लेखक परिचय

पंकज चतुर्वेदी

पंकज चतुर्वेदी

लेखक एन.डी. सेंटर फार सोशल डेवलपमेंट एंड रिसर्च के अध्यक्ष हैं।

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पंकज चतुर्वेदी

हम शीर्ष पर है, तो इस पर हमें गर्व होना चाहिये लेकिन यदि क्षेत्र और विषय का पता चले तो हमारा सर शर्म से झुक जाता है। हमारा लज्जित होना स्वाभाविक है, क्योंकि हम भ्रष्टाचार के मामले में शीर्ष पर है। यह आंकलन भ्रष्टाचार के खिलाफ दुनिया भर में अलख जागने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल का है। ताजा सर्वे में हमारी भ्रष्टता के चर्चे आम है। भारत के समकक्ष इस सूची में अफगानिस्तान, नाइजीरिया और ईराक जैसे देश खड़े है। इन देशों के इतिहास और संस्कृति को देखे तो और शर्म आती है, की इतने वैभवशाली अतीत और नैतिक मूल्यों वाला भारत देश किस स्तर पर आ गया है जहाँ हमारे साथ ऐसे छोटे –छोटे देश है,वह भी भ्रष्टाचार जैसे मामले में।

हमें यह सम्मान दिलाने में सबसे ज्यादा अहम भूमिका हमारी पुलिस की है, देशभक्ति और जनसेवा का नारा लगाने वाली भारतीय पुलिस जनसेवा के स्थान पर आत्म सेवा में जुटी है। इनके साथ नगरनिगम से लेकर अस्पताल, राशन, तहसील और नजूल, स्कूल –कालेज, मक़न–दुकान हर जगह रिश्वत।

यह स्तिथि पूरे देश में है और इसमें सभी वे राजनितिक दल और उनकी सरकारें शामिल है, जो वर्तमान में देश की जनता के सामने दूसरे दल को भ्रष्ट और खुद को पाक-साफ बता रहें है। ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार अब एक राष्ट्रीय–रस्म गया है, जिसकी अदायगी के बिना कोई भी काम पूर्ण नहीं होता। तीव्र गति से बढ़ाते इस भ्रष्टाचार के दानव के कद में दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की हो रही है। राज नेताओं, नौकरशाहों, व्यापारियों के साथ कर्मचारियों का एक ऐसा गिरोह इस देश में बन गया है जो बिना किसी संवाद और प्रशिक्षण के सिर्फ एक ही भाषा समझता है और वो है भ्रष्टाचार। इस भ्रष्टाचार में धर्म, जात-पात, अगडे-पिछड़े जैसी कथित सामजिक बाधायें भी अड़े नहीं आती, यह सब एक है।

भ्रष्टाचार के इस आंकलन को देश का वर्तमन घटनाक्रम भी सही साबित कर रहा है। कॉमनवेल्थ,टू जी स्पेक्ट्रम, आदर्श सोसयटी, लवासा पूना जैसे मामले इस बात की पुष्टि करते है, कि हमने नैतिकता को गिरवी रख अब सिर्फ और सिर्फ धन को ही प्राथमिकता और उद्देश्य बना लिया है।

भ्रष्ट आचरण को बढ़ावा और संबल देने का पूर्ण जिम्मा सरकारों का ही है, और इसमें राज्यों की सरकारे सिर्फ केंद्र पर दोष देकर अपना दमन नहीं छुडा सकती। भ्रष्टाचार का सांप घटिया किस्म के नेताओं और आधिकारियों के आस्तीन में पल रहा है, लेकिन वह सांप इनको डसने के बजाय देश को ही खा रहा है। इस कथित लोकतंत्र में किसी को भी यह की फुर्सत नहीं है कि क्यों और कैसे देश में नेताओं और अफसरों की संपत्तियां बेहिसाब बढ़ रही है। कैसे देश में करोड़ों लोगो को छोड़ लक्ष्मी जी इन्ही चंद लोगो पर अपनी कृपा सतत बरसा रही है। यह लोक तंत्र की विडंबना ही है की मधु कोड़ा जैसा व्यक्ति भी देश के एक हिस्से के लोगो का भाग्य-विधाता बन जाता है।

वर्तमान परिदृश्य में भारत सहित दुनिया भर में सभी जगह भ्रष्टाचार ऐसा मुद्दा बना हुआ है जिस पर सर्वाधिक चर्चा हो रही है। गरीबी, भूख, बेरोजगारी जिसे बुनियादी मुद्दे पीछे है। अब तो यह एक गंभीर वैश्विक बीमारी बन चुकी है, जिसका इलाज किसी भी विज्ञानं में नहीं है।

अपने देश में यह महामरी विगत दो या तीन दशकों में ज्यादा फ़ैली है। अब हमारा उद्देश्य सिर्फ यह है की कैसे भी हो बस हमारा कम बन जाये। नैतिकता, ईमानदारी जैसे बातें अब सिर्फ किस्सों और किताबों के लिए ही शेष है। नौकरी पाने के लिए रिश्वत, फिर नौकरी बचाने और बढ़िया पोस्टिंग के लिए रिश्वत। आज जितने नेता भ्रष्टाचार को लेकर देश भर में चीख रहें है यदि वो अपने गिरेबान में झांके तो, चुनाव के टिकट के लिए पैसा, चुनाव लड़ने के लिए पैसा और फिर मलाईदार कुर्सी के पैसा और फिर इन सब खर्चों को पूरा करने के लिए भ्रष्टाचार। जनता बेचारी लाचार।

भौतिक सुख सुविधा की लालसा और प्रतिद्वंदिता के इस युग में ईमानदार और चरित्रवान व्यक्ति को आज मूर्ख समझा जाता है। अब इमानदार वो है जी रिश्वत लेकर आपका कम कर दे और बेईमान वो जो रिश्वत लेकर भी आपका कम ना करे।

आधिकारियों और राज-नेताओं के साथ भ्रष्टाचार को उजागर करने वाला मीडिया भी इस गंदगी में मैला होता जा रहा है। टू जी स्पेक्ट्रम मामले देश के कुछ बड़े और नामी पत्रकारों की भूमिका भी प्रथम दृष्टया सन्दिग्ध लगी है। चुनावो के दौरान पैसे देकर खबर के पैकेज अब आम है, जिसे वर्तमान व्यवस्था का अंग मान लिया गया है। पत्रकरिता मिशन से प्रोफेशन में कब बदल गयी पता ही नहीं चला, लेकिन अब पत्रकरिता भी व्यवसाय हो गया है जिसे सब स्वीकार कर चुके है। इस लिए अब इस लोकतंत्र में गरीब आदमी तो नेता नहीं बन सकता। हां नेताओं और अफसरों का शिकार जरुर यही गरीब आदमी है, जिसके कोटे का पैसा,आनाज और वो सब कुछ जो भी सरकार से मिलता है उस ये सब मिलकर खा जाते है। फिर उसी गरीब और आम आदमी को बहलाने के लिए भरष्टाचार से लड़ने और मिटाने के झूटे और खोखले वादे करते रहतें है। आज देश में लोग भारत की बैंको के नाम नहीं जानते पर स्विस बैंक का नाम और काम सब जानते है।

अब तो देश में नेताओं –अफसरों के साथ ही न्याय –पालिका से जुड़े लोगो की संपत्तियां सार्वजनिक होने लगी है, लेकिन इतने से ही काम नहीं बनेगा। जिसकी संपत्ति जरुरत से ज्यादा बढ़ी हो उस पर कठोर कार्यवाही से कुछ सबक मिलेगा और तभी भ्रष्टाचार का यह दानव शांत होगा।

देश की क़ानून कि कमजोरियां भी इन भ्रष्टाचारियों का काम आसान किये हुए है। आयकर के छपे के बाद आप कर और जुर्माना देकर छुट सकते है, ना कोई बड़ी सजा न दंड। यही कमजोरी भ्रष्टों की ढाल बनी हुई है। इस ढाल को हटकर ही भ्रष्टाचार के भाल पर चोट की जा सकती है। और जब तक चोट नहीं होगी तो कुछ भी बदलाव संभव नहीं।

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3 Comments on "बढ़ता भ्रष्टाचार–कौन जिम्मेदार?"

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sunil patel
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चतुर्वेदी जी ने बहुत अच्छा लेख लिखा है. भ्रष्टाचार तो केवल दो तरीके से रुक सता है. १. शासन तंत्र बदल जय, २. हम खुद बदल जय.
सासन, संविधान तो बदल नहीं सकता. हम खुद ही बदल सके है. व्यक्तिगत तौर पर कसम खा ले की भ्रष्टाचार न करेंगे, न करने देंगे. अगर हो रहा हो तो भी अपनी आँख, कान, मुह – तीन बंदरो की तरह बंद नहीं करेंगे. अपना नैतिक कर्त्तव्य करेंगे.
हर भ्रष्टाचारी का सामाजिक बहिस्कार करेंगे. उससे डोरी बनेयेंगे, उसके सुख में सम्मिलित नहीं होंगे, अपने सुख दुःख में शामिल नहिकरेंगे चाहे वोह हमारे कितना भी करीबी हो.

आर. सिंह
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मैंने यह लेख नहीं पढ़ा फिर भी मैं टिपण्णी कर रहा हूँ.मेरा अनुरोध केवल यही है की इस तरह के लेख लिखने और उसके बारे में परिचर्चा करने से अच्छा है की हम अपने स्तर पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध काम करना शुरू करे.पहले तो हम यह प्रतिज्ञा करे की हम न घूस देंगे और न घूस लेंगे.अपना काम करवाने के लिए नियम के विरुद्ध कुछ भी नहीं करेंगे,चाहे काम हो या न हो.इसी तरह की अन्य बातें भी हैं.सबसे पहला सबक यह है की हम ईमानदार रहेंगे सारी दुनिया भले ही बेईमान हो जाये.क्या हम ऐसा व्यक्तिगत रूप में कर… Read more »
प्रेम सिल्ही
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प्रेम सिल्ही
गंगा गए तो गंगादास, जमुना गए तो जमुनादास कहावत और ऎसी कई और कहावतें हमारे व्यक्तित्व और चरित्र को परिभाषित करते हुए हमें उस हमाम में धकेल देती हैं जहां हम सभी नंगे हैं| उलझन में आँखें नहीं मिलाते और दृष्टि को किसी और पर टिकाये बस अपनी धुन (पैसा कमाने) में मस्त रहते हैं| उदाहरणार्थ, अवैध तरीके से बैंक में नौकरी पाने के लोभ में एक युवक अपने बहुत-पहुँच वाले मामाजी के पास जाता है| मामाजी अयोग्य भांजे को बिचोले के सपुर्द कर उसकी मनोकामना पूर्ण करवा देते हैं| तत्पश्चात मामाजी और बिचोला भांजे से वसूले “पारिश्रमिक” को बराबर… Read more »
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