लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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कुछ समय पूर्व भारत के टीवी चैनल्स पर एक नामी सीमेंट कम्पनी का विज्ञापन प्रसारित किया जा रहा था जिसमें एक लड़की के कुछ अंगों को उभारकर दिखाया जाता था। यहां  सोचने वाली बात यह है कि सीमेंट से लड़की का ताल्लुक क्या था? क्या वह लड़की सीमेंट खाती थी या वह सीमेंट से बनी थी? शायद कारण तक जाने की किसी को आवश्यकता ही नहीं महसूस हुई। किंतु इसकी जड़ में पश्चिमी नव वामपंथी विचारधरा कार्य कर रही थी जो वास्तव में वर्तमान में हमारे सर चढ़ कर बोल रही है।

 

इस पश्चिमी नव वामपंथी विचारधरा में सेक्स को खुलकर परोसा जसा रहा है क्योकि यह पश्चिम विचारधरा इस बात पर विश्वास करती है कि सेक्स व स्त्राी का सुडौल शरीर कहीं छुपा कर रखने की चीज नहीं है। पश्चिम में यौन शिक्षा की भी बहुत पैरवी की जाती है। स्कूलों में कंडोम दिखाया जाता है और उसके प्रयोग के तरीके भी बताये जाते हैं। और भी न जाने क्या-क्या?

 

अब भारत में भी उसी तर्ज पर यौन शिक्षा स्कूलों में पेश की जाने की बातें की जा रही हैं। हम भी आंख बंद कर पश्चिम की नकल करने में लगे हुये हैं। हाल ही में अमेरिका के एक घर के अंदर की बात पढ़ने को मिली। टीवी पर कंडोम का विज्ञापन आ रहा था तभी एक बारह साल की लड़की अपनी मां से पूछती है कि मां यह कंडोम क्या होता है? अब यदि हम भी यौन शिक्षा का प्रचार करना चाहते हैं तो अपने बच्चों के ऐसे ही सवालों का जवाब देने के लिए तैयार रहना चाहिए? ऐसा नहीं होगा कि बच्चा जो स्कूल में पढ़कर आयेगा उसे घर पर दोहराएगा नहीं? भारत मंे अब तक अश्लील शब्द की परिभाषा कानून ही तय नहीं कर पाया है। पहले तो उसे ही इस शब्द को पढ़ लेना चाहिए।

पश्चिम में रिश्ते नाते नहीं होते हैं। सेक्स उनके लिए पिज्जा-बर्गर जैसा ही है। हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो यह कहते हैं कि देश  में यौन शिक्षा का प्रचार खुलकर होना चाहिए। इस बात को पुख्ता करने के लिए वे जो तर्क देते हैं जरा उसे भी सुनिए, सन् 1999 तक 150 देशों में 3,23,379 व्यक्ति एड्स से पीड़ित थे ;यूनेस्कोद्ध, जिनमें सबसे अध्कि संख्या भारतीयों की ही थी। अगर भारत में यौन शिक्षा का प्रचार हो तो ऐसा नहीं होगा। जबकि अब यह साबित हो चुका है कि इस बान को यूनेस्को ने अमेरिका के कहने पर ही पफैलाया था ताकि उसकी सेक्स इंडस्ट्री भारत में तथा विश्व में पैर पसार सके। दूसरी तरपफ अमेरिका में ही 60 पफीसदी से ऊपर ‘पफीमेल सेक्सुअल डिस्पफंक्शन’ से पीड़ित हैं। इस बात को अमेरिका की ही कुछ कंपनियों ने पफैलाया है। जबकि अमेरिका के वैज्ञानिक ही कहते हैं कि इस तरह की कोई बिमारी होती ही नहीं है। अब आप ‘पफीमेल सेक्सुअल डिस्पफंक्शन’ का अर्थ भी जान लीजिये, जैसे पुरुषों में नामदांगी होती है वैसे ही महिलाओं में भी नजनानीपन को यह नाम दिया गया है। जबकि विज्ञान कहता है कि स्त्रिायां बांझ हो सकती हैं किंतु ‘पफीमेल सेक्सुअल डिस्पफंक्शन’ कभी नहीं। यह बस स्वार्थी लोगों की चाल है, अब बताइये कि हम ऐसे चालबाज लोगों की राह पर कैसे चल सकते हैं।

अमेरिका में लगभग 3 अरब लोग एड्स से पीड़ित हैं तथा यह आकड़ा भारत, कनाड़ा, ब्रिटेन तथा जापान से कहीं ज्यादा है। संमलैगिकों की सबसे ज्यादा भरमार अमेरिका में ही है। अमेरिकर वामपंथ बोल रहा है कि उसके देश में 17 प्रतिशत टीन प्रेग्नेंसी कम हो गई है क्योकि वो यौन शिक्षा का प्रचार कर रहा है। यह उसका नजरिया है, भारतीय सनातन के अनुसार इसका अर्थ यह है कि वहां के युवा अब बिना किसी झिझक के सेक्स कर रहे हैं। वहां की लड़कियां मातृत्व को खो रही हैं। कड़ोम, आई पिल्स है तो डर अब है ही नहीं। जबकि भारतीय र्ध्म कहता है कि गर कंडोम और ये स्टोप प्रेंग्नेंसी नहीं होगी तो एक डर से युवा मार्ग से भटकने से बच सकता है।

अमेरिका में हर साल 30 लाख किशोरियों को यौन रोग हो रहे हैं। 100 में से 56 प्रतिशत किशोरियां ही मां बनने को तैयार होती हैं। 83 प्रतिशत बिन ब्याही लड़किया जो मां बनती हैं वे गरीब घर से होती हैं तथा भु्रण हत्या का खर्च वहन नहीं कर सकती हैं। सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि अमेरिका में 35 प्रतिशत लड़के तथा 25 प्रतिशत लड़कियां 15 साल की उम्र से पहले ही संभोग कर लेते हैं। 19 साल तक पहुंचते-पहुंचते यह आकड़ा 85 प्रतिशत लड़के तथा 77 प्रतिशत लड़कियों तक पहुंच जाता है। एक अध्ययन में बताया गया कि अगर वहां के युवा ऐसा न करें तो इन पर इनके दोस्त हसंते हैं। इसी अध्ययन में यह भी बताया गया कि 19 साल की जो 77 प्रतिशत लड़कियां संभोग करती हैं उनमें से 12 प्रतिशत  ही इतनी खुशनसीब होती है जिनसे उनका बायप्रफैंड शादी करता है।

आज प्श्चिम में भी दबे शब्दों में कहा जाने लगा है कि भारत का ब्रहाचार्य एक अच्छा शस्त्रा है। किंतु कितनी बड़ी विडबना है कि हम अंध्े होकर प्श्चिम के पीछे भागे जा रहे हैं। माता-पिता अपने बच्चों को स्वतंत्राता दे रहे हैं यह अच्छी बात है किंतु इसका मतलब यह नहीं है कि उनके बच्चें कहां जा रहे हैं, क्या पहन रहे हैं? इससे उन्हें कोई मतलब ही नहीं है। आज दिल्ली में ही 60 प्रतिशत लड़किया आई-पिल्स को हाजमें की गोली की तरह खा रही हैं।

भारत में एक नामी चैनल पर प्रसारित कार्यक्रम ‘स्वंवर’, ‘अमेरिकन बैचलर’ नामक शो की कापी है, इस बैचलर शो में सेक्स का प्रदर्शन होता है। स्त्राी-पुरूष संबंध् तार-तार किये जाते हैं। ऐसे बहुत से नये प्रोगा्रम भी जल्द शुरू होने वाले हैं जो यह सि( करते है कि अब भारत में भी सेक्स इंडस्ट्री पश्चिम द्वारा खूब उगाई और खाई जा रही है। यह सेक्स इंडस्ट्री 1000 करोड़ का व्यापार हमारे देश में कर रही है। इंटरनेट पर खुलकर सेक्स सामग्री को परोसा जा रहा है तथा हमारा प्रशासन कुछ भी नहीं कर पा रहा है। भारत में भी अब सेक्स के  अविवाहित मरीजों की संख्या बढ़ रही है।

जागरूकता के नाम पर अब हमारे देश में भी देहकामना की पूर्ति की जा रही है। अखबारांे, टीवी चैनलों पर जो यौन क्रांति पेश की जा रही है वह पश्चिमी विध्वंसक शक्तियों की ही सोचा समझी एक चाल है जो भारतीय संस्कृति कोे पूरी तरह से नष्ट कर देना चाहती हैं।

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14 Comments on "भारतीय संस्कृति पर अश्लीलता का खतरा"

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आर. सिंह
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ऐसे मुझे बार बार टिपण्णी करनी पड़ रही है ,जो अच्छा तो नहीं लग रहा है पर भ्रम दूर करने केलिए ऐसा करने के लिए विवश हो जा रहा हूँ.मैं मानता हूँकि आम शिक्षित भारतीय साधारणतः आर्थिक मान्यता के अनुसार दो खेमों में बटा हुआ है.जिसमे तथाकथित वाम पंथ पहले खेमे का प्रतिनिधित्व करता है और दूसरा खेमा दक्षिण पंथ यानि जो तथाकथित पूंजीवाद से प्रभावित खेमा है. उसी तरह मानसिकता या नैतिकता के मामले में भी दो खेमा है.एक तो जिसको प्रत्येक विदेशी चीज अच्छा लगता है और दूसरा जिसको हर विदेशी व्यवहार या चाल चलन अनैतिक लगता है.मेरे… Read more »
chandra kant
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नीचे जो आकड़ा दिया हैं वामपंथी लोग कुछ बोले,, अगर सच में वो अमेरिका तथा पश्चिम की तारीफ़ करना चाहते हैं तो,,, ,, और खुदा ने चाहा तो मेरा अगला लेख ऐसा होगा जो ये साबित कर देगा की एड्स को पश्चिम ही, पूरे विश्व में फेला रहा है अमेरिका में हर साल 30 लाख किशोरियों को यौन रोग हो रहे हैं। 100 में से 56 प्रतिशत किशोरियां ही मां बनने को तैयार होती हैं। 83 प्रतिशत बिन ब्याही लड़किया जो मां बनती हैं वे गरीब घर से होती हैं तथा भु्रण हत्या का खर्च वहन नहीं कर सकती हैं।… Read more »
chandra kant
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जी नमस्कार , मेरे इस लेख में जो आंकड़ा हैं वह यह था की सन १९५२ से लेकर सन २००९ तक ३ अरब लोग एड्स से पीड़ित हो चुके हैं और इसमें मर चुके लोगो का भी आंकड़ा है , इसमें अमेरिका के मूल निवासी तथा गैर निवासी दोनों सामिल हैं…., ऐसा कहना अमेरिकेन रेसेअर्च का ही हैं…. और ये रिपोर्ट पहली बार प्रकाश में आई है.. अब मेरे इस लेख से वामपंथी लोगो को आग लगनी तो जायज ही है,, ये वामपंथी बस ऐसे लेखो में गलतियाँ ही निकाल सकते हैं,,, ये लोग भारत में तो रहते हैं, लेकिन… Read more »
आर. सिंह
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डाक्टर राजेश कपूर की जानकारी के लिए मैं लेख वह हिस्सा उद्धृत कर रहाहूं जहां अमेरिका में एड्स पीड़ितों की संख्या दिखाई गयी है.”अमेरिका में लगभग 3 अरब लोग एड्स से पीड़ित हैं तथा यह आकड़ा भारत, कनाड़ा, ब्रिटेन तथा जापान से कहीं ज्यादा है।’ तीस करोड़ की आवादी वाले देश में तीन अरब एड्स पीड़ित?ऐसे ताज़ा जानकारी के अनुसार अमेरिका में एड्स पीड़ितों की संख्या शायद हजारों में ही सीमित है.ऐसे भी अमेरिका के मुख्य रोग संक्रामक नहीं बल्कि जीवन शैली पर आधारित यानि कैंसर,हृदय रोग इत्यादि है. अमेरिका में यौन सम्बन्धी बीमारियाँ भी अपेक्षाकृत कम है.रह गयी भारत… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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एक सूत्र का प्रयोग करके हम जान सकते हैं कि हम मैकाले की योजना का शिकार बनकर अपने देश और संस्कृति के दुश्मन बने हैं या नहीं. ‘ अपने देश, संस्कृति, महापुरुषों, श्रधा केन्द्रों की प्रशंसा सुनकर हमारे रोंगटे खड़े होते हैं या नहीं, हम आनंदित होते हैं या नहीं ? अपने देश, धर्म, संस्कृति, बलिदानियों, पुराण-पुरुषों की आलोचना से हमारा रक्त खौलने लगता है, हम आवेश– क्रोध से भर उठते हैं या नहीं? यदि नहीं तो इस कटु सच्चाई को जानलें, मानलें कि हम देश द्रोही बन चुके हैं, चाहे अनजाने में ही सही. हम मैकाले की कुटिलता का… Read more »
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