लेखक परिचय

अनिल त्‍यागी

अनिल त्‍यागी

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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अनिल त्यागी

गुलाम मोहम्मद वस्तानवी के दारूल उल उलूम देवबन्द के मोहतमिम चुने गये तो उनकी तारीफ में ढेरो बयान और बाते आई। मजलिसे शूरा ने जिस यकीन और एतबार से वुस्तानवी साहब की चुनाव किया था उस पर वो खरे नहीं उतर पाये। अब इसे चाहे लोग इस संस्था की अन्दरूनी सियासत का नाम दे या कुछ और, पर कुल मिला कर जो हालात पैदा हो गये है उन सब के लिये वुस्तानवी साहब अपने आप जिम्मेवार है। अब चाहे वे उर्दू मीडिया को कोसे या अपनी समझ को,

दारूल-उल-उलूम देवबन्द जिसे वहॉ के आम लोग अरबी मदरसा के नाम से जानते कभी उत्तेजित होकर बयानबाजीयों और बहसों में नहीं उलझता क्योंकि यह इसका काम नहीं है।हजारों तालिबिल यहॉ पढते है सबके सब उस उम्र के शैतानीयों की उमर होती है पर देवबन्द में आज तक इनकी शैतानियों या अनुशासनहीनता की कोई मिसाल लोगों के सामने नहीं आई।आप कल्पना नहीं कर सकते इस इदारे और इसके बगली दूसरे इदारे दोनों में लगभग छ: हजार छात्र हैं लेकिन इस इलाके मे कोई आधुनिक रेस्टोरेंट या फास्ट फूड का स्टाल नहीं है आस पास ले देकर दो चार ढाबे और चाय की दुकानें है। इससे साफ है कि यहॉ पढने वालो के लिये इनके इदारे में बेहतर खान पान के इंतजाम है।हालांकि इसमे पढने वाले देश विदेश के रईस खानदान के भी है।

वुस्तानवी साहब से पहले किसी भी मोहतमिम ने मीडिया सेंटर स्थापित करने की बात नहीं कही और वुस्तानवी जी ने तो आते ही मीडिया को महत्ता देनी शुरू कर दी अब बबूल का पेड बोया है तो आम तो मिलेंगे नहीं जिस मीडिया से जरिये उन्होनें पैठ बढाने की कोशिश की उसी में दिये बयानों के जाल में फंस गये, अब भले ही वो कहते रहें कि मैने ऐसा नहीं वैसा कहा था, पर सवाल तो ये है कि कुछ तो कहा था, और जो कहा था उसे सुनने वाले आजाद है कि वे उसका क्या मतलब लगाये,अब घर घर जाकर वुस्तानवी साहब अपने बयान को समझा तो नहीं सकते। उनके पूर्व के किसी मोहतमिम ने कभी अखबारी सुर्खीयों में जगह बनाने की कोशिश नहीं की ये ही वहॉ की रवायत बन गया अब वुस्तानवी साहब इन परम्पराओं को दरकिनार करना चाहे तो ऐसा मुमकिन नहीं, बयानबाजी और बहसबाजी दारूल उल उलूम की परम्परा नहीं है वुस्तानवी साहब को इससे बचना चाहिये था बच नहीं पाये और अब भी बच नहीं पा रहे है।

हालाकि वुस्तानवी साहब यहॉ से अपने इस्तीफे की घोषणा कर कर गये थे पर गुजरात पहुॅचते ही उनके बयान बदले बदले नजर आ रहे है और अगले ही दिन एक टी वी चैनल पर अपनी सफाई देते नजर आये जिसमें उन्होने लगभग माफी मांगने की कोशिश की, यहॉ भी वस्तानवी साहब याद नहीं रख पाये कि आम तौर पर दीनी मुसलमान टी0वी0 देखना अच्छा नहीं मानते। उर्दू मीडिया से लडाई के लिये हिन्दी मीडिया का सहारा यानि बुराई की एक लकीर को खत्म करने के लिये दूसरी बडी बुराई की लकीर को खींचने की कोशिश कर रहे हैं वस्तानवी साहब। मुझे तो लगता है कि मजलिशे शूरा की होने वाली बैठक इसे हल्के में नहीं लेगी और वस्तानवी साहब को जाना ही होगा।

दारूल उल उलूम देवबन्द का मूल सिलेबस दीनी तालीम का है दुनियावी फसादात का इससे कोई लेना देना नहीं, यह दीनी तालीम का इदारा दुनियादारी की बातो पर खामोश भले ही रहता हो पर उन पर पैनी निगाहबानी का काम करता है। हालांकि पिछले कुछ समय से हर बात पर फतवे को लेकर इसकी आलोचना भी होती आई है पर इसने कभी जवाब नहीं दिया अब ये बात समझने वाले समझ कर अपने आप समझाने लगे कि जब दुनिया मे मसलो में इजाफा है तो उन पर फतवो में इजाफा होना लाजिमी है।

अनुशासन और तालीम यहॉ के छात्रों को इससे ज्यादा और कुछ नहीं चाहिये और इससे ज्यादा और कुछ यहॉ उन्हें दिया भी नहीं जाता। और जहॉ तक इस तालीम के फायदे और रोजगार की बात है तो लोग भले ही न जानते हो पर लाखो की संख्या में देश में मदरसे है और उनमें पढाने वाले मौलवी साहब इस सिलेबस और शिक्षा की ही देन है तो आप स्वय अनुमान लगा लें कि जब मदरसे लाखो है तो उनमें पढाने वाल कितने लाख लोगो को इस दीनी तालीम ने रोजगार दिया है शायद अलीगढ और जामिया से भी ज्यादा लोगो को रोजगार दारूल उल उलूम और इससे जुडे मदरसो ने दिया है और दे रहा है जो काम सर्व शिक्षा अभियान और वर्ल्ड बैंक के बडे बडे बजट के प्रोग्राम नहीं कर पाये उन्हे यहॉ आकर शोध करने चाहिये कि ऐसा कैसे हो सकता है। जहॉ तक मदरसा एजूकेशन से फायदे की बात है इतना तो मै दावे से कह सकता हूं कि देश के करोडो मुस्लिमों को इस शिक्षा ने स्कालर भले ही न बनाया हो साक्षर बनाने में इसका अहम रोल है। और मुझे तो आज दारूल उल उलूम से शिक्षा पा कर निकलने वाला बेरोजगार नजर नहीं आया। वुस्तानवी साहब इससे आगे की सोच के एम.बी.ए है उनके जैसे विद्वान की यहॉ खपत होना आसान नजर नहीं आता।आधुनिक शिक्षा के लिये तो न जाने कितने स्कूल कालिज और यूनिवर्सिटीयां मौजूद है ऐसे में दारूल उल उलूम का किरदार बदलने की बेमानी कोशिश करने की परमीशन शायद ही मजलिसे शूरा और इस्लामी जगत को मंजूर हो।

जनाब मुस्तानवी साहब ने आई0बी0एन07 पर अपनी बातचीत में दिल की गहराइयों से कहा कि उन्होने मोदी को कोई क्लीन चिट नहीं दी उन्होने टाइम्स आफ इंडिया का हवाला देते हुए कहा कि उस में छपा है कि वुस्तानवी डीड नॉट गीव क्लीन चिट टू मोदी उन्होने बताया कि बयान गुजराती में दिया था जो अंग्रेजी में छपा और उर्दू मीडिया ने उसे तोड मरोड कर पेश किया।हो सकता है उनकी बात सही हो पर ये बात समझ से परे है कि मोदी के बारे में कोई क्लीन या डट्री चिट चिपकाने की जरूरत वस्तानवी साहब को क्यों आन पडी वे मोहतमिम दारूल उल उलूम देवबन्द के बनाये गये हैं गुजरात की किसी सरकारी संस्था के नहीं जो वे वहॉ के मुसलमानों और सरकार के सरोकार का गुणनान करें। इससे पहले ऐसे मसलो पर किसी मोहतमिम ने इस तरह विचार रखे भी नहीं। यदि वस्तानवी साहब को अपनी बातो पर कोई अफसोस जाहिर करना ही था तो उन्हे ये बात मुस्लिम विद्वानों और संस्थान से जुडे लोगों से करनी चाहिये थी किसी टी0वी0चैनल के माध्यम से नहीं। ये तो घर के अन्दर की बात आम करना ही हुआ और कोई पढा लिखा आदमी इस कोशिश को मंजूरी देने से परहेज ही करेगा।

दारूल उल उलूम देवबन्द में जहॉ स्थित है वहॉ जाने के लिये कोई चौडी 100 फुटा सडके नहीं है और न ही बिजली की बत्तियों से चकाचौंध होती सीनरियां है ले देकर पन्द्रह बीस फीट चौडे रास्तों से होकर ही इसके मुख्य द्वार तक पहुॅचा जा सकता है ये सडके ऐसी नहीं कि इन पर चला न जा सकता हो या कोई मोटर गाडी न चल सकती हो आराम से आना जाना होता है पर सरपट यानि की नये जमाने की चाल से दौडना मुश्किल होगा, ऐसे में वस्तानवी साहब को समझना होगा कि यहॉ लगभग एक सौ तीस साल पुराने दारूल उल उलूम की परम्पराओं को नये जमाने के चलन मे ढालना नामुमकिन होगा। ऐतिहासिक खासियत को बदलना कोई मजबूरी भी नहीं।

सभी धर्मो का मूल है साधन की पवित्रता ही साध्य प्राप्ति का साधन है, नेक नीयत मंजिल आसान,जैसे कथन दुनिया में न कभी बेमानी हुए और न ही कभी होंगे,वस्तानवी साहब को सोचना होगा कि जिस मोदी के बारे में उन्होने बात की, भले ही आज बेहतर काम कर रहा हो पर उनके सत्ता प्राप्ति के साधन क्या थे, कैसे धार्मिक उन्माद को उन्होने बोट मे बदल कर सत्ता पाई।दारूल उल उलूम देवबन्द ने भी हमेशा नेक नीयत को ही प्राथमिकता दी है। जिन्ना को,मुस्लिम लीग को सबसे पहले खारिज करने वाले यहीं के उलेमा थे। 2008 में आंतकवाद के खिलाफ जो मजबूती दारूल उल उलूम ने दिखायी उसी का नतीजा है कि देश के अधिंकाश मुस्लिम आतंकवादियों से कोई हमदर्दी नहीं रखते।

इस बात की भी चर्चा है कि मौलाना वस्तानवी 6फरवरी को देवबन्द लौटेंगे जहॉ उनका स्वागत करने वालो का हूजूम उमडेगा। वस्तानवी साहब हो सकता है कि देवबन्द के लोग अपनी सियासी मजबूरीयों से या सीधे सीधे कहें कि मदनी परिवार के विरोध के लिये आपके सम्मान को आये पर इससे कोई हल निकनले वाला नहीं है क्योंकि आपको तो मतलब होना चाहिये दारूल उल उलूम से वहॉ के छात्रों से मजलिसे शूरा से जनता से स्वागत करवा कर रूतबा जमाना अजीब सा लगता है। एक सवाल यह भी उछल रहा है कि वस्तानवी साहब जब किसी अन्य संस्था के प्रबन्धक है तो वे कैसे दूसरी संस्था के वाइस चांसलर हो सकते हैं।ये तो खैर वहॉ के बाईलाज ही जाने की नियमानुसार क्या है।

अन्त में एक बात और कहना चाहूंगा कि देवबन्द की सबसे खास चीज है वहॉ के मीठे बेर शायद ही दुनिया में इससे मीठा बेर कही और पैदा होता हो, और बेर के पेड पर कॉटे बहुत ही ज्यादा नुकीले होते हैं होशियार बागवान वहीं है जो मीठे बेरो को कांटेदार पेड़ों से सही सलामत बचा सके।

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1 Comment on "वस्तानवी साहब और दारूल उल उलूम देवबन्द की परम्पराएं"

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शैलेन्‍द्र कुमार
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शैलेन्द्र कुमार

वस्तानवी साहब ने दिल से बयान दिया था लेकिन दिमाग वालों की राजनीति ने उन्हें परेशान कर दिया और कट्टरपंथी मुसलमानों और देश के अन्य धर्मों के उनके कट्टरपंथी अनुयायियों ने उन्हें बता दिया कि किसी मुसलमान को उनके विपरीत अपनी राय रखने का अधिकार नहीं है चाहे वो देवबंद के कुलपति ही क्यों न हो

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