लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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बीनू भटनागर

भारत की जनसंख्या 122,000,000 का आँकड़ा पर कर चुकी है। विश्व की आबादी की 17.5% जनसंख्या भारत की है। यहाँ जनसंख्या का धनत्व किसी भी देश से ज्यादा है विश्व के भूतल का केवल 2.4% भूतल ही भारत मे है जबकि उसकी जनसंख्या इतनी अधिक है। जनसंख्या वृद्धि के क्षेत्र मे हम दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति कर रहे हैं। 2050 तक हम चीन को पछाड़ देंगे, विशेषज्ञों का ऐसा दावा है। हम हर साल एक ब्राज़ील या आस्ट्रेलिया अपनी जनसंख्या मे जोड़ते आ रहे हैं।आख़िर इतनी बड़ी जनसंख्या का बोझ हमारी धरती कब तक उठा पायेगी।

अब यह तो स्पष्ट है कि भारत भूमि पर हम ठूँस ठूँस के भरे हुए हैं अब कितना और ठूँसेंगे यह तो वख़्त ही बतायेगा, मैदान हों या पहाड़, समुद्र तट हो या दक्कन का पठार, गाँव हो या शहर भीड़ ही भीड़ नज़र आती है। अब इतनी बड़ी जनसंख्या को रहने के लियें जगह तो चहिये ही, मकान ही मकान, इमारतें ही इमारतें बनती जा रही हैं, ज़ाहिर है हरियाली कम होगी जंगल सिकुड़ेगें, पशु-पक्षी कम होंगे खेती की ज़मीन कम होगी, फिर भी बहुत सारे लोग बेघर रहेगे, मजबूरी मे फुटपाथ पर फ्लाईओवर के नीचे सोयेंगे ।क्या करें जब जनसंख्या बढती ही जा रही है।

सरकारी अस्पतालों मे मरीज़ डाक्टर के ऊपर लदे पड़े रहते हैं, बाहर सैंकडो मरीज़ लाइन मे लगे रहते हैं ,फिर मरीज़ो के रिश्तेदार इधर उधर भटक रहे होंगे बस भीड़ ही भीड…। प्राइवेट अस्पतालों मे भी भीड़ की कमी नहीं है बस वहाँ लोगों को बैठने की सुविधा, पेयजल की सुविधा और वातानुकूलित वातावरण मिल जाता है। कभी कभी किसी विशेषज्ञ का ऐपोंइंटमैंट मिलने मे हफ्तों का समय लग जाता है, आख़िर क्यों ? उत्तर तो वही है सुविधाओं की अपेक्षा जनसंख़्या बहुत अधिक है।

रेलवे स्टेशन पर प्लेटफार्म खचाखच भरे मिलेंते हैं। कितनी भी नई ट्रेन चला दी जाती हैं फिर भी अफरातफरी मची रहती है । हवाई यात्रा का भी हाल बुरा है। शहरों मे सड़कों पर वाहनों की संख्या बहुत ज़्यादा है। इतनी बड़ी जनसंख्या घर पर तो बैठी नहीं रहेगी। मैट्रों मे खड़े रहकर भी हाथ पैर हिलाने की जगह नहीं रहती। व्यस्त बाज़ारों मे इतनी भीड़ है कि कंधे से कंधा छिलता है। जब देश की धरती पर ही हम ठूँस ठूँस कर भरे पड़े हैं तो इसका असर हर जगह दिखेगा ही।

खेती के लियें कम ज़मीन और जनसंख्या की लगातार बढोतरी की वजह से पैदावार बढने के बावजूद खाद्य पदार्थो की आपूर्ति नहीं हो पाती और बहुत सी खाने पीने की चीज़े आयात करनी पडती हैं। खाने के ज़रूरी सामान की कीमते बेहद बढ चुकी हैं इसका मुख्य कारण जनसंख्या का निरंकुश बढते रहना ही है। इसी तरह बेरोज़गारी का भी सीधा संबध जनसंख्या से ही है ।जब लोगों को काम नहीं मिलता, ज़रूरते पूरी नहीं होतीं तो कुछ ग़लत रास्ता चुनकर अपराध की दुनियाँ मे प्रवेश कर लेते हैं, जहाँ से एक बार धुसकर निकल पाना अत्यधिक कठिन होता है।

122 करोड़ वाले देश की जनसंख्या मे भीड़ जुटाना शायद सबसे आसान काम है इसीलिये बहुत सारे तथाकथित को धर्मगुरुओं को 5-7 हज़ार अंधभक्त मिल ही जाते हैं। भीड़ से भीड़ आकर्षित होती है इसलियें कई ढोंगी बाबा खूब पनपते हैं। किसी धार्मिक उत्सव पर भी भीड़ का दरिया उमड़ पडता है। सभी राजनैतिक दल अपनी रैली मे लोगों कुछ दे दिला कर भीड़ दिखा कर अपना शक्ति प्रदर्शन करते हैं।

बच्चे के स्कूल जाने का समय आता है तो अच्छे स्कूल मे प्रवेश दिलाना मातपिता की चिंता का कारण बन जाता है, क्योंकि बच्चे जितने हर साल जन्म लेते है उतनी सीटें होती नहीं हैं।बहुत सारे ग़रीब बच्चे इतने सारे सरकारी स्कूल होने के बावजूद भी शिक्षा नहीं पा पाते।थोड़ा बड़ा होते ही मा बाप उन्हे काम पर लगा देते हैं। मजबूरी मे वे बाल मज़दूर बन जाते हैं,उनको यदि बाल मज़दूरी से मुक्त भी करा दिया जाता है तो उनके पुनर्वास का सही प्रबन्ध नहीं हो पाता । अब सवाल यह उठता है कि क्या हर चीज़ की जिम्मेदारी सरकार पर छोडी जा सकती है, नहीं। माता पिता को बच्चा पैदा करने से पहले सोचना चाहिये कि वह ये ज़िम्मेदारी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से उठाने मे सक्षम हैं या नहीं। अब जब मातापिता ही अशिक्षित हों तो उन्हे इतनी समझ कहाँ से होगी इसलियें अशिक्षा भी जनसंख्या वृद्धि का बहुत बड़ा कारण है। अशिक्षा और ग़रीबी तो साथ साथ चलते हैं आमतौर पर ग़रीब और अशिक्षित लोगों के ही ज्यादा बच्चे पैदा होते हैं।

अशिक्षा और ग़रीबी के अतिरिक्त यहाँ के लोगों के बच्चे पैदा करने की क्षमता (फर्टिलिटी )भी ज़्यादा है। कुछ धर्म भी परिवार नियोजन के रास्ते मे आड़े आते हैं। दूसरी ओर परिवार नियोजन के प्रति राजनैतिक दल भी उदासीन हैं। बिना किसी कड़े क़ानून के परिवार नियोजन कार्यक्रम जो कि अब परिवार कल्याण कार्यक्रम कहलाता है, की सफलता की आशा नहीं की जा सकती। कड़े क़ानून लाना तो दूर की बात है इसके प्रचार और प्रसार के लियें भी राजनैतिक इच्छा शक्ति का पूरा अभाव है। भारत के पड़ौसी देशों की राजनैतिक व आर्थिक स्थिति भी संतोषजनक नहीं है इसलियें बाँग्लादेश, नैपाल श्रीलंका से बहुत से लोग वैध अवैध तरीकों से भारत मे आकर बस गये हैं। अब पाकिस्तान से भी हिन्दू परिवार आकर राजनैतिक शरण मांगने लगे हैं जिससे जनसंख्या मे और वृद्धि हो गई है।

स्वास्थ्य सुविधाओं मे सुधार के कारण देश वासियों की मृत्युदर घटने से औसत आयु काफी बढ गई है। पहले प्रसूति मे माओं और बच्चों की जान बहुत जाती थी। कई बीमारियों के टीके लगने से भी कई जानलेवा बीमारियों पर नियंत्रण लगाया जासका है इसलिये मृत्य दर घटी है। पिछले दशक मे जनसंख्या की वद्धि की दर 2.23% से घटकर 1.76% हो गई है यह अच्छा संकेत है पर पर्याप्त नहीं है। स्वतन्त्रता मिलने के बाद से आज तक हमारी जनसंख्या तीन गुना बढ़ चुकी है। अनुमान है कि हर मिनट मे देश मे 51 बच्चे पैदा हो जाते हैं।

बीसवीं सदी के आरंभ तक भारत की जनसंख्या स्थिर थी।बहुत बड़े अकाल पड़ते थे हैजा़ और प्लेग जैसी बीमारियाँ बहुत सी जाने ले लेती थीं इसलियें प्रति 1000 लोगो के बीच जन्म और मृत्युदर 48 थी, 1901 और 1910 के बीच जनसंख्या कुछ कम हुई थी। इसके बाद हर दशक मे जनसंख्या बढती ही रही। 1901 मे जनसंख्या का घनत्व 77 व्यक्ति प्रति वर्ग कि. मी. था जो 1981 तक 267 प्रति वर्ग कि. मी. हो चुका था।

भारत ऐसा पहला देश था जहाँ परिवार नियोजन की आवश्यता को समझा गया और 1951 मे पहली पंचर्षीय योजना के तहद परिवार नियोजन की नीतियाँ बनाई गईं । उसके बाद कुछ दशक तक परिवार नियोजन कार्यक्रम को लोकप्रिय बनाने के लियें सरकार प्रयत्नशील रहीं कुछ हद तक सफलता भी मिली, फिर भी जनसंख्या वृद्धि 2.25% प्रतिवर्ष हो गई। ये आँकड़े चौंकाने वाले थे तब राजनीतिज्ञों, विशषज्ञों, उद्योगपतियों और पढे लिखे संभ्रात लोगों को लगा कि स्थिति चिन्ताजनक है, तब तत्कालीन स्वास्थ मंत्री श्री करण सिह ने अकटूबर 1975 मे प्रधानमंत्री को ऐसा पत्र लिखा जिसमे परिवार नियोजन को अनिवार्य बनाने की सिफारिश की गई थी।

आँतरिक ऐमरजैंसी के समय जब इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थी, श्री संजय गाँधी के नेतृत्व मे परिवार नियोजन कार्यक्रम बहुत ज़ोर से चला। काम तो अच्छा था पर तरीके कुछ ग़लत होगये। कुछ लोगों पर ज्यादतियाँ हो गईं। अगले चुनाव मे काँग्रेस व श्रीमती गाँधी बुरी तरह हार गये।इसके बाद आने वाली सभी सरकारों ने परिवार नियोजन कार्यक्रम को ठन्डे बस्ते मे रख दिया। ग़रीब अशिक्षित लोगों को परिवार नियोजन अपनाने के लाभ समझाने की जगह उन्हें पूरी छूट मिल गई जनसंख्या बढाने की। राजनैतिक दलों ने भी सोच लिया कि उनका वोट बैंक बढ रहा है, तबसे आजतक किसी भी पार्टी ने जनसंख्या नियंत्रण को प्रचार का मुद्दा ही नहीं बनाया। चीन मे केवल एक बच्चा पैदा करने की अनुमति है जिसकी वजह से वहाँ की जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लगा है।

भारत एक प्रजातंत्र हैं यहाँ ज़ोर ज़बरदस्ती से कोई काम नहीं करवाया जा सकता।ऐमरजैंससी से पहले परिवार नियोजन पर काफी ध्यान दिया जा रहा था। लोगों को तरह तरह से परिवार नियोजन के लाभ समझाने की कोशिश हो रही थीं। सबसे पहले ‘’दो या तीन बच्चे घर मे होते हैं अच्छे’’ का नारा लगा फिर ‘’छोटा परिवार सुखी परिवार’’ और ‘’हम दो हमारे दो’’ का। लोगों को परिवार नियोजन के उपाय बताने के लियें भी प्रशिक्षित किया जाता रहा था। यद्यपि निर्धारित लक्ष्य प्राप्त नहीं हुए फिर भी बहुत सारे जन्मों को रोका जा सका था। कम से कम पढे लिखे लोग परिवार नियोजन की अहमियत समझ गये थे।

काँग्रेस की चुनाव की हार के बाद तो परिवार नियोजन के नाम से ही राजनैतिक दल डर गये उन्होंने इसे परिवार कल्याण का नाम दे दिया। तब से अब तक चांहे जो भी सरकार आई हो परिवार नियोजन के सारे नारे बन्द हो गये , प्रचार बन्द हो गया। पहले परिवार नियोजन करने वाले लोगों को कुछ सुविधाओं का ऐलान होता रहता था, जो अब नहीं होता बल्कि वोटों के लालच मे कुछ प्रदेश सरकारें ग़रीबों को प्रसूति के समय काफ़ी सुविधाये और नक़द भी देती हैं चांहे वो 6-7 या और अधिक बच्चे भी पैदा करलें।

ऐसी स्थिति मे जब कोई राजनैततिक पहल न हो तो जनसंख्या पर क़ाबू पाना बहुत कठिन है।केवल स्वयं सेवी संस्थाओं से उम्मीद की जा सकती है कि वो इस दिशा मे काम करें। यहाँ बहुत सारे पर्यावरण विशेषज्ञ किसी भी योजना के लागू होने में अडंगे लगाने मे सबसे पहले आगे आजाते हैं,पर उन्हे यह नहीं दिखाई देता कि पर्यावरण के लियें सबसे बड़ा ख़तरा निरंकुश बढ़ती जनसंख्या से है, उनको भी इस क्षेत्र मे अहम भूमिका निभाने की आवश्यकता है।

यदि जनसंख्या वृद्धि का यही हाल रहा कुछ ही दशकों मे रोटी, पानी,बिजली और अन्य ज़रूरी सामान के लिये इतनी छीना झपटी मचेगी कि लोग एक दूसरे की जान लेने पर उतारू हो जायेंगे।पूरी तरह अराजकता फैल जायेगी, इसकी शुरुआत तो हो ही चुकी है।

 

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2 Comments on "भीड़.. भीड़ ही भीड़"

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parshuramkumar
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भारत में १२२२०००००० जन की संख्या ही सिर्फ नहीं है ,उतना मष्तिष्क कि भी संख्या है .|ज्यादातर लोग पोजिटिव मस्तिष्क के रहें धरतीपुत्र का मनोभाव रक्खें ,प्रकृति स्वच्छ रक्खें मानव एवँ मानवेत्तर प्राणियों पर दया भाव रखकर विश्व वन्धुत्व का परिचय दें तो यह जन संख्या विश्व के लिए वरदान साबित हो सकती है |संस्कारक्षम कार्यक्रमों कि योजनाए सब लोग बनायें, सरकार को इसके लिए बाध्य करने का सार्थक प्रयास करें ,रोना रोने से कुछ नहीं होने वाला ~परशुराम ,,हरनौत नालन्दा ,धन्यवादः

parshuramkumar
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भारत में १२२२०००००० जन की संख्या ही सिर्फ नहीं है ,उतना मष्तिष्क कि भी संख्या है .|ज्यादातर लोग पोजिटिव मस्तिष्क के रहें धरतीपुत्र का मनोभाव रक्खें ,प्रकृति स्वच्छ रक्खें मानव एवँ मानवेत्तर प्राणियों पर दया भाव रखकर विश्व वन्धुत्व का परिचय दें तो यह जन संख्या विश्व के लिए वरदान साबित हो सकती है |संस्कारक्षम कार्यक्रमों कि योजनाए सब लोग बनायें, सरकार को इसके लिए बाध्य करने का सार्थक प्रयास करें ,रोना रोने से कुछ नहीं होने वाला ~परशुराम ,,हरनौत नालन्दा ,धन्यवादः

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