लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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-अरविंद जयतिलक-

israel gaza

पश्चिम एशिया का फलस्तीनी गाजा पट्टी एक बार फिर जंग के मैदान में तब्दील हो चुका है। फलस्तीनी हमास गुट और इजरायल दोनों हवाई हमले से एकदूसरे की संप्रभुता को ललकार रहे हैं। लेकिन इस संघर्ष में सर्वाधिक नुकसान फलस्तीन को ही उठाना पड़ रहा है। उसके एक हजार से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और हजारों घायल हुए है। हालांकि फलस्तीन भी रॉकेटों के जरिए इजरायल को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है लेकिन चूंकि इजरायल का मिसाइल रक्षा कवच ताकतवर है इसलिए वह 90 फीसदी रॉकेटों को हवा में ही नश्ट कर दे रहा है। इजरायल की मानें तो उसका मकसद सिर्फ आतंकियों और आतंकी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना है, न कि आमलोगों को। पर सच्चाई है कि उसके हमले में कट्टरपंथियों के अलावा आम आदमी की भी जान जा रही है। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की युद्धविराम प्रस्ताव से दोनों देशों के बीच संघर्ष थमने की उम्मीद बढ़ी है लेकिन कुछ भी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। हालात बेकाबू तब हुए जब इजरायल के आत्मरक्षा के अधिकार को वाशिंगटन का समर्थन मिला और इजरायली सेना ने गाजा पट्टी पर जमीनी हमला करना शुरू कर दिया। गौरतलब है कि मौजूदा संघर्ष कुछ इजरायली नौजवानों के लापता होने के बाद शुरू हुआ है। इजरायली सेना ने अपने लापता नौजवानों को ढूंढ़ने के लिए पश्चिमी तट पर अभियान चलाया और सैकड़ों फलस्तीनियों की गिरफ्तारी की। गिरफ्तार लोगों में हमास के सदस्य भी हैं। इजरायल आगबबूला तब हुआ जब उसके लापता तीन नौजवानों का शव मिला। उसने आशंका जतायी कि उसके नौजवानों की हत्या हमास के चरमपंथियों ने की है। इसी दरमयान एक फलस्तीनी किशोर को जिंदा जलाए जाने का मामला भी सामने आया और फलस्तीन भड़क गया। उसका कहना है कि उसके किशोर की हत्या यहूदी चरमपंथियों ने की। बहरहाल सच जो भी हो पर इन दोनों घटनाओं ने पहले से चली आ रही शत्रुता को और भड़का दिया है। गौर करें तो इजरायली सेना और हमास चरमपंथियों के बीच हिंसक टकराव यह पहली बार नहीं है। 2012 में भी दोनों के बीच खूनी संघर्ष हुआ जिसमें 100 से अधिक फलस्तीनियों को जान गयी। तब संघर्ष और रक्तपात को रोकने के लिए मिश्र ने गंभीर पहल की थी। लेकिन संघर्ष तभी थमा जब अमेरिकी ने चाहा। दरअसल, यह सच्चाई है कि इजरायल की पीठ पर अमेरिका का हाथ है और उसकी इच्छा के मुताबिक इजरायल गाजापट्टी पर कहर बरपाता रहा है। गौर करें तो अमेरिका अनेकों बार कह भी चुका है कि इजरायल को अपनी आत्मरक्षा का अधिकार है। याद होगा 2012 के तनाव के दौरान भी अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि जब फलस्तीन रॉकेट से हमला करेगा तो इजरायल का आत्मरक्षा का अधिकार बनता ही है। समझना होगा कि इजरायल अमेरिका का परंपरागत मित्र है और वह जब भी मुश्किल में घिरता है अमेरिका उसकी मदद करता है। याद होगा गत वर्ष पहले इजरायल ने बगैर किसी चेतावनी के ही गाजा पर हमला बोल हमास के सेनापति अहमद जबारी की हत्या कर दी थी। लेकिन अमेरिका ने एक बार भी उसकी निंदा नहीं की। इसका कारण चाहे जो भी हो पर माना यही जाता है कि चूंकि अमेरिकी सरकार पर यहूदी समुदाय का व्यापक प्रभाव है, उस नाते इजरायल का साथ देना उसकी मजबूरी है। देखा भी जा चुका है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में फलस्तीन के पक्ष में कई प्रस्ताव पारित होने के बाद भी अमेरिका उसे संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य नहीं बनने दे रहा है। इजरायल भी अमेरिका के प्रति समर्पित है। जब अमेरिका ने स्वतंत्र फलस्तीन की स्थापना का रोडमैप तैयार किया इजरायली मंत्रिमंडल ने उसे स्वीकृति देने में तनिक भी देर नहीं लगायी। दरअसल पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन बिठाने के लिए इजरायल और अमेरिका का साथ रहना समय की मांग भी है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पश्चिम एशिया में इस्लामी कट्टरवादी संगठनों की शक्तियां बढ़ती जा रही है। जगजाहिर है कि फलस्तीन के कट्टरपंथी संगठन हमास और फतह को सीरिया और ईरान का समर्थन हासिल है। खुलासा यह भी हो चुका है कि ईरान इजरायल के खिलाफ हमास को खुलकर मदद कर रहा है। हमास का अन्य आतंकी संगठनों से भी मिलीभगत है। उसकी मंशा विश्व में इस्लाम का परचम लहराना और इजरायल को नेस्तनाबूंद करना है। अमेरिका ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को लेकर पहले से ही चिंतित है। वह कतई नहीं चाहता कि हमास और फतह जैसे इस्लामिक संगठन फलस्तीन में मजबूत हों या इजरायल कमजोड़ पड़े। यह सच है कि अमेरिका की दोहरी भूमिका पश्चिम एशिया के संकट का एक प्रमुख कारण है। लेकिन कट्टरवादी संगठन हमास को भी शांति का पैरोकार नहीं माना जा सकता। वह भी उतना ही जिम्मेदार है जितना इजरायल और अमेरिका। हमास फलस्तीनी सुन्नी मुसलमानों की एक सशस्त्र संस्था है जो फलस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण की मुख्य पार्टी है। इसका गठन 1987 में मिश्र और फलस्तीन के मुसलमानों ने किया था। इसके सशस्त्र विभाग का गठन 1992 में हुआ। इस संगठन का उद्देश्य इजरायली प्रशासन के स्थान पर इस्लामिक शासन की स्थापना करना है। गाजापट्टी क्षेत्र में इसका विशेष प्रभाव है। गाजापट्टी इजरायल के दक्षिण-पश्चिम में स्थित तकरीबन 6-10 किमी चौड़ी और 45 किमी लंबा क्षेत्र है। इसके तीन ओर इजरायल का नियंत्रण और दक्षिण में मिश्र है। यहां की आबादी तकरीबन 15 लाख के आसपास है। हमास 1993 से लेकर अब तक अनगिनत बार इजरायल को निशाना बना चुका है। 2006 में फलस्तीनी संसद के चुनावों में उसने कुल 132 सीटों में 76 सीटों पर विजय भी प्राप्त की। साथ ही उसने आज तक इजरायल को मान्यता नहीं दी है। वह हमेशा इजरायल को समाप्त करने की बात करता है। गौर करें तो मौजूदा संघर्ष के लिए सर्वाधिक रूप से जिम्मेदार भी वहीं है। उसके रॉकेट हमले के बाद ही इजरायल ने उस पर हमले का निर्णय लिया। लेबनान में संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल ने भी हमास की निंदा की है और कहा है कि उसके द्वारा लेबनान से उत्तरी इजरायल पर रॉकेट दागना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा प्रस्ताव 1701 का उलंघन है। यहां जानना जरुरी है कि लेबनान इजरायल का शत्रु है। दोनों के बीच 2006 से ही शत्रुता है जब हिज्बुल्ला (लेबनान का एक शिया राजनीतिक और अर्द्धसैनिक संगठन) ने दो इजरायली सैनिकों को बंधक बना लिया। इजरायल ने हिज्बुल्ला के दक्षिणी लेबनान स्थित ठिकानों पर हमला बोल अपनी सीमा से हिज्बुल्ला को खदेड़ा। लेकिन इस युद्ध में उसे 20 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा और तकरीबन एक हजार लोग मारे गए। विश्व समुदाय को समझना होगा कि मौजूदा परिदृष्य पष्चिम एषिया के लिए बेहद खतरनाक है। बेहतर होगा कि वह घृणित कूटनीति के खोल से बाहर निकल पष्चिम एषिया में षांति के लिए ठोस पहल करें।

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