लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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-आलोक कुमार- wine shop

सुशासन की सरकार और सुशासनी प्रशासन ने बिहार में शराब बेचने की खुली छूट दे रखी हैl सच्चाई तो ये है कि शराब बिक्री के बहुत बड़े हिस्से पर अवैध कारोबारियों का ही कब्ज़ा है, जिनकी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों और अन्य सरकारी बाबुओं से साठ-गांठ हैl जाहिर है इस कमाई में सबका अपना-अपना हिस्सा होता हैl जिस तरह आज बिहार में गाँव-गांव, शहर-शहर, मोहल्ले-मोहल्ले, नुक्कड़-नुक्कड़ शराब मिल रही है या बेची जा रही है, उसने शराब पीने की प्रवृति को निःसंदेह बढ़ावा दिया है l

अगर आंकड़ों की मानें तो बिहार में जितनी सरकारी शराब की खपत है उससे 8 गुना अधिक शराब लोग इस्तेमाल कर रहे हैं l यहां ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि बाकी शराब की आपूर्ति कौन कर रहा है और कैसे कर रहा है ? कुछ साल पहले सरकार के ही एक मंत्री जनाब जमशेद अशरफ ने जब इनके खिलाफ कार्रवाई करने की कोशिश की थी तो उन्हें मंत्री पड़ से हाथ धोना पड़ा था l इस से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि अवैध शराब के कारोबार से जुड़े माफियाओं के हाथ कितने लंबे हैं !! डेढ़-दो वर्ष पहले ही एक बुजुर्ग नेता पूर्व मंत्री हिंद केशरी यादव पर शराब-विरोधी आन्दोलन के कारण मुज्जफ़रपुर समाहरणालय के परिसर में जिस निर्भीकता से शराब माफियाओं ने कातिलाना हमला किया था, वह भी बिहार में शराब माफियाओं के बढ़े हुए मनोबल और रसूख को ही दर्शाता है l

बिहार सरकार को अगर बिहार के लोगों विशेषकर गरीबों की चिंता होती तो हर गांव में शराब की दुकान नहीं खुलवाती| कुछ महीने पहले ही बिहार के मुख्यमंत्री ने मद्य-निषेध दिवस के अवसर पर घोषणा की थी कि शराब-मुक्त गांव को बिहार सरकार द्वारा एक लाख रुपये का इनाम दिया जाएगा, अजीब विरोधाभास है सरकार की कथनी और करनी मेंl अब जरा सुशासनी बिहार में शराब के कारोबार के आंकड़ों पर नजर डालते हैं (जो सुशासनी सरकार के विरोधाभासी चरित्र का स्वत: ही चित्रण कर देंगे) :-

2005-06 :-  319 करोड़ ,

2006-07 :-  384 करोड़ ,

2007-08 :-  536 करोड़ ,

2008-09 :-  749 करोड़ ,

2009-10 :-  1011 करोड़ ,

2010-11 :-  1542 करोड़ ,

2011-12 :-  2015 करोड़,

2012-13 :-  2700 करोड़ ,

2013-14 :-  3200 करोड़ का लक्ष्य

वर्ष 2006-2007 में राज्य में शराब दुकानों की स्वीकृत संख्या 3436 थी, इसे बढ़ाकर वर्ष 2007-08 में 6,184 किया गया l हालांकि संख्या पर कुछ अंकुश लगाने की कोशिश की गई और वर्ष 2012-13 में दुकानों की संख्या 5,300 तक लायी गयी लेकिन फिर भी कारोबार बढ़ता ही गयाl अवैध शराब का कारोबार भी नियंत्रित होने की बजाए संरक्षण की आड़ में बढ़ता ही गया और जहरीली शराब से होने वाली मौतों की अनेकों बड़ी घटनाएं इस शासन काल में सामने आयीं, जबकि अनेक घटनाओं पर शासन-प्रशासन ने पर्दा डालने का काम भी किया जैसे छपरा, सीवान, गोपालगंज के इलाके में हुई मौतें जिन्हें ‘रहस्यमयी बीमारी’ से हुई मौतें बता कर सरकार ने अपनी जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ने की भरपूर कवायद की l मेरे स्मृति-पटल पर गया में जहरील शराब की वजह से हुई मौतों के बाद एक विधवा का प्रलाप “का कहिओ बाबु.! ई दरूईए सब नाशले हो” अभी भी अंकित हैl (क्या कहें बाबु ये शराब ही सारे विनाश का कारण है)

बिहार के समाज में शराब का जो प्रचलन बढ़ा है, वह एक व्यसन की तरह फैला है और इसलिए नहीं फैला है कि अचानक शराब की मांग बढ़ गई थी, बल्कि उसे सर्व-सुलभ बनाकर दैनिक जरूरत की तरह परोसा गया और उसे एक ऐसे धंधे की तरह विकसित किया गया, जिसमें स्थानीय गाँव,मोहल्लों के जनप्रतिनिधि और दबंग तक शामिल हैंl इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि बिहार में शराब लोगों का ‘टेस्ट’ कम, बल्कि सुशासनी तंत्र का ‘ट्रैप’ अधिक है l इस ‘ट्रैप’ में फंसे लोग अपनी स्वाधीनता खोते जाते हैं, स्वास्थ्य और घर-परिवार का नाश करते हैं और एक संगठित गठजोड़ के हितों के पोषण हेतु इनका (लोगों का) उपयोग होता है l

शराब माफ़ियाओं के विरोध में खड़ा होना भी जोखिम मोल लेने की तरह है l सुशासन के पिछले साढ़े आठ सालों के कार्यकाल में जब-जब लोगों को शराब पीने से रोकने के लिए ही कोई अभियान चला है, गली-गली में पसरे शराब के कारोबारियों और उनकी हमसफ़र बनी सुशासन की ‘पीपुल्स फ्रेंडली’ पुलिस का असली चेहरा उजागर हुआ है l विगत वर्षों में शराब माफ़ियाओं के सच को उजागर करने में जुटे पत्रकार बंधुओं पर भी हमले की अनेकों घटनाएं हुई हैंl इस आलेख के प्रकाशन व प्रेषण के बाद देखिए मेरे साथ क्या होता है !

वर्तमान में राज्य के हरेक कोने में शराब माफ़ियाओं की जड़ें बहुत गहरी हैं l राजनीति और लालफ़ीताशाही के सिर्फ इशारे पर नोटों की बरसात ही इस माफ़िया का मूलमंत्र है l सिर्फ शराब ही नहीं ऐसे अनेकों अवैध धंधे हैं जो इन माफ़ियाओं के नियंत्रण में हैं l बिहार में इस सच से हर कोई वाकिफ़ है कि राजनीतिक सांठगांठ और लाल-फीताशाही की मिलीभगत के बिना यह माफ़िया कभी भी पनपता और फलता-फूलता नहीं है l इस गंठजोड़ का सबसे अच्छा नमूना तो पिछले वर्ष  होली के अवसर पर ही सामने ऊभर कर आया था , सम्पूर्ण बिहार में गुरुवार (28-03-2013) के ही दिन मुख्य होली थी लेकिन बिहार में शराब की दुकानें बुधवार (27-03-2013) को बंद थीं l होली के दिन शराब की दुकानों को खुला रखने का “सुशासनी निर्णय” शराब माफ़िया और शासन के गठजोड़ का ही परिणाम था l (ज्ञातव्य है कि 2013 में बिहार में होली दो दिन मनाई गई थी)

बिहार में शराब माफ़िया सत्ता और सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों पर सुदृढ़ और प्रभावी नियंत्रण रखता है l यही माफ़िया चुनावों की राजनीति में अपने-अपने आकाओं के लिए बाहुबल का इंतजाम भी करता है, पैसा भी बहाता है, शराब भी बहाता है और उसके अलावा भी बहुत कुछ जिस से हम-आप सब भली-भांति वाकिफ़ हैं l इसमें कहीं कोई दो राय नहीं है कि आगामी चुनावों में भी शराब लोगों के सिर पे चढ़ कर बोलेगा l

आज बिहार में इस बात की सख़्त ज़रूरत है कि लोग यह पहचान कर सकें कि आख़िर यह माफ़िया कहाँ-कहाँ कब्ज़ा जमाए बैठा है और माफ़िया,राजनीति और लाल-फीताशाही के इस गठजोड़ को कैसे तोड़ा जाए ? बिहार में राजनीतिक और प्रशासनिक शुचिता के लिए इस विषय पर सोचना और सख़्त कदम उठाना निहायत ही ज़रूरी है l बिहार में आज तक यह माफ़िया राजनीति में जो भी कोई कुर्सी तक पहुंचा है या जो विरोध में आवाज उठाने वाला होता है, दोनों को ख़रीदता ही आया हैl चेहरे बदलते रहे हैं, लेकिन शराब माफ़िया मजबूत ही होता रहा हैl

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