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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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अयूब कटारिया

हर रात के बाद दिन आता है और हर दिन के बाद रात आती है। मगर कश्‍मीर के जिन लोगों के लिए काली रात आई उनकी सुबह अभी तक नहीं आई है। ऐसे लोगों के लिए हर तरफ गम का ही माहौल अब तक बरकरार है। उनके लिए ईद और मुहर्रम सब एक जैसे हैं। गम के मारे यह वह लोग हैं जिनके साथ वक्त ने मजाक किया तो हुकुमत ने भी उन्हें तन्हां छोड़ दिया। घाटी में कई ऐसे लोग हैं जिनकी मौत आज तक रहस्मय बनी हुई है। मरने वाला न तो कोई सेलीब्रेटी था, न ही किसी संगठन से ताल्लुक रखता था और न ही किसी राजनीतिक पार्टी से संबद्ध था। यही कारण है कि उनकी मौत पर सिवाए घर वालों के किसी ने भी आंसू बहाना मुनासिब नहीं समझा। किसी ने भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि मरने वाले के परिवार वालों पर क्या गुजर रही है।

कुपवाड़ा जिला के करालपूरा ब्लॉक के तहत एक गांव वारसन गुजरान में एक मुसीबत का मारा बाप ने अपने जवान बेटे के गायब होने और फिर एक दिन उसकी लाश मिलने का जब किस्सा सुनाया तो कई सवाल उठने लगे। अपने आंसुओं पर काबू करते हुए उस 75 वर्षीय बुजुर्ग ने बताया कि उसका नाम अहमद गिनाई है। उनका एकलौता बेटा मो. सुल्तान था। जो अपने बच्चों का पेट पालने के लिए मजदूरी किया करता था। अहमद गिनाई के अनुसार वह किसी भी मिलीटेंसी या फौजी ग्रुप के साथ कभी भी नहीं रहा था। 1992 के अगस्त महीने में की एक दोपहर में तकरीबन तीन बजे अज्ञात बंदूकधारियों ने उसे अगवा कर लिया। हमसब उसका इंतजार करते रहे। परंतु मेरा बेटा दुकान पर सामान खरीदने ऐसा गया कि फिर कभी वापस नहीं आया। काफी खोजबीन के बावजूद उनके बेटे के मुर्दा या जिंदा होने का कोई पता नहीं चल रहा था। बेटे की खोज में उन्होंने गांवों, शहरों, जंगलों और यहां तक कि कब्रिस्तानों के भी चक्कर काट लिया। लेकिन कहीं पता नहीं चल सका।

आखिरकार पांच महीने दस दिनों की सख्त मेहनत और तलाश के बाद एक लकड़हारा ने जंगल में उनके बेटे की लाश और उसके कपड़े की पहचान कर उन्हें खबर दी। अहमद गुनाई कहते हैं कि खबर मिलने के बाद जब मैं राशनपुरा के जंगल में गया तो उनके बेटे की लाश मिटटी में दबी पड़ी मिली। जिसकी बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। उस समय उनके साथ भारतीय फौज के कुछ जवान तथा स्थानीय लोग मौजूद थे। अहमद गुनाई के शब्दों में सख्त सर्दी के बावजूद मेरा बदन पसीने से नहा गया। जिस बेटे को मैं अपने सीने से लगाया करता था वह लाश के रूप में मेरे सामने पड़ा था। मेरी बसी बसाई दुनिया उजड़ चुकी थी।

मृतक सुल्तान गुनाई के दो बच्चे एक लड़का और एक लड़की है। जिस वक्त उनके पिता की हत्या की गई थी उस समय लड़के की उम्र मात्र 17 दिनों की थी। पिता की मौत से न सिर्फ बच्चों के सर से साया उठ गया बल्कि जीवन की गाड़ी चलाना भी कठिन हो गया। घर का एकमात्र कमाने वाला व्यक्ति के जाने से घर में आर्थिक तंगी छा गई। जिसके कारण उसकी बड़ी बेटी रूबिना सुल्तान की पढ़ाई भी छूट गई। इनके घर का बमुश्किल खर्च निकल पाता है। दूसरी ओर जीवन के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुके बूढ़े अहमद गुनाई भी कई गंभीर बीमारियों के शिकार हो चुके हैं। ऐसे में घर की आमदनी जुटाना मुष्किल हो जाता है। बड़ी मुष्किल से भीख मांगकर अपना और अपने बेटे की निशानियों का पेट भरते हैं। इस मंहगाई के दौर में उनके खर्च किस प्रकार पूरे हो पाते होंगे इसका अंदाजा कोई भी आसानी से लगा सकता है। उनके पास सिर्फ इतनी जमीन है कि जिसपर पत्थरों का बना घर है जिसकी छत मिटटी की बनी हुई है। सर्दी के सख्त महीनों में जब तीन माह तक बर्फ पड़ती रहती है तो घर के अंदर भी बर्फ गिरते रहते हैं।

अहमद गुनाई को आज भी सरकारी योजनाओं के लाभ का इंतजार है। यही नहीं बल्कि उन्हें इस यतीम बच्चों की षिक्षा के लिए भी कोई सुविधा प्राप्त हुई है। अफसोस इस बात का है कि सरकार योजनाएं तो बनाती है जनता के हित के लिए परंतु उसका लाभ वास्तविक हकदार तक शायद ही पहुंच पाता है अथवा बहुत कम पहुंच पाता है। इस बुजुर्ग को अबतक इंदिरा आवास योजना का लाभ नहीं पहुंच पाया था। हालांकि सरकारी वेबसाइट पर इस बात का विषेश उल्लेख है कि मैदानी क्षेत्रों के जरूरतमंदों को विशेष आर्थिक मदद के रूप में इंदिरा आवास योजना के तहत 45 हजार रूपए तथा पहाड़ी एवं दुर्गम क्षेत्रों के जरूरतमंदों को 45 हजार 500 रूपए दिए जाएंगे। इसके अतिरिक्त जरूरतमंदों को 20 हजार रूपए वार्शिक 4 प्रतिशत की दर से कर्ज भी उपलब्ध कराया जाएगा। परंतु ऐसी घोषणाएं केवल घोशणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह गई है। प्रष्न उठता है कि क्या अहमद गुनाई जैसे लोग केवल इस आधार पर इन योजनाओं के लाभार्थी नहीं हैं कि उनकी पहचान अधिकारियों तक नहीं है। उम्र के आखिरी पड़ाव में एक तरफ बेटे की जुदाई तो वहीं दूसरी ओर उन बच्चों की रोजी रोटी का इंतजाम करना कितना मुश्किल होता है वह उनसे बेहतर और कौन बता सकता है। उम्मीद तो यह थी कि बढ़ापे के वक्त उनका बेटा सहारा बनता लेकिन कुदरत के इस खेल में उनके साथ उल्टा ही हुआ। सवाल यह है कि राज्य सरकार के पास कई विषेश स्कीमों के साथ साथ कई सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाएं हैं जो इन्हीं जैसों की मदद का दावा करते हैं। बावजूद इन सबके आखिर उनकी मदद क्यूं नहीं हो पा रही है। सरकार का कर्तव्य केवल योजनाओं के बनाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। आवश्‍यकता इस बात की है कि इन योजनाओं का जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन हो इसके लिए ठोस नीति बनाई जाए। अन्यथा विशेष आर्थिक पैकेज की झड़ी लगा देने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। (चरखा फीचर्स)

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