लेखक परिचय

निधि चौधरी

निधि चौधरी

तीन विषयों (अंग्रेजी साहित्य 2005, लोक प्रशासन 2007 एवं ग्रामीण विकास 2012) में स्नातकोत्तर की उपाधि । वर्तमान में लोक प्रशासन में पी.एच.डी. कर रही हैं । इसके अलावा यूजीसी-नेट, JAIIB (2008), CAIIB (2009) तथा BJMC (2003) की डिग्री भी रखती हैं ।। रचनाओं का प्रकाशन राष्ट्रीय स्तर के कई अखबार, पत्र-पत्रिकाओं जैसे द इंडियन बैंकर, बैंक क्वेस्ट, द इंडियन इकॉनोमिक जर्नल, द आइमा ई-जर्नल, बैंकिंग चिंतन अनुचिंतन, सीएबी कॉलिंग, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दैनिक नवज्योति, मेरी सहेली, गृहलक्ष्मी, गृहशोभा इत्यादि में हो चुका है ।

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womenनिधि चौधरी

एयरपोर्ट पर उतरते ही देश की जानी-पहचानी बयार ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया । सौंधी-सौंधी पुरवाई मेरी रगों में बहने लगी । इसी एयरपोर्ट से दुल्हन के वेश में रवानगी हुई थी मेरी, सुन्दर सपनों के दहेज के साथ । अब जब लौटी हूँ तो मांग का सिंदूर, हाथों की चूड़ियां, गले का मंगलसूत्र जैसे उन्ही सपनों की कब्रगाह बन गया है । कितने रंग नहीं भरे थे अपनी नई ज़िन्दगी को लेकर मगर सारे रंग परदेस की आबोहवा में काफूर हो गए थे, मगर न चाहते हुए भी यादों का माजी बारम्बार एक चलचित्र की तरह मेरी आंखों में उभर रहा था ।

होशियारपुर जिले के गढ़शंकर नाम के छोटे से कस्बे में एक सीधे-सादे पंजाबी परिवार में रहती थी मैं नवजोत कौर – सात बहनों में सबसे बड़ी । बेटे की चाह में परिवार का आकार बढ़ता गया और सातवीं बार प्रसव-पीड़ा सहते हुए मां ने अंतिम सांस ले ली । आठ लोगों का परिवार और आजीविका का एकमात्र साधन पिताजी की हेड-क्लर्क की नौकरी । सो एक बहुत सरल सी ज़िन्दगी हम बहनों के नसीब में लिखी थी ।

मैं बी.ए. अंतिम वर्ष में थी जब रिश्ते नातेदारों, पड़ोसियों इत्यादि द्वारा मेरे विवाह को लेकर अनगिनत चिन्ताएं और सुझाव आने लगे थे । कुछ लड़कों के परिवार मुझे देखने भी आए थे । अपने सबसे सुन्दर सलवार कमीज में नुमाइश की तरह मेरी बुआ ने मुझे लड़के वालों के सामने पेश भी किया । मगर उनके द्वारा की गई दहेज की मांगों के आगे एक के बाद एक लड़के वाले रिश्ते ठुकराकर जाने लगे । इन सबसे मुझमें आत्मग्लानि भी बढ़ने लगी और सोचने लगती कि मेरे पीछे मेरी बाकी छः बहनों के विवाह का खर्च पिताजी कैसे उठा पाएँगे । बहुत बार आत्म-हत्या करने का मन करता । मन यह भी कहता कि ऐसे निर्मम समाज में बेटी पैदा करने से तो अच्छा है उसे गर्भ में ही खत्म कर देना । मगर शायद जीवन में शक्ति मृत्यु से कहीं बढ़कर है । और हर दिन मैं फिर जी उठती एक आस के साथ कि आने वाला कल शायद अच्छा हो ।

और एक दिन ऐसा आया जब मेरी यह आस पूरी हुई । आकाशदीप, हाँ वही बनकर आया था आशा का दीपक । वो और उसका परिवार कनाडा के वैंकुवर शहर में रहते थे और वहीं रहने वाले हमारे पड़ोसी के बेटी-दामाद ने उन्हें हमारे बारे में बताया था । उसके परिवार की दहेज के लिए कोई मांग नहीं थी बल्कि शादी का सारा खर्च भी वही उठाना चाहते थे । उन्हें चाहिए थी तो सिर्फ एक संस्कारी हिन्दुस्तानी बहू । मैं तो जैसे हकीकत भूल सपनों में ही जीने लगी थी । अपने विवाह की मैंने जैसी कल्पना भी न की थी उससे भी खूबसूरत था सब कुछ । विवाह के कुछ ही दिनों बाद हम वैंकुवर के लिए रवाना हुए । दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट को देखकर मेरी तो आंखें ही चौंधिया गई । मुझे विदा करने आए पिताजी और मेरी बहनें भी एयरपोर्ट की साज-सज्जा को देखकर विस्मित थे और एकबारगी सब भूल गए कि आज मेरी विदाई है वो भी परदेस के लिए । मगर कुछ ही देर में विस्मय टूट गया और नैनों की सरिता अनवरत बहने लगी – बिछोह और आने वाले भावी के लिए उल्लास से भरी ।

अमूमन 15 घंटों की उस यात्रा ने मुझे अपने देश से पिया के देश पहुंचा दिया । वो पँद्रह घंटे मन में अनगिनत सवालों के ज्वारभाटे उठते रहे जो घर पहुंचकर ही शांत हुए । आकाशदीप का घर इतना बड़ा था कि मेरे मायके जैसे बीस घर उसमें समा जाए मगर हम बहनों की बक-बक से गुंजायमान घर से सर्वथा विपरीत था यह घर – शांत, निश्चल, स्थिर । कनाडा भी भारत से बिल्कुल अलग था – ऊँची-ऊँची इमारतें, साफ सुथरी चौड़ी सड़कें, बर्फीला ठंडा मौसम, सब कुछ सुन्दर था मगर अपना देश अपना ही होता है – अपनी मिट्टी का कीचड़ भी परदेस के सरोवरों से ज्यादा सरस लगता है ।

मगर धीरे-धीरे मैंने इस अपने पति के देश को ही अपना देश मान लिया और पूरी तरह रम गई अपनी नई दुनिया में । यूँ तो मैंने बीए किया था मगर अंग्रेजी में बात करना मैंने वैंकुवर में ही सीखा । आकाशदीप से पूछकर मैंने कम्प्यूटर क्लासेस लेनी शुरु कर दी । हर दिन मेरे लिए एक पाठशाला की तरह था जहां मैं नए देश की जीवन शैली के ढ़ंग सीख रही थी मगर अपनी भारतीयता की जड़ों को पुख्ता रखते हुए ।

आकाशदीप के रूप में मुझे ऐसा जीवनसाथी मिला था जिसे मेरे नित नया सीखने की प्रवृति पर कोई आपत्ति नहीं थी । वो अक्सर ऑफिस के काम में व्यस्त रहते या टूर पर रहते और मैं उनके इंतजार में समय किताबें पढ़कर या कुछ सीखकर बिताती । जब मेरे द्वारा बनाए गए किसी नए व्यंजन पर वो तारीफ करते तो दिल खुशी से फूला न समाता ।

सिर्फ मेरे पति आकाशदीप के लिए थी मगर उस दिन सुहाग के वो रंग भी मेरे आंसुओं से धुल गए जब एलिना अपने दो बच्चों डेनिस और केरल के साथ मेरे घर आ पहुँची । वो स्वयं को आकाशदीप की पत्नी और डेनिस और केरल को उसकी संतान बता रही थी । इस तरह के लांछन सुनकर मुझसे रहा न गया और मेरे गुस्से का सारा कहर एलिना पर टूट पड़ा । क्या-क्या न कहा मैंने उससे मगर मेरे सास-ससुर और आकाशदीप चुपचाप चट्टान की तरह निष्ठुर खड़े थे । सहसा यह अहसास कर मैंने उनसे कहा कि इसे घर से बाहर निकाल फेंके । मगर मेरे सास-ससुर की नज़रें शर्म से झुकी थी और आकाशदीप तो जैसे अपने वज़ूद पर ही शर्मिंदा हो ।

इतना बड़ा धोखा, इतनी बड़ी साजिश । मेरे रोम-रोम से उनके लिए बददुआएं निकल रही थी । चीखों और चीत्कारों से मेरा घर गूँज उठा । वो अथाह खामोशी जो इस घर में मैं पहले दिन से महसूस कर रही थी, इतने भयावह तूफान की सूचक थी । क्यों नहीं मैं समझ सकी आकाशदीप के कई-कई दिनों तक टूर पर रहने का कारण ? क्यों नहीं समझ आई मुझे बिना दहेज शादी करने के पीछे छिपी योजना ? जिस इंसान के लिए मैंने अपना हर भाव, हर सपना, हर चाहत लिख दी थी, उस पति को परमेश्वर मान लेने वाले भारतीय संस्कार से नफरत हो रही थी मुझे । एलिना जैसे मेरे नारीत्व को गाली दे रही थी और वो मासूम बच्चे मेरे माँ बनने की ख्वाहिशों पर क्रूर कुठाराघात कर रहे थे । आखिर क्या आन पड़ी थी आकाशदीप को मुझसे शादी करने की । क्यों मेरे अस्तित्व को वृथा करने के लिए उसने ये घिनौना खेल खेला । जब अंततः मेरा रूदन शांत हुआ तो आकाशदीप और एलिना मुझे समझाने की कोशिश करने लगे मगर मेरे पास सुनने को शेष क्या था- जीवन भर की आहें, सुबकियां, आंसु, विषाद और परदेस की यह घुटन मेरे नसीब में लिख दी गई थी । एलिना गेस्ट रूम में अपने बच्चों के साथ थी जबकि आकाशदीप अब भी मेरे साथ थे मेरी आहों को सुनने के लिए । रोते-रोते कब आँख लगी, पता ही नहीं लगा और जब खुली तो खुद को अस्पताल में पाया । आकाशदीप, उसके माता-पिता, एलिना और उसके बच्चे जैसे बेसब्री से मेरे होश में आने का इंतजार कर रहे थे । उनका हाल कह रहा था कि पिछले कुछ दिन उनके लिए कठिन थे । बाद में डॉक्टर ने बताया कि मुझे ट्रॉमेटिक डिसऑर्डर के चलते अस्पताल में भर्ती किया गया था और कई दिनों से मैं अपने असली वजूद से परे व्यवहार कर रही थी । दोनों की आंसुओं से लबालब आंखें क्षमायाचना कर रही थी । एक साल की केरल और पांच साल का डेनिस मेरे पास आकर बोले “मॉम, वी आर सॉरी वी विल नेवर कम टू मीट डैडी, यू गेट वैल सून ।” बच्चों के मूंह से मां सुनकर जैसे अतृप्त ममत्व की तृष्णा शांत हो गई । मैंने बच्चों को गले से लगा लिया ।

आज जब मैं फिर होशो-हवाश में थी तो मैंने एलिना और आकाशदीप को बोलने का मौका दिया । एलिना की यह दूसरी शादी थी और उसका एक बेटा डेनिस भी था । इसी वजह से आकाशदीप अपने माता-पिता को एलिना के बारे में बता नहीं पा रहा था और जब उसने बताया तो माता-पिता ने बेटे की पसंद विधवा एलिना जो कि एक चार साल के बच्चे की मां भी थी, को अपनी पसंद बनाने की बजाय जल्दबाजी में बेटे के लिए एक हिन्दुस्तानी दुल्हन की व्यवस्था कर डाली । मगर वह एलिना को भी धोखा नहीं देना चाहता था इसीलिए उसने और एलिना ने कोर्ट में शादी कर ली और टोरंटो में रहने लगा । उसने अपने माता-पिता को यह बात भी बता दी मगर माता-पिता द्वारा एलिना को घर की बहू बनाने पर आत्म-हत्या कर लेने की धमकी देने पर वह विवश हो गया और मज़बूरन दूसरे विवाह के लिए तैयार हो गया । मेरी सास को पूरा यकीन था कि आकाशदीप जल्द ही फिरंगी एलिना को भूलकर अपने नए घर-संसार में खुश हो जाएगा और यदि एलिना आई भी तो मैं उसे कभी अपना हक नहीं छीनने दूँगी । आकाशदीप के माता-पिता की आंखों में अब भी वही विश्वास था ।

आकाशदीप और एलिना भी तो उसी समाज के दिखावे, झूठ, रीति-रिवाज की सजा भुगत रहे थे जिसकी सजा बचपन से मैंने भी भुगती थी । यदि यह समाज ऐसा न होता तो क्यों मेरी मां सात बेटियों को जन्म देते-देते दम तोड़ती, क्यों दहेज के फेर में मेरे पिताजी की कमर टूटती, क्यों अपनी बेटी ब्याहते समय आकाशदीप की पृष्ठभूमि जानने का प्रयास नहीं होता ? मैंने गरीब की बेटी होने की सजा भुगती है तो एलिना को विधवा मां होने की सजा देना चाहता है यह समाज । मैंने आकाशदीप और एलिना को माफ कर दिया बल्कि उन्हें वो ज़िन्दगी दे दी जो उन दोनों का हक थी । आकाशदीप को तलाक देने का तो सवाल था ही नहीं क्योंकि पंजाब में शादी के तुरंत बाद हम कनाडा आ गए थे और बिना रजिस्ट्रेशन की शादी में तलाक का प्रश्न ही नहीं उठता । इस विवाह की कानूनी तौर पर कोई मान्यता ही नहीं थी । मैंने भारत आने का फैसला कर लिया । आकाशदीप और एलिना ने मुझे रोकने की बहुत कोशिश की मगर मुझे अब अपना देश बुला रहा था । वो जानते थे मेरी पारिवारिक स्थिति के बारे में इसीलिए या शायद अब तक जो मैं बतौर पत्नी वहां रही थी उसकी एवज में या सिर्फ मेरी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए उन दोनों ने मुझे एक बड़ी रकम थमाई मगर उन्हें डेनिस और केरल को आशीर्वाद स्वरूप देकर मैं भारत लौट आई ।

जिस रंग में मैंने देश छोड़ा था वो तो परदेस ने बदरंग कर दिए थे मगर परदेस के उन दिनों में मैंने इतना कुछ जरूर सीख लिया था कि अपने पावों पर खड़ी हो पाती और अपनी बहनों को भी आत्मनिर्भर बनने के लिए तैयार कर पाती । मुझे मालूम है कि एक परित्यक्ता का जीवन भारतीय समाज में कितनी कठिनाईयों भरा है और कितना मुश्किल है इस समाज में एक औरत का अपने बलबूते पर जीना । मगर यह संघर्ष ही अब मेरी ज़िन्दगी है । परदेस ने इस देश की एक घुटी, सिमटी, बेबस, लाचार नवजोत में आत्मविश्वास की नई ज्योति जो जला दी थी ।

 

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3 Comments on "“देश-परदेश”"

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Prabhas Upadhyay
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” अपनी मिट्टी का कीचड़ भी परदेस के सरोवरों से ज्यादा सरस लगता है ।”

निधि जी मैं आपके इस कथन से सहमत हूँ ।
आपने जिस तरीके से एक युवती के मनोभावनाओं को प्रदर्शित किया हैं , बहुत सराहनीय हैं।

निधि चौधरी
Guest

thank you Satyarthi Ji for appreciating the story…

SATYARTHI
Guest

लेखिका की येह कहानी हिन्दु सिख समाज की विक्रितिओन को उजागर करती है पुत्रप्रप्ति की उत्कत कामना,दहेज प्रथा तथा अनिवासि भारतियोन की विवाह सम्बन्धि समस्यओन का मार्मिक चित्रन किय गय है. लेखिका को शुभ्कामनायेन

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