लेखक परिचय

शाहिद नकवी

शाहिद नकवी

मै फिलहाल स्‍वतंत्र हूं ।इसके पहले देश के कई अखबारों मे उप सम्‍पादक और रिर्पोटर के रूप मे काम कर चूंका हूं ।

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दादरी के बिसड़ा गांव में जो हुआ उसने दुनिया को फिर याद दिलाया कि हमारे
प्रधानमंत्री चाहे नये भारत की कितनी भी बातें करें , युवा भारत के
र्निमाण का सपना दिखायों लेकिन आज भी भारत की आधुनिकता सिर्फ एक कमजोर
कड़ी की तरह है , जिसके पीछे छिपा है वही पुराना धार्मिक कट्टरपंथ और वही
पुरानी मानसिकता जिसने इस देश को अब तक आगे बढ़ने से रोका है।अभी तक हमें
विकासशील या विकसित भाईचारे का कोई नुस्‍खा नही मिल सका है।तभी तो एक ओर
हमारे प्रधानमंत्री जी तोड़ मेहनत से डिजिटल भारत का सपना साकार करने का
प्रयास कर रहे हैं, विदेशी निवेशकों को बदलते भारत का भरोसा दिला रहे हैं
।उनके नेतृत्‍व पर भरोसा कर के परदेस मे देशभक्‍ति की भावना से ओतप्रोत
अनिवासी भारतीयों मे एक विश्‍वास जग रहा है , तो दूसरी तरफ देश की
राजधानी की सीमा से आबाद गांव मे पुलिस अपना फर्ज नही निभा पाती है ।कहा
जाता है कि विदेशी निवेशक भारत की ओर सकारात्मक उत्सुकता से देख रहा है,
उन्‍हें उभरते भारत का तस्‍वीर दिख रही है ।विश्‍व गुरू बनने का सपना
संजोये और मंगल पर पताका फहराने वाले दुनियां के सबसे बड़े लोकतांत्रिक
देश भारत मे 21 वीं सदी मे भी अगर दादरी जैसी घटनाऐं होती हैं तो ये
हमारे लिये मंथन वा मनन का सबब है ।
भारत की पहचान बुनियादी तौर पर धमर्निपेक्ष देश
के रूप मे है और तमाम मुल्‍क इसकी अनेकता मे एकता की खासियत के कायल भी
हैं , वह इससे सबक भी लेते रहतें हैं ।दरअसल देश की जनता स्वभाव से
धार्मिक होते हुए भी किसी किस्म के अतिवाद और कट्टरवाद के हमेश खिलाफ रही
है। जनता ने कभी पूरी तरह से किसी भी अतिवाद को स्‍वीकार नही किया । अगर
भारतीय जनता सचमुच कट्टर होती तो पूर्व राष्‍ट्रपति अब्‍दुल कलाम की मौत
पर आंसू ना बहाती ।,हालांकि उसे मजहब के नाम पर उकसाने की तरह-तरह की
कोशिशें हमेशा की जाती रही हैं।सवा सौ करोड़ की आबादी वाले इस देश मे
व्‍यापक जनसमुदाय को धमर्निपेक्ष स्‍वरूप ही भाता है ।दादरी काण्‍ड के
बाद भी शायद इसी व्यापक जन-समुदाय में दुख और आत्ममंथन हो रहा है ।शायद
यही वजह है कि जो शाकाहार के कट्टर समर्थक और गो-हत्या के कट्टर विरोधी हैं,
उनकी तरफ से भी इस तरह के बयान आ रहे हैं कि बात इस हद तक नहीं जानी
चाहिए थी।यहां तक कि हमलावर भीड़ का शिकार होने से पहले अखलाक तक
का हिंदूओं पर पूरा भरोसा था ।एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक अखलाख ने
अपने घर से पांच सौ मीटर दूर रह रहे अपने एक हिंदू दोस्‍त को फोन कर अपनी
जान बचाने के लिये पुलिस भेजने की गुजारिश की थी ।दोस्‍त ने अपना फर्ज भी
निभाया लेकिन मदद पहु्ंचने तक मौत ने इंतज़ार नही किया ।भारत की साझी
संकृति कि दूसरी मिसाल भी दादरी की ही है जहां कई दर्जन मुसलमानों को
हिंदुओं ने अपनी निगरानी मे सुरक्षित निकाला ।इसमे कोई संदेह नही कि औसत
भारतीय मुसलमान गाय का सम्‍मान करते हैं ।क्‍योकि वे भारतीय परम्‍पराओं
और हिंदुओं की उसके प्रति श्रध्‍दा को ध्‍यान मे रखतें हैं ।विवादों और
राजनीतिकरण के इस माहौल के बाद भी इसकी एक बानगी लखनउू मे देखने को मिली
। मोहम्‍मद जकी नाम के नवजवान ने अपनी जान जोखिम मे डाल कर तीस फीट गहरे
कुऐं से एक गाय को जीवित निकाल कर एक मिसाल पेश की ।
आम भारतीय अपनी ओर से वैमनस्‍य के
दुष्‍प्रभावों को प्रभावहीन करने मे लगा है ।लेकिन दूसरी ओर राजनेता इस
घटना में अपना राजनीतिक फायदा देख रहे हैं और उन्हें बड़ी चिंता इस घटना
से होने वाले राजनीतिक नुकसान को कम करने की है। मगर इस कोशिश में दोनों
ही पक्षों के राजनेता विवेक और समझदारी का संदेश नहीं दे रहे हैं।दोनो
तरफ के बहुत सारे नेताओं का रुख रक्षात्मक होने की बजाय आक्रामक दिखने का है और वे
इसमें धु्रवीकरण के फायदे भी देख रहे हैं।उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍य मंत्री
अखिलेश यादव ने दादरी ना जाकर बल्‍कि पीड़ित को लखनऊ बुलाकर जरूरी सहायता
देकर ठीक ही किया ।लेकिन उनकी पार्टी के नेता इसे समझने के बजाय बयानबाजी
कर रहे हैं ।इसी लिये साध्‍वी प्राची ,ओवैसी ,संगीत सोम ,साक्षी महाराज
और आजम खां मे समानताऐं हैं क्‍यों कि वह मरहम लगाने के बजाय एक दूसरे को
कटघरे मे खड़ा करने की कोशिश्‍ा कर रहें हैं।दरअसल देश मे पिछले कुछ समय
से गो-रक्षा व पशु वध को जिस तरह से मुद्दा बनाया जा रहा है, उससे लगता
है कि इसके पीछे भावना गो-धन के सम्मान या अहिंसा की नहीं, राजनीतिक नफरत
फैलाने की है।दूसरे पक्ष ने कभी ऐसी मांग नही कि जिससे सीधे उसे कठघरे मे
खड़ा कर दिया जाये । वास्तव में हर आदमी के लिये मरने वाले का धर्म
महत्वपूर्ण है और मारने वालो का भी । ऐसा हर घटना के बाद होता है और होता
रहेगा, क्योंकि हम जब भी ऐसी किसी घटना के बारे में सुनते है तो सबसे
पहले यही जानने की कोशिश करते है कि मरने और मारने वालों का धर्म क्या
था । हम कभी भी एक इन्सान के मरने पर प्रतिक्रिया नहीं देते, जबकि हम अगर
इन्सान की नजर से ऐसी घटनाओं को देखे तो ऐसी घटनायें बन्द हो सकती है,
क्योंकि इनका समर्थन नहीं होगा और कोई भी राजनेता ऐसे मामलों पर वोट नहीं
बटोर सकेगा ।वास्‍तव मे लोगों को उनकी वह सीमा बतानी है, जहां से उनके
अधिकार नही वरन दूसरों के अधिकार शुरु होतें हैं ।माहौल को सामान्‍य
बनाने के लिये उग्र बयानबाजी से परहेज़ करना होगा ।
यहं पर वह लोग भी सवालों के घेरे मे
हैं जो समय –समय पर गाय की दशा पर उबाल खाते हैं ।इनसे ये सवाल पूंछा
जाना चाहिये कि वह अपनी दिन चर्या मे सड़कों पर घूमने वाली गायों को
कितनी बार रोटी खिलातें हैं ।क्‍या ये सोचने कि जहमत उठाई कि आपके
दूवारा सड़कों पर फेंकी जाने वाली पन्‍नी को खाकर कितनी गाय बीमार हुयीं
या कभी किसी असहाय गाय को पशु अस्‍पताल ले गये dadri इस समय देश किसी दल के नेता की तरफ नही बल्‍कि अपने उस
मुखिया की तरफ ताक रहा है जिसने आजादी के बाद पहली बार उन मुद्दों को छुआ
जो अब तक उपेक्षित पड़े थे । ये जिम्मेदारी किसी ना किसी को लेनी पडेगी
कि उग्रता पर लगाम कसी जाए ताकि ‘मेक इन इंडिया” सफल होने के पहले ही दम
न तोड़ दे । मुस्लिम देशों में फैली हुई मारकाट और अराजकता का कारण
धार्मिक कट्टरता है ।इस लिये हमें धर्मनिरपेक्षता के झण्डे को बुलंद करना
होगा ।जैसे अमेरिका और यूरोप ईसाई बहुसंख्यक होने के बावजूद
धर्मनिरपेक्षता का दामन थामें हैं ।यह भी सही है कि अगर गौवध या गोमांस
सेवन कानूनी तौर पर निषिद्ध है तो उस पर हर संप्रदाय को सही से अमल करना
चाहिये ।क्‍यों कि कट्टरता से ही कट्टरता पैदा होती है और इस्‍लाम भी वतन
,मुल्‍क और समाज के प्रति अपनी पूरी जिम्‍मेदारी निभाने की वकालत करता है

** शाहिद नकवी **

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