लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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प्रवीण दुबे

दो दिन पूर्व दिल्ली नगर निगम उपचुनाव के परिणाम सामने आए थे यहां कांग्रेस को मिली चार सीटों पर एक बड़े कांग्रेस नेता ने इसका श्रेय कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी को दिया था। वे यहां तक कह गए थे कि हमने नरेन्द्र मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत की हवा निकाल दी है। अभी ४८ घंटे ही बीते थे कि चार राज्यों और केन्द्र शासित पुड्डुचेरी के नतीजे हमारे सामने हैं।

असम में १५ साल पुरानी कांग्रेस सरकार ढह गई है केरल में सत्तासीन कांग्रेस गठबंधन सरकार धराशायी हो गई है, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस को निराशा ही हाथ लगी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जो नेता दिल्ली नगर निगम जैसे टटपुंजिए चुनाव में कांग्रेस को चार सीटें मिलने का श्रेय जिन राहुल गांधी को दे रहे थे तथा वे नेता आज आए चुनाव परिणामों में कांग्रेस को मिली शर्मनाक हार का श्रेय अपने कथित राजकुमार (राहुल) को देने का साहस दिखाएंगे? दूसरा सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या वास्तव में कांग्रेस नरेन्द्र मोदी की कांग्रेस मुक्त भारत की परिकल्पना की हवा निकाल पाई? जैसा कि दो दिन पूर्व उसके बड़बोले नेता कहते दिख रहे थे।

आज जिस समय टीवी पर चुनाव परिणाम आ रहे थे और इसको लेकर बहस चल रही थी तब देश के वरिष्ठ पत्रकार आर जगन्नाथ कहते दिखाई दे रहे थे कांग्रेस मुक्त भारत की बात करने वाली भाजपा ने अपने लक्ष्य का आधा रास्ता पूरा कर लिया है । निश्चित ही आर जगन्नाथ की यह बात कांग्रेस के उन नेताओं को सटीक जवाब कहा जा सकता है जो दिल्ली की चार सीटों पर कांग्रेस मुक्त भारत की बात का मखौल बनाते दिख रहे थे।

आज आए चुनावी आंकड़ों में कांग्रेस नेताओं को चार राज्यों में मिली करारी हार से ज्यादा इस दृष्टि से देखने की आवश्यकता है कि आज उसकी सरकार वाले राज्यों की संख्या का आंकड़ा मात्र छह रह गया है जबकि भाजपा की अपने दम पर नौ राज्यों में सरकारें हैं। यहां इस बात पर गौर करना जरूरी होगा कि भाजपा जहां केन्द्र में भी सरकार चला रही है वहीं कांग्रेस की जो सरकारें बची हैं वो राज्य भी राजनीतिक दृष्टि से बड़े नहीं हैं। अब इसे कांग्रेस मुक्त भारत की शुरुआत नहीं माना जाए तो और क्या कहा जाए?

आज आ रहे चुनाव परिणामों के बाद हमारे देश के बहुत सारे राजनीतिक विश्लेषकों ने तो देश की राजनीतिक केन्द्र बिन्दु से कांग्रेस को कई पायदान नीचे खिसकाते हुए यहां तक कह दिया है कि कांग्रेस की जो दुर्गति हुई है उसे देखकर ऐसा लगता है कि अब उसमें भाजपा जैसे राजनीतिक दल से निपटने की सामथ्र्य समाप्त हो गई है। आने वाले चुनावी परिदृश्य में तो भाजपा को चुनौती सिर्फ क्षेत्रीय शक्तियों से ही प्राप्त होगी।

यहां तक कहा जा रहा है कि यदि भाजपा ने क्षेत्रीय शक्तियों से सामंजस्य और गठजोड़ की चतुरता भरी राजनीति दिखाई तो देश में उसका एक छत्र राज कायम हो सकता है। यहां एक बार पुन: वही सवाल खड़ा हो जाता है कि यदि राजनीतिक विश्लेषकों की यह बात सच निकतली है तो इसे कांग्रेस मुक्त भारत न कहा जाए तो और क्या कहा जाएगा?

कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा चिंता वाली बात यह है कि अब उसके हाथ से ऐसे राज्य भी निकलते जा रहे हैं जहां उसकी सरकारें थीं या फिर जहां से उसे आशा थी कि पार्टी अच्छा प्रदर्शन करेगी। इसी आस में कांग्रेस ने वो प्रयोग किए जो अलग हटकर थे। जैसे कि पश्चिम बंगाल में जहां वामदल और कांग्रेस ने आपस में हाथ मिलाया जबकि यही दल केरल में एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोक रहे थे। कुछ समय पूर्व तक डीएमके और कांग्रेस के संबंधों को शायद ही लोग भूले हों लेकिन इन चुनावों में साथ-साथ लड़ रहे थे। इतना ही नहीं असम में गोगोई की लगातार गिरती साख को भी कांग्रेस नहीं भांप पाई और बिना किसी गठबंधन के चुनाव में जाने का अति आत्मविश्वास दिखाया। कांग्रेस के यह सारे निर्णय नेतृत्व की राजनीतिक अपरिपक्वता को प्रदर्शित करते हैं। ऐसे ही निर्णय आज कांग्रेस को रसातल की ओर ले जा रहे हैं।

आश्चर्य की बात यह है कि लगातार हाशिए पर पहुंचती कांग्रेस के नेता आज भी सोनिया-राहुल के चारणभाट की तरह गुणगान करते नजर आ रहे हैं। टीवी पर चल रही बहस में यह बात साफ दिखाई दी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर हों या फिर मणिशंकर अय्यर अथवा सिंघवी हर कोई कांग्रेस की इस छीछालेदर पर लगातार सफाई दे रहे हैं। वो इसे कांग्रेस की ऐतिहासिक हार मानने से भी इनकार कर रहे थे, और इस बात की भी सफाई दिए जा रहे थे कि भारत कभी कांग्रेस मुक्त नहीं हो सकता।

इन कांग्रेसियों को आखिर क्यों समझ नहीं आता कि कांग्रेस मुक्त भारत का अर्थ यह कदापि नहीं कि कांग्रेस का भारत से लोप हो जाएगा। कांग्रेस मुक्त भारत का मतलब यह है कि उसका ग्राफ इतना नीचे चला जाना कि वह भारतीय राजनीति में अस्तित्वहीन हो जाए, और आज आए चुनाव परिणाम भी कुछ इसी ओर इशारा भी कर रहे हैं। समय आ गया है कि कांग्रेस से प्रेम करने वाले राजनीतिज्ञ या तो गांधी जी की उस सलाह को जो कि उन्होंने आजादी के बाद दी थी कि कांग्रेस का उद्देश्य पूरा हो चुका है उसे समाप्त कर देना चाहिए, को नही मानने पर माफी मांगते हुए यह काम अब कर लें अथवा कांग्रेस को इस हाल में ले जाने वाली सोनिया-राहुल की व्यक्तिनिष्ठ राजनीति से छुटकारा दिलाएं तभी कांग्रेस का कुछ भला हो पाएगा।

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