लेखक परिचय

तनवीर जाफरी

तनवीर जाफरी

पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में बहुत ही सक्रिय लेखन,

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-तनवीर जाफरी- Criminal-Politics
देश का मतदाता एक बार फिर लोकतंत्र के चुनाव रूपी महापर्व में शिरकत करने जा रहा है। भारतीय जागरूक मतदाताओं द्वारा चुने जाने वाले 543 लोकसभा सदस्य एक बार फिर देश व देशवासियों के भविष्य का निर्धारण करने हेतु 2014 की लोकसभा में निर्वाचित होकर लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर अर्थात् लोकसभा की शोभा बढ़ाने वाले हैं। इस चुनावी महापर्व पर केवल भारतवासियों की ही नज़रें टिकी नहीं होती बल्कि पूरी दुनिया भी बड़ी उत्सुकता के साथ इन चुनावों को देखती है। पूरा विश्व यह भी बड़ी बारीकी से देखता है कि दुनिया को सर्वधर्म संभाव, अनेकता में एकता व धर्मनिरपेक्षता की राह दिखाने वाला भारतवर्ष देश के भविष्य निर्धारण के लिए आखिर कैसे जनप्रतिनिधियों को चुनकर लोकसभा में भेजता है। और बड़े दु:ख के साथ हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि विगत् लगभग 4 दशकों से हमारे देश की संसद तथा विधानसभाओं की असली सूरत इतनी भयावह होती जा रही है कि अब तो कोई सज्जन, ईमानदार तथा योग्य व्यक्ति राजनीति के क्षेत्र में कदम रखने के नाम से ही घबराने लगता है। ऐसा लगता है गोया राजनीति अब केवल बाहुबलियों, अपराधियों, गुंडों, मवालियों तथा भ्रष्टाचार में पूरी तरह से सिद्धहस्त लोगों का ही धंधा बनकर रह गई हो। ऐसे हालात निश्चित रूप से न केवल किसी अपराधी या दा$गी छवि वाले किसी व्यक्ति के निर्वाचित होने पर उस क्षेत्र विशेष के मतदाताओं की बदनामी का सबब बनते हैं बल्कि ऐसे निर्वाचित ‘माननीय’ देश की लोकसभा अथवा विधानसभा पर बदनुमा दाग भी साबित होते हैं।
वैसे तो राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण के विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर बुद्धिजीवियों द्वारा गहन चिंतन-मनन किया जा रहा है। फिल्म,आलेख,नुक्कड़ नाटक, विज्ञापन तथा पुस्तक लेखन आदि माध्यमों से देश के मतदाताओं को इस विषय पर जागरूक करने की पूरी कोशिश की जाती है। निर्वाचन आयोग भी अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत् मतदाताओं को स्वच्छ व साफ-सुथरा मतदान करने के लिए प्रोत्साहित करता रहता है। कई निजी संगठन भी आम लोगों को बेदाग प्रत्याशी को चुने जाने के लिए आगाह करते रहते हैं। इन सब के बावजूद देश की लोकसभा व विधानसभाओं में चुनकर आने वाले दागी व अपराधी ‘माननीयों’ की सं या घटने का नाम ही नहीं ले रही है। बल्कि घटने के बजाए इस सं या में और भी इज़ाफा होता जा रहा है। पिछले दिनों आमिर खां द्वारा निर्देशित कार्यक्रम सत्यमेव जयते में देश की इस चुनाव रूपी लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा देश के ‘माननीयों’ के वास्तविक चरित्र पर जिस प्रकार रोशनी डाली गई वह अत्यंत डरावनी व चिंताजनक है। इस कार्य·्रम ने एक बार फिर पूरे देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है। पूरी तरह से सत्य,व्यक्तिगत् अनुभव,दलील तथा वास्तविक आंकड़ों पर आधारित इस कार्य·्रम को देख कर जहां इस बात का विश्वास होता है कि देश का कोई भी राजनैतिक दल राजनीति को अपराधियों व दा$िगयों से मुक्त कराने की दिशा में गंभीर नहीं है वहीं यह भी पता चलता है कि ऐसे लोगों को निर्वाचित करने वाले देश के मतदाता इन हालात के लिए $खुद को अपनी जि़ मेदारी से बरी नहीं कर सकते।
सत्यमेव जयते के मंच पर आकर ऐसोसिएशन $फार डेमो·्रेटिक रि$फार्म अर्थात् एडीआर के संस्थापक सदस्य जगदीश छोकर ने जो आंकड़े पेश किए वह भारतीय राजनीति विशेषकर देश की संसद व विधानसभाओं का सिर झुकाने लिए पर्याप्त हैं। एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार पिछली अर्थात् 2009 की निर्वाचित लोकसभा में 543 में 162 माननीय ऐसे निर्वाचित हुए थे जिनपर गंभीर आपराधिक मुकद्दमों के तहत आरोप पत्र दा$िखल हो चुके हैं तथा देश की विभिन्न अदालतों में इनके विरुद्ध मुकद्दमे विचाराधीन हैं। गोया लोकसभा के तीस प्रतिशन सदस्य दा$गी व अपराधी रि·ॉर्ड रखते हैं। जबकि 2004 की लोकसभा में यह सं या 129 थी। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि राजनीति में अपराधियों की घुसपैठ तथा उनकी विजय का सिलसिला 2009 के चुनाव तक का$फी तेज़ी से आगे बढ़ा है। एडीआर के आंकड़ों के अनुसार देश का कोई भी राजनैतिक दल ऐसा नहीं है जो दा$िगयों,अपराधियों व बाहुबलियों को अपना प्रत्याशी न बनाता हो। इसी प्रकार देश का कोई भी राज्य ऐसा नहीं है जहां से ऐसे दा$गी व अपराधी छवि के लोग निर्वाचित होकर संसद या विधानसभाओं में न पहुंचते हों। रिपोर्ट के अनुसार देश के विभिन्न राजनैतिक दलों में दागी,अपराधी तथा बाहुबली निर्वाचित सदस्यों का प्रतिशत भी कम चौंकाने वाला नहीं हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा तथा मजलिस-ए-इतेहादुल मुसलमीन जैसे राजनैतिक दलों में जहां सौ प्रतिशत ‘माननीय’ दा$गी हैं वहीं शिवसेना में 82 प्रतिशत ‘माननीय’ अपराधी हैं। इसी प्रकार आरजेडी में 75 प्रतिशत,एआईएडीएमके में 44 प्रतिशत, एनसीपी में 44 प्रतिशत, जेडीयू में 40 प्रतिशत, समाजवादी पार्टी में 39 प्रतिशत, भारतीय जनता पार्टी में 38 प्रतिशत, बहुजन समाज पार्टी तथा बीजू जनता दल में 29 प्रतिशत, शिरोमणी अकाली दल में 25 प्रतिशत तथा डीएमके में 22 प्रतिशत माननीय, अपराधी रिकॉर्ड रखते हैं। जबकि काग्रेस व तृणमूल काग्रेस में अपराधी माननीय 21 प्रतिशत हैं। 2009 निवर्तमान लोकसभा में निर्वाचित 162 दागी सदस्यों में 76 सदस्य ऐसे हैं जिनपर कत्ल, डकैती,अपहरण व फिरौती जैसे गंभीर आरोप लगे हुए हैं तथा इनके विरुद्ध अदालत में आरोप पत्र भी दाखिल हो चुके हैं।
एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार देश की विधानसभाओं की स्थिति भी लोकसभा से कम खतरनाक नहीं हैं। इस समय देश के कुल 4032 विधायको में विभिन्न पार्टियों के 1264 विधायक अपराधी,भ्रष्ट,बाहुबली अथवा गैंगस्टर हैं। भारत व भारतवासियों के भविष्य का निर्धारण करने वाले नेतागण केवल चोरी, डकैती, हत्या, लूट व अपहरण जैसी घटनाओं में ही शामिल नहीं रहते बल्कि महिलाओं के साथ बलात्कार अथवा महिला उत्पीडऩ जैसे अपराधों में भी इनका पूरा योगदान रहता है। एडीआर के अनुसार 2009 के लोकसभा चुनाव में विभिन्न पार्टियों ने 6 ऐसे उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, जिनपर बलात्कार के मामले में आरोप पत्र दाखिल किए जा चुके हैं। जबकि 34 प्रत्याशी ऐसे थे जिनपर महिला उत्पीडऩ संबंधी दूसरे मामले अदालतों में विचाराधीन हैं। इसी प्रकार विधानसभाओं में 27 प्रत्याशी ऐसे थे जिनपर बलात्कार के मुकद्दमे चल रहे हैं। क्या उपरोक्त दर्पण को देखने के बाद हम देश की संसदीय व्यवस्था को भरोसेमंद, मानपूर्ण, निष्पक्ष अथवा विश्वसनीय व्यवस्था स्वीकार कर सकते हैं? क्या स्वतंत्रता संग्राम में अपना सबकुछ न्यौछावर कर देने वाले महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह, चंद्रशेखर आज़ाद,अशफाक उल्ला खां,सुखदेव,राजगुरु जैसे अनेक राष्ट्रभक्तों ने स्वतंत्र भारत में ऐसी ही भ्रष्ट व दागी लोकसभा व विधानसभाओं के गठन की कल्पना की थी?
देश के मतदाताओं को केवल देश के राजनैतिक दलों से ही इस बात की उम्मीद लगाकर नहीं रखनी चाहिए कि पार्टियां उनके समक्ष साफ-सुथरा, ईमानदार व चरित्रवान प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारेंगी। क्योंकि राजनैतिक दलों का लक्ष्य चुनाव में किसी भी प्रकार से जीत हासिल करना तथा बहुमत के जादूई आंकड़े तक पहुंचना होता है। अब इसके लिए चाहे उन्हें किसी बाहुबली को प्रत्याशी बनाना पड़े या गैंगस्टर, डाकू अथवा स्मगलर या बलत्कारी को। राजनैतिक पार्टियों का यह विश्वास बन चुका है कि चुनाव जीतने के लिए धनबल व बाहुबल बेहद ज़रूरी है। इसलिए संसद व विधानसभाओं को साफ-सुथरा रखने का जि़ मा हम देश के राजनैतिक दलों पर नहीं डाल सकते। यह तो हम आम भारतवासी व आम मतदाताओं को ही सोचना पड़ेगा कि पार्टियों द्वारा थोपे गए ऐसे कलंक रूपी दागी प्रत्याशियों को संसद के बजाए जेल की सलाखों के पीछे भेजने का रास्ता दिखाएं जहां के वे वास्तविक हकदार हैं। आम चुनाव प्रत्येक पांच वर्षों के बाद हमें यह सुनहरा अवसर प्रदान करते हैं कि हम देश के उज्जवल भविष्य के लिए अपने साफ-सुथरे,योग्य,ईमानदार, धर्मनिरपेक्ष तथा कर्मठ प्रत्याशी निर्वाचित करें। और यदि हमें कोई भी प्रत्याशी उचित न लगे तो इस बार चुनाव आयोग ने मतदाताओं की नापसंदगी ज़ाहिर करने वाला बटन भी वोटिंग मशीन में लगा दिया है। अत: मतदाताओं को चाहिए कि स्वच्छ लोकसभा के लिए यदि अच्छे उ मीदवार को वह नहीं चुन सकते तो कम से कम किसी भी दबाव या प्रभाव में आए बिना अपराधी व दा$गी व्यक्ति को हरगिज़ न चुनें। भले ही वह अपनी नापसंदी के पक्ष में मतदान क्यों न करें। बहरहाल, यह देश के मतदाताओं की ही जि़ मेदारी है कि वे दागियों से मुक्त लोकसभा व विधानसभाओं का गठन करें।

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