लेखक परिचय

शंकर शरण

शंकर शरण

मूलत: जमालपुर, बिहार के रहनेवाले। डॉक्टरेट तक की शिक्षा। राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर अग्रलेख प्रकाशित होते रहते हैं। 'मार्क्सवाद और भारतीय इतिहास लेखन' जैसी गंभीर पुस्‍तक लिखकर बौद्धिक जगत में हलचल मचाने वाले शंकर जी की लगभग दर्जन भर पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

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download (1)कुछ लोग दंगों का गणित चतुराईपूर्वक इस्तेमाल करते हैं। जिसे पुनः लाने की तैयारी चल रही है, वह ‘सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा निरोध विधेयक’ भी मान कर चला था कि सांप्रदायिक हिंसा के दोषी बहुसंख्यक समुदाय और पीड़ित अल्पसंख्यक समुदाय के लोग होते हैं। तदनुरूप निरोधक और दंड व्यवस्था की भी परिकल्पना की गई थी। यही मानसिकता दंगे संबंधी अधिकांश बौद्धिक विचार-विमर्श में है। मगर आंकड़े क्या कहते हैं?

विगत 18 अक्तूबर सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल के मुजफ्फरनगर दंगे में हताहतों और आरोपियों का हिसाब दाखिल किया कि उस में 15 हिन्दू और 37 मुस्लिम मारे गए। उस से पहले 25 सितंबर को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी विगत दो वर्ष में देश में सांप्रदायिक हिंसा का कुछ आँकड़ा जारी किया। उस के अनुसार कुल 89 हिन्दू और 114 मु्स्लिम मरे, तथा 1804 हिन्दू और 1490 मुस्लिम घायल हुए। यह केवल चार राज्यों – बिहार, उ.प्र., गुजरात व महाराष्ट्र का हिसाब था। सरसरी तौर पर यही दिखाया जाता है कि सांप्रदायिक दंगों में मुसलमान अधिक मरे, हिन्दू कम। किंतु इस गणित में बहुतेरी गड़बड़ियाँ हैं।

सर्वप्रथम, हिसाब रखने में एक मापदंड नहीं। गड़बड़ी कई बार प्रेस रिपोर्टिंग से ही आरंभ हो जाती है। प्रेस काउंसिल ने कह रखा है कि दंगों के संदर्भ में किसी समुदाय का नाम न लिया जाए, परंतु मीडिया अबूझ रवैया अपनाता है। किसी हिंसा में ‘क’ समुदाय के पीड़ित होने पर वह समुदाय का नाम लेता है, पर ‘ख’ के पीडित होने पर उल्लेख नहीं करता। दंगे आरंभ करने वालों पर भी वही रवैया। यदि शुरुआत ‘क’ ने की हो, तो बात छिपाई जाती है। गोल-मोल रिपोर्टिंग होती है। गोधरा और गुजरात दंगा (2002) की रिपोर्टिंग इंटरनेट पर देखी-परखी जा सकती है। उससे पीछे बंबई, मऊ, मुरादाबाद, भागलपुर, जमशेदपुर, जबलपुर, आदि लगभग सभी दंगों में इस प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। सभी तफसीलें सबके सामने नहीं आने दी जातीं। चुनी हुई बातें बताई-छिपाई जाती हैं।

दूसरे, सांप्रदायिक हिंसा की पहचान में भी हीला-हवाला है। जिहादी हमलों के शिकार लोगों को सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों में नहीं गिना जाता। जबकि अधिकांश ऐसे हमले स्थान, दिन और घड़ी देखकर ऐसे संगठित की जाती हैं ताकि एक विशेष समुदाय के लोग ही शिकार हों या न हों। तब यह ‘लक्षित’ सांप्रदायिक हिंसा के हिसाब से कैसे बाहर है? दिल्ली, जम्मू, वाराणसी, कोयम्बटूर, पुणे, अयोध्या, अक्षरधाम, संकटमोचन, रघुनाथ मंदिर, महाबोधि मंदिर, आदि हमले देखें। दीवाली की पूर्व-संध्या पर सरोजिनी नगर बाजार में या मंदिरों आदि में की गई आतंकी हिंसा तो स्पष्टतः समुदाय ‘लक्षित’ हिंसा है। दूसरे उदाहरणों में भी हमले का दिन, समय और स्थान किसी समुदाय को बचाते हुए अन्य समुदाय को मारने की दृष्टि से चुना जाता रहा है। फिर उस हिंसा की पूरी मानसिकता सांप्रदायिक उद्देश्य से परिचालित होती है। जैसा अभी यासीन भटकल की निशानदेही पर हुए दर्जनों छापों और गिरफ्तारियों से देखें कि आतंकी कार्रवाइयों में लगभग संपूर्णतः केवल एक समुदाय के लोग सक्रिय रहते हैं। इसलिए जिहादी आतंक के शिकार हिन्दुओं को सांप्रदायिक हिंसा के गणित में न जोड़ना मनमानी है, जो राजनीतिक कारणों से की जाती है।

आतंकी, जिहादी कार्रवाइयाँ सांप्रदायिक, लक्षित हिंसा ही हैं, इसका एक प्रमाण वैसे आतंकियों के प्रति एक समुदाय विशेष के नेताओं और लोगों की सांप्रदायिक एकजुटता से भी मिलता है। संसद पर हमला करने वाले मुहम्मद अफजल को सजा देने के विरुद्ध जम्मू-कश्मीर विधान सभा ने प्रस्ताव पास किया। फिर पूरे राज्य में बंद आयोजित हुआ। बड़े-बड़े कश्मीरी नेताओं ने उस जिहादी के प्रति आदरसूचक शब्दों का प्रयोग किया। अभी कश्मीर के एक मुस्लिम संगीत ग्रुप ने अपना एक अलबम अफजल को समर्पित किया है। कुछ यही रुख मुंबई हमले में पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब के प्रति भी दिखा, जब उसे इच्छित भोजन देने और बाद में मजहबी सम्मानपूर्वक दफनाए जाने की माँगें की गईं।

ऐसी बातों से उस मिथ्याचार को पहचाना जा सकता है कि ‘आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता’। उपलब्ध प्रमाण और व्यवहार दिखाते हैं कि न केवल आतंकवादियों का मजहब होता है, बल्कि वे मजहबी विश्वास से ही वह सब करते हैं। तभी संबंधित समुदाय उस की वह भर्त्सना भी नहीं करता, जिस से आतंकी हिंसा को सांप्रदायिक हिंसा से बाहर रखने का कोई आधार बनता, चाहे कमजोर ही सही। परंतु भारत और अंतर्राष्ट्रीय स्तर भी देखा गया कि कुख्यात जिहादियों की निंदा करने में भी मुस्लिम समुदाय अनिच्छुक रहा है। वैसे भी, भारत में तमाम आतंकी हमले और उन में मृतकों का हिसाब सीधे बताता है मरने वाले भारी संख्या में हिन्दू हैं, और आतंक बरपाने वाले मुख्यतः मुस्लिम। इसे सांप्रदायिक हिंसा के गणित में न जोड़ना जालसाजी है।

वैसी ही जालसाजी में उत्तर-पूर्व में इसाई उग्रवादियों के हाथों मरने वाले हिन्दुओं को नहीं गिना जाता। नगालैंड और मिजोरम में इक्के-दुक्के और सामूहिक रूप से हिन्दुओं का मारा जाना, प्रताड़ित होना, दबाव द्वारा धर्मांतरित, विस्थापित होने पर भी उसे गिनती में नहीं लिया जाता। जबकि उड़ीसा में किसी हिन्दू के हाथों कुल तीन इसाईयों के मरने का दुनिया भर में वर्षों प्रचार होता है। इस चुनी हुई रिपोर्टिंग और प्रचार से वास्तविक गणित के विपरीत छवि बनाई जाती है कि भारत में ‘बेचारे अल्पसंख्यक इसाई बहुसंख्यक हिन्दुओं द्वारा सताए जाते हैं।’

सांप्रदायिक हिंसा के शिकार का गणित जोड़ने में वैसा ही छल जम्मू-कश्मीर के संदंर्भ में भी हुआ है। कश्मीर में संपूर्ण हिन्दू समुदाय को मार भगाने की गिनती सांप्रदायिक हिंसा में नहीं की जाती। तर्क है कि वहाँ आतंकियों के हाथों मुस्लिम भी तो मरे! मगर इस तर्क में पोल है। यह छिपाया जाता है कि उन मुस्लिमों को मारने वाले कोई हिंदू नहीं थे। जबकि हिन्दुओं को मारने वाले केवल मुस्लिम थे। उससे भी अधिक बुनियादी यह कि उन्हें केवल इसीलिए मारा गया क्योंकि वे हिन्दू थे। वह भी तब जबकि किसी कश्मीरी हिन्दू द्वारा किसी मुस्लिम को चोट पहुँचाने का कोई समाचार नहीं रहा है। तब भी उन्हें निरंतर मारा, भगाया और सताया गया। यह केवल जिहादियों ने नहीं, सामान्य कश्मीरी मुसलमानों ने भी किया जो उन हिन्दुओं के पड़ोसी थे। वहाँ से जान बचाकर आए प्रत्येक हिन्दू ने यही गवाही दी है। तब यह सबसे घृणित सांप्रदायिक हिंसा के सिवा क्या है? मगर सांप्रदायिक हिंसा के गणित से यह बाहर रखा गया है।

तीसरे, भारत में दंगों का कम से कम सौ साल पुराना अविच्छिन्न इतिहास है। मगर आज इस के उत्पीड़क और उत्पीडित की गणना में पाकिस्तान और बंगलादेश के आँकड़े गुम रखे जाते हैं। वह भी तब, जब उन दोनों देशों में हजारों हिन्दू मंदिरों के विध्वंस का ‘मूल कारण’ भारत में बाबरी मस्जिद गिराने जैसी एक घटना को बताया जाता है! अर्थात्, तीन स्वतंत्र देश हो जाने के बाद भी हिन्दू-मुस्लिम दंगे के हिसाब में आपसी संबंध होने के बावजूद दंगों के शिकार के हिसाब में पाकिस्तान और बंगलादेश में हिन्दू जान-माल-पूजास्थल की हानि नहीं जोड़ी जाती। जबकि वास्तविकता यह है कि, बाबरी मस्जिद गिरने के पहले, केवल 1989 के एक वर्ष में ही बंगला देश में सैकड़ों हिन्दू मंदिर तोड़ डाले गए थे। पूरा हिसाब जोड़ने का हाजमा शायद ही किसी सेक्यूलर समीक्षक के पास हो!

चौथे, हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिक हिंसा के विमर्श में अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य को नजरअंदाज किया जाता है। विभिन्न देशों में मुस्लिमों के इसाइयों के साथ सांप्रदायिक हिंसा/सद्भाव संबंध, तथा हिन्दुओं के इसाईयों के साथ उसी संबंध की तुलनात्मक स्थिति देखने से इंकार किया जाता है। जबकि भारत में सांप्रदायिक हिंसा का गणित व व्याकरण समझने में वह अनावश्यक नहीं है। इसलिए भी, क्योंकि यूरोप में भी मुस्लिमों द्वारा हिन्दू मंदिरों और बस्तियों पर हमले की घटनाओं के शिकार और शिकारी प्रायः आप्रवासी भारतीय-पाकिस्तानी-बंगलादेशी ही अधिक रहे हैं। पर एक कारण और है। यूरोपीय-अमेरिकी-अफ्रीका महादेशों में सांप्रदायिक हिंसा का आकलन साथ में देखना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि उससे उत्पीड़क-उत्पीड़ित का हिसाब करने, और समस्या के मूल कारण तक पहुँचने में मदद मिलती है।

इस प्रकार, दंगे के गणित में सभी जरूरी विवरणों को जोड़ें तो तस्वीर बिलकुल उलट जाती है। जिसे उत्पीड़ित मानकर यहाँ एक फासिस्ट कानून बनाने का प्रस्ताव था, वास्तव में उसी ने दूसरे समुदाय, बल्कि समुदायों को सारी दुनिया में आतंकित कर रखा है। यह स्वयं उस समुदाय के विविध संगठनों की खुली घोषणाओं से झलकता है कि वह शत-प्रतिशत सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा है जो दूसरे समुदाय को निशाना बनाकर अपनी आक्रामक, विस्तारवादी योजनाएं बनाती है। फिर उसे लागू करने के लिए किसी भी हद तक जाती है। यहाँ तक कि अपने समुदाय के बाधकों को भी दंडित करती है।

यह सचाई न तो केवल भारत की बात है, न केवल आज की। कथित अल्पसंख्यक समुदाय ही कथित बहुसंख्यक समुदाय को मारता, धमकाता, प्रताड़ित-अपमानित करता और उनकी जमीन और सर्वस्व छीनता रहा है। यह सब न केवल आँकड़ों के गणित, बल्कि स्वयं अनगिनत अल्पसंख्यक नेताओं की घोषणाओं, दावों और धमकियों में भी दर्ज है। फिर बंकिमचंद्र, शरतचंद्र, श्रीअरविन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर, लाला लाजपत राय, एनी बेसेंट, महात्मा गाँधी, डॉ. भीमराव अंबेदकर और डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे महापुरुषों के अवलोकनों में भी स्पष्ट अंकित है। भारत का विभाजन एकतरफा सांप्रदायिक हिंसा के बल पर हुआ। इसे स्वयं जिन्ना ने भी स्वीकारा था कि मुस्लिम लीग द्वारा हिन्दू-विरोधी दंगे ही निर्णायक कारण थे, अन्यथा पाकिस्तान नहीं बनता।

विभाजन के बाद भी पाकिस्तानी क्षेत्रों से हिन्दुओं को मार भगाया गया या जबरन धर्मांतरित करा लिया गया। जिन्हें सांप्रदायिक हिंसा का तुलनात्मक गणित देखना हो, वे नोट करें कि 1947 से 1989 तक भारत में हिन्दुओं के हाथों जितने मुसलमान मरे, उतने हिन्दू पूर्वी पाकिस्तान (बंगलादेश) में 1950 के कुछ महीनों में ही मारे जा चुके थे। वह अंतिम भी न था। फिर सन् 1971 में वहाँ कम से कम दस लाख हिंदुओं का संहार हुआ। बंगलादेश में हुआ वह नरसंहार विगत आधी सदी में दुनिया का सबसे बड़ा था! किन्तु उस के मुख्य शिकार हिंदू थे, यह तथ्य सब ने नजरअंदाज किया है। क्यों किया है? क्या यह हमारे बुद्धिजीवियों के सोचने का विषय नहीं? फिर, क्या इस बौद्धिक भैंगेपन से बीमारी के बढ़ने का कोई संबंध नहीं?

पूरा हिसाब करें, तो भयावह वास्तविकता सामने आती है कि केवल 1947 के बाद से हुई सांप्रदायिक हिंसा में मुसलमानों की तुलना में नौ गुना हिन्दू मारे गए! विस्थापन, और शरणार्थियों के आकंड़ों में भी उस की झलक है। जहाँ पाकिस्तान और बंगलादेश से उत्पीड़न के मारे हिन्दू शरणार्थी लाखों की संख्या में भारत आते रहे, वहीं उसी कारण भारत से पाकिस्तान जाने वाले मुस्लिम नगण्य थे।

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4 Comments on "दंगों का गणित / शंकर शरण"

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इंसान
Guest
हिन्दू मुस्लमान को लेकर स्वतन्त्र भारत में छियासठ वर्षों बाद आज मरने मारने (डॉ. मधुसूदन द्वारा निष्कर्ष) की बात क्योंकर होती है? इस से पहले कि इस प्रश्न का उत्तर मिले, मन में सोचता हूँ कि क्या भारत सचमुच स्वतन्त्र है? भारतीय स्वतंत्रता अभियान व उसके तुरंत उपरान्त इंडियन नेशनल कांग्रेस द्वारा रचित भारतीय इतिहास में जहां कहाँ वर्णित नेहरू का व्यक्तित्व व उनकी भारत व हिन्दू-विरोधी नीतियों को एक साथ देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि थॉमस बैबिंगटन मैकॉले के एक ही भारतीय सपूत जवाहरलाल नेहरु ने रक्त रंग, और रूप में भारतीय होते अंग्रेजी सोच, नैतिकता,… Read more »
प्रताप
Guest

आप सभी से मेरा एक विनम्र निवेदन है की क्या कारन है की सब के सब समाचार चैनल हिंदू विरोधी अथवा सनातन धर्मं के विरोधी हो गए है |इनका आपस मैं कोई सम्बन्ध है क्या ??? इस बात की कोई जानकारी हो तो आपका आभारी रहूँगा |
वंदे मातरम

Konark Kumar
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नेहरू ने शुरू से ही मीडिया और अकामियों को हिन्दू-विरोधी रुख अपनाने को मजबूर किया। धीरे-धीरे वह उनकी आदत हो गई है, जिसे ‘कन्वेंशनल विजडम’ समझा जाता है। यह विचारधारा का दुष्प्रभाव है, जिसे गैर-वामपंथी राजनीतिक दलों ने दूर करना या उनसे गंभीरता से लड़ना जरूरी नहीं समझा। बल्कि बेध्यानी में वे भी वही बातें दुहराते हैं। जैसे, संघ-परिवार वाले सेक्यूलरिज्म की दुहाई देते हैं, और इस्लाम के सामने सिर झुकाते हैं। बिना जाने-समझे कि ये सब है क्या!

डॉ. मधुसूदन
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||कॉमन सेंस वालों के लिए क्वेश्चन||
प्रश्न भारतके संदरभ में॥
(१) एक विशाल कक्ष में १००० म. और ९००० ह. (याने १और ९ के अनुपात में) विद्यमान है.
(२) यदि दोनों समुदाय समान रूप से हिंसा के लिए उत्तेजित होते हैं, तो “ह” की हिंसा की क्षमता “म” से ९ गुनी होगी, या नहीं?
(३) निष्कर्श ===> “म” “ह” की अपेक्षा नौ (९) गुना मारा जाएगा।
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अब यही समीकरण पाकिस्तान में भी लगाकर दिखाइए|

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