लेखक परिचय

कुमार सुशांत

कुमार सुशांत

भागलपुर, बिहार से शिक्षा-दीक्षा, दिल्ली में MASSCO MEDIA INSTITUTE से जर्नलिज्म, CNEB न्यूज़ चैनल में बतौर पत्रकार करियर की शुरुआत, बाद में चौथी दुनिया (दिल्ली), कैनविज टाइम्स, श्री टाइम्स के उत्तर प्रदेश संस्करण में कार्य का अनुभव हासिल किया। वर्तमान में सिटी टाइम्स (दैनिक) के दिल्ली एडिशन में स्थानीय संपादक हैं और प्रवक्ता.कॉम में सलाहकार-सम्पादक हैं.

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IMG-20160812-WA001770वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं तो शायद मेरे इस लेख की हेडिंग को देखकर बहुतों के मन में आक्रोश होगा, क्षोभ होगा। लेकिन बात ही कुछ ऐसी है कि कलम उठी तो जैसे कह रही हो कि हर एक शब्द के साथ इंसाफ करना। जो 15  अगस्त हम ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाते हैं, भारतीय सेना के जज्बे को सलाम करते हैं, उस पर इतराते हैं। राजपथ पर सेना की करतब को देखकर सलाम करते हैं।

लेकिन 15  अगस्त से ठीक तीन दिन पहले जब सेना के एक बड़े अधिकारी (विशेष सेवा मैडल सम्मान प्राप्त) के दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने ऐसी हरकत की जिसे जानकार आप भी कहेंगे- शेम-शेम-शेम। डीडीए ने उन्हें बिना मोहलत दिए किसी दबाव में इस बेकदरी से निकाला कि आप एक सैन्य अधिकारी की बेकदरी पर सिर झुका लेंगे। वो सेना के अधिकारी भारत सरकार में डेप्यूटेशन पर वर्तमान में प्रसार भारती में एडीजी हैं। वह इससे पहले दिल्ली गवर्नर हाउस में बतौर सचिव कार्य कर चुके हैं। उन्हें उसी वक्त डीडीए का ये ऑफिसर फ्लैट मिला था। अभी  वर्तमान में प्रसार भारती में हैं तो डीडीए को उन्होंने रिक्वेस्ट किया था कि जब तक मुझे MOIB  की तरफ से आवास अलॉट नहीं होता है तब तक उसी डीडीए फ्लैट में रहने दिया जाए। चूंकि उस सेना के अधिकारी की ईमानदारी ही कहिए कि आज तक वो एक अपना घर तक नहीं ले पाए थे।

डीडीए का अपना कोर्ट होता है, स्वाभाविक है- फैसला डीडीए के ही पक्ष में देते हैं… लेकिन फैसला कोई भी कोर्ट देता हो, आप किसी को घर खाली करने और दूसरा घर खोजने का वक्त तो देंगे ? लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जानकार बताते हैं कि एक खास बड़ी ताकत इसके पीछे काम कर रही थी, जिसके आगे बड़े आका भी बौने पड़ गए। बीते 11 अगस्त को उनके घर पर दर्जनों पुलिसकर्मी महिला पुलिसकर्मियों के साथ आते हैं, घर खाली करने की बात कहते हैं। ऑर्डर कहां है, ये पूछने पर मोबाइल मैसेज दिखाते हैं। लेकिन बिना ठोस आधार के थे, तो पुलिसकर्मियों को लौटना पड़ता है। लेकिन ठीक 12 अगस्त को अगले ही दिन वो अधिकारी अपनी पत्नी के साथ हाइकोर्ट जाते हैं गुहार के लिए… हाईकोर्ट में माननीय जज पूछते भी हैं कि पोजिशन किसका है- इन्हें पता न था कि इनमें घर में क्या हो रहा है। इनके वकील ने कहा- पोजिशन मेरा है। हाइकोर्ट ने कहा की अगली सुनवाई तक (Maintain Status Quo) यथा स्थिति बनाए रखें। ये जैसे ही कोर्ट से बाहर आते हैं, इनकी बेटी का फोन आता है कि पापा, सैंकड़ों आईटीबीपी के जवान आ गए हैं, जो घर में घुसकर तोड़फोड़ कर रहे हैं। बता दें कि आईटीबीपी के जवानों को देश में विपरीत परिस्थितियों के लिए लगाया जाता है। अधिकारी व उनकी पत्नी तेजी से भागकर घर आते हैं, पता चलता है कि कोर्ट के ‘Status Quo’ वाले फैसले पर इनलोगों ने फायदा उठाते हुए अपने हाथ में पोजेशन ले लिया। घर पहुंचते ही उन्हें व उनकी पत्नी को बंधक बना लिया जाता है। घर इस तरह तहस-नहस किया जा रहा है, कि जैसे घर में कोई आतंकी छिपा हो। उनकी बिटिया की चिल्लाहट, घबराहट और आक्रोश को कैमरे में कैद किया जाता है। अंत में दो घंटे तक चले इस तमाशे के बाद उन्हें घर से बाहर कर दिया जाता है। आज वो बेघर हैं, घर में सारा कपड़ा, दवा, सामान बंद है। परिवार को लेकर इधर-उधर हैं।

आप सोच रहे होंगे कि पूरी बात में मैंने उस सेना के अधिकारी का नाम नहीं बताया, तो ये बता दूँ , हमने जब उनसे कहा कि हम इसे प्रकाशित करवाएंगे तो वो बोले- मत लिखिए, मेरा नाम भी मत लिजिए, अभी 15  अगस्त स्वतंत्रता दिवस सामने है। सेना की सम्मान पर चोट की बात इस देश में न फैले। इससे देशवासियों का मनोबल टूटेगा।

लेकिन हम कलमकार हैं, सो सच बात सेना और देशवासियों तक भी पहुंचाना ज़रूरी था, सो लिख दिया। बस इस स्टोरी के मार्फत इतना ही कहेंगे कि इसे पढ़कर आप अपने सिस्टम पर लज्जित हो जायेंगे। कलमकार हूं तो मेरा काम लिखना था। अब आगे काम किनका है, यह बताने की ज़रूरत नहीं।

 

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