लेखक परिचय

शाहिद नकवी

शाहिद नकवी

मै फिलहाल स्‍वतंत्र हूं ।इसके पहले देश के कई अखबारों मे उप सम्‍पादक और रिर्पोटर के रूप मे काम कर चूंका हूं ।

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लाल किले की प्राचीर से डेढ़ साल पहले जिस किसी ने गुजरात के
मुख्‍यमंत्री से प्रधानमंत्री बने नरेन्‍द्र मोदी को भावुकता मे बहते
सुना था ,तब सचमुच लगा कि देश बदलाव के लिये अंगड़ाई ले रहा है ।विकास के
लिये सवा सौ करोड़ देशवासियों को आवाज़ देने वाले मोदी ने हर किसी को
भरोसा दिलाया था कि सबका साथ सबका विकास उनका एजेंडा है ।लेकिन इस दौरान
गणतांत्रिक भारत के साढ़े छह दशक के इतिहास मे पहली बार असहिष्‍णुता
,धर्मर्निपेक्षपता या पंथर्निपेक्षता जैसे शाब्‍दिक मुद्दों पर राजनीति
खूब गर्म हुयी । या यूं कहें कि इन शब्‍दों के वास्‍तविक अर्थ की
राष्ट्रीय परीक्षा ली गयी ।इसके चलते बड़े पैमाने पर लेखकों ने अपने
सम्मान लौटाए या अपने पदों से इस्तीफ़े दिए । इसका संदेश पूरी दुनिया में
गया और कश्मीर से लेकर केरल तक लेखकों ने एकजुटता दिखाई।ऐसा लगा कि क्षोभ
और प्रतिरोध की थरथराहटें कमज़ोर नहीं हुई हैं। इस बीच एक पूरा खेमा इस
प्रतिरोध को मिटाने पर पुरज़ोर तुल गया । वे भर्त्सना करते रहे , मज़ाक
उड़ाते रहे और सदाशयता पर बराबर सवाल भी उठाते रहे ।इसके बावजूद मौके
बेमौके मन की बात करने वाले पीएम मोदी खुद तो खामोश रहे लेकिन उनकी
पार्टी के बयान बाज़ जहरीले बोल बोलते रहे । शायद इसी वजह से मुलायम सिंह
जैसे खांटी समाजवादी नेताओं को शंका हुयी कि कहीं तीस सालों बाद बनी
बहुमत कि सरकार इन विषयों पर संविधान संशोधन पर आमादा ना हो जाये ।पहले
संविधान दिवस के मौके पर मुलायम ने अपना ये दर्द संसद मे जाहिर कर दिया
।उन्‍होने संसद मे बार – बार संविधान संशोधन ना करने की मांग उठायी
।बाकौल सपा सुप्रिमों हम लोग डा.भीमराव अंबेडकर ,पंडित जवाहरलाल नेहरू और
डा.राजेन्‍द्र प्रसाद से ज्‍़यादा काबिल नही हैं ? लेकिन अब तक देंश के
भीतर ऐसे मामलों पर मौन रहने वाले उन्‍हीं मोदी ने इन शंकाओं को र्निमूल
साबित करते हुये एक बार फिर देश को भरोसा दिलाया है कि सरकार का एक ही
धर्म है इंडिया फर्स्‍ट और एक ही धर्गग्रंथ भारत का संविधान है ।इस बार
उन्‍होने देश की संसद मे वह भी संविधान दिवस के मौके पर डा.भीमराव
अंबेडकर पर चर्चा के समापन मे बोलते हुये देश को विश्‍वास दिया कि
संविधान मे कोई बदलाव नही किया जायेगा ।प्रधानमंत्री ने कहा कि देश
संविधान के मुताबिक चला है और आगे भी चलता रहेगा । लोकतंत्र सहमति के
आधार पर चलता है और बहुमत का ये मतलब नही कि सब पर अपने विचार थोप दिये
जायें ।उन्‍होने हम की भावना से काम करने की भी वकालत की ।राजनीतिक हलके
मे ये माना जा रहा है कि शीतकालीन सत्र मे विपक्ष खासकर गैर कांग्रेसी
दलों को साधने के लिये मोदी बतौर प्रधनमंत्री के रूप मे नज़र आये ।
प्रधानमंत्री बनने के
बाद नरेन्‍द्र मोदी ने ऐसे कई बदलाव किये हैं जिनके बारे मे पहले किसी
प्रधानमंत्री ने सोचा तक नही था ।अपनी बात कहने के लिये उन्‍होने मन की
बात शुरू की तो स्‍वच्‍छता के लिये लालकिले की प्राचीर से देशवासियों को
जगाया ।गांधी जयंती को स्‍वच्‍छता से जोड़ा और नेहरू के जन्‍म दिवस को
खास बनाया ।जीवनदायिनी गंगा और यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने के लिये खास
कार्ययोजना का एलान किया ।शहरों की तस्‍वीर बदलने के लिये स्‍मार्ट शहर
की परिकल्‍पना की गयी ।युवाओं को तरूण भारत का सपना दिखाया ।लेकिन दादरी
काण्‍ड जैसे तमाम मामलों पर वह खामोशी ओढ़े रहे ।क्रिकेटरों और
फिल्‍मकारों के जन्‍म दिन पर उन्‍होने मुबारकबाद तो दी लेकिन जहरीले बोल
वाले पार्टी सांसदों और संगठनों पर लगाम लगाने की जरूरत नही समझी ।जिसके
चलते आदित्यनाथ, साध्वी प्राची, गिरिराज सिंह आदि जैसे चेहरों ने लगातार
बयानबाजी कर मोदी सरकार की ये इमेज बनाई है कि उनके पास बोलने वाले यही
लोग हैं। नतीजे मे देश मे पहली बार व्यापक बौद्धिक संकट सा खड़ा हो गया
।लोगों को लगा कि असहिष्णुता के पक्ष में गोलबंदी को शासकीय सहमति हासिल
हो गई है।जिससे असहिष्णुता की बहस देश की सरकार के विरोध की बहस में बदल
गई।यही नही सरकार समर्थकों के बचाव में उतरने के कारण ही सुरक्षा,
सांप्रदायिक सद्भाव और अभिव्यक्ति की आजादी जैसे विषय सरकार विरोधी दिखने
लगे। सहिष्णुता की बहस में मुद्दे पीछे छूट गए।या यूं कहें कि असहिष्णुता
सत्ता पाने का सिद्ध मंत्र बन गई है।तमाम लोगों का कहना है कि इस तरह के
मुद्दे जानबूझ कर भी उछाले जातें हैं ताकि जनमानस का ध्‍यान बांटा जा सके
। दालें अगर आज भी डेढ़ सौ रुपये किलो से अधिक पर बिक रही हों,खाद्य
तेलों के दाम भी चढ़ रहें हो और सीजन मे भी टमाटर,लहसुन वा प्‍याज़ के
दाम आसमान पर हो तो इस मंत्र को साधना और भी ज़रूरी हो जाता है।समूचा
प्रचारतंत्र इसी में जुटा है ताकि बहस फिल्‍मी ख़ानों पर होती रहे,
ग़रीबों के दस्तरख़्वान पर नहीं।ये कहना गलत नही होगा कि राजनीति ने पूरी
तरह से जनतंत्र को अपने दांवपेंचों के मकड़जाल मे उलझा रखा है ।
दरअसल विरोध लोकतंत्र का आधार है।सत्ता
बहुमत से आती है लेकिन दो चुनावों के बीच राय देकर या सरकारी फैसलों का
विरोध कर जनता अपनी संप्रभुता दिखाती है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में
हिस्सा लेती है। समझदार सरकारें और नेता भी उस पर प्रतिक्रिया देकर या तो
उसे स्वीकार करते हैं या नकार कर अपनी राय के लिए समर्थन जुटाते हैं।
लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं होती ,यहां तक कि जबानी हिंसा की भी
नहीं। पार्टी और संगठनों के नेताओं को अपने कार्यकर्ताओं पर काबू करने की
जरूरत है। डर के वातावरण में आर्थिक विकास की कहीं कोई मिसाल नहीं मिलती
। भारत भी यदि खाने पहनने और आदतों की बहस में फंसा रहा तो विकास का मौका
गंवा देगा। अस्थिर माहौल में बाहर के लोग निवेश नहीं करते और कुशल और
चतुर लोग अपने सपनों को साकार करने के लिए शांत माहौल की तलाश में बाहर
निकल पड़ते हैं। भारत के सामने कठिन चुनौती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी को अपनी नेतृत्व की क्षमता का असल परिचय अब देना है। सहिष्णुता की
बहस में मुद्दे पीछे छूट गए। भारत को विकास की पटरी पर लाने के लिए विवाद
के मुद्दों पर बहस करने की जरूरत है। भारत में किसी भी विचारधारा की
सरकार आए या जाए उससे भारत की प्रकृति तय नहीं होती, भारत की प्रकृति तो
संविधान तय करता है। यह धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक देश है और इसके सभी
बाशिंदे धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक हैं। संविधान में धार्मिक पहचान गौण
है, नागरिक की पहचान प्रमुख है।भारत के अधिकांश हिन्दू- मुसलमान कुल
मिलाकर भारत के संविधान के द्वारा परिभाषित संस्कृति और सभ्यता के दायरे
में रहते हैं। हमारा संविधान किसी भी समुदाय को कट्टरपंथी होने की अनुमति
नहीं देता। भारत कें संविधान से शासित होने के कारण सभी भारतवासियों को
उदारतावादी मूल्यों, संस्कारों और आदतों का विकास करना पड़ता है।सदन मे
संविधान दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ने भाजपा के रूख और रवैये मे बदलाव
का जो संकेत दिया है ,ये बदलाव न केवल दिखना चाहिए वरन असल मे आना भी
चाहिये ।जरूरी है कि साकार विपक्ष के उपेक्षा के आरोपों को खारिज करे
बल्‍कि अपने रवैये को लेकर देश मे बन रही धारण को भी र्निमूल साबित करे
।निकट भविष्‍य मे राज्‍य सभा मे सरकार को बहुमत मिलता नही दिख रहा है इस
लिये भी जरूरी है कि वह लचिले पन के साथ असल मे विपक्ष का सहयेग ले ।
पीएम मोदी ने ठीक ही कहा कि जनसामान्य की गरिमा और देश की एकता संविधान
का मूल है और हम सबको बांधने की ताकत हमारे संविधान में है।इस लिये अब इस
बात का कोई औचित्‍य नही कि भाजपा लगातार ये साबित करती रहे कि उसकी
हिंदूवादी राजनीति की नीति कांग्रेस जैसे दलों की बरसों पुरानी
तुष्‍टिकरण की राजनीति की देन है ।देश मे इस तरह की राजनीति तो हमारी
आजादी के समय से ही चली आ रही है। ये कहना गलत नहीं होगा कि अब तो आम लोग
भी कुछ-कुछ राजनैतिक पैंतरेबाजी के अभ्यस्त हो गए हैं।अब समय आ गया है कि
इस तरह कि सियासत से देश को मुक्‍त किया जाना चाहिये ।ये तभी सम्‍भव है
जब सरकारें जनता के मुद्दों पर ध्‍यान देगीं।डेढ़ साल पहले देश की अवाम
ने भाजपा को नही नरेन्‍द्र मोदी को इसी उम्‍मीद से जनादेश दिया था ।अभी
तक जन को ठोस धरातल पर उम्‍मीद की किरण नही दिखी है ।ये भी सही है कि
अनावश्‍सक बयानबाजी मोदी के बेहतरीन प्रयासों और अंतर्राष्ट्रीय यात्राओं
के सकारात्मक नतीजों पर पानी फेर रही है।विपक्ष पर भी ये जिम्‍मेदारी है
कि वह लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर मे टकराव के बजाय अवाम के मुद्दों पर
सरकार से जवाबतलब करे ।मंहगाई से राहत दिलाने का सरकार पर दबाव डाले और
जनहित के कानूनों को पास कराने मे मोदी सरकार की मदद करे ।वैसे राज्‍य
सभा मे कांग्रेस और जदयू तो लोकसभा मे कांग्रेस के साथ माकपा अहिष्‍णुता
पर चर्चा कराना चाहती है ।इस लिये ये सवाल फिर भी खड़ा है कि क्‍या संसद
का शीतकालीन सत्र जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा और सदन मे जनता के
मुद्दे भी सुनाई पड़ेगें या मानसून सत्र वाला हाल होगा ।
** शाहिद नकवी

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1 Comment on "दलीय टकराव के बजाय जनता की सुनें"

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डॉ धनाकर ठाकुर
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डॉ धनाकर ठाकुर

संविधान में परिवर्त्तन की दिशा स्वयम उसी में है और यह कहना की वह अंतिम है एक धार्मिक कट्टरपन सेमेटिक धर्मों की तरह है.हिंदूवादी राजनीति ही सच्ची सेकुलर राजनीती हो सकती है

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