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अंजनी कुमार झा

छत्तीसगढ़ में बड़ी-बड़ी कंपनियों के नक्सली संगठनों से रिश्तों के उजागर होने के बाद अब पुनः सरकार और जनता को सलवा जुडूम की प्रासंगिकता याद आ रही है। अवैध ढंग से धन देकर नक्सली बहुल क्षेत्रों में खनन और ऊर्जा कंपनियाँ भोले-भाले आदिवासियों और अन्य वर्गों का शोषण करती हैं। सर्वहारा वर्ग का कथित संरक्षण का दंभ भरने वाले नक्सली इनका दोहरा शोषण करते हैं। ऐश करने का माध्यम बनाकर नक्सली वीरप्पन शैली में खुशहाल जिंदगी जीते हैं। हिंसा का ताण्डव कर पुलिस व प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को वहाँ जाने से रोकते हैं। अकूत वन संपदा का दोहन करने पहुँचे उद्योगपतियों से लाखों रूपये की वसूली के बदले वे उन्हें अवैध तरीके से करोड़ों रूपये का लाभ पहुँचाते हैं। सर्वहारा और पूंजीवाद के विकृत घालमेल से उत्पन्न विद्रूप तस्वीर अत्यंत भयावह है। कमीशनखोरी के कारण सरकार के प्रतिनिधि भी अति प्रसन्न हैं। विकास के नाम पर राशि में वृध्दि ही उनकी संपन्नता को बढ़ाता है। छत्तीसगढ़ सरकार की एस.आई.टी. द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, दंडकारण्य कमेटी की वार्षिक आय पांच करोड़ है, जिसमें तीन करोड़ हर साल खर्च हो जाते हैं। दो करोड़ रूपये प्रतिवर्ष सेंट्रल कमेटी को भेजा जाता है। सलवा जुडूम की वजह से आय का स्त्रोत घटा है। सरकारी उत्सव से लेकर आयोजनों को विफल करने की नक्सली रणनीति अपने साम्राज्य के क्षेत्र को बढ़ाना और निरंकुश शासन व्यवस्था को कायम रखने का है। उद्योगपतियों से अकूत धनराशि देने के एक मामले का भंडाफोड़ से सरकार और जनता सभी चकित हैं। अभी तो एस्सार कम्पनी के जीएम ही गिरत में आया है। बस्तर में एनजीओ जय जोहार सेवा संस्थान के दतर से कई आपत्तिजनक दस्तावेज बरामद किये गये। इसका अध्यक्ष कांग्रेस नेता पवन दुबे फरार है। जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि एस्सार कम्पनी ने जान-बूझकर ठेकेदारों को अतिरिक्त भुगतान किया, जो नक्सलियों को देने के लिये थी। इसकी सीबीआई जांच की मांग उठने के साथ सियासी राजनीति गर्मा गई है। स्टील क्षेत्र में बड़े निवेश कर रही विवादास्पद कंपनी एस्सार की 267 किलोमीटर लंबी मेटल पाइपलाइन दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) से आरंभ होकर मलकानगिरि (उड़ीसा) से गुजरते हुए विशाखापत्तनम (आंध्रप्रदेश) में समाप्त होती है। एनएमडीसी के साथ अनुबंध के बाद एस्सार ने पाइपलाइन बिछाई जिससे प्रतिटन 550 रूपये की जगह अब उसे 80 रूपये व्यय करने पड़ते हैं। इस कार्य को पूरा करने में बाधक न बनने के लिये नक्सलियों को करोड़ों रूपये दिये गये। वर्ष 2005 और 2009 के बीच 15 बार नक्सलियों ने पाइपलाइन को ध्वस्त किया। उग्रवादियों ने चित्राकोंडा (मलकानगरी) में मई, 2009 में संयंत्र पर भीषण बमबारी की। पाइपलाइन को बन्द रखने से कंपनी को 1800 करोड़ की क्षति हुई। नक्सलियों के ताण्डव को रोकने में विफल सरकार से एस्सार की गुहार बेकार जाती रही तभी तो करोड़ों की थैली पहुँचाने का काम फिर शुरू हो गई। इन क्षेत्रों में धंधा करने के लिये यह आवश्यक हो गया है।

पूर्व गृह सचिव जी.के. पिल्लई ने स्वीकार किया कि अनेक उद्योगपतियों से ‘शांति’ के एवज में वाम उग्रवादी धन वसूलते हैं। कंपनियों की सुरक्षा के लिये राज्य औद्योगिक सुरक्षा बलों के गठन की बात शुरू हुई और यह भी कहा गया कि इसका वहन उद्योग करेंगे। इसके बावजूद सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। उल्लेखनीय है कि 60 के अंतिम दशक में एनएमडीसी ने बेलाडिला (दंतेवाड़ा) में बड़े पैमाने पर खनन कार्य शुरू किया। सुरक्षा के लिये सी.आई.एस.एफ. की तैनाती हुई। इसके बावजूद वर्ष 2006 में नक्सली 20 टन विस्फोटक पदार्थ उठा ले गए।

अकूत धन-संपदा के बावजूद दंतेवाड़ा में प्रति व्यक्ति आय काफी कम है। यू.एन.डी.पी. रिपोर्ट में इस जिले की दयनीय स्थिति दर्शायी गई है। गत वर्ष एन.एम.डी.सी. को 2600 करोड़ की आय हुई, किन्तु उसने जिले के विभिन्न विकास परियोजनाओं में सात करोड़ 26 लाख रूपये ही खर्च किये। दंतेवाड़ा के जिलाधिकारी ओ.पी. चौधरी ने इसे चिंताजनक बताया। डेढ़ सौ ग्रामों में न बिजली है और न सड़कें। गत वर्ष सौ व्यक्तियों की डायरिया से मौत हो गई थी। उसी प्रकार चित्राकोण्डा में एस्सार ने ट्यूबवेल लगाने का वायदा किया, किन्तु उड़ीसा सरकार ने ही इसे पूरा किया।

वन क्षेत्र छत्तीसगढ़-44 प्रतिशत,  झारखण्ड-30 प्रतिशत, उड़ीसा-37 प्रतिशत,खनन क्षेत्र 17प्रतिशत, (देश के कुल कोयले का) 40 प्रतिशत,(देश के कुल खनिज सम्पदा का) 70प्रतिशत, (देश के कुल बॉक्साइट का) हिंसा का तांडव शहीद जवान वर्ष 2007-124 वर्ष 2008-64 वर्ष 2009-101 वर्ष 2010-153 वर्ष 2011-37 मारे गये नक्सली 67 66 113 79 28 ( जून तक )

उधर नक्सलियों की जनजातियों के अतिरिक्त, पुलिस, न्याय व्यवस्था, जनप्रतिनिधियों और मीडिया में अच्छी पकड़ बन गई है। जब कभी पुलिस मुखबिर, दलाल आदि को गिरफ्तार करती है तो नक्सलियों के पे-रोल पर काम करने वाले सिविल सोसायटी, एनजीओ के सदस्य मानवाधिकार हनन की गुहार लगाकर अदालत को गुमराह करने में सफल हो जाते हैं। इसी वर्ष 9 सितम्बर को एस.पी.ओ. लिंगाराम जब एस्सार और नक्सलियों के बीच बिचौलिये की भूमिका में धरा गया तो कई राज खुले। इस सत्य को स्वीकारने के बजाय नक्सली अपने कथित मानवाधिकार हनन के नेटवर्क के जरिये स्वामी अग्निवेश और प्रशांत भूषण से प्रेस कान्फ्रेंस कराकर प्रशासन को दागी बनाने का कुचक्र किया। हिमांशु ने बयान दिया कि लिंगाराम ने नोयडा स्थित इंटरनेशनल मीडिया इंस्टीट्यूट ऑफ इण्डिया में पढ़ाई की और उसकी संलिप्तता नहीं है। विगत एक दशक से छत्तीसगढ़ में रह रहा हिमांशु वनवासी चेतना आश्रम के बैनर तले नक्सलियों की मदद करता है। उसकी पैदल यात्रा का वनवासियों ने काफी विरोध भी किया था। पुलिस के मुताबिक, ऐसे कई लोग नक्सलियों के पे-रोल पर काम करते हैं। पी.यू.सी.एल. लंबे अर्से से मानवाधिकार की रक्षा के नाम पर वाम उग्रवादियों की मदद करता है। इसके महासचिव कविता श्रीवास्तव के निवास पर छापेमारी में कई आपत्तिजनक साहित्य, सामग्रियाँ बरामद की गई। इस गंदे ‘खेल’ को जारी रखने में राइट टू फूड कैम्पेन के अरूण राय, जियन ड्रेजे, विनायक सेन, कोलिन गोनसालवेस ने तो संयुक्त बयान में अच्छा बताया। कविता को निर्दोष ठहराया। दंतेवाड़ा के एस.पी. अंकित गर्ग ने बताया कि दुर्दांत महिला उग्रवादी सोनी सोरी के कविता के घर छिपने के पर्याप्त सबूत हैं। पुलिस ने लिंगा और सोनी से कई सच उगलवाये। दंतेवाड़ा जिले में नक्सवादियों और सीआरपीएफ दोनों के ठिकाने हैं जहाँ हत्या व प्रतिहत्या संक्रामक रोग की तरह फैली है। यहाँ यदि कोई उग्रवादी के पक्ष में है तो हत्या और पुलिस के पक्ष में तो भी हत्या। केन्द्रीय गृहमंत्री चिदंबरम ने कहा कि नक्सल हमलों में आतंकी हमलों की अपेक्षा अधिक लोगों की जान जा रही है, लेकिन जिन लोगों की जान इसमें नहीं जा रही है उनका जीवन देश में चल रहे धीमी तीव्रता के युध्द की विभीषिका की जीती-जागती तस्वीर बन चुका है। इन इलाकों में न्याय, विश्वास, स्वतंत्रता, नैतिकता, सबूत, सही और गलत की साधारण समझदारी जैसी चीजें भी धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं। सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच ग्रामीण और आदिवासी फंसे हुए हैं। इन इलाकों के 90 फीसदी आदिवासी माओवादियों के संपर्क में हैं। वे उन्हें राशन देते हैं और उनकी बैठकों में जाते हैं। वे मजबूरन ऐसा करते हैं, अन्यथा वे इन इलाकों में जिंदा ही नहीं बचेंगे।

हकीकत में माओवादी आदिवासियों की रक्षा के बजाय अपनी रक्षा के लिये कवच के रूप में उनका इस्तेमाल करते हैं और कॉरपोरेट घरानों का एजेंट बनकर वे रह गये हैं।

* लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभ लेखक हैं। 

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