लेखक परिचय

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पदस्थ हैं। वे स्वदेश ग्वालियर, दैनिक भास्कर, पत्रिका और नईदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसाययिक विषयों पर आलेख, कहानी, कविता और यात्रा वृतांत प्रकाशित। उनके राजनीतिक आलेखों का संग्रह 'देश कठपुतलियों के हाथ में' प्रकाशित हो चुका है।

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लोकेन्द्र सिंह राजपूत

दु:खद, बेहद दु:खद २०१३ का आखिरी शनिवार। दामिनी चली गई। हमेशा के लिए इस बेदर्द दिल्ली से। बेहया दुनिया से, जहां उसे सिर्फ मांस की तरह देखा गया। भेडिय़ों ने नोंचा था, १३ दिन पहले उसका जिस्म। १३ दिन बाद मौत हो गई भारत की अस्मिता की। घनघोर शर्मनाक दिन था १६ दिसंबर, जब भारत के दिल में महज रात १० बजे, चलती बस में दामिनी की आत्मा का बलात्कार किया ६ हरामखोर भेडिय़ों ने। १७ दिसंबर की सुबह लज्जा से सिकुड़ गया था सारा देश (युवा), जमा हो गया राजपथ पर, इंडियागेट पर और संसद के माथे पर। आक्रोशित, उद्ेलित, बेबस देश अपनी ही सरकार से पूछ रहा था- नारी को पूजने वाले देश में अब नारी कहां सुरक्षित रह गई है? सरकार आखिर करती क्या है? कब तक यूं ही तार-तार होती रहेगी मर्यादा, आजादी और दामिनी?

शर्मनाक आंकड़ा है- भारत में हर २० मिनट में एक दामिनी के साथ बलात्कार होता है और हवस का शिकार बनाया जाता है। हर २५ मिनट में किसी न किसी सार्वजनिक जगह, बस, ट्रेन, चौराहा, मॉल, स्कूल-कॉलेज या बाजार में दामिनी को छेड़ा जाता है। उस पर अश्लील फब्तियां कसी जाती हैं। ये इस हद तक अश्लील और अमर्यादित होती हैं कि कई दामिनी घर जाकर जिंदगी ही खत्म कर लेती हैं। वर्ष २००९ में २३ हजार ९९६, वर्ष २०१० में २५ हजार २१५, वर्ष २०११ में २६ हजार ४३६ और वर्ष २०१२ में भी लगभग बीते वर्ष के बराबर दामिनी भूखे जानवरों का ग्रास बनीं। लेकिन, देश अब जागा। देर से ही सही जागा तो सही वरना और देर हो जाती। ये मामले ऐसे हैं, जिनमें चार्जशीट दाखिल हुई। इसके इतर कई मामले तो थाने ही नहीं पहुंच पाते तो कई मामले थाने में ही समझौते के बाद खत्म हो जाते हैं। इतना ही नहीं उक्त मामलों में महज २२ फीसदी बलात्कारियों को ही सजा हुई। जबकि बलात्कार की शिकार प्रत्येक दामिनी रोज सजा पा रही है। जिंदगीभर भेडिय़े की हरकत उसे भीतर ही भीतर खाये जाती है।

देश इस बार जागा था कि अपराधियों को फांसी से कम सजा पर नहीं मानेगा, चुप नहीं बैठेगा। देश की यह स्व स्फूर्त जाग्रति है। सोशल मीडिया की इसमें अहम भूमिका है। निरुत्तर सरकार देश को जवाब देने की जगह पुलिस को देश पर लाठियां भांजने का हुक्म देती है। लेकिन, इस बार गुस्सा पानी का बुलबुला नहीं था। युवा राजपथ पर डट गए, सह गए पानी की तेज धार। आंसू गैस के गोले क्या रूलाते आंखें तक १६ दिसंबर को ही सूख गईं थी। युवा जोश के सामने बेकार साबित हुए पुलिस के अश्रु गोले। पीठ, पैर और सीने पर लाठी खाकर भी मुंह से उफ नहीं निकली, निकली तो बस एक आवाज- वी वांट जस्टिस। बलात्कारियों को फांसी दो। देश की अस्मित की सुरक्षा की गारंटी दो….. सरकार फिर भी खामोश रही। सोनिया के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्पी आज भी कायम रही। युवराज हमेशा की तरह लापता थे। मंत्री फितरत के मुताबिक आज भी देश को टरकाने के मूड में दिखा। दिल्ली की महारानी एक बार भी पीडि़त के हाल जानने नहीं पहुंची। सब दूर से निराश युवा इंसाफ की आस लिए नए नवेले राष्ट्रपति प्रणव दा के पास भी गया था लेकिन वहां भी सन्नाटा ही पसरा था। न्याय नहीं मिलता देख आखिर युवा मन उखड़ गया। लेकिन, हारा नहीं। अब तो मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल…. मुंबई यानी सारा देश साथ खड़ा हो गया दामिनी के हक के लिए। आधी आबादी के लिए। सृष्टि के शक्ति केन्द्र के सम्मान में सब दूर आवाज बुलंद हो उठी। जज्बा, उत्साह, उमंग, हौसला, गुस्सा और आक्रोश ऐसा दिखा कि सरकार से आर-पास की लड़ाई हो ही जाए। नारा बुलंद हुआ- कितना दम है दमन में तेरे, देखा है और देखेंगे। गूंजी मांग – जब तक इंसाफ नहीं होता ये आक्रोश ठंडा नहीं पड़ेगा। कानून कड़े बनाए। सुधार लाओ। सुरक्षा पुख्ता करो। बलात्कारियों को फांसी दो। १३ दिन से आक्रोश बरकरार था। अब अलविदा कह गई दामिनी। तो क्या गुस्से को ठंडा होने दिया जाए। सरकार तो यही चाहती है। लेकिन, आज फिर युवा देश ने कह दिया- अभी न्याय बाकी है, गुस्सा बाकी है, लड़ाई जारी है और जारी रहेगी इंसाफ होने तक। २९ दिसंबर को दामिनी चली गई हमें बेशर्म व्यवस्था से अपने अधिकार के लिए लडऩा सिखाकर। उसकी सीख जाया नहीं होने देना है, गुस्सा खत्म नहीं होने देना है। कभी नहीं जागने वाली नींद में जाने से पहले कह गई वो- अब और कोई दामिनी नहीं बननी चाहिए। न्याय चाहिए। मेरे हक में उठे हाथ, आवाज अब खामोश नहीं होने चाहिए। युवा मन में जो उबाल आया है वह ठंडा नहीं होना चाहिए। नींम बेहोशी से जो देश जागा है तो अब सोना नहीं चाहिए।

इन १३ दिन में राजनीति के पतन का शीर्ष भी दिखा तो हड़बड़ाए नेताओं का मानसिक दिवालियापन भी सामने आया। लोमहर्षक, बीभत्स, नृशंस अपराध के बाद भी नेता जुबान संभालकर बात नहीं कर पाते। प्रणव दा के बेटे अभिजीत कहते हैं कि कैंडल मार्च फैशन हो गया है। दिन में प्रदर्शन, शाम को कैंडल जलाने के बाद ये रंगी-पुती युवतियां पब में मौज उड़ाती हैं। एक महिला नेता कहती है कि जब छह लोगों ने घेर लिया था तो उसे वीरता दिखाने की क्या जरूरत थी, सरेंडर कर देना चाहिए था। महिला अधिकारी की हितैषी एक अन्य महिला कहती है कि इतनी रात फिल्म देखने जाएंगी तो यही होगा। घोर आपत्तिजनक हैं ये बयान। चाय की गुमठी और चौराहे पर पान की पीक थूकते लोग भी शायद इस समय ऐसी बात कर रहे हों। दूसरे नेता कहते हैं कि देश में अराजक स्थितियां हैं। सवाल उठता है कि इन स्थितियों के लिए कौन जिम्मेदार है? कौन संभालेगा देश? एक ने कहा कि माहौल ऐसा है कि मेरी बेटियां भी सुरक्षित नहीं। महोदय यह सफेद झूठ है। आपकी बेटियां जिस दिन असुरक्षित हो जाएंगी तो झट से कड़े कानून आ जाएंगे। तब दरिंदे १३ दिन तक जीवित नहीं रहेंगे। शर्म करो… संसद और विधानसभा में बैठकर काम करने की जगह अश्लील फिल्म देखते हो, दामिनी पर बहस होती है तो खीसें निपोरकर हंसते हो। कुछ काम करो ताकि आम आदमी की बेटी, पत्नी, बहू घर से बिना संकोच निकले, शान से सिर उठाकर सड़क पर चले और बिना किसी अपमानजनक स्थिति का सामना किए खुशी मन से घर लौट सके। कानून में सुधार लाओ। वैज्ञानिक तरीके से सबूत जुटाए जाएं। पुलिस को संवेदनशील बनाओ। गवाहों को सरंक्षण दो। फास्ट ट्रैक कोर्ट पर सुनवाई हो ताकि अपराधी बचकर न निकल सकें। उनमें खौफ पैदा हो। गलत काम की कीमत उन्हें चुकानी पड़े।

आखिर में लंबी नींद से जागे हुए देश से अपील है। जिंदगी की जंग हारने से पहले दामिनी जगा गई है देश को। १३ दिन देश सोया नहीं, थका नहीं, डरा नहीं सरकार के वार से। इस जज्बे को बनाए रखना होगा वरना फिर किसी चलती बस में, होटल में, पब में या फिर किसी चाहरदीवारी के भीतर तार-तार कर दी जाएगी दामिनी।

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