लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

Posted On by &filed under कला-संस्कृति.


सुधांशु त्रिवेदी

आज संपूर्ण विश्व एक संक्रमण काल से गुजर रहा है। कहा जा रहा है कि बदलते समीकरणों के अनुसार 21 वीं सदी भारत और चीन की सदी होगी। एक अनुमान के अनुसार भारत आज विश्व की उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति ही नहीं है , बल्कि 21 वीं शताब्दी के मध्य तक भारत की जनसंख्या चीन से अधिक और इसका जीडीपी अमेरिका से अधिक हो जाएगा। यानी भारत का भविष्य अत्यंत संभावनापूर्ण है। परंतु इसका मुख्य आधार भारत के विशाल आकार और जनसंख्या में निहित है। एक अन्य बिंदु यह है कि भारत विश्व की सभी प्राचीनतम सभ्यताओं में से एकमात्र जीवित सभ्यता है। भारत विश्व का एकमात्र जीवित प्रागैतिहासिक राष्ट्र है। अतीत से भविष्य तक इतने लंबे अंतराल में इतने विराट स्वरूप को भारत कैसे संरक्षित करके रख सका , यह पश्चिमी विचारकों के लिए आश्चर्य और शोध का विषय है।

यूनानो – मिस्र – रोमां

भारत की एकता का मुख्य आधार आर्थिक , राजनैतिक , प्रशासनिक कारणों में निहित नही था क्योंकि इन आधारों पर गठित बड़े – बड़े राष्ट्रों का जीवन बहुत लंबा नहीं होता। इतिहास में अरब क्षेत्र में टर्की और मेसोपोटामिया के साम्राज्य , उत्तरी अफ्रीका में मिस्र का साम्राज्य और यूरोप में रोमन साम्राज्य आज उसी क्षेत्र में अनेक राष्ट्रों में विभाजित है। पिछली शताब्दी में ही चेकोस्लोवाकिया और सोवियत संघ का विघटन इसका प्रमुख उदाहरण है। भारत में एकता का सूत्र यहां की संस्कृति , धर्म और सांस्कृतिक मनोविज्ञान में इतने सुव्यवस्थित ढंग से बसा हुआ है कि सामान्य तौर पर वह नजर ही नहीं आता।

शैव – शाक्त – वैष्णव

भारतीय संस्कृति की यह एक अद्भुत विशेषता है कि आप यहां के धर्म और संस्कृति के किसी भी प्रतीक पर आस्था रखिए तो संपूर्ण भारतवर्ष से स्वत : जुड़ जाएंगे। इसे कुछ उदाहरणों के द्वारा समझा जा सकता है। जैसे यदि कोई भारतीय कहे कि वह वैष्णव है , उसकी आस्था भगवान राम में है तो उत्तर में अयोध्या से लेकर चित्रकूट होते हुए धुर दक्षिण में रामेश्वरम तक सभी स्थानों से उस व्यक्ति की आस्था स्वयं जुड़ जाएगी। यदि कोई व्यक्ति कहे कि उसकी आस्था भगवान श्रीकृष्ण में है तो उत्तर में उनकी जन्मभूमि मथुरा , पूर्व में जगन्नाथपुरी , पश्चिम में द्वारिका और दक्षिण में तिरुपति बालाजी तक देश के सभी स्थानों से उसकी आस्था स्वत : जुड़ जाएगी।

यदि कोई यह कहे कि वह वैष्णव नही बल्कि शैव है और उसकी आस्था भगवान शंकर में है तो उत्तर में अमरनाथ , मध्य में उज्जैन के महाकाल , पश्चिम में सोमनाथ और दक्षिण में रामेश्वरम सहित द्वादश ज्योतिर्लिंगों के द्वारा भारत के हर कोने से उसकी आस्था जुड़ जाएगी। यदि कोई यह कहे कि वह शाक्त है और उसकी आस्था देवी में है तो उत्तर में वैष्णो देवी , मध्य में विंध्यवासिनी , पश्चिमी में मुंबा देवी , पूर्व में कामाख्या और दक्षिण में कन्याकुमारी सहित देश के सभी भौगोलिक क्षेत्रों से उस व्यक्ति की आस्था अपने आप जुड़ जाएगी।

एकता का यह सूत्र सिर्फ विचार में नहीं था। इसका क्त्रियात्मक स्वरूप भी अनादिकाल से दिख रहा है। देश के चार स्थानों नासिक , उज्जैन , प्रयाग और हरिद्वार में हर तीन वर्ष के बाद कुंभ मेला होता है और देश के समस्त साधु – संत और अखाड़े लगातार इन चारों स्थानों की यात्रा करते रहते हैं। आदि शंकराचार्य जी ने चारों कोनों पर चार मठ बनाए और वहां के शंकराचार्य बनने के लिए यह बाध्यता बनाई कि उसी क्षेत्र का व्यक्ति शंकराचार्य नहीं बनेगा। अभी नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर विवाद के समय यह बात प्रकाश में आई कि वहां का मुख्य पुजारी शताब्दियों से कर्नाटक का ही होता रहा है। अर्थात राजनीतिक पार्थक्य भी एकता को सांस्कृतिक सूत्र से जोड़े रखता है।

इतना ही नहीं , भारत में धर्म और संस्कृति के कर्मकांडों में भी , जिसकी आधुनिक बुद्धिजीवी तीव्र आलोचना करते हैं , राष्ट्रीय एकता के गहरे सूत्र है। पूजा करते समय जब पुरोहित आपसे हाथ में जल लेने को कहता है तो संकल्प स्वरूप यह मंत्र बोला जाता है – ‘ गंगे च यमुने च गोदावरी , सरस्वती , नर्मदा , सिंधु , कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु ‘ । अर्थात पूजा स्थल पर बैठे हुए आप भावना से देश की समस्त नदियों के साथ जुड़ जाते है। सांस्कृतिक विधान तो यह है कि त्यौहारों में स्नान करते समय भी यही मंत्र बोलना चाहिए।

स्पष्ट है कि भारत की एकता के सूत्र जिन देवी – देवताओं और परंपराओं में निहित हैं , उनके कारण देश का कोई हिस्सा यदि किसी अन्य के प्रभाव में हो तो भी दूसरे हिस्से में बैठे व्यक्ति की भावना उस हिस्से से जुड़ी रहती है। भारतीय संस्कृति में जरूरी नहीं कि आप पूजा बाहर जाकर करें। आप अपने देवता घर में ही रख सकते हैं और घर बैठे किसी भी देवता की आराधना से आपकी आस्था सारे भारत के साथ जुड़ जाती है। यहां तक कि आप धार्मिक विधान के अनुसार स्नान करते हुए भी स्वयं को सारे भारत की नदियों से जुड़ा हुआ महसूस कर सकते हैं।

चिरंतन और सनातन

विश्व की कोई भी सत्ता मंदिरों , मठों और आस्था के केंद्रों को तो नष्ट कर सकती है परंतु एक – एक व्यक्ति के घर में घुसकर उसके क्त्रियाकलाप को नियंत्रित नहीं कर सकती। और स्नानागार में स्नान कर रहे व्यक्ति को नियंत्रित करना तो अकल्पनीय है। भारत की एकता के सूत्र सांस्कृतिक आस्था और धार्मिक कर्मकांड से लेकर घर के स्नानागार तक इतने सूक्ष्म तरीके से बिछे हुए हैं कि शताब्दियों के विदेशी शासन के बाद भी भारत अपनी राजनैतिक एकता को अक्षुण्ण रखकर विराट स्वरूप के साथ 21 वीं सदी में विश्व का मार्गदर्शन करने को तैयार खड़ा है , जबकि विश्व की अन्य महानतम शक्तियां अपनी किसी भी किस्म की एकता को नहीं बचा पाईं। इसीलिए भारत एक चिरंतन राष्ट्र है , सनातन राष्ट्र है।

भारत की युवा पीढ़ी को इसकी शक्ति के इस वास्तविक , मूल और नैसर्गिक तत्व को समझना होगा , इसे संरक्षित और विकसित करना होगा। तभी भारत 21 वीं सदी में विश्व का नेतृत्व कर पाएगा।

(लेखक बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं)

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz