लेखक परिचय

पीयूष पंत

पीयूष पंत

लेखक राजनैतिक, आर्थिक और विकास के मुद्दों पर केन्द्रित पत्रिका 'लोक संवाद' के संपादक हैं।

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– पीयूष पंत

अमूमन किसी भी देश के लिए उसकी सुरक्षा सर्वोपरि होती है। देश सुरक्षित रहेगा तो देशवासी भी सुरक्षित रहेंगे, उनकी पहचान सुरक्षित रहेगी और उनकी रोजी-रोटी सुरक्षित रहेगी। लेकिन देश की संप्रभुता को अगर आर्थिक साम्राज्यवाद के हाथों गिरवी रख दिया जाए, अगर देश की सुरक्षा के नाम पर अभिव्यक्ति की आज़ादी सरीखे नागरिकों के मौलिक अधिकारों को राज्य द्वारा अगवा कर लिया जाए, अगर ग़रीबों तथा विस्थापितों के पक्ष में खड़े होना ‘देशद्रोह’ कहलाया जाने लगे तो देश की सुरक्षा की बात करना महज एक निरर्थक मंत्र-जाप बन कर रह जाता है।

जब देश की सुरक्षा का यह जाप साम्राज्यवादी ताक़तों के निहित स्वार्थों को पूरा करने का ज़रिया बन जाए तो ऐसे में देश की सुरक्षा के नाम पर हुक़मरानों द्वारा ऐसे नियम-क़ानून थोप दिये जाते है जो उन सभी लोगों को देश के लिए ख़ातरा बताते हैं जो राज्य द्वारा किए जा रहे आम आदमी के उत्पीड़न, द्गोषण और मौलिक अधिकारों के हनन के विरोध में अपनी आवाज़ बुलंद करने का दम-खम रखते हैं। आज हमारे देश में ‘आतंकवाद’ और ‘नक्सलवाद’ सत्ता के हाथों ऐसे हथियार बन गए हैं जिनका डर दिखा लोकतांत्रिक परंपराओं और नागरिक अधिकारों का ख़ात्मा किया जा रहा है। दरअसल राज्य के इस तरह के व्यवहार के पीछे तर्क देश की सुरक्षा का उतना नहीं होता जितना उभरते जन असंतोष और जनाक्रोश के चलते सत्ता पर काबिज़ पूंजीपति-दलाल वर्ग के प्रतिनिधियों को अपनी असुरक्षा का भय।

शायद यही कारण है कि आज चर्चा इस बात पर चल पड़ी है कि क्या देश की सुरक्षा हमारे हित में है या फिर हमारे लिए एक ख़तरा बन गयी है। जवाब शायद आपको लोकप्रिय कवि पाश की इस कविता में मिल जाए-

अपनी असुरक्षा से

यदि देश की सुरक्षा यही होती है

कि बिना ज़मीर होना ज़िंदगी के लिए शर्त बन जाए

आँख की पुतली में ‘हाँ’ के सिवाय कोई भी शब्द

अल हो

और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे

तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज़

जिसमें उमस नहीं होती

आदमी बरसते मेंह की गूँज की तरह गलियों में बहता है

गेहूँ की बालियों की तरह खेतों में झूमता है

और आसमान की विशालता को अर्थ देता है

हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम

हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा

हम तो देश को समझे थे क़ुर्बानी-सी वफ़ा

लेकिन ‘ग़र देश

आत्मा की बेगार का कोई कारख़ाना है

‘ग़र देश उल्लू बनाने की प्रयोगशाला है

तो हमें उससे ख़तरा है

‘ग़र देश का अमन ऐसा होता है

कि कर्ज़ के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह

टूटता रहे अस्तित्व हमारा

और तनख़ाहों के मुँह पर थूकती रहे

क़ीमतों की बेशर्म हँसी

कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो

तो हमें अमन से ख़तरा है

‘ग़र देश की सुरक्षा ऐसी होती है

कि हर हड़ताल को कुचलकर अमन को रंग चढ़ेगा

कि वीरता बस सरहदों पर मरकर परवान चढ़ेगी

कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा

अक्ल, हुक्म के कुएँ पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी

मेहनत, राजमहलों के दर पर बुहारी ही बनेगी

तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है।

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