लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

पश्चिम बंगाल के मालदा में जो हुआ वह हैरतअंगेज है। एक अनजान से हिंदू नेता के चलताऊ बयान मात्र से हिंसा, आगजनी और सांप्रदायिक तनाव की इतनी बड़ी घटना बिना किसी अंदरूनी बहकावे के घटना मुश्किल है ? क्योंकि विश्व हिंदू महासभा के मामूली नेता कमलेश तिवारी ने बयान तो उत्तर प्रदेश में दिया,लेकिन ढाई लाख मुसलमानों ने जुलूस मालदा में निकाला और फिर विरोध जाहिर करने के लिए निकाला गया जुलूस एकाएक हिंसा और आगजनी के क्रूर तांडव में बदल गया। यहां तक कि पुलिस थाना पर हमला बोल दिया। विशेष सुरक्षा बल के वाहनों समेत 25 वाहन आग के हवाले कर दिए। यात्री बासों को भी नहीं बख्शा। बावजूद सांप्रदायिक सद्भाव की पैरोकार पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने इस पूरे मामले पर न केवल मुंह बंद रखा, बल्कि इसे दबाने की भी नाकाम कोशिश की। भला हो इलेक्ट्रोनिक मीडिया का जिसने आग से खेल रही ममता के मुस्लिम तुष्टिकरण की मंशा को बेपर्दा करने में राष्ट्रीय दायित्व का पालन किया। अब खुलासा होने के बाद मुख्यमंत्री कह रही हैं कि कालियाचक में हुई घटना बीएसएफ और स्थानीय लोगों के बीच झगड़े का नतीजा है। राज्य में कोई सांप्रदायिक तनाव नहीं है। साथ ही उन्होंने राज्य सरकार, तृणमूल कांग्रेस और स्थानीय पुलिस व प्रशासन का भी बचाव किया। ममता का इस तरह से हकीकत से मुंह चुराना अपनी कमजोरियों पर पर्दा डालना है। इस बयान से बीएसएफ के जवानों का भी मनोबल गिरेगा, क्योंकि वे वहां तमाशा देखने नहीं गए थे, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था में तैनात थे।

हालांकि नेता छोटा हो या बड़ा, उसे धर्म से जुड़े नायकों पर ऐसी टिप्पणी कभी भी नहीं करनी चाहिए जो धर्म समुदायों के लिए ईश्वर के रूप में प्रचलित होने के कारण वंदनीय हैं। क्योंकि धर्म हमारे बालमन में ही जन्मजात संस्कारों के जरिए अवचेतन में गहरी पैठ बना लेता है। इस लिहाज से कमलेश तिवारी ने उत्तर प्रदेश में पैगंबर मोहम्मद से संबंधित जो आपत्तिजनक टिप्पणी की थी,उसे कतई उचित नहीं कहा जा सकता है। लेकिन इस बात के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की तरीफ करनी होगी कि उसने कथित टिप्पणी संज्ञान में आने के तत्काल बाद ही तिवारी पर कानूनी शिकंजा कसकर सीखंचों के पीछे कर दिया। इस कार्रवाही का कारगर परिणाम यह निकला कि उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक सद्भाव कायम रहा। उत्तर प्रदेश के पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में मुसलमानों ने विरोध स्वरूप बड़े-बड़े जुलूस निकाले, लेकिन कहीं हिंसा नहीं भड़की। आगजनी नहीं हुई। तब गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में माहौल बिगड़ा तो क्यों बिगड़ा ? यहां इस भीड़ का चरित्र आखिर ऐसी कौनसी परिस्थिति या मंशा का सबब बना की राष्ट्रीय संपदा को नुकसान पहुंचाने पर आमादा हो गया। इससे यह आशंका सहज ही पैदा होती है कि कहीं हिंसा का ताल्लुक इसी साल होने वाले पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव से तो नहीं हैं ?

यह शंका इसलिए भी प्रबल है,क्योंकि भाजपा को छोड़ बंगाल के सभी राजनीतिक दल इस हिंसा पर खामोशी ओढ़े हुए हैं। अन्यथा यहां के प्रमुख विपक्षी वामपंथी दल तो ममता सरकार को घेरने को हमेशा उतावले दिखाई देते हैं। हालांकि वामपंथी भी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के चलते मुस्लिमों के गैरकानूनी कामों पर अंततः पर्दा ही डालने का काम करते हैं। यही वजह है कि बंगाल के राजनीतिक दल इस हिंसा को भी सांप्रदायिक संगठनों के मार्फत गोलबंद करने में लगे हैं। मुस्लिमों को तो हमारे देश में कांग्रेस समेत अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल वोट बैंक ही मानते रहे हैं,इसलिए वे उनकी नाराजी मोल लेने से अकसर बचते हैं। कमोबेश हिंदुओं के परिप्रेक्ष्य में यही मंशा भाजपा की रहती है। इसलिए वह भी हिंदू समुदायों के धु्रवीकरण को अकसर उकसाने का काम करती है।

आरोप तो यह है कि अधिकतर दंगाई तृणमूल कांग्रेस से जुड़े हैं। इसी वजह से भीड़ को हिंसक होने में देर नहीं लगी। जुलूस को नियंत्रित बनाए रखने के लिए तैनात पुलिस भी इसलिए अपेक्षित सख्ती बरतने में हीला-हवाली करती रही। नतीजतन एक बार भीड़ तंत्र जो बेकाबू हुआ तो प्रशासन व पुलिस तंत्र अपनी आत्मरक्षा में तार-तार बिखर गया। केंद्र ने जब राज्य सरकार पर जरूरी दबाव बनाया तब कहीं जाकर हिंसा को नियंत्रित करने के नजरिए से सख्ती बरती गई और कुछ गिरफ्तारियां हुईं। चंद पुलिस वालों के तबादले भी किए गए। घटना के सिलसिले में तो यह फौरी कार्रवाही हो गई,लेकिन सियासतदारों की सांप्रदायिकता की आग से खेलने की ऐसी तुच्छ मंशाएं अंततः राष्ट्र पर भारी ही पड़ती हैं। मालदा समेत पश्चिम बंगाल की लंबी सीमा बांग्लादेश से जुड़ी है। इसलिए ऐसी उग्र हिंसा और सांप्रदायिक तनाव राष्ट्रीय सुरक्षा को भी बड़ी चुनौति का सबब बन जाते हैं। वैसे भी बांग्लादेश में चरमपंथी मजहबी संगठन अर्से से सिर उठाए हुए हैं। ब्लाॅगरों की हत्या का सिलसिला जारी रखते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरा बने हुए हैं। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा बांग्लादेश में रह रहे हिंदुओं को भुगतना पड़ता है। लिहाजा मालदा की हिंसा पर सियासी रंग चढ़ाना देश हित में कतई नहीं है।

इसके बावजूद जूलूस में शामिल ऐसे कई लोग थे, जिन पर गंभीर अपराधों के साथ तस्करी के भी मामले दर्ज हैं। ऐसा बताते हैं कि पुलिस इन पर गिरफ्तारी का दबाव बनाए हुए थी। इस मुहिम से अपराधी परेशान थे। ऐसे में उन्हें जुलूस के रूप में दंगा भड़काने का अवसर मिल गया। इस अवसर को असामाजिक तत्वों ने इसलिए भी भुनाया,क्योंकि वे जानते थे कि तृणमूल हो या वामपंथी,आगामी विधानसभा चुनाव के चलते अल्पसंख्यक वोटों को नाराज करने का जोखिम कोई उठाने वाला नहीं है। यही वजह है कि मालदा की हिंसा पर सियासी रंग गहराता जा रहा है। इस हिंसा की पृष्ठभूमि से बंगाल से जुड़ी कुछ कट्टरपंथी वारदातें भी सामने आई हैं। कोलकाता में तलपुकुर आरा उच्च मदरसा के प्रधान अध्यापक काजी मासूम अख्तर पर कुछ समय पहले इसलिए हमला हुआ,क्योंकि वे राष्ट्रीय भावना और दायित्व से अभिप्रेरित होकर विद्यार्थियों को राष्ट्रगान का पाठ पढ़ा रहे थे। किंतु चरमपंथियों को यह पाठ रास नहीं आया और उन्होंने शिक्षक की सरेआम पिटाई लगा दी। यही नहीं इस राष्ट्रवादी शिक्षक के मदरसा जाने पर रोक भी लगा दी गई थी। इतना हो चुकने के बावजूद पुलिस ने पर्याप्त कानूनी कार्यवाही नहीं की ? राज्य के प्रगतिशील वामपंथियों की भी बोलती बंद रही। क्योंकि निकट भविष्य में चुनाव होने हैं और चुनाव में मुसलमानों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करना है। सत्ताधारी दल की भी कमोबेश यही मंशा थी,इसलिए राज्य पुलिस ने ममता सरकार की मंशा के अनुरूप ही कार्रवाही को अंजाम दिया।

दरअसल मालदा एक सीमांत जिला है। इसलिए यहां चरमपंथियों को सरंक्षण देने के उपाय अंततः घातक ही साबित होंगे। वैसे भी पश्चिम बंगाल व असम समेत सभी सीमांत प्रांतों का बांग्लादेशी अवैध घुसपैठियों के चलते लगातार जनसंख्यात्मक घनत्व बिगड़ रहा है। अनेक जिले मुस्लिम बहुल होते जा रहे हैं। असम में मूल आदिवासी और घुसपैठियों के बीच बार-बार छिड़ जाने वाला संग्राम इसी नजायाज घुसपैठ का परिणाम है। कांग्रेस तो केंद्र व असम में अर्से तक सत्तारूढ़ रहने के बावजूद इस मुद्दे पर लंबी चुप्पी साधे रही, इसी चुप्पी का अनुसरण बंगाल में 35 साल सत्तारूढ़ रहे वामपंथी दलों ने किया। हैरानी यह है कि ममता बनर्जी भी इसी राष्ट्रविरोधी परिपाटी को आगे बढ़ा रही हैं। मालदा में ही महिला फुटबाॅल प्रतिस्पर्धा एक फतवे के बाद इसलिए रद्द कर दी गई  थी,क्योंकि उसमें मुस्लिम युवतियां शिरकत करने वाली थीं। फिर ईद की वजह से दुर्गा माता की मूर्तियों का विर्सजन एक दिन टाल दिया गया था। भाजपा पर सांप्रदायिक होने का आरोप मढ़ने वाली ममता बनर्जी खुद कितनी धर्मनिरपेक्ष हैं,यह मूल्यांकन पश्चिम बंगाल की जनता को करने की जरूरत है।

पिछले दिनों साहिष्णुता बनाम असहिष्णुता का खूब प्रलाप हुआ। साहित्यकारों,वैज्ञानिकों और फिल्मकारों ने दादरी की घटना को बढ़ती असाहिष्णुता का सबब मानते हुए अपने सम्मान लौटा दिए थे। ऐसा माहौल रच दिया था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांप्रदायिक सद्भाव खतरे में हैं। किंतु अब मालदा और तलपुकुर में जो व्यापक पैमाने पर असहिष्णुता देखने में आई हैं,इस पर इन बौद्धिकों ने ओंठ सिल हुए हैं। ऐसा क्यों,यह सोचनीय पहलू है। इससे साबित होता है कि बुद्धिजीवियों की असहिष्णुता के पीछे भी सियासी वजह थी,क्योंकि बिहार में चुनाव चल रहे थे। अब मालदा की हिंसा भी ऐसा लगता है,कि कुछ समय बाद पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनाव के परिप्रेक्ष्य में मुस्लिम वोटों के धु्रवीकरण की कुटिल चाल है।

प्रमोद भार्गव

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