश द्वार शुभ माना जाता है। अगर दो प्रवेश द्वार हों तो उत्तर दिशा वाले द्वार का प्रयोग करें।

——–पूरबमुखी भवन का प्रवेश द्वार या उत्तर की ओर होना चाहिए। इससे सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है तथा दीर्घ आयु व पुत्र धन आता हैं।

——–पश्चिम मुखी मकान का प्रवेश द्वार पश्चिम या उत्तर-पश्चिम में किया जा सकता है, परंतु दक्षिण-पश्चिम में बिल्कुल नहीं होना चाहिए। भूखंड कोई भी मुखी हो, अगर प्रवेश द्वार पूरब की तरफ या उत्तर-पूरब की तरफ उत्तर की तरफ हो तो उत्तम फलों की प्राप्ति होती हैं।

——उत्तर मुखी भवन का प्रवेश उत्तर या पूरब-उत्तर में होना चाहिए। ऐसे प्रवेश द्वार से निरंतर धन, लाभ, वयापार और सम्मान में वृद्धि होती हैं।

——-दक्षिण मुखी भूखण्ड का द्वार दक्षिा या दक्षिण-पूरब में कतई नहीं बनाना चाहिए। पश्चिम या अन्य किसी दिशा में मुख्य द्वार लाभकारी होता हैं।

——उत्तर-पश्चिम का मुख्यद्वार लाभकारी है और व्यक्ति को सहनशील बनाता हैं।

——मेन गेट को ठीक मध्य (बीच) में नहीं लगाना चाहिए।

——-प्रवेश द्वार को घर के अन्य दरवाजों की अपेक्षा बड़ा रखें।

——प्रवेश द्वार ठोस लकड़ी या धातु से बना होना चाहिए। उसके ऊपर त्रिशूलनुमा छड़ी लगी नहीं होना चाहिए।

——-द्वार पर कोई परछाई व अवरोध अशुभ माने गए हैं।

——–ध्यान रखें, प्रवेश द्वार का निर्माण जल्दबाजी में नहीं करें।

 

इन कुछ बातों का ध्यान प्रवेश द्वार के निर्माण के समय रखते हुए आप सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य आरोग्य एवं दीर्घायु प्राप्त कर सकते हैं।वास्तु शास्त्र के मुताबिक घरों के द्वार की स्थिति के आधार पर सुख-संपत्ति, समृद्धि, स्वास्थ्य का अनुमान अलाया जा सकता हैं। प्राचीन समय में बड़े आवासों, हवेलियों और महलों के निर्माण में इन बातों का विशेष ध्यान रखा जाता था। दिशाओं की स्थिति, चैकोर वर्ग वृत्त आकार निर्माझा और वास्तु के अनुसार दरवाजों का निर्धाश्रण होता था।

——दिशा जिस काम के लिए सिद्ध हो, उसी दिशा में भवन संबंधित कक्ष का निर्माण हो और लाभांश वाली दिशा में द्वार का निर्माण करना उचित रहता हैं। प्लाटों के आकार और दिशा के अनुसार उनके उपयोग में वास्तु शास्त्र में उचित मार्गदर्शन दिया गया हैं।

—–दक्षिण भारत के वास्तुशास्त्र के मुताबिक भवन की दिशा कैसी भी हो, पर यदि वह चैकोर बना हुआ हो और मुख्य भवन के आगे यदि एक कमरा वाहन, मेहमानों के स्वागत और बैठक के मकसद से बनाया जाए तो उसके द्वारों से गृहपति मनोवांछित लाभ प्राप्त कर सकता हैं। इस प्रकार के कक्ष को पूर्व भवन कहा जाता है।

—–भवन में द्वार पूर्व या उत्तर दिशा में बनाया जायें तो संपदा की प्राप्ति सुनिश्चित हैं। तथा बुद्धि की प्राप्ति होती है।

——दक्षिण दिशा वाले द्वार से स्थायी वैभव की प्राप्ति होती हैं।

——पश्चिम दिशा वाले द्वार से धन-धान्य में वृद्धि होती हैं।

ध्यान रखें कि भवन के मुख्य परिसर से लेकर भीतर के भवन के द्वार को परी तरह वास्तुशास्त्र के अनुसार रखें। इसके लिए वास्तु में बताया गया है कि प्लाट के आकार को आठ से विभाजित करें और दोनों ओर 2-2 भाग छोड़कर द्वार को रखने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

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