लेखक परिचय

संजय स्‍वदेश

संजय स्‍वदेश

बिहार के गोपालगंज में हथुआ के मूल निवासी। किरोड़ीमल कॉलेज से स्नातकोत्तर। केंद्रीय हिंदी संस्थान के दिल्ली केंद्र से पत्रकारिता एवं अनुवाद में डिप्लोमा। अध्ययन काल से ही स्वतंत्र लेखन के साथ कैरियर की शुरूआत। आकाशवाणी के रिसर्च केंद्र में स्वतंत्र कार्य। अमर उजाला में प्रशिक्षु पत्रकार। दिल्ली से प्रकाशित दैनिक महामेधा से नौकरी। सहारा समय, हिन्दुस्तान, नवभारत टाईम्स के साथ कार्यअनुभव। 2006 में दैनिक भास्कर नागपुर से जुड़े। इन दिनों नागपुर से सच भी और साहस के साथ एक आंदोलन, बौद्धिक आजादी का दावा करने वाले सामाचार पत्र दैनिक १८५७ के मुख्य संवाददाता की भूमिका निभाने के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़ाव। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ लेखन कार्य।

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संजय स्वदेश

जुलाई के अंतिम दो दिन बिजली ने आधे भारत को गच्चा दे दिया। शहरी जिंदगी में हाहाकार मच गया। मतलब बिन बिजली सब सून। केंद्र और राज्य एक दूसरे पर दोष मढ़ते रहे। केंद्र ने कहा, राज्य जरूरत से ज्यादा दोहन करते हैं। गुजरात ने प्रधानमंत्री ने जवाब मांग। केंद्र सरकार ने कहा, राज्य जरूरत से ज्यादा बिजली का दोहन कर रहे हैं। दो दिन तक बिजली के अंधरे पर जुड़े एक से बढ़ कर एक रचनात्क शीर्षक के साथ बिजली का अंधेरा मीडिया की सुर्खियों में रहा।

बिजली पर केंद्र और राज्यों की आपसी राजनीतिक के बीच बिजली का वह जरूरी मुद्दा पहले की तरह की खोया रहा। देश में तीन ग्रिड हैं और तीनों ग्रीड की बिजली शहरों को रौशन करती है, ट्रेनों की आवाजाही सुचारु करती है, शहरी जीवनशैली को सुचारू रूप से चलाने के लिए बिजली की जितनी जरूरत होती है ये ग्रिड उन्हें पूरा करते हैं। लेकिन क्या सचमुच दो ग्रिड के गिर जाने से सचमुच आधा भारत अंधेर में डूब गया?

मीडिया ने शब्दों के खेल से आधे भारत को अंधरे में डूबा दिया। मीडिया का आधा भारत मानें वह भारत जो हमेशा बिजली से रोशन रहा करते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि तीनों ग्रीड से उत्पादित बिजली की आधा हिस्सा भी उस आधे भारत की आम जनता तक नहीं पहुंचती है, जिसको इस आपूर्ति ठप्प होने पर प्रभावित बता दिया गया। आधे भारत के इन लोगों की ग्रिड तो रोज ही फेल होती है। इस आधे भारत में भी तिहाई चौथाई भारत तो ऐसा है जिसकी कोई ग्रिड ही नहीं है। आज भी देश के 40 करोड़ लोगों के पास इस ग्रिड वाली बिजली बत्ती की कोई सुविधा नहीं है।

 

शहरी इलाके को छोड़ दें तो देश का आधे हिस्से में हर दिन बिना बिजली अंधेरे का सन्नाटा पसरा रहता है। छोटे-मोटे कस्बाई इलाके में तो जरनेटर की बिजली से दो चार घंटे व्यावसायिक कार्य पूरे किए जाते है। लेकिन इससे हवाओं में जहरीला धुआ घुल कर जनता की सेहत खराब कर रहा है। इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। ग्रामीण इलाकों में तो बिना बिजली की दिनचर्या जनता की नियती है। उनका भरोसा बल्ब की रोशनी में नहीं, बल्कि केरोसिन के जलते दिए की लौ में है, जिसकी ग्रिड कभी फेल नहीं होती है।

आजाद भारत में विद्युत क्रांति के नाम पर देश के सुदूर इलाकों तक बिजली के तार पहुंच गए। लेकिन बिजली की रौशनी उन गांवों को वैसे नहीं नहला पाई जैसे शहरों में भी रात में दिन का अहसास होता है। लिहाजा, सुचारु बिजली हमेशा से ही जनता के लिए लुभावनी रही है। इस आकर्षण में जनता भी जाने-अनजाने में फंसती रहती है। कभी बिजली के लिए सरकारी कार्यालयों का घेराव करती है, तो कभी हाइवे पर चक्का जाम कर पुलिस की लाठी खाती है। चुनाव में यही बिजली महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल होती है। संसद या विधानसभा, किसी भी चुनाव में मुद्दों का रिकार्ड देंखे। बिजली की सुचारु आपूर्ति महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल रही है। चुनाव से पहले सरकार 24 घंटे बिजली देने का सपना बोती है। चुनाव में 24 घंटे बिजली आपूर्ति का का वादा पूरे करने का दावा दोहराती है। लेकिन हकीकत में क्या होता है, सब जानते हैं। गांव से तालुक्कात रखने वाले अनेक लोगों की स्मृति पटल पर करीब एक-दो दशक पहले के वे दिन जरूर याद होंगे, जब अचानक बिजली का बल्ब जलता था और लोग खुशी के मारे उछलते हुए यह कहते थे अरे! बिजली आ आई, पर वह क्षण भर की खुशिया बल्ब बुझने के कुछ ही मिनट काफूर हो जाती थी। जब ग्रामीण जनता इसकी अभ्यस्त हो गई, तब बिजली से उसकी अपेक्षा ही खत्म हो गई।

 

ग्रीड़ों से उत्पन्न बिजली भले ही शहरों में पहुंच कर कंपनियों की झोली नकदी से भरती हो, लेकिन उसका उस बिजली को उपभोग का हक ग्रामीण भारत को भी है। उनके हिस्से में सरकार प्रकृतिक प्रदत ऊर्जा को बढ़ावा देने की बात कर ही है। अनुदान भी देती है। अक्षय ऊर्जा ना से मंत्रालय भी है। लेकिन हर वर्ष हजारों करोड़ खर्च करके भी अक्षय ऊर्जा को ग्रामीण भारत क सुलभ नहीं कराया जा सकता है। सुदुर गांवों तक कुछ सौर ऊर्जा वाले उपकरण पहुंचे हैं, लेकिन वे इतने महंगे हैं कि आम लोगों के लिए खरीदना आसान नहीं है। सौर ऊर्जा की क्रांति अभी सुगबुगाहट की दौर में है। यह कब जवां होगी भविष्य के गर्भ की बात है। फिलहाल ग्रिड़ों से निकलने वाली

बिजली गांवों तक पहुंचे न पहुंचे, ग्रामीणों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। गांवों में गुजर-बसर करने वाली बुनियादी जरूरतों वंचित देश की बदहाल जनता के लिए बिजली की रौशनी अब उसकी जिंदगी में मायने नहीं रखते हैं। आबाद शहरों में लिए बिना बिजली जीना सपना है, वहीं ग्रामीण भारत में यह सबसे सहज है।

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