लेखक परिचय

तारकेश कुमार ओझा

तारकेश कुमार ओझा

पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ हिंदी पत्रकारों में तारकेश कुमार ओझा का जन्म 25.09.1968 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में हुआ था। हालांकि पहले नाना और बाद में पिता की रेलवे की नौकरी के सिलसिले में शुरू से वे पश्चिम बंगाल के खड़गपुर शहर मे स्थायी रूप से बसे रहे। साप्ताहिक संडे मेल समेत अन्य समाचार पत्रों में शौकिया लेखन के बाद 1995 में उन्होंने दैनिक विश्वमित्र से पेशेवर पत्रकारिता की शुरूआत की। कोलकाता से प्रकाशित सांध्य हिंदी दैनिक महानगर तथा जमशदेपुर से प्रकाशित चमकता अाईना व प्रभात खबर को अपनी सेवाएं देने के बाद ओझा पिछले 9 सालों से दैनिक जागरण में उप संपादक के तौर पर कार्य कर रहे हैं।

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क्रिकेट का एक मैच यानी हजारों सहूलियत का कैच। बाजार के लिए यह खेल बिल्कुल गाय की तरह है। जो हमेशा देती ही देती है। नाम – दाम और पैसा बस इसी खेल में है। दूसरे खेलों के महारथी जीवन – भर सुख – सुविधाओं का रोना रोते हैं, जबकि यही सुख – सुविधाएं  मानो क्रिकेट खिलाड़ियों के चरण में लोटने को तरसती रहती है। दुनिया के  विकासशील देशों में क्रिकेट आम – आदमी से लेकर महान हस्तियों यहां तक कि प्रधानमंत्री जैसे पद पर रहने वालों को सीधे प्रभावित करता है।  तो इसकी सबसे बड़ी सुविधा यह है कि घंटों करते रहिए मैच के हर कोण का पोस्टमार्टम। जीते तो भी हारे तो भी। मैच हारे तो हार की लाश के पोस्टमार्टम के बहाने घंटों खींच सकते हैं। और यदि जीत गए तो फिर कई दिनों की बल्ले – बल्ले।  मैच जिताऊ  क्रिकेट खिलाड़ियों को असाधारण से लेकर अवतारी पुरुष तक बनाने की यहां छूट है। बुलंद सितारे वाले खिलाड़ियों के परिजनों से लेकर दोस्त, प्रेयसी , बांधवी व गर्ल फ्रेंड तक का लंबा इंटरव्यू दिखाया जा सकता है। वर्तमान में चल रहे खिलाड़ियों की महिमा का बखान करने के बहाने आप उन चेहरों पर भी  घंटों फोकस बनाए रख सकते हैं, जो अब रिटायर्ड हो चुके हैं और हाशिये पर पड़े है। इस बहाने पेज थ्री कल्चर का बखूबी पोषण हो सकता है। दुनिया के तमाम दूसरे खेल फूल की तरह है, जो खेले यानी खिले और चंद  मिनटों में खत्म यानी मुर्झा गए। लेकिन क्रिकेट का मामला हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह है। जैसे मान लीजिए कि बारिश के चलते कोई मैच हुआ ही नहीं। फिर भी आंकड़ों के जरिए यहां यह बताने की गुंजाइश है कि इससे पहले कब – कब बारिश के चलते मैच रद हुआ था। कोई टीम लगातार हारती ही जा रही है तो भी आंकड़ों के जरिए बताया जा सकता है कि हारने के मामले में अब तक दूसरी टीमों का रिकार्ड क्या रहा है। यह संभावना दूसरे खेलों में नहीं है।  खबरों की दुनिया के लिहाज से आकलन करें तो हादसों में मौत और सैनिकों पर आतंकवादी हमला सबसे ज्यादा नेगलेक्टेड और ओवरलुक की जाने वाली खबरे हैंं। इसका इस्तेमाल बस फीलर या रुटीन खबरों की तरह ही होता है। बहुत हुआ तो सुर्खियां दिखाने के दौरान कुछ फुटेज दिखा दिए। स़ड़क हादसों में होने वाली मौत तो खबरों की दुनिया के लिए कभी चिंतनीय प्रश्न रहा ही नहीं। हां रेल हादसों का मसला काफी हद तक समय और परिस्थिति पर  निर्भर करता है। बिल्कुल शेयर मार्केट की तरह। कभी तो किसी मालगाड़ी के बेपटरी हो जाने की खबर देर तक चलती रहती है और कभी बड़े हादसों को भी वह महत्व नहीं मिलता। जो मिलना चाहिए। क्योंकि एेसी दुर्घटनाओं में मरता तो बिल्कुल आम आदमी ही है। जैसे उस दिन हुआ। विश्व कप क्रिकेट में बांग्लादेश पर भारतीय टीम की जीत के बाद मानो चैनलों ने पूरे दिन दर्शकों को क्रिकेट के रंग में रगने की अग्रिम  तैयारियां कर रखी थी। एंकरों पर इसका नशा कुछ इस कदर चढ़ा हुआ था कि सफल खिलाड़ियों का  बखान ही नहीं महिमामंडन करने की जैसे  होड़ सी मची थी। । लेकिन तभी जम्मू कश्मीर में आतंकवादी हमला…. तीन जवान शहीद… और रायबरेली में ट्रेन हादसा, 32 की मौत की खबर अाई। लेकिन चैनलों पर क्रिकेट पुराण जारी था। हादसे से जुड़ी खबरों को बिल्कुल चलताऊ तरीके से निपटाया जा रहा था। मसलन  रेल राज्य मंत्री ने की   मुआवजे की घोषणा…  दिए जांच के आदेश। सुर्खियां दिखाने के दौरान बस एकाध बार रेल राज्य मंत्री का चेहरा और फिर दुर्घटनास्थल का सामान्य फुटेज। जिसमें साफ नजर आ रहा है कि सरकारें बदलने के बावजूद यह वही रेल है, जिसे हम  सालों से इस्तेमाल करते आ रहे हैं।  विश्व कप  क्रिकेट पर भारत की बांग्लादेश पर जीत न हुई होती तो चार लोग चैनलों पर बहस के लिए बैठाए भी जा सकते थे। रेल व्यवस्था पर छाती पीटने के लिए। लेकिन ….।

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